गीता में वर्णित पाण्डव और कौरव का
युद्ध उत्कर्ष और मोहासक्ति की लक्षणात्मक अभिव्यक्ति है । पाण्डव सही चुनाव
द्वारा धर्मपथ से उत्कर्ष की ओर प्रगति का प्रतिनिधित्व करते हैं । कौरव अधिक
प्रकृतीय मोंह की ओर यात्रा का प्रतिनिधित्व करते हैं । देववृत्ति और राक्षस
वृत्ति का युद्ध । धर्म जिसे अपनाने से मनुष्य सत्य की ओर अग्रसर होता है । अधर्म
जिसे अपनाने से मनुष्य और अधिक प्रकृतीय मोंह की ओर अग्रसर होता है । धर्म और
अधर्म दोनों की उत्पत्ति एक ही सत्य के मूल से सम्भव हुई है । मात्र उचित के चुनाव
के भेद से दोनों के फल भिन्न होते हैं ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें