बुधवार, 30 सितंबर 2015

उपलब्धि की व्याख्या

गुरू द्वारा बताये गये योग में स्थापित व्यक्ति की स्थिति की व्याख्या करते हुये कहा गया कि अहंकार का पूर्ण समर्पण होने पर ही योग की स्थिति पायी जा सकती है । सत्य ब्रम्ह है । आत्मा मात्र किसी कार्य विषेस के लिये किसी विशिष्ट शरीर में स्थापित है । 

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

मस्तिष्क पर विजय

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जिस व्यक्ति का अनुशासित और नियंत्रित मस्तिष्क कार्य करते हुये सतत् आत्मा के ध्यान में संलग्न रहता है उस व्यक्ति को योग में स्थापित कहा जाता है । 

सोमवार, 28 सितंबर 2015

योग की उपलब्धि

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि इस प्रकार अनुशासित रहते हुये, नियंत्रित मस्तिष्क द्वारा जो व्यक्ति ब्रम्ह के साथ युक्त रहते हुये कार्य करता है वह ब्रम्ह निर्वाण की शांत दशा को प्राप्त करता है जो कि मुझमें समाहित होनेका फल होता है । वह कार्य करता है परंतु उसके आत्मा की दशा शांत ही रह्ती है । 

रविवार, 27 सितंबर 2015

अतिकारक त्याज्य

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि योगाभ्यासी व्यक्ति को शरीर को अतिकारक स्थितियों से बचाना चाहिये यथा अधिक भोजन, अधिक निद्रा आदि । गुरू ने उपरोक्त कथन का विलोम भी कहा कि योगाभ्यासी व्यक्ति को संयमित भोजन तथा संयमित निद्रा का जीवन रखते नियंत्रित मस्तिष्क द्वारा कार्य का अभ्यास करने के फल से वह योग की मर्यादा का प्रसाद पाता है । इस योग के फल से उसके समस्त संताप का निवारण हो जाता है । 

शनिवार, 26 सितंबर 2015

योगी का कार्य

योगाभ्यासी जब पूर्णतया प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो जाता है, उसका चित्त पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाता है तो ऐसी दशा प्राप्त होने पर उसे ब्रम्ह का शाश्वत् धर्म ग्राह्य हो जाता है । उसे सत्य का दर्शन मिलता है । यह शाश्वत् दर्शन, दूषित करने वाले मोंह से मुक्त होने पर ही मिलता है । सत्य का दर्शन पाने वाला योगी ब्रम्ह की शाश्वत् चिर शांति का भोग करता है । वह कार्य तो करता है परंतु उसकी आत्मा अविचलित शांति स्थिति में कायम रहती है । इस स्थित का उदाहरण कमल के पत्ते से दिया जाता है जो पानी में रहते हुये भी पानी से अछूता रहता है । 

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

योग : मर्यादा की स्थापना

आत्मा अपने मौलिक स्वरूप में पूर्णतया प्रकृति से अछूती रहती है । परंतु प्रकृति के मध्य रहते, प्रकृति के गुणो का भोग करते वह मोंह आसक्ति जनित कर लेती है । यत्न द्वारा आत्मा को आच्छादित मोंह से मुक्त करना तथा इसे अपने मौलिक स्वरूप में पुनर्स्थापित करना मर्यादा की स्थापना है । योग खोई हुई मर्यादा की पुनर्स्थापना है । 

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

एकाग्रता

गुरू ने ध्यान योग की विधि बतायी । पुन: ध्यान योग के अभ्यास काल में सम्भावित बाधाओं तथा उन बाधाओं से बचने के उपाय बताये । लक्ष्य प्राप्ति के दो अंग है । पहला आत्मा को उस पर आच्छादित मोंह से उबार कर उसे उसके मौलिक स्वरूप में वापस लाना दूसरा प्रकृति जो कि अपने गुणॉं तथा आकर्षणों से युक्त रहकर आत्मा को अपने सत्य मौलिक स्वरूप से विचलित कर उसे दूषित करने के लिये सदैव उपस्थित रहती है से आत्मा को रक्षित रखना । सत्य का चिंतन ध्यान व उसका अनुभव पाने के लिये एकाग्र मस्तिष्क अनिवार्य वाँक्षना होती है । 

