गीता का लक्ष्य मात्र सिद्धांत को निरूपित करना नहीं है
अपितु उचित के चुनाव के द्वारा धर्मपथ से सिद्धांत को व्यवहारिक जीवन में चरितार्थ
करने का पथ प्रदान करना है । धर्म सामाजिक और मनुष्य समुदाय में मनुष्य के
दायित्वों और वाँक्षनाओं द्वारा सृजित होता है । धर्म मनुष्य को उन्नति प्रशस्थ
करता है । धर्म मनुष्य को परवशता से मुक्त कर स्वतंत्रता प्रशस्थ करता है । गीता
में एक उदाहरण के माध्यम से जिसके अनुसार एक मनुष्य अपने कर्म दायित्व और खून के
रिश्तों को त्यागने को तत्पर होता है, यह मार्ग प्रशस्थ
करती है कि कैसे वह मनुष्य उस अवसर को जिसमें वह उपरोक्त त्याग करने को उन्मुख हुआ
है को अपनी उन्नति और स्वतंत्रता के लिये प्रयोग कर सकता है । प्रकृति ने हमें
जीवन चाहे किसी भी स्तर पर दिया है । हम इस जीवन को प्रकृति के दिये हुये स्तर से
कैसे उन्नति कर परम् सत्य के स्तर तक पहुँचा सकते हैं ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें