सभी रूपों में ब्रम्ह को विद्यमान
देखने वाले व्यक्ति के सम्बंध में गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि
क्योंकि वह व्यक्ति प्रत्येक रूप में ब्रम्ह को समानरूप से विद्यमान देखता है इसके
फल से वह अपनी अहंकार स्वरूप आत्मा द्वारा अपनी सत्य आत्मा को आहत नहीं करता है और
सर्वोच्च उपलब्धि को प्राप्त हो जाता है ।
बुधवार, 31 मई 2017
मंगलवार, 30 मई 2017
सर्वव्यापी
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो व्यक्ति प्रत्येक रूपों में ब्रम्ह को विद्यमान देखता है और उन रूपों
के नष्ट हो जाने पर भी उसे न नष्ट हुआ विद्यमान देखता है, वह सत्य को देखता है और इसके फल से वह स्वयँ सर्वभौम बन जाता
है ।
सोमवार, 29 मई 2017
आरोपण
क्षेत्र और क्षेत्र के ज्ञाता का
सन्योग एक का दूसरे के ऊपर आरोपण के रूप में होता है । इस आरोपण के विज्ञान के
फलसे एक का दूसरे रूप में अनुभव ज्ञान होने लगता है । इसी भ्रम का जब भी निवारण
होता है, तो इस जीवन मृत्यु के चक्र से
मुक्ति मिल जाती है ।
रविवार, 28 मई 2017
सृजन आधार
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बताये कि
हे भारत (अर्जुन) जिस भी जीव को जन्म मिला है, चाहे चालय-मान हो अथवा अचलाय-मान हो, वह क्षेत्र और क्षेत्र के ज्ञाता के सन्योग से ही सम्भव हुआ है
।
शनिवार, 27 मई 2017
अन्य लोग
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
बताये कि कुछ अन्य लोग जो ध्यान-ज्ञान अथवा कर्म द्वारा अपने को
ब्रम्ह के साथ युक्त नहीं कर पाते हैं,
वे अन्य लोगों से सुनकर उपासना करते हैं,
वे भी जो कुछ उन्होने सुना है, उस-पर आस्था रखते हुये मृत्यु के परे पहुँच जाते हैं ।
शुक्रवार, 26 मई 2017
ध्यान-योग
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि कुछ लोग ध्यान को केंद्रित करने के अभ्यास द्वारा अपने आत्मा के द्वारा
अपने आत्मा को अपने आत्मा में स्थापित करते है, कुछ अन्य लोग ज्ञान के द्वारा तो अन्य कुछ लोग कर्म के द्वारा
अपने को अपने आत्मा में स्थापित करते हैं ।
गुरुवार, 25 मई 2017
जीवन-मुक्त दशा
संचित वासना से कर्म का सृजन-चक्र प्रारम्भ होता है । विवेक में विचार
बनकर उदय होता है । मस्तिष्क में इच्छा का रूप धारण करता है । अहंकार उसे सम्पादन
प्रदान करता है । कर्म-सिद्धांत के अनुसार यह कर्म कर्मफल
की परिधि में है । इसके विपरीत आत्मा साक्षी है । कर्ता प्रकृति है । गुण प्रकृतीय
रचना हैं । इस स्वरूप को धारण करके व्यक्ति की इंद्रियाँ अपने विषयों के साथ
परस्पर करेंगी, कर्म होगा, परंतु वह कर्मफल की परिधि में नहीं होगा । यह जीवनमुक्त दशा
होगी ।
बुधवार, 24 मई 2017
यथा स्वरूप
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो व्यक्ति आत्मा, प्रकृति और गुणों को उनके
यथास्वरूप जानता है वह व्यक्ति यद्यपि कि प्रत्येक कार्य करता है परंतु वह
पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है ।
मंगलवार, 23 मई 2017
अद्वैत वेदांत
अद्वैत वेदांत यही प्रशस्थ करता है
कि प्रकृति कर्ता है परंतु अ-चेतन है और पुरुष (आत्मा) चेतन है परंतु अ-कर्ता है ।
आत्मा प्रकृति के कार्यों की दृष्टा है । वह ब्रम्ह स्वरूप है । माया के आवरण
शक्ति के प्रभाव से व्यक्ति कर्ता और साक्षी के मध्य भेद को नहीं जान पाता है ।
यही अज्ञान का स्वरूप है ।
सोमवार, 22 मई 2017
साक्षी
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि शरीर में स्थित आत्मा को दृष्टा, अनुमतिदाता, आधार, अनुभवकर्ता, महान स्वामी और परमात्मा स्वरूप
बताया जाता है ।
रविवार, 21 मई 2017
जन्म मृत्यु चक्र
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि आत्मा शरीर में रहते हुये प्रकृति द्वारा सृजित गुणों का भोग करती है, उसकी इन गुणों के साथ आसक्ति उसके अच्छी