बुधवार, 23 सितंबर 2015

गुरू का उपदेश

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जो व्यक्ति शांत प्रसन्न मुद्रा में किसी भी प्रकार का भय न रखते हुये तथा दृढता से लैंगिक सम्भोग को वर्जित रखते हुये अपने मस्तिष्क को पूर्ण वश में करके ब्रम्ह का ध्यान करता है और ब्रम्ह के ज्ञान के लिये पूर्ण समर्पित रहता है उसे सफलता मिलती है । 

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

धर्मदर्शन में मान्यता

हिंदू धर्म दर्शन में ब्रम्हचर्य का पालन अनेको प्रसंगो में अनिवार्य बताया गया है । इंद्र 101 वर्षों पर्यंत ब्रम्हचर्य का पालन करते हुये तपस्या करके ब्रम्हाजी के पास आये तब ब्रम्हाजी ने इंद्र को सत्य के दर्शन कराये । ज्ञान प्राप्ति के लिये इस ब्रम्हचर्य को महत्वपूर्ण बताते हुये इसे पालन करने को कहा गया है । अन्य धर्मों में भी ज्ञान प्राप्ति के लिये ब्रम्हचर्य को पालन करने को अनिवार्य बताया गया है । 

सोमवार, 21 सितंबर 2015

ब्रम्हचर्य

ब्रम्हचर्य की परिभाषा करते हुये कहा गया है कि व्यक्ति के विचार में, बचन में व क्रिया में साथ ही प्रत्येक काल में प्रत्येक स्थान पर लैंगिक सम्भोग से वंचित रहना ब्रम्हचर्य होता है ।

रविवार, 20 सितंबर 2015

नियंत्रण

गुरू ने योगावस्था प्राप्त करने के लिये जिज्ञासु को समस्त इंद्रियों, मस्तिष्क, पूर्व जीवन की स्मृतियों आदि सभी को नियंत्रित तथा अनुशासित रखने के लिये उपदेश किया है । वास्तविकता में योग अनुशासन की स्थापना है । अनुशासन नियंत्रण द्वारा ही स्थापित हो सकता है । इस प्रक्रिया के ठीक विपरीत प्रकृति के प्रति मोंह आत्मा का अनियंत्रित अनुशासन विहीन आचरण होता है । 

शनिवार, 19 सितंबर 2015

चित्तशुद्धि

आत्मा की प्रधानता का जीवन पानेके लिये प्रकृतीय मोंह के जीवन का त्याग अपरिहार्य आवश्यकता होती है । अभ्यासी का पूर्व का समस्त जीवन प्रकृतीय मोंह का ही रहा होता है । इसलिये विगत जीवन की स्मृतियों का त्याग । चित्तशुद्धि । स्मृतियों के संचय को ही चित्त कहा जाता है । इसी चित्तशुद्धि के लिये ही गुरू ने उपाय सुझाये, फल की कामना बिना किये कर्म को करने का अभ्यास, अपने मस्तिष्क और इंद्रियों को नियंत्रित रखना आदि । प्रकृति आत्मा को चित्त के मार्ग से ही अपने मोंह में आकर्षित करती है । 

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

विद्वानो का मत : 3

विद्वान दार्शनिक एवं सत्यदर्शी प्लूटो का मत है कि हमें सत्य के ज्ञान की आवश्यकता इसलिये है कि हम अपने मानसिक स्तर को इतना ऊँचा उठा सके कि समस्त अच्छाई जानने की हममें क्षमता जागृत हो सके । इस सत्य के ज्ञान के लिये हमें एकांत शांत स्थान पर शांत अंत:करण द्वारा उस सत्य को जानने के लिये एकाग्र प्रयत्न करने की आवश्यकता होती है । 

