शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

साकार स्वरूप

ब्रम्ह की वह अद्भुद महिमा, जिसके द्वारा वह इस समस्त रूप संसार का आधार है, को भगवद्गीता के ग्रंथकार ने “विभूतय:” शब्द द्वारा व्यक्त किया है । यह ब्रम्ह का वह दिव्य विज्ञान है, जिसके द्वारा, इस संसार के समस्त रूप को उनकी प्रकृति मिलती है । ब्रम्ह को ब्रम्ह की रचनाओं के माध्यम से जानना उसकी उपासना के समान है । 

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

निराकार ब्रम्ह

ब्रम्ह की अभिव्यक्ति करने के लिये, “अनिर्देष्यम्” जिसकी परिभाषा नहीं की जा सकती, “अव्यक्त अक्षरम्” जिसका कोई रूप नहीं है और जिसका क्षय नहीं होता है, “अचिंत्यरूपम्” जिसका चिंतन करना सम्भव नहीं है, जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है । फिरभी उसकी ग्राह्यता के लिये गुरू पथ निर्दिष्ट किये है ।  

बुधवार, 28 सितंबर 2016

धर्मदर्शन

श्रीमद भगवद्गीता में अव्यक्तनीय सत्य ब्रम्ह और उसकी अपर्याप्त अभिव्यक्ति इस रूप संसार में कोई विरोधाभास जैसी स्थिति नहीं व्यक्त की गई है । यह सत्य है कि ब्रम्ह को मनुष्य की ज्ञानेंद्रियों की ग्राह्यता के परे का अस्तित्व बताया गया है परंतु फिरभी उस एकाकी सत्यब्रम्ह को उसकी रचनाओं के माध्यम से जाना जा सकता है, अनुभव किया जा सकता है, उसे पूजा जा सकता है । यह सभी कुछ सम्भव है ।  

मंगलवार, 27 सितंबर 2016

जिज्ञासा : चरण 8

चरण 7 से क्रमश: । हे जनार्दन हे प्रभू कृपया करके मुझे अपने को इन रूपों में प्रगट करने की क्षमता को विस्तार से इस प्रकार समझाइये कि मैं अज्ञानी उसको ग्रहण कर सकूँ । मुझे आपकी अमृत वाणी सुनते हुये अभी पूर्ण तृप्ति नहीं हुई है । 

सोमवार, 26 सितंबर 2016

जिज्ञासा : चरण 7

चरण 6 से क्रमश: । कृपया करके हमें वह पथ बताइये जिसके द्वारा मैं ध्यान करने के समय अपने मस्तिष्क में आपके रूप की लल्पना कर सकूँ । मैं प्रभु पूर्णरूप से हत्प्रद दशा में हूँ । कृपया मेरी सहायता कीजिये ।

रविवार, 25 सितंबर 2016

चरण 5 से क्रमश: । कृपया करके मुझे अपने दिव्य स्वरूप का वह रहस्य बताइये जिसके द्वारा आप समस्त समस्त रूप संसार के सृजनकर्ता होते हुये भी सभी से अछूते हैं और भिन्न हैं । व्याख्या चरण 5 में वर्णित स्थिति को और आगे स्पष्ट करते हुये अर्जुन अपनी मौलिक जिज्ञासा कि प्रभु आप प्रत्येक रूप को अपनी प्रकृति प्रदान कर प्रत्येक रूप का आधार हो फिरभी आप किसी रूप में नहीं हो प्रभू को बताने की कृपा करो प्रभू । 

शनिवार, 24 सितंबर 2016

जिज्ञासा : चरण 5

चरण 4 से क्रमश: । हे परम पिता हे समस्त रूपों के जनक हे देवों के देवता हे सृष्टि के सृजनकर्ता हे समस्त ब्रम्हाण्ड के स्वामी आप ही अपने ज्ञाता हैं और अन्य दूसरा कोई भी नहीं जो आपको जान सका है । व्याख्या –चरण 4 में वर्णित स्थिति के द्वारा अर्जित मनोबल द्वारा अर्जुन कहता है कि वे समस्त ऋषि जिन्हे आपकी अनुभूति मिली वे ब्रम्ह की दशा को प्राप्त हो गये इस प्रकार प्रभु आपही अपने ज्ञाता हो अन्य कोई दूसरा नहीं । 

