मंगलवार, 31 जनवरी 2017

दृष्य का स्वरूप

गुरू द्वारा अनुग्रहपूर्वक अर्जुन को कराये गये दिव्यरूप के दर्शन में देवों का स्वरूप अर्जुन को इस सांसारिक सुख दु:ख की परिधि से ऊपर उठा वृहद मानसिक ग्राह्यता की स्थिति का अनुभव कराते हैं । ब्रम्ह की माया का विस्तार समस्त ब्रम्हाण्ड में है जिसका यह भू-लोक एक छोटा सा खण्ड मात्र है । अर्जुन दिव्य स्वरूप में समस्त ब्रम्हाण्ड के विभिन्न स्वरूपों का दर्शन करता है । 

सोमवार, 30 जनवरी 2017

अर्जुन की अभिव्यक्ति : चरण 1

अर्जुन कहता है कि हे देव मैं आपके मुखमें मैं सभी देवताओं को देख रहा हूँ और सभी जीवों के मेज़बान को भी देख रहा हूँ, ब्रम्हा सृजनकर्ता को कमल के आसन पर आरूढ देख रहा हूँ और सभी संतों एवं देवालय के नागाओं को देख रहा हूँ । 

रविवार, 29 जनवरी 2017

अर्जुन की दशा

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा प्रगट किये गये दिव्यरूप का दर्शन कर अर्जुन अत्यंत विस्मयपूर्ण चकित स्थिति में अपने दोनो हाथों को प्रणाम करने की मुद्रा में जोडे हुये गुरू से अपनी अंत:करण की दशा को व्यक्त करने का प्रयत्न करता है । ऐसा करने में उसके शरीर के रोम रोम रोमांच से खडे हुये स्थिति में हैं । 

शनिवार, 28 जनवरी 2017

दिव्य स्वरूप का साराँश

दिव्य रूप का दर्शन प्रत्येक रूप में एक ब्रम्ह तथा एक ब्रम्ह में प्रत्येक रूप के दर्शन का वृतांत हैं । दिव्य रूप में प्रत्येक रूप पूरे रूपों की क्षवि निरूपित करने वाला है । ब्रम्ह से प्रत्येक रूप है । प्रत्येक रूप में ब्रम्ह की क्षवि है । यह एक धारणा का क्षवि रूप में चित्रण है । यह क्षवि मानसिक शक्ति द्वारा ही ग्राह्य हो सकती है । इस क्षवि का दर्शन आँखों से नहीं सम्भव है । 

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

दृष्टा अर्जुन

संजय दिव्य स्वरूप का वृतांत राजा को आगे बताते हूये वृतांत को संकलित करते हुये कहता है कि पाण्डव अर्जुन पूरे ब्रम्हाण्ड के विविध रूपों को संकलित हुये एक स्थल देवों के देव गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुख में देखता है । 

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

डृष्य का वृतांत लगातार

संजय दिव्य स्वरूप का वृतांत राजा को आगे बताते हुये कहता है कि कंचिद हज़ार सूर्य का प्रकाश एक साथ आकाश में व्याप्त हो जाय तो सम्भव है कि उस दिव्य स्वरूप की भव्यता की तुलना कर सके । 

बुधवार, 25 जनवरी 2017

दृष्य का वृतान्त सतत्

संजय दिव्य स्वरूप का वृतांत राजा को बताते हुये आगे कहता है कि सभी ईश्वरीय माला और परिधान पहने हुये, ईश्वरीय सुगंध को लगाये हुये ईश्वरीय विलेप को लगाये हुये अनेकानेक चमत्कारिक क्षवि में दीप्तिमान सीमारहित आयाम में सभी दिशाओं में मुख किये हुये हैं । 

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

दृष्य की समीक्षा

श्रीमद् भागवद्गीता के ग्रंथकार द्वारा गुरू के दिव्य अकथनीय रूप का वृतांत प्रस्तुत करने के प्रयत्न में यह स्पष्ट विदित होता है कि ग्रंथकार के अनुभव को व्यक्त करने में शब्दों का आभाव महसूस हुआ है । यह स्वाभाविक भी है । यथा अनेक मुख तथा आँखों से युक्त – द्वारा ग्रंथकार व्यक्त करना चाहता है कि सभी को खाजाने वाला तथा सभी को देखने वाला । अकथनीय अनुभव को व्यक्त करना दुष्कर प्रयत्न है । 

