प्रकृति असंख्य सम्भावनाये प्रस्तुत करती है । आत्मा का सम्बंध
उन सम्भावनाओं से नहीं होना चाहिये । परंतु प्रकृतीय मोंह से ग्रसित आत्मा उन
सम्भावनाओं में से चयन करने में संलग्न हो जाती है । इस त्रुटि के कारण ही समस्त
तनाव की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं । इसी त्रुटिपूर्ण स्थिति का अर्जुन सामना कर
रहा था ।
शनिवार, 31 अक्टूबर 2015
शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015
अर्जुन की समस्या सतत्
अर्जुन योगेश्वर को अपने मस्तिष्क की दशा बताते हुये आगे कहता
है कि मस्तिष्क अति चंचल दशा में है,
भावुकता के वशीभूत है इसे वश में करना मेरे लिये अति दुष्कर हो रहा है ।
गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015
अर्जुन की समस्या
गुरू द्वारा योग का विस्तार सुन कर अर्जुन कहा कि हे मधुसूदन
आपने बताया कि योग की स्थिति के लिये मस्तिष्क की समता की स्थिति होनी चाहिये
परंतु मैं अपने मस्तिष्क में व्याप्त व्यग्रता के कारण ऐसा महसूस करता हूँ कि समता
की स्थिति पाने के लिये मेरे पास कोई स्थिर आधार नहीं है
बुधवार, 28 अक्टूबर 2015
सनता की व्याख्या
प्रथम चरण में आत्म अनुभूति का होना पुन: आत्मा में ब्रम्ह स्वरूप
का बोध होना । इन भावो के प्रतिफल से उसे प्रत्येक स्वरूप में ब्रम्ह के विद्यमान
होने का अनुभव होने लगता है । ऐसी दशा प्राप्त होने पर व्यक्ति प्रत्येक के प्रति
आदर भाव से युक्त हो जाता है विनम्र हो जाता है । उसकी इच्छायें क्षीण हो जाती है
इसलिये वह सुख और दु:ख की अनुभूति से मुक्त हो जाता है ।
मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015
समता
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि हे अर्जुन जो व्यक्ति सभी को एक
समता के भाव से देखता है, सभी में ब्रम्ह के विद्यमान होने
की अनुभूति करता है, चाहे वह सुख में हो अथवा दु:ख में
हो एक समान ही रहता है वह व्यक्ति योगी होता है ।
सोमवार, 26 अक्टूबर 2015
ब्रम्हसमाहित की व्याख्या
गुरू का कथन व्यक्ति के मस्तिष्क के भाव से सम्बन्ध रख्ता है ।
जिस व्यक्ति के मस्तिष्क में ब्रम्हचेतना सतत् स्थिर रहती है उसका अहंकार क्षीण हो जाता है । कार्य तो वह
प्रकृति की अपेक्षानुसार करेगा ही परंतु उसे ब्रम्ह की मर्यादा का स्मरण सतत्
विद्यमान रहने से वह कर्तापन के भाव से मुक्त रहेगा और ब्रम्ह के प्रतिनिधि के रूप
में कार्य करेगा ।
रविवार, 25 अक्टूबर 2015
ब्रम्हसमाहित
योग की अवस्था प्राप्त व्यक्ति के लिये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
बतये कि जो व्यक्ति ब्रम्हके साथ युति की दशा प्राप्त कर लिया है वह व्यक्ति संसार
के समस्त रूपों में ब्रम्हको विद्यमान देखते हुये ब्रम्ह में ही जीवन यापन करता है
भले ही वह किसी कर्म में रत हो ।
शनिवार, 24 अक्टूबर 2015
सर्वव्यापी की व्याख्या
गुरू का कथन कि वह व्यक्ति न ही ब्रम्हसे बिक्षुडता है और ना ही
ब्रम्ह उस व्यक्ति को विस्मृत करता है व्यापकता का ज्ञोतक है । व्यक्ति अपने आत्म
अनुभूति को जितना ही अपना गहन अनुभव बनाता है उतना ही वह प्रत्येक रूप में ब्रम्ह
की अनुभूति से ओतप्रोत हो जाता है । व्यक्ति जितना ही अपने को प्रकृति के मोंह से
काट अपने को ब्रम्ह के ध्यान में केंद्रित करता है उतना ही उसके विचार व्यापक हो
जाते हैं ।
शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015
सर्वव्यापी
योग की स्थिति प्राप्त हो जाने पर उसके स्थायी लाभ को बताते
हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि जिस व्यक्ति को रूप संसार के प्रत्येक रूप
