शनिवार, 31 जनवरी 2015

अर्जुन का विषाद

प्रकृतीय मोंह में जीवन जीते हुये प्रत्येक मनुष्य को प्रकृतीय रूपों से लगाव हो जाता है । जब उस लगाव को त्यागने की स्थिति सम्मुख होती है उसे ऐसा लगता है कि जब सब छूट ही जावेगा तो फिर जीयेंगे किस लिये । यह भय उसे सन्यास का रूप विदित करता है । सन्यास का स्वरूप अनुभव आने पर वह सन्यासी नहीं बनना चाहता है इसलिये वह अपना वास्तविक भय व्यक्त नहीं करता और कुछ अन्य कारण बाधा के रूप में बताता है । सत्य बात यह होती है कि मनुष्य एक अज्ञात लोक को जाने के लिये अपने ज्ञात लोक को त्यागना नहीं चाहता है । इस स्थिति को भ्रामक अभिव्यक्ति द्वारा प्रगट करता है । 

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

कौरव पाण्डव युद्ध

मनुष्य के हृदय में प्रतिदिन प्रतिपल चलने वाला युद्ध है । दुर्वृत्तियों और सद्वृत्तियों के मध्य युद्ध है । प्रकृतीय मोंह और आत्मज्ञान के मध्य का अंतराल है । यह युद्ध प्रत्येक मनुष्य के हृदय में चलता है । अर्जुन नाम मात्र एक उदाहरण है । एक मनुष्य जो अब तक प्रकृतीय मोंह में जीवन यापन कर रहा था । उसे जब प्रकृतीय मोंह को त्याग आत्मज्ञान की ओर उन्मुख होने की जिज्ञासा हुई तो यह युद्ध उसके हृदय में चलेगा । 

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

रथ

गीता में पाण्डव और कौरवों के युद्ध के प्रसंग में रथ शब्द का प्रयोग किया गया है । यह भी लक्षणात्मक अभिव्यक्ति है । रथ के घोडे मनुष्य की पाँच इंद्रियों के प्रतीक हैं । इन घोडों को नियंत्रित रखने के लिये लगाम की रस्सी मनुष्य के बुद्धि की अभिव्यक्ति है । रथ चालक के रूप में संचालक आत्मा की अभिव्यक्ति है । अर्जुन के रथ के संचालक परम् सत्य के अवतार स्वरूप श्रीकृष्ण स्वयँ हैं ।  

द्विजोत्तम


जिसका जन्म दो बार हुआ हो वह द्विजोत्तम कहा जावेगा । प्रथम बार जन्म प्रकृति के संसार में एक सामान्य मनुष्य पुत्र के रूप में हुआ है । पुन: शिक्षा का लक्ष्य आत्मज्ञान कराना होता है, शिक्षा के प्रभाव से आत्मज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश दूसरे जन्म के समान होता है । मनुष्यों में उत्तम पुरुष जिसका जन्म दो बार हुआ है द्विजोत्तम । प्रकृति की गोद में पैदा हुआ शिशु आत्मज्ञान के लोक में प्रौढ हुआ । 

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

युद्ध क्षेत्र

युद्ध क्षेत्र को धर्म क्षेत्र भी कहा जाता है । उचित के चुनाव का क्षेत्र । परम् सत्य जो धर्म ( उचित ) का रक्षक भी होता है वह स्वयं भी युद्ध क्षेत्र अर्थात् मनुष्य के हृदय में आत्मा के रूप में विद्यमान रहता है । गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण मोहासक्त अर्जुन को जीवन का सत्य रूप बताते है । फिर उचित कर्म का चुनाव स्वयं करने के लिये अर्जुन को ही कहते हैं । धर्मदर्शन मनुष्य को सत्य स्थिति को बताता है । चुनाव प्रत्येक मनुष्य को स्वयं अपने ही करना होता है । 