सोमवार, 23 जनवरी 2017

दृष्य का वृतांत

संजय राजन को बताता है समस्त दृष्य अनेको मुख और आँखों से युक्त अनेको चमत्कारिक दृष्य दृष्टों से युक्त, अनेको ईश्वरीय परिधानो से युक्त, अनेकों ईश्वरीय शस्त्रों से युक्त है । 

रविवार, 22 जनवरी 2017

रूपांतरण

गुरू द्वारा सर्वोच्च ईश्वरीय रूप को प्रगट करना वास्तविकता में अपने रूप का रूपांतरण है जिसके प्रभाव से जिज्ञासु अर्जुन गुरू के रूपांतरित रूप में सकल भू-मण्डल तथा स्वर्ग लोक के समस्त रूपों का एकीकृत एक रूप में दर्शन करता है । 

शनिवार, 21 जनवरी 2017

साक्षी का वृतांत

      गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण एवं जिज्ञासु अर्जुन के मध्य हुये उपरोक्त संवाद को संजय राजा धृतराष्ट्र को बताने के उपरांत संजय कहता है कि हे राजन योगेश्वर ने अर्जुन को अपने सर्वोच्च ईश्वरीय रूप साक्षात् दर्शन कराते हैं । 

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

दृश्य की व्याख्या

अर्जुन द्वारा ब्रम्ह के दिव्य रूप के दर्शन की व्यक्त अभिलाषा – ब्रम्हस्वरूप गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा अनुग्रहपूर्वक जिज्ञासु अर्जुन को दिव्य दर्शन कराने की व्यक्त अनुकम्पा – यह समस्त निश्चयही आँखों से देखे जानी वाली स्थिति का वृतांत नहीं है – अपितु यह समस्त मनुष्य के मस्तिष्क की विश्लेषणात्मक क्षमता द्वारा ब्रम्ह के उस अद्भुद विज्ञान को ग्राह्य करने का वृतांत है जिसके द्वारा ब्रम्ह ने अपने को इस रूप संसार के असंख्य रूपों के रूप में प्रगट किया है – यह सृजित रूप संसार अपने रूप में स्थिर है – और समयांतर से उसी ब्रम्ह में विलीन हो जावेगा । यह क्षमता निश्चय ही मनुष्य अपनी सीमित क्षमता द्वारा अर्जित नहीं कर सकता है । इसे पाने के लिये ब्रम्हस्वरूप गुरू की विशेस अनुग्रहात्मक अनुकम्पा द्वारा ही अर्जित कर सकता है । इस क्षमता के जागृत हो जाने पर वह भूत, वर्तमान और अभविष्य को एकीकृत एक वर्तमान में देख सकेगा । यह आँखों की दृश्य क्षमता नहीं है अपितु मस्तिष्क में धारणाओं को स्थापित करने की विशिष्ट क्षमता है जो कि ब्रम्हस्वरूप गुरू की अनुकम्पा द्वारा ही मिल सकती है । 

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

दृष्य क्षमता की व्याख्या

गुरू द्वारा अनुग्रहपूर्वक दिव्य दर्शन की जो पेशकश जिज्ञासु अर्जुन को की गई है वह वास्तविकता में उस मानसिक क्षमता को सृजित करने की दिशा में है जिसके द्वारा जिज्ञासु आत्मा के विज्ञान की धारणा को ग्रहण कर सके । ब्रम्ह का दिव्यरूप उस ब्रम्ह का वह विज्ञान है जिसके द्वारा ब्रम्ह ने अपने को इस रूप संसार के असंख्य रूप के रूप में प्रगट किया है । ब्रम्ह किसीभी रूप में नहीं है फिरभी हर प्रत्येक रूप उस ब्रम्ह को प्रगट करने वाला है । यह विज्ञान मनुष्य को विशिष्ट विकसित मानसिकता द्वारा ही ग्राह्य हो सकता हई ।

बुधवार, 18 जनवरी 2017

दृष्य शक्ति

गुरू दिव्य दर्शन का प्रारूप बताने के उपरांत जिज्ञासु अर्जुन को बताये कि हे अर्जुन तुम यह सब कुछ अपनी इन आँखों से नहीं देख सकोगे क्योंकि इन आँखो में यह सबकुछ देखने की क्षमता नहीं है । इसलिये मैं तुम्हे दिव्य चक्छु  प्रदान करता हूँ जिससे तुम यह सबकुछ देख सकॉग़े । 

