गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति अज्ञान के प्रभाव में जीवन जीता
है,
जिसे ज्ञान के प्रति आस्था नहीं है, वह व्यक्ति अपने विध्वंस के पथ पर चलता
है । व्याख्या – गुरू का उपरोक्त कथन इस बात को बल देता है कि मनुष्य को सही
के चुनाव का विवेक ही जीवन का सत्य आधार प्रदान करता है ।
मंगलवार, 30 जून 2015
सोमवार, 29 जून 2015
आस्था
आत्मा
की उत्कण्ठा आत्मज्ञान पाने हेतु । यह ज्ञान मिलेगा । ऐसा विश्वास । आस्था ।
परमात्मा की छवि हम सभी में विद्यमान होती है । मात्र हम उसा छवि के प्रति अचेत
होते हैं । इस छवि का बोध/ज्ञान पाने की उत्कण्ठा यदि मस्तिष्क में व्याप्त हो जाय
और इस ज्ञानको पाने के लिये व्यक्ति इंद्रीय संयम बरतते हुये और हृदय में आस्था धारण
कर प्रयत्नशील होगा तो अवश्य ही उसे ईश्वरीय छवि के दर्शन अपने अंत:करण में
मिलेंगे ।
रविवार, 28 जून 2015
आस्था अनिवार्य
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से बताया कि जिसे आत्मज्ञान पाने की उत्कण्ठा है,
जो इस आत्मज्ञान पाने की उत्कण्ठा में लीन होकर अपने इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण
रखते हुये प्रयत्न करता है उसे आत्मज्ञान अवश्य मिलता है, जिसे मिलने से वह ब्रम्ह की दिव्य शांति
की अनुभूति करता है ।
शनिवार, 27 जून 2015
आत्मज्ञान सात्विकतम्
आत्मज्ञान
के समस्त विस्तार को बताने के उपरांत गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि
इस संसार का यह सात्विकतम् ज्ञान है जिसे कि जिज्ञासु उपलब्ध हो जाने पर स्वयं अनुभव करेगा कि
यह परम् ब्रम्ह की सात्विकता का ही प्रतिबिम्ब है ।
शुक्रवार, 26 जून 2015
आत्मज्ञान की शक्ति
गुरु
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्म ज्ञान की प्रचण्ड शक्ति बताते हुये कहे कि हे
अर्जुन जिस प्रकार प्रचण्ड अग्नि समस्त ईधन जो कि अग्नि पैदा करने वाला होता है को
जला कर राख कर देती है उसी प्रकार आत्म ज्ञान की शक्ति समस्त दूषित कर्मों को
जलाकर समाप्त कर देती है ।
गुरुवार, 25 जून 2015
आत्मा ज्ञान का प्रभाव
आत्म
अनुभव का प्रभाव बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा
कि कोई भी मनुष्य चाहे कितना भी मोंह के कर्मों में लिप्त क्यों ना हो परंतु आत्म
ज्ञान हो जाने की दशा मात्र से वह समस्त दोष पूर्ण कर्मों से मुक्त हो जाता है ।
बुधवार, 24 जून 2015
आत्म अनुभव की महिमा
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि आत्मा का अनुभव हो जाने का फल यह होगा कि
आप पुन: इस प्रकार मोंह में नहीं फँसोगे । ज्ञान के दर्शन मात्र से आपको समस्त
अस्तित्व ज्ञान में ही अनुभव होगा तथा समस्त ज्ञान की उत्पत्ति मुझ से प्रतीत होगी
।
मंगलवार, 23 जून 2015
सत्य के ज्ञाता व्यक्ति
प्रचलित
बलिदान के कर्मों एवं उनकी सार्थकता बताने के उपरांत इन कर्मों की उपलब्धि पथ
बताते हुये गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि सत्य के ज्ञाता व्यक्ति से,
सेवा भाव से एक जिज्ञासु के रूप में संलग्न होने पर, विनम्र आग्रह के द्वारा यह पथ तुम्हे
मिल सकेगा । व्याख्याकार गुरू के उपरोक्त कथन को स्पष्ट करते हुये कहता है कि सत्य
के ज्ञाता के अनुभव पर आधारित मार्ग दर्शन ही प्रभावी दिशा निर्देश होगा ।
सोमवार, 22 जून 2015
सार्थक कर्म
विभिन्न
प्रकार के प्रचलित बलिदान कर्मों को बताने के उपरांत गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे
कि हे अर्जुन बलिदान का ज्ञान किसी भी वस्तु के बलिदान की अपेक्षा अधिक मूल्यवान होता
है । बलिदान के लिये किया गया कोई भी कर्म संकलित होकर उच्चतम उपलब्धि ज्ञान
पर्यन्त पहुँचाने वाला होता है । मनुष्य शरीर के लिये उचित का विवेक जागृत होना ही
उच्चतम उपलब्धि होती है । यह मुक्ति प्रशस्थ करती है ।
रविवार, 21 जून 2015
बलिदान : चरण 10
बलिदान