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

विद्वानो का मत : 2

विद्वान सत्यदर्शी शंकर का कहना है कि सत्य के ज्ञान के जिज्ञासु के लिये जिन गुणों की आवश्यकता हैं वह हैं – सत्य और प्रकृति के मध्य भेद का स्पष्ट विवेक व दृष्टि, किये जाने वाले दायित्व के कर्मों के कर्मफल के प्रति जिज्ञासा का ना होना, आत्म नियंत्रण और सत्य के ज्ञान के लिये प्रबल जिज्ञासा । 

बुधवार, 16 सितंबर 2015

विद्वानो का मत : 1

विद्वान सत्यदर्शी दार्शनिक पाइथागोरस से यह पूँछे जाने पर कि आप अपने को दार्शनिक क्यों कहते हैं के उत्तर में उन्होने एक दृष्टांत के माध्यम से अपने को व्यक्त किया था । उन्होने कहा कि मनुष्य का जीवन ओलम्पिक खेलों के समान होता है जहाँ पूरे संसार के लोग खेलगाँव एकत्रित होते हैं । कुछ लोग वहाँ व्यवसाय करके आनंदित होते हैं, कुछ स्पर्धाओं की होड में व्यस्त रहते हैं और कुछ लोग मात्र सभी कुछ हो रहे के दृष्टा होते हैं । दार्शनिक उपरोक्त अंतिम श्रेणी का होता है । दार्शनिक अपने को आवश्यकताओं और समस्याओं से परे रखता है । 

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

अभ्यास का विस्तार

सर्वोच्च सत्य जिसका अस्तित्व ज्ञान के लिय उपलब्ध इंद्रियों, मस्तिष्क और विवेक की सीमा के परे का है के स्वरूप की धारणा स्थापित करना तथा अनुभव प्राप्त करने का लक्ष्य लेकर किये जा रहे प्रयत्नों में उद्यमी व्यक्ति को अपने अंत:करण में उठने वाली सूक्ष्मतम स्थितियों का अध्ययन करना अपेक्षित होगा । यह अनुभूति क्या होगी इसे निश्चय पूर्वक कोई भी नहीं बता सकता है । यहाँ तक कि अनुभूति होने पर स्वयँ वह व्यक्ति भी नहीं बता सकेगा । परंतु गुरू का कहना है कि इस अभ्यास द्वारा आत्मा जो कि प्रकृतीय मोंह में बँधी हुई है उसे मुक्ति मिलेगी । 

सोमवार, 14 सितंबर 2015

ध्यानयोग की व्याख्या

परम् सत्य जो कि इंद्रियों, मस्तिष्क एवं विवेक के ज्ञान क्षेत्र के परे का स्वत: अस्तित्व है का ध्यान करने और अनुभूति को अपनी धारणा में स्थापित करने के लिये व्यक्ति को इस नश्वर परिवर्तनशील संसार के समस्त सम्बंधों से अपने को अलग करने की अनुशंसा की गुरू ने । मस्तिष्क में संचित पूर्व के सम्बंधों से भी अपनी रक्षा करने की अनुशंसा की गुरू ने । साधना काल में सम्भावित विघ्नों का ध्यान कर गुरु नें इंद्रियों को नियंत्रण में करने की वाँक्षना बतायी है । 

रविवार, 13 सितंबर 2015

ध्यानयोग

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि एक शांत एकांत स्थान पर पवित्र आसन पर बैठकर अपने स्मृति के संचित विचारों तथा इंद्रियों को अपने पूर्ण नियंत्रण में रखते हुये अपने मस्तिष्क को एकल ब्रम्ह के ध्यान में संलग्न कर अपनी आत्मा की शुचिता के लिये योग का अभ्यास करना चाहिये। 