में ब्रम्ह का दर्शन मिलने लगता है और समस्त रूप संसार ब्रम्ह में प्रतीत होने
लगता है वह प्रतिपल ब्रम्ह के संसर्ग मे रहता है वह न ही ब्रम्ह से विछुडता है और
न ही ब्रम्ह उससे बिछुडता है ।
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015
लक्षण की व्याख्या
आत्मा का ब्रम्ह के साथ युक्त दशा योग है । यह ब्रम्ह का
साक्षात् अनुभव है । इस अनुभूति मात्र से यह भाव पैदा होता है कि प्रत्येक प्राणी
में वह ब्रम्ह साक्षात् विद्यमान है और यह समूचा रूप संसार उस ब्रम्ह में ही निहित
है । यह योग के अनुभव की ही व्यापक अनुभूति का विस्तार है ।
बुधवार, 21 अक्टूबर 2015
योगी के लक्षण
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बताये कि जिस व्यक्ति ने योग की स्थिति
प्राप्त कर लिया है उसे प्रत्येक प्राणी में ब्रम्ह विद्यमान दीखने लगता है और
प्रत्येक प्राणी उस ब्रम्ह के अंदर निहित प्रतीत होने लगता है ।
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015
फल की व्याख्या
सत्य का ज्ञान मात्र मानसिक स्तर की खोज नहीं है अपितु आत्मा की
सत्य अनुभूति होगी । योग साधना का अभ्यास व्यक्ति को इसी सत्य अनुभूति तक पहुँचाता
है । गुरू यही बताते हैं कि इंद्रियों को नियंत्रण में रखते हुये अनुशासित
मस्तिष्क को ब्रम्ह के ध्यान में केंद्रित रखने का अभ्यास करने वाला व्यक्ति
ब्रम्ह की शांति की अनुभूति करता है ।
सोमवार, 19 अक्टूबर 2015
योग का फल
योग साधना की चर्मोत्कर्ष उपलब्धि बताते हुये गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण कहे कि साधक व्यक्ति सतत् ब्रम्ह के साथ युक्त रहते हुये यह फल पायेगा
कि उसे ब्रम्ह की चिर शांति उसकी अपनी अनुभूति बन जावेगी ।
रविवार, 18 अक्टूबर 2015
योग साधना विधि : चरण 4 की व्याख्या
गुरू ने योग साधना विधि के चरण 1 में इच्छाओं का त्याग और
इंद्रियों का नियंत्रण बताया । चरण 2 में बताया कि चरण के सफलता पूर्वक क्रियांवन
पर फल के रूप में शांति की अनुभूति मिलेगी । चरण 3 में चरण 1 के प्रयत्नों की सतत्
समीक्षा के लिये बताया । अब चरण 4 में कहा कि आनंद की अनुभूति चरण 1 की सही
क्रियांवन पर आश्रित होता है ।
शनिवार, 17 अक्टूबर 2015
योग साधना विधि : चरण 4
योग साधना विधि को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे
कि साधक व्यक्ति को ब्रम्ह की चिर शांति की अनुभूति तभी मिलेगी जब उसका मस्तिष्क
पूर्णतया विषयों से मुक्त हो और उसकी बलशाली मोंह आसक्तियाँ शांत हो चुकी हों और
उसका मस्तिष्क आत्मा के चिंतन में लीन होगा ।
शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015
योग साधना विधि : चरण 3 की व्याख्या
गुरू ने योग साधना विधि के चरण 1 में बताया कि समस्त इच्छाओं का
परित्याग किया जाय तथा इंद्रियों को पूर्ण नियंत्रण में रखा जाय । अब उस चरण 1 की
स्थिति की सतत् समीक्षा की बात गुरू ने चरण 3 में कही है । निमित्त का निर्धारण करते
हुये व्याख्याकार कहता है कि एक समय स्थल पर प्रयास पूर्वक इच्छा का त्याग किया
व्यक्ति ने परंतु समयांतर से नयी इच्छा के जन्म को सम्भव पाते हुये गुरू ने सतत् समीक्षा
के लिये कहा है ।
गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015
योग साधना विधि : चरण 3
योग साधना विधि को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे
कि जो भी कारण मस्तिष्क के केंद्रित ध्यान को विचलित करते पाये जाँय उन्हे तत्काल
नियंत्रित किया जाय और मस्तिष्क को आत्मा के नियंत्रण में आत्मचिंतन में ही
