रविवार, 31 जुलाई 2016

अजन्मा उद्गम श्रोत

गुरू का उपदेश है कि ब्रम्ह अजन्मा हैं परंतु सभी का उद्गम श्रोत है । प्रत्येक रूप की उत्पत्ति ब्रम्ह से है । इस रूप में ब्रम्ह समस्त रूप संसार का शासक है । ब्रम्ह की उत्पत्ति को कोई देवता और कोई संत भी नहीं जानता है । 

शनिवार, 30 जुलाई 2016

अनादि

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये कि ना ही कोई देवता और ना ही कोई संत मेरे उद्गम को जान सका है क्योंकि मैं सभी देवताओं और संतों का हर प्रकार से उद्गम श्रोत हूँ । 

शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

हितकारी वचन

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले हे महाबाहो अर्जुन मैं तुम्हे अपना प्रिय अनन्य मानते हुये तुम्हे श्रेष्ठतम ज्ञान के विषय में हितकारी बचन सुनाता हूँ । 

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

श्रेष्ठतम

इस रूप संसार की समस्त रूपों की रचना में विद्यमान ब्रम्ह ही श्रेष्ठतम है । ब्रम्ह की श्रेष्ठता अद्वितीय है । इसलिये इसकी तुलना किसी अन्य से सम्भव नहीं है । इस श्रेष्ठतम को जानने वाला सदैव आनंदित रहता है । 

बुधवार, 27 जुलाई 2016

अन्तर्भुति

इस रूप संसार के समस्त ज्ञात रूप में ब्रम्ह की क्षवि विद्यमान है । यह सत्य अकाट्य है । किसी भी रूप का अस्तित्व ब्रम्ह की क्षवि के उपस्तिति से ही सम्भव हुआ है । उस रूप की स्थिरता उस ब्रम्ह की क्षवि के विद्यमान रहने पर्यंत ही है । 

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

अहंकार से मुक्ति

गुरू ने जिज्ञासु अर्जुन को अहंकार की कैद से मुक्त होकर उस अनंत सत्ता की व्यापकता में विलीन होकर उस चिर दिव्य शांति की दशा के आनंद भोग करने का उपदेश बता कर उसे प्रयत्नशील होने को प्रेरित करते हैं । गुरू उसे सुझाते हैं कि अपनी समस्त शक्ति एवं हृदय में उपलब्ध प्यार को उसे अर्पित कर दो और उसे पाना ही अपना सर्वोच्च लक्ष्य निर्धारित कर उसका ही ध्यान उसका ही सतत् जप करने से तुम निश्चय ही उसके साथ एकीकृत हो जावोगे ।

इसप्रकार सर्वोच्च ज्ञान एवं सर्वोच्च रहस्य नामक नौवां अध्याय पूर्ण हुआ }

सोमवार, 25 जुलाई 2016

लक्षणात्मक अभिव्यक्ति

गुरू ने चर्मोत्कर्ष उपलब्धि के लिये अभ्यासी को अपने समास्त ज्ञानेंद्रियों को मर्यादित आचरण का अभ्यासी बनाने के लिये किये गये उपदेश में बराबर मुझपर एकाग्र करो, मेरा ध्यान करो, मेरेप्रति समर्पित जैसे शब्दों का प्रयोग किया है यह समस्त अभिव्यक्ति मात्र लक्षणात्मक है । उनका समस्त उपदेश अभ्यासी को ब्रम्ह पर एकाग्र करने के लिये है । इन समस्त प्रयत्नों का फल होगा कि अभ्यासी योगेश्वर के समान स्थिति को प्राप्त कर सकेगा । 

रविवार, 24 जुलाई 2016

चर्मोत्कर्ष एकीकरण

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि अपने मस्तिष्क को पूर्णरूप से मुझपर एकाग्र करो, मुझपर पूर्णरूप से समर्पित हो जावो, मरी आराधना करो, मेरा ही जप करो इस प्रकार से अपनी समस्त ज्ञानेंद्रियों को मेरे प्रति मर्यादित आचरण का अभ्यासी बनाओ मुझे पाना ही अपना सर्वोच्च लक्ष्य बनाओ, तो निश्चय ही तुम मेरी स्थित तक अवश्य पहुँच जावोगे । 

