अर्जुन गुरू के सम्मुख अपनी विनय प्रार्थना
को और आगे बढाते हुये बोला कि हे सर्वस्य के स्वामी आपके मुखसे मैंने परम् ब्रम्ह
के अखण्ड अविभाज्य रूप के सम्बंध में जो कुछ भी सुना वह सब सत्य है परंतु हे प्रभु
मुझे कृपा पूर्वक अपने उस दिव्य स्वरूप के दर्शन कराइये ।
शनिवार, 31 दिसंबर 2016
शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016
जन्म और मृत्यु
अर्जुन अपनी मन:स्थिति को और आगे
व्यक्त करते हुये कहता है ! हे कमलनयन परम् ब्रम्ह स्वरूप मैं आपके मुखसे इस रूप
संसार के सृजन और उनके विलय के समबन्ध में विस्तार से सुना है ।
गुरुवार, 29 दिसंबर 2016
घबराहट की व्याख्या
अर्जुनके मस्तिष्क में इस रूप संसार
के रूपों के जन्म, उनके अस्तित्व की स्थिरता के
सम्बंध में, उसे जो कुछ भी उसकी पूर्व की
जानकारी थी, वह गुरू के अब तक के उपदेश के
प्रभाव से. इस समबंध में सत्य स्थिति क्या है का ज्ञान प्राप्त हुई, जिसके फल से भ्रामक प्रमाणित हुई । उसके
मस्तिसक में व्याप्त समस्त अस्थिरता उसके भ्रामक विचारों से ही जनित थी । इसलिये
सत्य स्थिति के ज्ञान से उसकी अस्थिरता क्षीण हुई । इसी स्थिति को उसने गुरू के
समक्ष व्यक्त किया ।
बुधवार, 28 दिसंबर 2016
घबराहट का क्षय
गुरू के अब तक के उपदेश द्वारा
अर्जुन के ऊपर जो प्रभाव हुआ उसे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि चर्मोत्कर्ष
ज्ञेय के विषय में आपके द्वारा मुझे जो भी दीक्षा मिली उसके प्रभाव से मुझमें जो
घबराहट व्याप्त हो गई थी वह नियंत्रित हो गई है ।
मंगलवार, 27 दिसंबर 2016
सीमन की व्याख्या
यह समस्त रूप संसार अखण्ड, अविभाज्य, अनंत ब्रम्ह की महिमा का मात्र आंशिक अभिव्यक्ति है । इस रूप
संसार में विकीर्ण समस्त वैभव ब्रम्ह की चमकती हुई महिमा मण्डल के मात्र एक किरण
से प्रकाशित है । ज्ञान के जिज्ञासु साधक को ब्रम्ह की इस महिमा का ध्यान कर
प्रयत्नमें संलग्न होना अपेक्षित होता है ।
इसके साथ विभूति योग नामक दशवाँ
अध्याय पूर्ण हुआ
सोमवार, 26 दिसंबर 2016
जिज्ञासा का सीमन
अर्जुन की जिज्ञासा की तुष्टि के
लिये समस्त रूप विस्तार सम्बंधी उपदेश करने के उपरांत गुरू योगेश्वर श्रीकृष्न
अर्जुन से कहे कि परंतु यह सब कुछ तुम्हे जानने की क्या आवश्यकता है ? मैं इस समस्त रूप संसार को मात्र अपने
अस्तित्व के अंश मात्र से इस रूप संसार के समस्त रूपों को वेध करके सम्बल देता हूँ
।
रविवार, 25 दिसंबर 2016
उपसंहार की व्याख्या
गुरू द्वारा इस रूप विस्तार के
सम्बंध में बताये गये उपदेश का साराँश यह है कि इस रूप संसार का प्रत्येक रूप
ब्रम्ह की महिमा द्वारा ही सृजित हुआ है,
उनकी कृपा द्वारा ही अपने रूप में स्थिर है, परंतु जो भी रूप अधिक सुंदर और वैभवयुक्त प्रगट होते हैं वह
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से व्यक्त करने वाले होते हैं । इस रूप संसार के दृष्य पटल
पर जो भी कीर्तिमानकृत, जो भी महानतम बलिदान, जो भी प्रखर बुद्धिमत्ता के कर्म सम्भव
होते हैं वह समस्त ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से व्यक्तकरने वाले प्रमाणित होते हैं ।
जो भी महाकाव्य, जो भी वीरगाथा मनुष्य के सीमित
मस्तिष्क के लिये अस्पष्ट अथवा अपरिभाष्य प्रतीत होते हैं वह सभी ब्रम्ह के मात्र
अंशमात्र वैभव द्वारा सम्भव हो जाते हैं ।
शनिवार, 24 दिसंबर 2016
रूप विस्तार का उपसंहार
अर्जुन द्वारा उठाये गये ब्रम्ह के
ध्यानकाल में मस्तिष्क में धारण करने के लिये ब्रम्ह के रूप सम्बंधी जिज्ञासा की
पुष्टि करते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस रूप संसार के विविध रूपों में से
कुछ एक का लक्षणात्मक उपदेश करने के उपरांत सार रूप में बताये कि किसी भी रूप