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

एकीकृत की व्याख्या

दिव्य स्वरूप का दर्शन वास्तविकता में भूतकाल, वर्तमानकाल, और भविष्य काल को एकीकृत एक समयस्थल पर अनुभवकरने का वृतांत है । यह एक अनुभूति है । मनुष्य की कल्पना शक्ति का परिचायक है । यह भूत, वर्तमान और भविष्य को एकीकृत वर्तमान में देखना है अनुभव करना है । 

सोमवार, 16 जनवरी 2017

एकीकृत

गुरू दिव्य दर्शन के विस्तार को और आगे बताते हुये जिज्ञासु अर्जुन से कहे कि हे गुणाकेश अर्जुनतुम समस्त चल और अचल रूपों को मेरी शरीर में एकीकृत रूप में देखो जिसे आप देखना चाहते हो । 

रविवार, 15 जनवरी 2017

मरुत

मरुत” को वैदिक काल में “रूद्र” का पुत्र बताया गया है । इनकी संख्या के विषय में अनेक मत हैं । यथा दो, सत्ताइस, साठ । यह बादलों के संचालक, वायु को गति देने वाले, पेडों को गिराने वाले, पर्वतो के पद के उपदेवता हैं । इन्हे इंद्र के सहायक देवता के रूप में बताया गया है । यह कई बार इंद्र के साथ युद्ध में भी सम्मलित हुये हैं । 

शनिवार, 14 जनवरी 2017

“अ‍श्विन”

हिंदू धर्म में “अश्विन” को “अश्विन कुमार” भी कहा गया है । ये दो वैदिक देवता हैं । ये जुडवा हैं । ये सूर्य के पुत्र हैं इनकी माता “सरन्यु” जो कि बादलों की देवी है । ये जुडवा देवता सूर्योदय एवं सूर्यास्त को निरूपित करते हैं । ये देवताओं के स्वास्थ्य चिकित्सक होते हैं । आयुर्वेद के ये प्रधान देवता है । इनका स्वरूप वर्णण बताया जाता है कि इनका शरीर मनुष्य सदृष्य है और सिर घोडों सदृष्य है । ये अपने उपासक को प्रचुर धन सम्पदा, देते हैं और उसके दुर्भाग्य तथा कष्ट का निवारण करते हैं । महाभारत में वर्णित है कि पाण्डु की पत्नी “मदरी” को इन जुडवा देवता के आशिर्वाद से जुडवा पुत्र “नकुल” व “सहदेव” के रूप में प्राप्त हुये थे । 

“अॅरश्विन”

हिंदू धर्म में “अश्विन” को “अश्विन कुमार” भी कहा गया है । ये दो वैदिक देवता हैं । ये जुडवा हैं । ये सूर्य के पुत्र हैं इनकी माता “सरन्यु” जो कि बादलों की देवी है । ये जुडवा देवता सूर्योदय एवं सूर्यास्त को निरूपित करते हैं । ये देवताओं के स्वास्थ्य चिकित्सक होते हैं । आयुर्वेद के ये प्रधान देवता है । इनका स्वरूप वर्णण बताया जाता है कि इनका शरीर मनुष्य सदृष्य है और सिर घोडों सदृष्य है । ये अपने उपासक को प्रचुर धन सम्पदा, देते हैं और उसके दुर्भाग्य तथा कष्ट का निवारण करते हैं । महाभारत में वर्णित है कि पाण्डु की पत्नी “मदरी” को इन जुडवा देवता के आशिर्वाद से जुडवा पुत्र “नकुल” व “सहदेव” के रूप में प्राप्त हुये थे । 

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

“रूद्र”

संस्कृत में “रूद्र” को ऋगवेद में वर्णित देवता बताया गया है । ये देवता वायु के प्रचण्ड तूफानों तथा बन एवं पहाड के विस्तृत सुनसान क्षेत्रके अधिपति होते हैं । ऋगवेद में “रूद्र” शब्द का प्रयोग “गरजने वाले” और “प्रचण्डतम से भी प्रचण्ड” के रूप में किया गया है । यजुर्वद में “रूद्रम” जो कि “रूद्र” को प्रसन्न करने का मंत्र गायन वर्णित है वह शैव-धर्म सम्प्रदाय का महत्वपूर्ण मंत्र है । 

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

“वसु”

हिंदू धर्म में “वसुओं” को देवताओं के राजा इंद्र के सहायक देवता के रूप में बताया गया है । इनकी संख्या 8 बतायी गई है । इन्हे “अष्ट वसु” कहा गया है । ये प्रथम स्तर पर इंद्र के सहायक देवता हैं और द्वितीय स्तर पर श्रीहरि विष्णु के सहायक देवता भी हैं । “वसु” शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है – बसने वाले, निवास करने वाले, रहने वाले । यह प्रकृतीय प्रक्रियाँओं के नियंत्रक होते हैं । 