के समस्त उपदेश का सार बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये
कि यह विविध बलिदान ब्रम्ह को पाने के उपाय हैं । हे अर्जुन इन समस्त बलिदानों का
प्रादुर्भाव कर्म द्वारा सम्भव होता है । हे अर्जुन इन बलिदानो को जानकर इन्हे
अपनाने से तुम मोंह से मुक्त हो जावोगे ।
शनिवार, 20 जून 2015
बलिदान : चरण 9
बलिदान
के विषय में आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये
कि कुछ लोग जो पवित्र संयमित आहार ग्रहण
करते हैं और सतत् बलिदान करते हैं उन्हे पवित्र आत्मज्ञान प्राप्त होता है । हे
अर्जुन यह संसार बलिदान हेतु ही है ।
शुक्रवार, 19 जून 2015
बलिदान : चरण 8
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कुछ लोग अपने ग्रहण करने वाले आहार को
संयमित कर अपनी प्राण वायु को ही अपनी प्राण वायु की अग्नि को अर्पित करते हैं ।
ये बलिदान के ज्ञाता लोग बलिदान के द्वारा अपने समस्त पापों को निर्मूल करते हैं ।
व्याख्या –
नियंत्रण ही समस्त बलिदान का मूल होती है । इसलिये बलिदान आत्म-ज्ञान का पथ है ।
गुरुवार, 18 जून 2015
बलिदान : चरण 7
बलिदान
की श्रंखला का अगला चरण बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये
कि कुछ लोग जिन्हें अपनी स्वांस क्रिया के नियंत्रण का अभ्यास होता है,
वे प्राण (बाहर निकलने वाली वायु) को एवं अप्राण (अंदर आने वाली वायु) को क्रमश: रोक रोक कर
क्रमश: प्राण वायु को अप्राण को तथा अप्राण वायु को प्राण को अर्पित करते हैं ।
बुधवार, 17 जून 2015
बलिदान : चरण 6
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कुछ लोग अपनी समस्त भौतिक उपलब्धियों को,
कुछ लोग अपनी समस्त सुकृतियों को, कुछ लोग अपने आत्मा ज्ञान के लिये किये
गये समस्त प्रयत्नों को, और कुछ लोग अध्ययन दारा अर्जित समस्त
ज्ञान को पावन ब्रम्ह की अग्नि को अर्पित कर ब्रम्ह को पाने की कामना करते हैं ।
मंगलवार, 16 जून 2015
बलिदान : चरण 5
बलिदान
के उपदेश की श्रंखला को आगे बढाते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि कुछ लोग
समस्त इंद्रियों के कर्मों को आत्मा की ज्योति से संतृप्त पावन विवेक की अग्नि को
अर्पित करते हैं ।
सोमवार, 15 जून 2015
बलिदान : चरण 4
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बलिदान द्वारा ब्रम्ह को पाने की प्रक्रिया बताते
हुये कहे कि कुछ लोग अपनी इंद्रीय अनुभूतियों को नियंत्रण की अग्नि को आहुति करते
हैं,
और कुछ लोग इंद्रीय वासना वस्तुओं को इंद्रीय अग्नि को अर्पित करते हैं ।
व्याख्याकार कहता है कि गुरू का उपरोक्त निर्देश जिज्ञासु को मर्यादित आचरण के
जीवन के लिये इंद्रीय नियंत्रण की विधि निर्दिष्ट करने वाले हैं ।
रविवार, 14 जून 2015
बलिदान : चरण 3
बलिदान
का स्वरूप विस्तार बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये
कि कुछ लोग ब्रम्ह को बलि अर्पित करते हैं, जबकि कुछ दूसरे व्यक्ति बलि को ब्रम्ह की
अग्नि में अर्पित करते हैं ।
शनिवार, 13 जून 2015
बलिदान : चरण 2
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि पूर्ण मुक्त व्यक्ति का कर्म का अर्पण
स्वरूप ब्रम्ह है, अर्पित कर्म भी ब्रम्ह है, यह अर्पण ब्रम्ह द्वारा ही किया जा रहा
है,
उसे इस अर्पण द्वारा ब्रम्ह को ही पाना है, यह समस्त स्थिति उस व्यक्ति के लिये
प्रभावी होती है जो ब्रम्ह को अपने कर्म के रूप में अनुभव करता है ।
शुक्रवार, 12 जून 2015
बलिदान : चरण 1
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस व्यक्ति का मोंह पूर्णतया क्षीण हो
चुका है,
जो मुक्त है, जिसका मस्तिष्क पूर्णतया विवेक के नियंत्रण में कार्य करता है
वह व्यक्ति कार्य को एक बलि के रूप में करता है । ऐसा व्यक्ति ब्रम्ह में विलयके
लिये योग्य पात्र बन जाता है ।
गुरुवार, 11 जून 2015
बलिदान
बलिदान
का शाब्दिक अर्थ होता है, किसी कीमती वस्तु को उससे अधिक कीमती