स्वरूप में जो कुछ भी गौरव, लावण्य, ओज़ प्रदान किया गया है उसे जानो कि वह मात्र मेरे अंश मात्र
द्वारा सम्भवहुआ है ।
शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 20
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को उपरोक्तानुसार कराने के उपरांत गुरु योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मेरे वैभव से सृजित हुये रूपों की गणना का कहीं अंत
नहीं है हे शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले अर्जुन जो कुछ भी मैंने बताया है वह
मेरी अन्तविहीन वैभव का मात्र प्रतीक अन्श है ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के
प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही
रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।
गुरुवार, 22 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 19
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि सभी रूप धारी अस्तित्वों में बीर्य हूँ, हे अर्जुन इस संसार की कोई भी चल अथवा अचल रूप मेरे अवलम्ब के
बिना अपने रूप में स्थिर नहीं रह सकता है ।
एक संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
बुधवार, 21 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 18
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि दण्ड देने वालों में मैं दण्ड का मानक हूँ, जो लोग विजय प्राप्त करते हैं मैं उनकी नीति हूँ, गोपनीय वस्तुओं में मैं मौन हूँ और ज्ञान
प्राप्त ज्ञानियों में मै ज्ञान हूँ ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के
प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही
रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।
मंगलवार, 20 दिसंबर 2016
ब्यास
ब्यास संस्कृत भाषा का शब्द है
जिसका अर्थ होता है “ संकलित करने वाला” – “संग्रहित करने वाला” । महर्षि ब्यास
ग्रंथ महाभारत के रचयिता है । इन्होंने वेदों का वर्गीकरण किया था । इन्हे
वेदव्यास भी अनेको प्रसंगों में कहा गया है ।
सोमवार, 19 दिसंबर 2016
वृसिनि
वृसिनि यदु वंश के प्रथम राजा थे ।
श्रीमद्भागवद्पुराण में वर्णन आया है कि वृसिनि के वंशजो में बलरामजी उन्नीसवें
शासक थे और श्रीकृष्ण बीसवें शासक थे । संस्कृत शब्द “वृसिनि” का अर्थ “बंशजो में”
बताया गया है ।
रविवार, 18 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 17
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि वृसिनि में मैं वासुदेव हूँ,
पाण्डवों में मैं धन पर विजय करने वाला अर्जुन हूँ, बुद्धिमान विवेकी पंडितों में मैं ब्यास हूँ और कवियों में मैं
उस्ना हूँ ।
एक संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
शनिवार, 17 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 16
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि छल के क्षेत्र में मैं जूआ हूँ,
भव्य की मैं भव्यता हूँ, मैं विजय हूँ, मैं प्रयत्न हूँ और मैं अच्छे की अच्छाई
हूँ ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के
प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही
रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।
शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016
गायत्री मंत्र
वैदिक मंत्रों में सबसे अधिक गाया
जाने वाला मंत्र “गायत्री मंत्र” है । वेदों के अन्य मंत्रों की भाँति ही इस मंत्र
के रचयिता के रूप में किसी का नाम नहीं बताया जाता है । वेद के मंत्रों के विषय
में कहा जाता है कि वे प्रत्येक किसी ना किसी ऋषि के मस्तिष्क में स्वयं से ही
प्रगट हुये हैं । इस रूप में गायत्री मंत्र ऋषि विश्वामित्र के मस्तिष्क में स्वयं