सोमवार, 26 जनवरी 2015

उत्कर्ष और मोंहासक्ति

गीता में वर्णित पाण्डव और कौरव का युद्ध उत्कर्ष और मोहासक्ति की लक्षणात्मक अभिव्यक्ति है । पाण्डव सही चुनाव द्वारा धर्मपथ से उत्कर्ष की ओर प्रगति का प्रतिनिधित्व करते हैं । कौरव अधिक प्रकृतीय मोंह की ओर यात्रा का प्रतिनिधित्व करते हैं । देववृत्ति और राक्षस वृत्ति का युद्ध । धर्म जिसे अपनाने से मनुष्य सत्य की ओर अग्रसर होता है । अधर्म जिसे अपनाने से मनुष्य और अधिक प्रकृतीय मोंह की ओर अग्रसर होता है । धर्म और अधर्म दोनों की उत्पत्ति एक ही सत्य के मूल से सम्भव हुई है । मात्र उचित के चुनाव के भेद से दोनों के फल भिन्न होते हैं ।  

रविवार, 25 जनवरी 2015

जीवन एक संघर्ष

मनुष्य के जीवन के संघर्ष में एक पक्ष होता है बुराइयों का शमन करना तो दूसरा पक्ष होता है उत्कर्ष की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करना । दोनो पक्ष एक दूसरे के सम्मुख होते हैं । इस संसार में अपूर्णता, बुराई, और अकारण विघ्न विद्यमान हैं । उचित कर्म द्वारा मनुष्य बुराई को उत्कर्ष मे पर्णित कर सकता है अपूर्णता को  पूर्णता में पर्णित कर सकता है और अकारण विघ्न को सकारण हल में पर्णित कर सकता है । युद्ध त्रास भी होता है और मर्यादा (discipline) की स्थापना भी होता है ।

शनिवार, 24 जनवरी 2015

संसार धर्मक्षेत्र

यह संसार नैतिक संघर्ष का क्षेत्र है । नैतिक क्या उचित है उसे अपनाना है और क्या अनुचित है उसे त्यागना है । मनुष्य का हृदय (concept)  युद्ध स्थल होता है जहाँ संघर्ष के मुद्दे विद्यमान रहते हैं । यह प्रतिदिन प्रतिपल का संघर्ष होता है । धर्म के पथ से उचित के चुनाव द्वारा मनुष्य को दु:ख त्रास से स्वतंत्रता तक एवं रूपों के संसार से सत्यलोक पर्यंत पहुँचने का पथ मिलता है । यह संसार कर्मभूमि है । कर्म करके मनुष्य अपने अंदर विद्यमान आत्मा की इस शरीर में उपस्थिति के उद्देष्य की पूर्ति करता है ।  

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

धर्मक्षेत्र

सत्यता के मैदान में । यह संसार धर्मक्षेत्र है । इस संसार में यह निर्णय करना कि क्या सत्य (which does not change or decay with time) है वह धर्म है क्या मनुष्य के लिये उचित कर्तव्य है एक मनुष्य के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्णय होते है । भूंख, निद्रा, भय, यौन सम्बंध यह तो मनुष्य और पशु दोनों में समान रूप से होती है । उचित और अनुचित का विवेकधारक होने के कारण ही मनुष्य पशु से उत्कृष्ठ होता है । विवेक के प्रयोग द्वारा ही मनुष्य उत्कृष्ठ स्थितियों को प्राप्त कर सकता है । 

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

गीता का लक्ष्य

गीता का लक्ष्य मात्र सिद्धांत को निरूपित करना नहीं है अपितु उचित के चुनाव के द्वारा धर्मपथ से सिद्धांत को व्यवहारिक जीवन में चरितार्थ करने का पथ प्रदान करना है । धर्म सामाजिक और मनुष्य समुदाय में मनुष्य के दायित्वों और वाँक्षनाओं द्वारा सृजित होता है । धर्म मनुष्य को उन्नति प्रशस्थ करता है । धर्म मनुष्य को परवशता से मुक्त कर स्वतंत्रता प्रशस्थ करता है । गीता में एक उदाहरण के माध्यम से जिसके अनुसार एक मनुष्य अपने कर्म दायित्व और खून के रिश्तों को त्यागने को तत्पर होता है, यह मार्ग प्रशस्थ करती है कि कैसे वह मनुष्य उस अवसर को जिसमें वह उपरोक्त त्याग करने को उन्मुख हुआ है को अपनी उन्नति और स्वतंत्रता के लिये प्रयोग कर सकता है । प्रकृति ने हमें जीवन चाहे किसी भी स्तर पर दिया है । हम इस जीवन को प्रकृति के दिये हुये स्तर से कैसे उन्नति कर परम् सत्य के स्तर तक पहुँचा सकते हैं ।