शनिवार, 23 जुलाई 2016

परम् सत्य की शरण

ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति और उच्चतर प्रकृति की परस्पर क्रिया एवं प्रतिक्रिया का स्थल यह रूप संसार है । उच्चतर प्रकृति निरंतर निम्नतर प्रकृति के मोंह में आसक्त है । फलत: यह त्रास भोग का जीवन मृत्यु का चक्र निरंतर चलता ही जा रहा है । मोंह का अज्ञान इस चक्र को गतिमान किये ही रहेगा । इस मोंह से मुक्ति का पथ ब्रम्ह की शरण ही है । 

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

संसार एक पुल

समस्त जीवन में गुज़रते हुये स्थल, जीवन के विभिन्न भागो के बदलते हुये मनोवेग, समस्त मानवता के इतिहास को एक नदी के पुल के रूप में देखा जा सकता है । इनसे व्यक्ति गुज़रे परंतु गुरू का उपदेश बताता है कि इसके निवासी बनने की चेष्टा मत करिये । यह समस्त रूप संसार मात्र ब्रम्ह की क्षवि है परंतु सत्य नहीं है । 

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

त्रासभोग के लिये

त्रुटिपूर्ण बंधनकारी कर्मों को करते व्यक्ति निरंतर जन्म और मृत्यु के चक्र में चलता ही जावेगा । यह रूप संसार इन्ही त्रुटिपूर्ण बंधनकारी कर्मों को करने और उनके फल भोग के रूप में यातनाओं को भोगने का स्थल बना हुआ है । इस चक्र से मुक्ति सन्यास की दशा में कर्मों को करने से ही सम्भव है । 

बुधवार, 20 जुलाई 2016

दु:चक्र से उद्धार

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये कि जो व्यक्ति अपने पूर्व के त्रुटिपूर्ण कर्मों के फलभोग को शिरोधार्य कर अनेको प्रकार के यातना भोगो को भोग रहा हैं वह भी मेरी शरण में आकर अपने दु:ख भोगों से मुक्ति पा सकता है यद्यपि कि वे संत जिन्हे आत्मज्ञान प्राप्त है वे सरलता से मुक्ति पा जाते हैं । 

मंगलवार, 19 जुलाई 2016

मौलिक प्रकृति को प्रधानता

भवद्गीता में वर्णित ज्ञान के जिज्ञासुओं की आहर्ताओं और वेदों में वर्णित सांसारिक वैभव की प्राप्ति के जिज्ञासुओं की आहर्ताओं में स्पष्ट अंतर है । सांसारिक वैभवों की प्राप्ति के लिये व्यक्ति के जन्म के वंश और कुल तथा स्त्री और पुरुष के मध्य भेद महत्वपूर्ण बताया गया है जबकि ज्ञान प्राप्ति के जिज्ञासुओं के लिये यह विभाजन महत्वपूएण नहीं बताया गया है । 

सोमवार, 18 जुलाई 2016

वेदमत और गीतामत

वेदों में वर्णित उपासना पद्धतियों में व्यक्ति के जन्म के वंश कुल पर आधारित तथा स्त्री और पुरुष के भेद पर आधारित योग्यता को मान्यता दी गई है । परंतु भगवदगीता में वर्णित ज्ञान के जिज्ञासुओं के लिये उपरोक्त आधारों का विभाजन महत्वपूर्ण नही माना गया है । 

रविवार, 17 जुलाई 2016

सर्वभौम

गुरू का उपदेश प्राणी मात्र के उत्थान के लिये है । गुरू के उपदेश प्रत्येक वर्ग प्रत्येक देश के स्त्री व पुरुष के लिये समान रूप से प्रभावी व फलदायी हैं । आत्मा प्रधान जीवन पाने के प्रत्येक जिज्ञासु के लिये मार्ग-दर्शन हैं । 

शनिवार, 16 जुलाई 2016

सभी योग्य पात्र

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि व्यक्ति का जन्म चाहे किसी भी कुल में, स्त्री अथवा पुरुष के रूप में हुआ है वह ज्ञान के लिये योग्य पात्र हैं । हे अर्जुन जो भी ज्ञान का जिज्ञासु मेरी शरण ग्रहण करता है उसे ज्ञान प्राप्त होता है ।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