से प्रगट हुआ था । यह ऋगवेद का मंत्र है ।
गुरुवार, 15 दिसंबर 2016
बृहतसम
सामवेद जो कि गायन के डृष्टिकोण से
अन्य तीन वेदों की अपेक्षा अधिक सम्पन्न बताया जाता है में निहित देवताओं को
प्रसन्न करने वाले गायन के गीतों में देवताओं के राजा इन्द्र की प्रसन्नता के लिये
गाया जाने वाला गीत “बृहतसम” है । इसका गायन काल मध्य रात्रि होती है । इसकी राग अत्यंत
मधुर है ।
बुधवार, 14 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 15
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि प्रशंसा गायन के गीतों में बृहतसम हूँ, ध्वनि में निरंतर नियमित गति सृजित करने वाली कविताओं में मैं
गायत्री मंत्र हूँ, माह/महीनों में मृगशिरा हूँ, ऋतुओं में मैं फूलों से भरी बसंत ऋतु हूँ ।
एक संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
मंगलवार, 13 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 14
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि मैं सभी जीवों को खा जाने वाली मृत्यु हूँ औय्र जिनका अभी इस संसार में
प्रादुर्भाव नहीं हुआ है उनका जन्म हूँ और जीवों के जीवन के स्त्रीलिंग स्वभाव के
परिवर्तनों में मैं उनकी ख्याति, सम्पन्नता, वाणी, स्मृति, बुद्धि कुशाग्रता,
दृढता और धर्य हूँ ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के
प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही
रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।
सोमवार, 12 दिसंबर 2016
सृजन कर्ता ब्रम्हा
इस रूप संसार के सृजन कर्ता ब्रम्हा
सभी रूपों के प्रधान रूप हैं । अनेकों ब्रम्हा को बताया गया है । चार मुख के
ब्रम्हा, आठ मुख के ब्रम्हा, सोलह मुख के ब्रम्हा आदि । अलघ अलग
सृष्टियों के अलग अलग ब्रम्हा । अलग सृष्टियों में ये प्रत्येक, ब्रम्ह, को निरूपित करने वाले होते हैं ।
रविवार, 11 दिसंबर 2016
संहारक समय
समस्त ज्ञात संहारक शक्तियों में
“समय” सबका राजा है । सर्वाधिक शक्तिशाली है । इस रूप संसार का प्रत्येक रूप इस
“समय” के द्वारा ही अपने अंतिमगंतब्य पर पहुँचते हैं । यह “समय” सभी का संहारक
होता है । इस रूप में यह ब्रम्ह को व्यक्त करने वाला है ।
शनिवार, 10 दिसंबर 2016
अकार
संस्कृत भाषा की वर्णमाला का प्रथम
अक्षर वैदिक साहित्य का प्रथम अक्षर है । अकार के सन्योग होने से ही कोई भी ध्वनि
सम्भव होती है । इस प्रकार ध्वनि का मूल है “अकार” । इस रूप में यह ब्रम्ह स्वरूप
है ।
शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016
द्वंद:
यह शब्द संस्कृत भाषा से है । यह दो
ऐसे शब्दो का समूह होता है जिसमें प्रत्येक दोनों शब्द एक बराबर अर्थ तथा भाव के
होते हैं । उदाहरण – राम्कृष्ण, । इस समूह के दोनो शब्दों का अलग
पहचान होती है । इस समूह का कोई भी शब्द दूसरे शब्द के अधीन नहीं होता है । इस
समूह के प्रत्येक दोनो शब्द बराबर ओजस्वी होते हैं ।
गुरुवार, 8 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 13
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि वर्णमाला का मैं प्रथम अक्षर हूँ, मिश्रित में मैं द्वंद हूँ, मैं अक्षय समय हूँ और सृजनकर्ता में मैं ब्रम्हा हूँ जिसका मुख
प्रत्येक दिशा मैं है ।
एक संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
बुधवार, 7 दिसंबर 2016
तर्क-निष्कर्श-सत्य
हिंदू धर्मा दर्शन के विभिन्न
ग्रंथों में भिन्न भिन्न स्तर के तर्क की कवायद की गई है । इस प्रक्रिया में साक्ष्य
के रूप में उद्घृत दृष्टांतों को दर्शन में “जप” कहा गया है । पुन: एक तर्क को
दूसरे तर्क से परास्त करने के दृष्टांतों को “वितण्ड” कहा गया है । अंत में अंतिम