बुधवार, 11 जनवरी 2017

आदित्य

“आदित्य” सौर मण्डलीय देवताओं को कहा गया है । इनका निवास  स्वर्गलोक बताया जाता है । इनमें से प्रत्येक अलग अलग प्रकृतीय प्रक्रियाँओं के अधिपति बताये जाते हैं । इनकी माता अदिति और पिता कष्यप प्रजापति को बताया जाता है । प्राचीनतम् धर्म ग्रंथ देवताओं की गणना का विस्तार व्यक्त करते हुये लिखते हैं कि 12 आदित्य, 11 रूद्र, 8 वसुओं, 1 प्रजापति ब्रम्हा एवं 1 श्रीहरि विष्णु कुल योग 33 देवों द्वारा इस रूप संसार की रचना सम्भव हुई है ।

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

अवलोकन

गुरू दिव्य दर्शन का विसतार और आगे बताते हुये जिज्ञासु अर्जुन से कहे कि आदित्यों, वसुओं, रूद्रों, दो अश्विन, और मरुतों का अवलोकन करो, हे अर्जुन और भी अनेकों आश्चर्यजनक रूपों का अवलोकन करॉ जिसे पूर्व में तुमने कभी नहीं जाना होगा । 

सोमवार, 9 जनवरी 2017

सत्य दर्शन के अन्य दृष्टांत

भगवद्गीता में वर्णित गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा जिज्ञासु अर्जुन को कराये गये दिव्य रूप के दर्शन के सदृष्य अन्य दृष्टांत अन्य धर्मों में भी वर्णित हैं । यह वह अनुभूति है जो कि ज्ञान का जिज्ञासु इस रूप संसार के समस्त रूपों में उस परम् सत्य की उपस्थिति को स्वयं अपने अनुभव के आधार पर अनुभव करता है । दार्शनिक ज़ेसूज़ को भी इसी प्रकार का सत्य के दर्शन का वृतांत वर्णित है । संत हिल्देगई के प्रकरण में भी इस प्रकार के वृतांत वर्णित हैं । 

रविवार, 8 जनवरी 2017

दर्शन मात्र पौराणिक कथा नहीं

सत्य रूप में ज्ञान का दर्शन वह अनुभूति होगी, ब्रम्ह के उस विज्ञान को आत्मसात् करने के तुल्य होगा जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण रूप संसार उदय हुआ है और अपने रूप में स्थिर है । गुरू अनुग्रहपूर्वक जिज्ञासु अर्जुन का उत्साह वर्धन के उद्देष्य से उसे दिव्य रूप का दर्शन कराने को तत्पर हुये । 

शनिवार, 7 जनवरी 2017

गुरू का अनुग्रह

ज्ञान के जिज्ञासु अर्जुन द्वारा व्यक्त दिव्य रूप के दर्शन की अभिलाषा से द्रवित होकर गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अनुग्रह पूर्वक अर्जुन से कहे कि हे पार्थ तुम मेरे दिव्य रूप का दर्शन करो मेरे रूप जो सौ गुणा हज़ार गुणा विविध रूपों और रंगों में विस्तृत फैला हुआ हैं । 

शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

साक्षात् दर्शन के दृष्टांत

महाभारत ग्रंथ में दृष्टांत वर्णित है कि, जिस समय श्रीकृष्ण दुर्योधन के साम्राज्य में दूत बनकर, मौखिक संवाद के द्वारा कौरवों और पाण्डवों के मध्य विवाद का हल दूढने के प्रयत्न में गये थे, उस समय दुर्योधन ने उन्हे बलपूर्वक बंदी बना लेने का पूरा प्रयत्न किया था । उस अवसर पर श्रीकृष्ण ने उसे अपने दिव्य रूप का दर्शन कराया था जिसे देखकर वह भयभीत हो गया तथा अपने उद्देष्य का परित्याग कर दिया था |  