प्रकृति का प्रकृति के प्रति

ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति आत्मा जब निम्नतर प्रकृति के साथ परस्पर, कंचिद उसके गुणों के भोग की कामना से करती है, तो आसक्ति जनित होती है । इसके विपरीत यदि आत्मा प्रकृति के साथ परस्पर, मात्र अपने कर्तव्य दायित्व के निर्वाह के भाव से करती है, तो वह मोंह से मुक्त पथ पर होती है । इसाप्रकार प्रकृति का प्रकृति के प्रति भाव ही भेद है "मुक्ति" एवं "बंधन" । 

गुरुवार, 14 जुलाई 2016

त्रुटिरहित ब्रम्ह

आचरण की त्रुटियाँ प्रकृतीय मोंह से उत्पन्न होती हैं । कंचिद जो व्यक्ति ब्रम्ह को समर्पित भाव से सदा रहता है तो ऐसी दशा में उसके कृतों का संचालन स्वयं ब्रम्ह करता है । ऐसे व्यक्ति के द्वारा कृत कर्म सदैव त्रुटियों से मुक्त रहते हैं । उसके पतन की सम्भावना नहीं रह जाती है । 

बुधवार, 13 जुलाई 2016

विलय की दशा

ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति आत्मा जब अपने उद्गम श्रोत ब्रम्ह की चेतना से प्रतिपल ओतप्रोत रहेगी तो स्वाभाविक प्रतिफल के रूप में उसे चिर शांति की अनुभूति उसकी धरोहर बनेगी । ज्ञातव्य है कि अशांति और कलह उसके भ्रमात्मक स्व की अनुभूति के फल से होते हैं । 

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

चिर शांति की दशा

ब्रम्ह को अनन्य समर्पण के भाव से पूजने वाले व्यक्ति की उपलब्धि को बताते हुये योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि हे अर्जुन ऐसा व्यक्ति शीघ्र ही चिर शांति की दशा को प्राप्त करता है और यह भी जानलो कि मेरा अनन्य किसी भी परिस्थिति में किसी दुर्गति को नहीं प्राप्त होता है । 

सोमवार, 11 जुलाई 2016

ब्रम्ह की ज्वाला

ब्रम्ह के चेतना की ज्वाला जब आत्मा में व्याप्त हो जाती है तभी व्यक्ति के अहंकार का आच्छादन क्षीण होता है । बिना ब्रम्ह को समर्पित हुये इस प्रकृतीय मोंह से मुक्ति का पथ सम्भव नहीं होता है । ब्रम्ह जब सहायक होता है तभी मुक्ति मिलती है क्योंकि मोंह की जडे अति प्राचीन होती हैं । 

रविवार, 10 जुलाई 2016

अहंकार का समर्पण

गुरू का उपदेश है कि आत्मा जब तक, अपने को ब्रम्ह से भिन्न एक अलग अस्तित्व के रूप में प्रस्तुत करती है, उसके कर्म प्रेरण त्रुटिपूर्ण रहते हैं । आत्मा जब अपनी इस भूल को अनुभव कर अपने को ब्रम्ह को अर्पित कर देती है तो वह प्रकृतीय मोंह से मुक्ति के लिये योग्य पात्र बन जाती है । 

शनिवार, 9 जुलाई 2016

उद्धार का उचित निर्णय

गुरु बताये कि यदि व्यक्ति अपने उद्धार के लिये ब्रम्ह को समर्पित भाव से पूजने का सही निर्णय कर लेता है तो उसका पूर्व का आचरण यदि पापयुक्त भी है तो भी वह मुक्ति का योग्य पात्र बन जायेगा । प्रकृतीय मोंह में आसक्त होना यह तो सामान्य प्रक्रिया है । इससे मुक्ति के लिये चेतना जागृत होना तथा किये जाने वाले प्रयत्न के चुनाव में समर्पण का सही पथ अपनाना यह अधिक महत्वपूर्ण है । 