बुरी योनियों में जन्म का कारण होता है ।
शनिवार, 20 मई 2017
निमित्त व फल
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि कर्मफल, शरीर एवं अहंकार का सृजन प्रकृति
से होता है जबकि सुख और दु:ख की अनुभूति का सृजन आत्मा का अनात्मन के साथ मोंह से
सृजित होता है ।
शुक्रवार, 19 मई 2017
भिन्नमत
भगवद्गीता में पुरुष और प्रकृति को
एक ही ब्रम्ह की उच्चतर और निम्नतर प्रकृति के रूप में लिया गया है । अद्वैत
वेदांत में ब्रम्ह को सत चित आनंद बताया गया है । जीव में वर्तमान आत्मा और संसार
में फैले हुये रूप, दोनो ही एक ब्रम्ह से ही सम्भव
हुये हैं, परंतु माया के प्रभाव से कोई देख
नहीं पाता है ।
गुरुवार, 18 मई 2017
रूप गुण प्रकृति
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि पुरुष और प्रकृति दोनो ही अनादि काल से हैं और यह भी जानो कि समस्त रूप
तथा गुण प्रकृति से पैदा होते हैं ।
बुधवार, 17 मई 2017
विलय हेतु पात्र
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि इस प्रकार संक्षेप में हमने प्रकृति, ज्ञान और ज्ञान का विषय को बताया है । इन्हे जानने वाला
व्यक्ति मुझ में (ब्रम्ह में) विलय के लिये योग्य पात्र बन जाता है ।
मंगलवार, 16 मई 2017
ज्ञान-विषय-लक्ष्य
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ब्रम्ह के
विषय में अर्जुन को बताये कि, वह ज्योंतियों की भी ज्योति है ।
वह अंधकार से परे है । वह ज्ञान है | वह
ज्ञान का विषय है । वह ज्ञान का लक्ष्य है । वह प्रत्येक के हृदय में विद्यमान है
। उपरोक्त सभी सत्य का निरूपण हैं ।
सोमवार, 15 मई 2017
अविभाज्य विभाजित
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ब्रम्ह के
विषय में अर्जुन को बताये कि वह अविभाज्य है, फिर भी प्राणियों में विभाजित प्रतीत होता है । ऐसा जानना
चाहिये कि, वह सभी का पोषण कर्ता है, उनका बिलय भी उसी में होता है और पुन: उन्हे
नये सिरे से पैदा करता है ।
रविवार, 14 मई 2017
दूर-भी निकट-भी
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ब्रम्ह के
विषय में अर्जुन को बताये कि वह सभी प्राणियों के बाहर है और अंदर भी है । वह अचल
भी है और चलायमान भी है । वह इतना सूक्ष्म है कि उसे जाना नहीं जा सकता है । वह
दूर है फिर-भी पास है ।
शनिवार, 13 मई 2017
रूपधारी भी अ-रूपधारी भी
गुरू का उपदेश प्रशस्थ करता है कि
ब्रम्ह समस्त रूपों का आश्रय है फिर भी उसका कोई रूप नहीं है । वह सब कुछ सुनता है, परंतु इन चर्म कर्णों से नहीं, वह सब कुछ देखता है परंतु इन मानव आखों से
नहीं, वह सब कुछ जानता है, परंतु इस सीमित मस्तिष्क से नहीं । ब्रम्ह
की व्यापकता को अध्यारोप और अपवाद द्वारा व्यक्त किया जाता है । वह अव्यक्तनीय है
।
शुक्रवार, 12 मई 2017
अवलम्ब परंतु असम्बद्ध
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ब्रम्ह के
विषय में अर्जुन को आगे बताते हुये कहे कि, वह ऐसा प्रतीत होता है कि, उसमें सभी इंद्रियों के गुण हैं और फिर भी वह किसी भी इंद्रिय
से रहित है, वह अनासक्त है, फिरभी सभी का अवलम्ब है, वह प्रकृतीय गुणों से रहित है, फिरभी उनका उपयोग कर रहा है ।
गुरुवार, 11 मई 2017
विरोधाभास की भाषा
ब्रम्ह को व्यक्त करने के लिये
विरोधाभास वाले शब्दों का प्रयोग करना एक पद्धति है । यथा बिना किसी संसर्ग के फिर
भी प्रत्येक में, अ-चल फिरभी चलता हुआ, सभी से दूर फिर भी सन्निकट, अ-विभाज्य फिर भी विभाजित आदि । ब्रम्ह प्रकृति
से अछूता भिन्न स्वत: अस्तित्व है । इसलिये ज्ञान के कोई भी प्रकृतीय साधन उसे
व्यक्त करने में सक्षम नहीं हो सकते हैं । उसे ग्रहण किया जा सकता है परंतु व्यक्त
नहीं किया जा सकता है ।