गुरुवार, 5 जनवरी 2017

मन:स्थिति का विश्लेषण : पक्ष 3

      श्रीमद्भागवद्गीता में गुरू के उपदेश आदि से अंत पर्यंत यही प्रशस्थ करते हैं कि उस एकल सत्य परम् ब्रम्ह की धारणा जिज्ञासु स्वयं अपनी अनुभूति पर आधारित धारण करे । वही अनुभूति सत्य ज्ञान होगा । गुरू के इसी सुझाव को आत्मसात् करके जिज्ञासु अर्जुन गुरू के अबतक के उपदेश से इतना संतुष्ट हो गया है कि उस परम् सत्य की अनुभूति पाने के लिये उसे आत्मा प्रधान जीवन अपनाना होगा । वह गुरू से विनम्र भाव से विनय करता है कि प्रभु मुझे आत्मा प्रधान जीवन के पथ से चलते हुये उस परम् सत्य की अनुभूति पर्यंत यात्रा का दर्शन कराये प्रभू मैं आपका अनन्य अनुयायी हूँ । 

बुधवार, 4 जनवरी 2017

मन:स्थिति का विश्लेषण : पक्ष 2

एक आम प्रकृतीय मोंह से ग्रस्त गृहस्थ का सामन्य जीवन यही होता है कि व्यक्ति किसी नयी वस्तु अथवा स्थिति को देखता है तो उसकी यथा क्षवि से उसे आसक्ति/मोंह जनित होता है, तत्फलम् वह व्यक्ति उस वस्तु अथवा स्थिति को पाने के लिये उद्यत होता है । इसी कामना से अर्जुन गुरू से ब्रम्ह के दिव्य स्वरूप के दर्शन की प्रार्थना करता है । तर्क के आधार पर ऐसा कहा जा सकता है कि अर्जुन को ब्रम्ह और उसके विज्ञान के विषय में श्रवण द्वारा मिले ज्ञान से उसे उस ज्ञान को पाने को उद्यत होने का पर्याप्त उत्साह सृजित नहीं हो रहा है इसलिये वह उस दिव्यरूप को दृष्टि से देखकर ही उसे पाने को उद्यत होना चाहता है ।

मंगलवार, 3 जनवरी 2017

मन:स्थिति का विश्लेषण : पक्ष 1

ज्ञान के जिज्ञासु अर्जुन का अब तक का जीवन यापन एक आम गृहस्थ का था । अब गुरू के उपदेश के प्रभाव से यह पता चला कि आत्मा प्रधान जीवन पथ अपनाने से ही उसे सत्य ब्रम्ह का ज्ञान मिल सकेगा । इस आत्मा प्रधान जीवन को पाने के लिये उसे प्रकृतीय मोंह को त्यागना होगा । प्रकृतीय मोंह उसे प्रिय लग रहा है । प्रश्न उठता है उस प्रिय को त्यागे कैसे ? इसलिये उसका मस्तिष्क उसके सम्मुख यह पहला तर्क प्रस्तुत करता है कि जिस लक्ष्य को पाने के लिये अपने जन्म के साथी मोंह को त्यागने का विचार कर रहे हो, कम से कम उस सत्य को आँखों से देख तो लो । इस मानसिक तर्क की पुष्टि के लिये उसने दर्शन का विनय किया । 

सोमवार, 2 जनवरी 2017

दर्शन का विनय

अर्जुन अपने विनय को पूर्ण करते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण से कहता है कि यदि आप यह समझते हैं कि आपके दिव्यरूप का दर्शन मुझे मिल सकता है तो कृपा पूर्वक आप मुझे अवश्य दर्शन कराइये ।

रविवार, 1 जनवरी 2017

दर्शन की व्याख्या

अर्जुन ज्ञानका जिज्ञासु है । सिद्धांत रूप में श्रवण के माध्यम से यह जानना कि इस रूप संसार के प्रत्येक रूप का सृजन उस एकल सत्य ब्रम्ह द्वारा ही हुआ है और यह समस्त रूप समय के साथ विनाशशील है तथा इनका विलय भी उसी सत्य ब्रम्ह में ही होगा, यह एक स्थिति है, इसके विपरीत इस स्थिति को द्र्ष्य माध्यम से देखकर जानना, दोनो में बहुत अंतर होगा । जिज्ञासु अर्जुन को श्रवण द्वारा तो सभी स्थिति जानने को मिली परंतु उसे इतने से संतोष नहीं हो रहा था । इसलिये वह गुरू से ज्ञान को दृश्य माध्यम से आग्रह करता है । यद्यपि कि एक जिज्ञासु की जिज्ञासा के रूप में अर्जुन की यह अभिलाषा स्वाभाविक कही जावेगी परंतु एक भक्त का अपने ईष्ट से यह आग्रह निष्चय ही अशिष्ट आचरण माना जावेगा ।