शनिवार, 12 सितंबर 2015

सत्य का परिचय

भगवद्गीता में वर्णित गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण के उपदेशों का लक्ष्य है कि प्रत्येक व्यक्ति ब्रम्ह का अनुभव स्वयं कर सके । सत्य हम सभी के अंत:करण में विद्यमान है । इस सत्य को जानने के लिये हमें किसी अन्य सत्य की सहायता की आवश्यकता नहीं है । मात्र जो आवरण उस सत्य को ढके हुये है उसे हटाना है । सत्य को ढकने वाला आवरण असत्य है । यह असत्य हमारे ज्ञेय क्षेत्र का है । उस असत्य के प्रति हमें भ्रामक मोंह बाँधे हुये है । मोंह इस शरीर से, मोंह इसके व्यसन से यह सभी नश्वर है । मृत्यु अपरिहार्य है । परंतु फिर भी हमारे सारे प्रयत्न इसी शरीर के सुख आराम के लिये ही हैं । यह मोंह कंचिद कटेगा तो सत्य सम्मुख ही मिलेगा । 

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

एकीकृत

ब्रम्ह के साथ एकीकृत । जीवन के सभी छोटे बडे कार्यों को करने में अपनी आत्मा को ब्रम्ह के साथ एकीकृत रखना योगी का लक्ष्य होता है । कार्यों की कर्ता प्रकृति होती है । कार्यों का प्रेरक आत्मा होती है । आत्मा इंद्रियों, मस्तिष्क, और विवेक के ज्ञेय क्षेत्र से परे होता है । इसलिये आत्मा की यथास्थिति उसके द्वारा प्रेरित कर्म की गुणवत्ता द्वारा ही पता लगती है । यदि आत्मा कार्य के निमित्त तथा कार्य के फल से सम्बंध न रखते हुये मात्र उसके प्रेरण को अपने दायित्व के रूप में सम्बंध रखती है तो उसका आचरण धर्मवत है । यही स्थिति हासिल करने के लिये आत्मा को ब्रम्ह के भाव से एकीकृत रखना योगी का लक्ष्य होता है । इसी का अभ्यास योगाभ्यास है । 

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

हृदय

धर्म के प्रकरण में हृदय – concept – धारण को कहा जाता है । ज्ञान की ग्राह्यता सर्वप्रथम धारणा में ही होती है । ब्रम्ह जो कि इंद्रियों, मस्तिष्क और विवेक की सीमा से परे का अस्तित्व होता है उसके ज्ञान के लिये उसकी धारणा स्थापित करना एक दुर्गम लक्ष्य होता है । इसमें पूर्व के ज्ञान अथवा अनुभव सहायक नहीं होते हैं । धारणाशून्य स्थिति सहायक हो सकती है । ब्रम्ह स्वयं ही जिज्ञासु को अपना अनुभव करा देगा । इसी स्थिति को भक्ति पथ में विश्वास कहा जाता है ।  

बुधवार, 9 सितंबर 2015

यतचित्तात्मा

गुरू द्वारा बताये गये योगाभ्यास को व्यक्त करने में भगवद्गीता के अज्ञात् ग्रंथकार ने इस शब्द का प्रयोग किया है- यतचित्तात्मा । चित् अर्थात स्मृति आत्मा और स्मृति एकीकृत । मानसिक एकाग्रता का विचलन स्मृति से प्रारम्भ होता है । इसलिये गुरू ने कहा कि ब्रम्ह के चिंतन काल में मानसिक एकाग्रता को बनाये रखने के लिये जिज्ञासु साधक को चित्त को आत्मा के नियंत्रण में रखना होगा । 

मंगलवार, 8 सितंबर 2015

सतत् अभ्यास

गुरू द्वारा बताये गये योग की अभ्यास विधि में सतत् अभ्यास को भी केंद्रित मस्तिष्क के सदृष्य ही बल दिया गया है । प्राचीन अभ्यास को छोड नये अभ्यास को ग्रहण करने के लिये सतत् अभ्यास महत्वपूर्ण है । ऐसा करने से योग मस्तिष्क की आम क्रिया पद्धति बनेगी । 