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

जिज्ञासा : चरण 4

चरण 3 से क्रमश: । अर्जुन आगे कहता है हे कृष्ण ! ना ही कोई देवता ना ही कोई ऋषि आपकी उत्पत्ति को जान सका है । आपने जितना कुछ भी मुझे बताया वह सब सत्य है । मैं मानता हूँ । हे प्रभो । व्याख्या – चरण 3 में वर्णित स्थिति से गुज़रने के उपरांत गुरू से अर्जुन कहने का साहस जुटा सका कि हे परम् सत्य के प्रगट रूप आपकी उत्पत्ति को कोई भी ऋषि और कोई भी देवता नहीं जान सका है ।

गुरुवार, 22 सितंबर 2016

जिज्ञासा : चरण 3

चरण 2 से क्रमश: । अर्जुन आगे बोले कि सभी प्राचीन ऋषि भी ब्रम्ह के लिये यही बताये हैं जो प्रभु आपके श्रीमुख से मैंने सुना, देव ऋषि नारद, ऋषि असिता, देवता, व्यास सभी आपके रहस्य को इन्ही विस्तार से बताये । व्याख्या चरण 2 में वर्णित स्थिति के विगत होने पर अर्जुन अपने चरण 1 में व्यक्त विचार को और अधिक पुष्टि करते हुये अनेको महान ऋषियों की गणना बताता है जिन्हे कि ब्रम्ह की अनुभूति प्राप्त हुई और इस अनुभूति के प्रसाद से वे ब्रम्हलीन हुये । 

बुधवार, 21 सितंबर 2016

जिज्ञासा : चरण 2

चरण 1 से क्रमश: । अर्जुन बोला हे परम् ब्रम्ह, हे परम् धाम, हे सर्वोच्च सत्य स्वरूप, हे पवित्र, हे देवपुरूष, हे सर्वोच्च देव, हे अजन्मे, हे सर्वव्यापी ब्रम्ह । व्याख्या - जिज्ञासाओं को गुरू के सम्मुख व्यक्त करने के लिये सबसे पहले तो अर्जुन को गुरू की मर्यादा के अनुरूप उचित शब्दों की आवश्यकता थी । इस अपेक्षा की पूर्ति में वह गुरू के लिये उन सभी सम्मानित शब्दों का प्रयोग करता है जिनका उसे ज्ञान था यथा परम् ब्रम्ह, परम् धाम आदि । 

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

जिज्ञासा : चरण 1

आत्मा प्रधान जीवन के जिज्ञासु अर्जुन गुरू द्वारा अब तक बताये गये ब्रम्ह के व्यापक रहस्य को सुनकर बिलकुल हतप्रद दशा को प्राप्त हो गया है और ऐसी मन:दशा में अपनी जिज्ञासा को व्यक्त करते हुये कहता है कि हे प्रभू मैं यह अनुभव कर रहा हूँ कि इस समस्त रूप संसार का उदय आप से ही हुआ है और यदि कंचिद प्रत्येक रूप अपनी पूर्णता की स्थिति को प्राप्त कर सके तो वे सभी रूप आप सदृष्य हो जायेंगे । व्याख्या - ब्रम्ह के व्यापक रहस्य को सुनकर अर्जुन रोमांचित हो उठा है । उसने गुरू के मुख से जो कुछ भी सुना है उसे लगता है कि यह सब सच तो है परंतु उसका तार्किक विवेक यह नहीं ग्रहण कर पा रहा है कि यह सब सच कैसे है । इस जिज्ञासा की शांति के लिये वह गुरू से निवेदन करता है ।  