निर्णय के रूप में निकाले गये निष्कर्श को “वद” कहा गया है । इन समस्त “वद” के
परोक्ष में स्थित “परम् सत्य” को “प्रवद्तम” कहा गया है । “प्रवद्तम” ब्रम्ह
स्वरूप है ।
मंगलवार, 6 दिसंबर 2016
आत्मा का आत्मविज्ञान
आत्मा के आत्मविज्ञान का दर्शन हमें
अज्ञान के नाश का पथ प्रशस्थ करता है । आत्मा का आत्मविज्ञान हिंदू धर्मदर्शन के
अनेक ग्रंथों यथा चारो वेद, वेदांतसूत्र, 10 पुराणों, तथा भगवद्गीता में विस्तार पूर्वक वर्णित हैं । इस रूप में
उपरोक्त सभी ग्रंथ ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से व्यक्त करने वाले हैं ।
सोमवार, 5 दिसंबर 2016
आदि अंत और मध्य
इस रूप संसार की समस्त रूप रचनाओं
में प्रयुक्त बुनियादी पदार्थ ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति के अवयव हैं । इन समस्त
रूपों को उनके सृजित रूपों में स्थिर रखने का दायित्व ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति
निर्वाह करती है । अंत में इन समस्त रूपों का विलय भी “शिव” रूप ब्रम्ह में ही
होता है । यह समस्त प्रक्रिया ब्रम्ह की प्रकृति का ही सम्पादन है । इसी रूप में
ब्रम्ह ही समस्त रूप संसार के समस्त रूपों का आदि, मध्य तथा अवसान होता है ।
रविवार, 4 दिसंबर 2016
आदि अंत और मध्य
इस रूप संसार की समस्त रूप रचनाओं
में प्रयुक्त बुनियादी पदार्थ ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति के अवयव हैं । इन समस्त
रूपों को उनके सृजित रूपों में स्थिर रखने का दायित्व ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति
निर्वाह करती है । अंत में इन समस्त रूपों का विलय भी “शिव” रूप ब्रम्ह में ही
होता है । यह समस्त प्रक्रिया ब्रम्ह की प्रकृति का ही सम्पादन है । इसी रूप में
ब्रम्ह ही समस्त रूप संसार के समस्त रूपों का आदि, मध्य तथा अवसान होता है ।
शनिवार, 3 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 12
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि समस्त सृजित हुये रूपों का मैं आदि, मध्य और अवसान हूँ,
हे अर्जुन समस्त ज्ञात विज्ञानों में “आत्म विज्ञान” (spiritual scince of self) हूँ, तर्क द्वारा सत्य को जानने के प्रयत्नों में मैं अंतिम
निष्कर्श के रूप में आहरित होने वाला सत्य हूँ ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के
प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही
रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।
रूप विस्तार : चरण 11
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि पवित्र करने वालों में मैं “वायु” हूँ, वन में विचरण करने वाले शस्त्रधारियों में मैं “राम” हूँ, मछलियों में मैं “शार्क” हूँ, बहती हुई नदिंयों में मैं “गंगा” हूँ ।
एक
संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016
गरूण
हिंदू धर्म में गरुँण को एक देवता
के रूप में माना गया है । यह पक्षी स्वरूप में हैं । इनका सिर और पंख चील्ह सदृष्य
है शेस शरीर मनुष्य के सम्मन बताया गया है । ये भगवान विष्णु के वाहन के प्रयोजन
में संलग्न हैं । इन्हे पक्षियों का राजा माना गया है । इन्हे “विनायक” नाम से भी
जाना जाता है । इन्हे विघ्नों का निवारक बताया जाता है । इनकी पूजा भगवान विष्णु
की पूजा के साथ ही होती है ।
गुरुवार, 1 दिसंबर 2016
काल
इस रूप संसार की प्रत्येक घटना एवं
रूप का नियंत्रक “समय” होता है । प्रत्येक उद्घृत रूप का समय के साथ अंत निश्चय है
। इस रूप में नियंत्रक शक्ति के रूप में “समय” ब्रम्ह स्वरूप है । इस प्रकार
नियंत्रक शक्तियों में “समय” ब्रम्ह को सर्वाधिक सक्षमता से निरूपित करने वाला
होता है ।
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