सोमवार, 7 सितंबर 2015

केंद्रित मस्तिष्क

गुरू द्वारा बताये गये योग अभ्यास विधि में केंद्रित मस्तिष्क के लिये बल दिया गया है । इससे साधक की सम्पूर्ण ऊर्जा एक प्रयोजन विषेस के लिये प्रयोज्य हो जाती है । एकाग्र केंद्रित मस्तिष्क से स्वच्छ निर्मल विवेक जागृत होता है । निर्मल विवेक के फल से हम योग के अभ्यास के लिये तत्पर होते हैं । योग के साधना द्वारा, हम प्रयोग और प्रयोग के परिणामों पर आधारित जीवन को उच्चस्तरीय सत्य पर आधारित जीवन में उन्नति के लिये अपने को सक्षम बनाते हैं । 

रविवार, 6 सितंबर 2015

अभ्यास विधि की व्याख्या

व्याख्याकार गुरू द्वारा बताये गये योगाभ्यास विधि का विस्तार बताते हुये कहता है कि सामान्य जीवन यापन में प्रत्येक व्यक्ति भौतिक सुखों एवं वासना वस्तुओं को प्राप्त करने एवं संचय करने के प्रयत्नों में व्यस्त रहता है । इस व्यस्तता के कारण उसका मस्तिष्क ब्रम्ह के प्रति अचेत दशा में रहता है । इसलिये गुरू उपदेश किये कि अपने विवेक को ब्रम्ह के ध्यान में केंद्रित करें । 

शनिवार, 5 सितंबर 2015

अभ्यास विधि

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण योग की अवस्था प्राप्त करने के लिये उपाय बताते हुये कहे कि योग के लिये प्रयत्नशील व्यक्ति को अपने को पूर्ण नियंत्रण में एकाग्र रखते हुये सतत् अपने विवेक को परम् ब्रम्ह पर केंद्रित रखने का अभ्यास करना चाहिये । 

शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

उपलब्धि : लक्षण 3

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को, योगावस्था प्राप्त दशा के व्यक्ति के लक्षणों को बताते हुये कहे कि वह व्यक्ति "शत्रु और मित्र" के मध्य रहते हुये, उन व्यक्तियों के मध्य जो “उदासीन और निष्पक्ष हैं” रहते हुये, उन व्यक्तियों के मध्य जो “घृडित और सम्बंधित हैं” रहते हुये भी समभाव का आचरण करता है ऐसे व्यक्ति के कार्य में कोई त्रुटि नहीं होती है । उसके कार्य सदा दोष मुक्त होते हैं । 

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

योगावस्था की व्याख्या

एक योगी प्रति पल अपने को इस परिवर्तनशील संसार के परोक्ष में विद्यमान अपरिवर्तनीय सत्य के साथ युक्त रखता है | अपने को उससे जोडे हुये रहता है । इसलिये उसे इस संसार में प्रतिपल हो रहे परिवर्तनों के द्वारा किसी प्रकार का मानसिक विक्षेप नहीं होता है । वह उस अपरिवर्तनीय सत्य की चिर सत्यता में स्थिर रहता है । 

बुधवार, 2 सितंबर 2015

उपलब्धि : लक्षण 2

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस व्यक्ति की आत्मा ज्ञान (मौलिक ब्रम्ह स्वरूप) विज्ञान (ब्रम्ह और प्रकृति के मध्य भेद) सतत् धारण किये हुये रहती है और जिसे अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण है ऐसे व्यक्ति के लिये एक मिट्टी के टुकडे, एक पत्थर के टुकडे और एक सोने के टुकडे में कोई अंतर नहीं होता है । 

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

उपलब्धि: लक्षण 1

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस व्यक्ति की आत्मा इंद्रीय वासना वस्तुओं और प्रकृतीय गुणों के प्रति मोंह और अरुचि से मुक्त होकर मौलिक ब्रम्ह स्वरूप में स्थिर हो जाती है, उसे सांसारिक द्वैत के विषय, सुख और दु:ख की अनुभूति नहीं करा पाते है और वह सतत् चिर  शांति की अनुभूति करता है ।