निवेशित रखा जाय ।
बुधवार, 14 अक्टूबर 2015
योग साधना विधि : चरण 2 की व्याख्या
मोंह से ग्रसित व्यक्ति के मस्तिष्क की समस्त व्यस्तता इंद्रीय
वासना वस्तुओं की पूर्ति, संचय एवं रक्षा में ही रहती है तथा प्रकृतीय गुणों के अधीन कार्यों को नियोजित करने में रहती है । इसलिये गुरू के
द्वारा बताये गये चरण 1 के उपदेश यथा इच्छाओं के त्याग एवं इंद्रियों के नियंत्रण के क्रियांवन के फल से मस्तिष्क की व्यस्तता
क्षीण होगी और तत्फलम् शांति का अनुभव आयेगा और इस शांत स्थित के मस्तिष्क को
ब्रम्ह के ध्यान में व्यस्त करने का गुरू ने योग साधना के दूसरे चरण में उपदेश किया है ।
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015
योग साधना विधि : चरण 2
योग साधना विधि को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को बताये कि मस्तिष्क की अशांत स्थिति नियंत्रित होने पर साधक को शनै: शनै:
शांति का आनंद अनुभव होने लगेगा जिससे उसे एकाग्र ब्रम्ह के ध्यान में मस्तिष्क को
केंद्रित करने का लक्ष्य करना होगा ।
सोमवार, 12 अक्टूबर 2015
योग साधना विधि : चरण 1 की व्याख्या
गुरू ने योग की अवस्था पाने के लिये प्रथम अनिवार्य दशा के रूप
में सम्पूर्ण इच्छाओं का परित्याग बताया । वह इच्छायें जो इंद्रीय वासनाओं की
पूर्ति के निमित्त पैदा हुई हैं अथवा प्रकृतीय गुणों के सम्मोहन द्वारा जागृत हुई
हैं । इनके रहते मस्तिष्क ब्रम्ह की ओर अग्रसर हो ही नहीं सकता है । दूसरी
अनिवार्य दशा गुरू ने समस्त इंद्रियों को
मस्तिष्क के नियंत्रण में रखने की बतायी है । इससे साधना अवधि में नये विकार का
जन्म सम्भव नहीं होगा ।
रविवार, 11 अक्टूबर 2015
योग साधना विधि : चरण 1
योग साधना विधि बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को कहे
कि बिना किसी अपवाद के प्रत्येक इच्छा का त्याग करके मस्तिष्क द्वारा समस्त
इंद्रियों को पूर्ण नियंत्रण में रखते हुये ।
शनिवार, 10 अक्टूबर 2015
अभ्यास से शक्ति पर्यंत
गुरू ने अभी तक के उपदेश में जिज्ञासु अर्जुन को बताये गये योग
के अभ्यास का विस्तार,
योग की स्थिति प्राप्त
होने पर मिलने वाली शांति, योग की शक्ति से दु:खों का अंत
पर्यंत समस्त विस्तार बताये हैं । इन उपदेशो को स6कलित करते हुये अनुभवी
व्याख्याकार कहता है कि व्यक्ति को बिना मस्तिष्क में किसी प्रकार का अन्यथा विचार
लाये अपनी सम्पूर्ण शक्ति का निवेश कर योग का अभ्यास करना चाहिये । योगावस्था
प्राप्त होना निष्चय ही इस संसार की सर्वोच्च उपलब्धि होती है।
शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2015
योग शक्ति
ब्रम्ह के साथ एकीकृत होने के अनुभव के स्थायी स्वरूप को बताने
के उपरांत गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि इस युति को योग जानिये
और यह इस योग की महिमा है कि आप दु:खों से मुक्ति पा जाते हैं । इसलिये इस योग का, बिना मस्तिष्क में किसी अन्य विचार के लाये हुये, निश्चय पूर्वक दृढ -अभ्यास करिये ।
गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015
स्थायी उत्कर्ष की व्याख्या
गुरू द्वारा बताये गये आत्म अनुभव के मिलने पर व्यक्ति ब्रम्ह
के साथ एकीकृत महसूस करने लगता है । यह इस संसार का महानतम् अनुभव है । मोंह के
अधीन अनुभव होने वाला सुख अथवा दु:ख दोनो ही क्षणिक होते हैं, परिवर्तनशील होते हैं । ब्रम्ह के संसर्ग
का सुख चिर होता है । इस अनुभव के समान कोई दूसरा अनुभव सम्भव नहीं है ।
बुधवार, 7 अक्टूबर 2015
योग का उत्कर्ष