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

पतित का भी उद्धार

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कोई व्यक्ति जिसका आचरण अति पतित भी रह चुका हो यदि कंचिद मुझे अनन्य समर्पण के भाव से पूजता है तो वह भी मुक्ति के लिये योग्य पात्र बन जाता है क्योंकि उसने सही पथ के चुनाव का उचित निर्णय कर लिया है । 

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

समर्पण से मुक्ति

गुरू ने आत्मा प्रधान व्यक्तित्व के जिज्ञासु के लिये उपलब्धि का लक्ष्य “प्रकृतीय मोंह से मुक्ति” को प्राप्त करने का सरलतम उपाय बताते हुये कहे कि “मुझे श्रद्धायुक्त भक्ति द्वारा पूजो” तुम्हे मैं मोंह से मुक्त कर दूँगा । 

बुधवार, 6 जुलाई 2016

आत्मा में ब्रम्ह की क्षवि

ब्रम्ह की अपरिवर्तनीय अरूपधारी प्रकृति आत्मा की अनुभूति ही ब्रम्ह चेतना का द्योतक होती है । ब्रम्ह प्रकृति से अछूता होता है । आत्मा को, जब व्यक्ति इसी “प्रकृति से अछूता” चरित्र की मर्यादानुकूल आचरण के लिये प्रस्तुत करता है तो उस व्यक्ति को ही देव-स्वरूप स्थान मिलता है । इस उपलब्धि के लिये आत्मा की प्रकृतीय मोंह के प्रति लिप्सा ही बाधा होती है । इसीलिये गुरू ज्ञान उपदेश के प्रत्येक स्तर पर इसी मोंह के निवारण का उपाय बताते हैं । 

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

आत्मा ब्रम्ह का प्रतीक

गुरू ने ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति आत्मा की प्रत्येक व्यक्ति में एक समान उपस्थिति को इंगित करते हुये कहाकि मैं प्रत्येक व्यक्ति में एक समान हूँ । आत्मा की प्रधानता का जीवन प्राप्त करने के जिज्ञासु को इसी सत्य की अनुभूति करने की आवश्यकता होती है । प्रश्नगत इस आत्मा की अनुभूति होती है ना कि इसकी उपस्थिति होती है । 

सोमवार, 4 जुलाई 2016

ब्रम्हत्व एक रस

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये कि मैं सभी व्यक्तियों में एक समान हूँ, मुझे कोई भी प्रिय अथवा अप्रिय नही है, परंतु जो भी व्यक्ति मुझे श्रद्धापूर्वक पूजता है वह मुझमें निवास करता है और मैं उसमें निवास करता हूँ । 

रविवार, 3 जुलाई 2016

स्वतंत्रता

ब्रम्ह सभी कर्मों का कर्ता है परंतु स्वतंत्र है । उसकी उच्चतर प्रकृति आत्मा प्रकृतीय संसर्ग में रहते हुये प्रकृतीय मोंह में आसक्त हो प्रकृति की दासता को प्राप्त होती है । सन्यास की दशा में कर्म प्रेरण में संलग्न होना ही आत्मा की इस दासता से मुक्ति का उपाय होता है । इस सन्यास की दशा को पाने के लिये समस्त कर्मों को ब्रम्ह को अर्पित करके किया जाना पथ है । 

शनिवार, 2 जुलाई 2016

बंधनकारी कर्मफल

गुरू ने बताया कि बंधन कर्म के फल द्वारा सृजित होता है । इच्छा जनित कर्म किसी विशिष्ट फल की प्राप्ति की कामना से किया जाता है इसलिये बंधनकारी होता है । इसके विपरीत ब्रम्ह की सेवा में अर्पित कर्म होता है । हम कर्म को ब्रम्ह की सेवा में कर रहे हैं । यह सन्यासी का कर्म है । मुक्तिदायक होता है । 

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

कर्म विधान

कर्म का त्याग नहीं बल्कि कर्म को किया जाय परंतु किसी फल को पाने के लिये नही यह सन्यास है । इस सन्यास की स्थिति को पाने के लिये गुरू ने बताया कि समस्त कर्मों को मुझे अर्पित करके करो । इस अर्पण का फल होगा कि तुम्हे कर्म के फल से मुक्ति मिल जावेगी क्योंकि तुमने कर्म को मेरी सेवा में किया है ।