सोमवार, 19 सितंबर 2016

अनुभूति

ब्रम्ह इस रूप संसार के उद्भव का मूल है । वह इस रूप संसार में प्रतिपल घटित हो रही प्रत्येक गति का संचालक है । परंतु उपरोक्त सत्यो के होते हुये भी वह स्वयं ना ही किसी रूप में है और ना ही किसी गति में वह सम्मलित है । उस ब्रम्ह की प्रतिनिधि उसकी उच्चतर प्रकृति आत्मा का भी यही मौलिक स्वरूप होता है । परंतु प्रकृतीय संसर्ग के फल से आत्मा प्रकृतीय मोंह में आसक्त हो जाती है । फलत: अपने मौलिक स्वरूप को विस्मृत कर बैठती है । यदि कंचिद गुरू के उपदेश के फलसे और तत्फलम् उसके अनुसरण से व्यक्ति प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो जाय तो फलत: उसकी आत्मा अज्ञान से मुक्त हो जाय अर्थात अपने मौलिक स्वरूप में स्थापित हो जाय तो वह ब्रम्ह की अनुभूति के लिये योग्य पात्र बन जाय । वही व्यक्ति अवतारी पुरुष बन जाय । अवतार स्वरूप यही है । ब्रम्ह चेतना जागृत दशा में विद्यमान रहना । 

रविवार, 18 सितंबर 2016

भक्ति ज्ञान का साधन

गुरू ने ज्ञान प्राप्ति की पूरी श्रँखला को उपदेश द्वारा बताया है । भक्ति का स्वरूप क्या है । भक्ति का सही पथ क्या है । भक्ति की यात्रा किन किन स्थलो से गतिमान होते गंतव्य ज्ञान तक कैसे पहुँचती है । भक्ति को सत्य स्वरूप में स्थापित हो जाने पर ब्रम्ह अपनी अनुकम्पा द्वारा भक्त को अज्ञान के जाल से स्वयं  बाहर निकालते हैं । अज्ञान का क्षय होना ही ज्ञान का उदय है ।  

शनिवार, 17 सितंबर 2016

भक्ति द्वारा अज्ञान का नाश

गुरू ने उपदेश के द्वारा क्रमबद्ध अज्ञान नाश का पथ दिया है । व्यक्ति भक्ति द्वारा अज्ञान नाश की स्थिति तक पहुँच सकता है । ब्रम्ह के प्रति मस्तिष्क में सही धारणा स्थापित करना, उसके फल से मस्तिष्क का सतत् ब्रम्ह में ही केंन्द्रित रहना जिसके फल से ब्रम्ह की विषेस अनुकम्पा का पात्र बनना जिसके प्रभाव से ज्ञान ज्योति का उदय होना । 

शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

अनुकम्पा

सत्यनिष्ठ संत को ब्रम्ह से मिलने वाली अनुकम्पा की गणना को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मैं उन संतो के लिये, जो सतत मेरी ही प्रकृति में रहते हैं, अपनी अनुकम्पा द्वारा उनके अज्ञान को पूर्णतया नाश कर देता हूँ, जिसके फल से उन्हे ज्ञान के दर्शन हो जाते हैं । 

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

समाहित के चरण

गुरू के उपदेश ब्रम्ह समाहित दशा, तक कैसे चरणों में प्रगति करते हुये पहुँचा जाय, के लिये पथ बताते हैं । आत्मा प्रधान जीवन । इस आत्मा प्रधान जीवन के द्वारा शरीर की रचना में प्रयुक्त निम्नतर प्रकृति को आत्ममय के स्तर तक उन्नति । इस स्थिति के फल से उत्पन्न उत्कृष्ठ मानसिक क्षमता । इस उत्कृष्ठ क्षमता के मस्तिष्क द्वारा ब्रम्ह के अनुभूति की स्थिति । 

बुधवार, 14 सितंबर 2016

ब्रम्हमय का दृष्टांत

एक पात्र में जल है । उस पात्र को पूर्ण रूप से बंद करके जल में डुबाकर रखा गया है । ऐसी दशा में पात्र के अंदर भी जल है और पात्र के बाहर भी जल है । पात्र के अंदर के जल और बाहर के जल के मध्य यह पात्र ही विभाजन है । कंचिद यदि पात्र को भी जल में पर्णित होने की कल्पना की जाय तो ऐसी दशा में अंदर का जल और बाहर का जल सब एक रूप हो जायेगा । गुरू ने बुद्धियोग द्वारा ज्ञान के जिज्ञासु को यही स्थिति प्राप्त करने का पथ बताया हैं । 

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

बुद्धियोग

गुरू का उपदेश है कि उपासक संत प्रयत्न के प्रथमचरण में ब्रम्ह के साथ मानसिक युति की दशा स्थापित करने का प्रयत्न करे । संत का मस्तिष्क सर्वप्रथम यह ग्रहणकरे कि समस्त उत्पत्ति समस्त वैभव ब्रम्ह से है । मैं ऐसे ब्रम्ह का ही प्रतिनिधि हूँ । ऐसी स्थिति मस्तिष्क में लगातार रहने से संत के मस्तिष्क का ब्रम्ह के ध्यान, भजन चिंतन, चर्चा करते हुये वह ब्रम्ह से लगातार जुडा रहेगा । ऐसी स्थिति हो जाने पर ब्रम्ह की विषेस कृपा के फल से उसके मस्तिष्क में ब्रम्ह की अनुभूति करने की क्षमता जागृत होगी । 

सोमवार, 12 सितंबर 2016

ग्राह्यता का वरदान

सही मानसिक धारणा में स्थापित होकर ब्रम्ह को पूजने वाले संतो की उपलब्धि को बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो संत मुझे सतत समर्पित श्रद्धा के साथ पूजता है उसे मैं ऐसी मानसिक ग्राह्य शक्ति देता हूँ जिसके द्वारा उसे मेरी अनुभूति मिल जाती है । 

रविवार, 11 सितंबर 2016

समाहित दशा

मस्तिष्क में ब्रम्ह के प्रति सही धारणा स्थापित करने वाले संतों को उसी ब्रम्ह की तन्मयता में ही इतना रस मिलता है कि वह उसी तन्मयता में अपने स्व को पूर्णरूप से विस्मृत करने में सफल हो जाता है जिससे वह उस ब्रम्ह की अनुभूति के लिये योग्य पात्र बन जाता है । इस दशा को प्राप्त संत फिर किसी भिन्न आकर्षण के प्रति मोंह नहीं जनित करते हैं । उस संत का सम्पूर्ण जीवन स्वरूप वह ब्रम्ह ही हो जाता है । 

शनिवार, 10 सितंबर 2016

स्वाभाविक तन्मयता

गुरू का उपदेश है कि जो व्यक्ति ब्रम्ह के सही स्वरूप की धारणा मस्तिष्क में स्थिर करके ब्रम्ह ज्ञान को उन्मुख होता है वह स्वाभाविक रूप से उसी ब्रम्ह की सदैव चर्चा करता है, उसी ब्रम्ह की सदैव महिमा गाता है, उसी ब्रम्ह का ही सदैव चिंतन करता है, उसी ब्रम्ह का सदैव ध्यान करता है और सदैव उस ब्रम्ह को ही समर्पित रहता है । 

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

ब्रम्ह सर्वस्य

गुरू ने उपदेश किया कि ज्ञेय ब्रम्ह और उसकी महिमा इतनी व्यापक है कि जो व्यक्ति अपने मस्तिष्क में सत्य निष्ठा स्थापित कर तथा हृदय में उसके प्रति अतिआदर भाव धारण कर उसका पूजन, ध्यान, भजन, चिंतन, परिचर्चा में संलग्न रहता है उसे उसी में इतना आकर्षण और रस मिलता है कि फिर वह पूर्णतया उसी का हो जाता है ।

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

उपासक के लिये

सही मानसिक धारणा में स्थापित होकर ब्रम्ह को पूजने वाले जिज्ञासु के विषय में और आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये ऐसे संत का मस्तिष्क सदैव मेरे चितन में रहता है, वह सदैव मेरी ही चर्चा करता हैं, वह अपनी समस्त उर्जा मुझे ही समर्पित किये रहता हैं, मेरे ही ध्यान में सदैव आनंदित रहता हैं । 

बुधवार, 7 सितंबर 2016

असहाय समर्पण

व्यक्ति जितना कुछ भी जानता है सभी कुछ ब्रम्ह से ही सम्भव हुआ है । फिरभी व्यक्ति ब्रम्ह को नहीं जानता है । ब्रम्ह ऐसा रहस्य है कि जिसे जानने का प्रत्येक प्रयत्न अ-पर्याप्त है । ज्ञान के जिज्ञासु को ज्ञेय ब्रम्ह को जानने का सबसे सरल और सीधा उपाय है कि वह उसी ब्रम्ह से याचना करे कि, वह, अपने रूप को उसे अनुभव करा देवे । 

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

कारण और विज्ञान

यह रूप संसार है इसका कारण ब्रम्ह है । यह रूप संसार इस रूप में है इसका कारण ब्रम्ह का विज्ञान है । ब्रम्ह की अद्भुद महिमा का ध्यान करना, चिंतन करना, उसकी अद्भुद विभूति का अध्ययन करना उस ब्रम्हके साथ युत होने का पथ है । 

सोमवार, 5 सितंबर 2016

भाव समंवित:

गुरू का उपदेश है कि पूजना एक स्थिति है । मस्तिष्क में आराध्य के प्रति सही अनुभूति के साथ पूजना भिन्न दशा है । यह अनुभूति धारण कर ब्रम्ह को पूजना कि मैं उस ब्रम्ह से ही उत्पन्न हुआ हूँ और यह समस्त जो कुछ भी मैं देख रहा हूँ यह सभी कुछ उस ब्रम्ह से ही उत्पन्न हुआ है निश्चय ही एक भिन्न श्रद्धा एवं समर्पण को जन्म देने वाला होगा । 

रविवार, 4 सितंबर 2016

अनुभूति से ही युति

व्यक्ति का आधार उसकी आत्मा । प्रथम तो अपने स्वरूप को अनुभव करे पुन: समस्त फै हुले हुये वैभव ब्रम्ह से उत्पन्न हुये का अनुभव करा सके । यह अनुभूति के चरण हैं । एक उपलब्धि के बाद दूसरी । क्रमबद्ध अनुभूति । इन्ही अनुभूतियों द्वारा व्यक्ति पूर्णरूप से ब्रम्ह की अनुभूति कर सकेगा| 

शनिवार, 3 सितंबर 2016

अद्भुद रहस्य

ब्रम्ह एक अद्भुद रहस्य है । समस्त उत्पत्ति ब्रम्ह से हुई है फिरभी ब्रम्ह किसी में नहीं है । समस्त वैभव ब्रम्ह से सृजित हुआ है फिर भी ब्रम्ह किसी में भी नहीं है । वास्तविकता यही है कि इस प्रकृति द्वारा निर्मित शरीर से ब्रम्ह को जाना नहीं जा सकता है । परंतु गुरू का उपदेश है कि ब्रम्ह की अनुभूति सम्भव होती है । इसी अनुभूति के लिये ही समस्त उपदेश है । इसी के लिये जिज्ञासु चेष्टा करता है । 

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

युति अनुभूति से ही

व्यक्ति का आधार उसकी आत्मा । प्रथम तो अपने स्वरूप को अनुभव करे पुन: समस्त फैली हुई वैभव ब्रम्ह से उत्पन्न ही का अनुभव करा सके । यह अनुभूति के चरण हैं । एक उपलब्धि के बाद दूसरी । क्रमबद्ध अनुभूति । इन्ही अनुभूतियों द्वारा व्यक्ति पूर्णरूप से ब्रम्ह से अनुभूति कर सकेगा । 

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

उद्भवश्रोत

ब्रम्ह की विभूतियाँ तो सामने दृष्य है । समस्त प्रत्येक विभूति ब्रम्ह से सम्भव हुई है यह अनुभूति ग्रहण करना अपेक्षित होता है । गुरू ब्रम्ह का रहस्य बताते हुये प्रारम्भ से ही इसी अनुभूति को कराने के लिये चेष्टारत हैं । यह भगवद्गीता का केंद्रीय आदर्श है कि साधक जिज्ञासु स्वयं अपनी अनुभूति द्वारा ब्रम्ह को जाने ।