योग में स्थापित योगी का वृतांत और आगे बताते हुये गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि जिसके मस्तिष्क में अन्य विचार पूर्णत: शून्य स्थिति
में हो गये हों, जिसका मस्तिष्क एक मात्र विषय
आत्मा पर पूर्ण केंद्रित हो, जिसकी आत्मा ही आत्मा का नियंत्रण
करती हो और जिसकी आत्मा आत्मसुख में ही हर्षित रहती हो वह योगी योग में पूर्ण
स्थापित कहा जावेगा |
मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015
उत्कर्ष फल की व्याख्या
इंद्रीय ज्ञान अथवा मानसिक विश्लेषण द्वारा जो अनुभव व्यक्ति
ग्रहण करता है की तुलना यदि उस अनुभव से की जाय जिसे कंचिद व्यक्ति के मस्तिष्क को
समस्त ज्ञात लोक से अलग कर दिया जाय और वह मस्तिष्क केंद्रित प्रयत्नों से यह
अनुभूति ग्रहण करे कि हमारे शरीर में संचरित हो रही समस्त गति विधियों को उर्जा
कहाँ से प्राप्त हो रही है तो यह निष्कर्श निकलेगा कि पूर्व में वर्णित अनुभव
परिवर्तनशील हैं जबकि उत्तरार्ध में वर्णित अनुभव नित्य है । सही और उचित का
निर्णय जब हमारे नित्य/सत्य अनुभव पर आधारित होगा तो हम
परम् सत्य के साथ एकीकृत अनुभव करेंगे
सोमवार, 5 अक्टूबर 2015
उत्कर्ष का फल
योग की उत्कर्ष दशा का जो वृतांत गत श्लोक में गुरू ने बताया उस
दशा के प्राप्त होने पर योगी की क्या उपलब्धि होगी उसे बताते हुये गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण कहे कि जिस व्यक्ति की आत्मा आत्म-सुख में हर्षित रहेगी उसके विवेक
में इस सुख का अनुभव आयेगा क्योंकि यह सुख इंद्रीय ज्ञान सीमा के परे का होता है, और ऐसी दशा को प्राप्त योगी फिर इस सुख को
छोड किसी दूसरी कामना की ओर उन्मुख नहीं होगा ।
रविवार, 4 अक्टूबर 2015
उत्कर्ष दशा की व्याख्या
गुरू द्वारा योग की उत्कर्ष स्थिति बताने में मस्तिष्क की दशा
शांत (विचारों के स्थगन से) और केंद्रित (आत्म-चिंतन में) को विषेस महत्वपूर्ण
बताया है । यह स्थिति प्रकृति निर्मित मस्तिष्क के लिये है इसलिये अभ्यास द्वारा
प्राप्त की जाने वाली है । गुरू ने दूसरी बात कही है आत्मा द्वारा आत्मा का
नियंत्रण और आत्मा का आत्म-सुख में हर्षित रहना जो कि अनुभव के क्षेत्र के हैं ।
इस भाग को वही व्यक्ति साध्य बना सकेगा जिसे आत्मा का अनुभव प्राप्त हो गया है ।
शनिवार, 3 अक्टूबर 2015
योग का उत्कर्ष
योग में स्थापित योगी का वृतांत और आगे बताते हुये गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि जिसके मस्तिष्क में अन्य विचार पूर्णत: शून्य स्थिति
में हो गये हों, जिसका मस्तिष्क एक मात्र विषय
आत्मा पर पूर्ण केंद्रित हो, जिसकी आत्मा ही आत्मा का नियंत्रण
करती हो और जिसकी आत्मा आत्मसुख में ही हर्षित रहती हो वह योगी योग में पूर्ण
स्थापित कहा जावेगा |
शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015
अ-विचलित की व्याख्या
गुरू द्वारा बताये गये दीपक के ज्योति लौ के उदाहरण को स्पष्ट
करते हुये व्याख्याकार कहता है कि मस्तिष्क में ब्रम्हचेतना की ज्योति निर्विघ्न
बिना विचलन के दीप्तमान रहना चाहिये । ऐसी स्थिति होने पर पीछे छूटा हुआ मोंह पुन:
अवसर पाकर मस्तिष्क को आच्छादित नहीं कर सकेगा ।
गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015
अ-विचलित
पूर्ण योगी की स्थिति को और आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को कहे कि जिस प्रकार वायु संचरण से मुक्त स्थान पर दीपक की
ज्योति बिना कम्पन के निर्विघ्न एक लौ स्थापित किये जलती है उसी प्रकार योगी का
मस्तिष्क सतत् ब्रम्ह के ध्यान से युक्त अविचलित रहता है ।
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