बुधवार, 10 मई 2017
क्षेत्रज्ञ परमात्मा
महाभारत ग्रंथ में ऐसा वर्णन आता है
कि आत्मा जब प्रकृतीय गुणों के साथ अपने को युक्त प्रदर्शित करती है तो उसे
क्षेत्रज्ञ कहा जाता है जबकी आत्मा अपने मौलिक स्वरूप अर्थात् दृष्टा रूप में अपने
को प्रदर्शित करती है तो उसे परमात्मा बताया जाता है । वेदांत में इस भिन्नता का
कारण कहा गया है कि माया की आवरण शक्ति के प्रभाव से यह सम्भव होता है । इसे ही
अज्ञान बताया जाता है । इस अज्ञान का फल होता है कि आत्मा दृष्टा स्वरूप से च्युत
हो कर्ता स्वरूप ग्रहण कर लेती है ।
मंगलवार, 9 मई 2017
एक मात्र विषय
ब्रम्ह विषय है, इस रूप संसार के समस्त रूप एवं गति उसके
अनुभव की वस्तु हैं । वह सबसे श्रेष्ठ एवं भिन्न भी है और सभी में समाहित भी है ।
उसकी चेतना से ही समस्त अनुभव ग्राह्य होते हैं । सभी से अछूता है । वह दृष्टा है
। अन्य सभी कुछ दृष्य मात्र हैं । उसे शब्दो से व्यक्त नहीं किया जा सकता है ।
सोमवार, 8 मई 2017
निवासी भी आवरण भी
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
बताये कि उसके हाथ और पैर सब जगह है,
उसकी आँखे मुख और सर सब ओर हैं उसके कान सब दिशाओं में हैं वह सबको आवृत्त करके
संसार में रह रहा है ।
रविवार, 7 मई 2017
अनंत
वह शाश्वत् सत्ता इस रूप संसार के
समस्त अस्तित्वों तथा अन-अस्तित्वों के द्वैतों से परे है जिसका न ही प्रारम्भ है
न ही अंत है । कंचिद यदि व्यक्ति इसकी अनुभूति कर सके तो उसे जीवन और मृत्यु मात्र
एक घटना स्वरूप प्रतीत होने लगेगे वह अज़र स्वरूप में जीवनयापन करेगा । यह आत्मा
वही शाश्वत् स्वरूप हैं ।
शनिवार, 6 मई 2017
ज्ञेय
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
कहे कि अब मैं तुम्हे यह बताऊँगा कि जानने योग्य क्या है और जिसको जानने से शाश्वत
जीवन प्राप्त हो जाता है । वह है पर-ब्रम्ह
जिसका कोई आदि नहीं है, और जिसके लिये कहा जाता है कि, न तो सत् है और न ही असत् है ।
शुक्रवार, 5 मई 2017
ज्ञान का सार
अचेतन प्रकृति चेतन ब्रम्ह की चेतना
से प्रकाशित होती है । वह क्रियाशील हो जाती है । माया की महिमा से अहंकार का उदय
होता है । जीव सृजित हो जाता है । वह इस नाम-रूप-धारी संसार में भ्रमण करने लगता है
। कंचिद किसी काल उसे अंधकार (भ्रम) का बोध हो जाता है । वह प्रकाश (सत्य) की तलाश
को उन्मुख हो जाता है । उसमें, ज्ञान 1 से ज्ञान 5 पर्यंत, गुरू द्वारा गणना कराये गये 20 लक्षणों का
उदय होगा । इन्हे ही गुरू नें ज्ञान बताया है ।
गुरुवार, 4 मई 2017
ज्ञान : 5
व्यक्ति में अपेक्षित विशेषताओं की
गणना को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि आत्मज्ञान के
लिये सतत् सचेष्ट रहना, सत्य की अनुभूति के लिये
अंतर्दृष्टि – इसे (ज्ञान 1 से 5 पर्यन्त) (सच्चा) ज्ञान कहा जाता है और इससे
भिन्न जो कुछ भी है वह अज्ञान है ।
बुधवार, 3 मई 2017
ज्ञान : 4
व्यक्ति में अपेक्षित विशेषताओं की
गणना को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि अनन्यरूप से
अनुशासित भाव से मेरे प्रति अविचल भक्ति,
एकांत स्थान में रहना और समुदाय में रहने में अरुचि ।
मंगलवार, 2 मई 2017
ज्ञान : 3
व्यक्ति में अपेक्षित विशेषताओं की
गणना को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि अन-आसक्ति, पुत्र-स्त्री-घर आदि के प्रति मोंह ना होना, इच्छित और अन-इच्छित घटनाओं की दशामें
समभाव से रहना ।
सोमवार, 1 मई 2017
ज्ञान : 2
व्यक्ति में अपेक्षित विशेषताओं की गणना
को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि इंद्रीय विषयों से
अनासक्ति, अहंकार-शून्यता और जन्म,
मृत्यु, वृद्ध अवस्था, बीमारी तथा दु:ख की पीडाओं का सज्ञान रखना
।
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