वस्तु पाने के उद्देष्य से आहुत करना त्यागना । भागवद्गीता में कर्म और अकर्म का
उपदेश करने के बाद गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण आत्मा प्रधान जीवन पाने के जिज्ञासु
अर्जुन को बलिदान के द्वारा उद्देष्य प्राप्ति का पथ निर्दिष्ट करते हैं । इस
क्रममें गुरू प्रकृतीय मोंह के जीवन में कीमती मानी जाने वाली विभिन्न स्थितियों को
त्यागने का उपदेश किये हैं । इन बलिदानों का क्रमबद्ध विवरण आगे के अंको में
वर्णित किया जावेगा ।
बुधवार, 10 जून 2015
कर्म और अकर्म : चरण 7
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति प्रकृति द्वारा उपस्थित की गई
प्रत्येक परिस्थिति में संतुष्ट रहता है, जिस व्यक्ति को सांसारिक द्वैतों से
सुख अथवा दु:ख की अनुभूति नहीं रह जाती है, जिसे अन्य की उपलब्धियों से द्वेष नहीं
रह जाता है, ऐसा व्यक्ति सफलता और असफलता में समभाव में रहता है,
वह कार्य करते हुये भी कर्मके बंधन से मुक्त रहता है । व्याख्या : कर्म स्वयँ
बन्धनकारी नहीं होता है । यदि कर्म बंधनकारी रहता तो ब्रम्ह और संसार में द्वैत
होता । परंतु वास्तविकता यह है कि संसार ब्रम्ह का ही प्रगट स्वरूप है । स्पष्ट है
कि कर्म करने की पद्धति बन्धन और मुक्ति का आधार होती है ।
मंगलवार, 9 जून 2015
कर्म और अकर्म : चरण 6
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस व्यक्ति के मस्तिष्क में कोई इच्छा
नहीं हो,
उसका हृदय और आत्मा उसके पूर्ण वश में हो, वह कार्य में अपनी कर्मेंद्रियों को
मात्र यंत्रवत् प्रयोग करता है, ऐसे व्यक्ति के कर्म में कोई त्रुटि
नहीं होती है ।
सोमवार, 8 जून 2015
कर्म और अकर्म : चरण 5
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कर्म करते हुये जब उस कर्म के फल से मानसिक
आसक्ति ना रह जाय और ना ही कर्म के निमित्त से कोई मानसिक आसक्ति रह जाय,
ऐसा व्यक्ति अपने
कर्तव्य भाव में पूर्ण संतुष्ट रहते हुये जो कर्म करता है उसका कर्म पूर्ण रूप से
अकर्म की श्रेणी का होता है । ऐसा व्यक्ति किसी कर्म का कर्ता नहीं होता है जबकि
वह सदैव कर्म करता रहता है ।
रविवार, 7 जून 2015
कर्म और अकर्म : चरण 4
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस व्यक्ति ने अपने किये जाने वाले कर्मों
में अपनी इच्छा का पूर्ण त्याग कर लिया है, जिसने अपने शाश्वत् विवेक द्वारा अपने
कर्तापन के बोध को पूर्ण नियंत्रित कर लिया है, वह व्यक्ति ही ज्ञानी है । गुरू के
उपरोक्त कथन की व्याख्या है कि समस्त कर्म दोषों की उत्पत्ति मनुष्य में व्याप्त
इच्छाओं और अहंकार द्वारा ही होती है । इसलिये योगेश्वर इच्छा और अहंकार से मुक्त कर्म
को ही सही कर्म पथ बताते हैं ।
शनिवार, 6 जून 2015
कर्म और अकर्म : चरण 3
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो मनुष्य कर्म करने में अकर्म की भावना
रखता है तथा अकर्म में कर्म देखता है वह ही ज्ञानी है वह ही योगी है वह ही सभी
कार्य सही पद्धति से कर पाता है । व्याख्याकार उपरोक्त कथन को स्पष्ट करते हुये
बताता है कि समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति होती है परंतु बिना आत्मा के सम्मलित
हुये कर्म होता नहीं है इसलिये कर्म में आत्मा के सम्मलित होने के प्रति आत्मा का
अपेक्षित भाव होता है कि मैं प्रकृति के कार्य को पूर्ण कराने के लिये सम्मलित हूँ
परंतु कर्म से मेरा कोई सम्बंध नहीं है । स्मर्णीय है कि गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को शुरू से यही बताते आये हैं कि तुम्हारा सत्य परिचय तुम्हारी आत्मा है ना
कि प्रकृति । उपरोक्त कथन के उत्तरार्ध में योगेश्वर ने कहा कि अकर्म में कर्म
देखता है अर्थात् जैसे अर्जुन ने कहा कि मैं युद्ध नहीं करूँगा यह कथन कर्म करने
के तुल्य ही है – इंकार भी कर्म ही है । इसीलिये गुरू ने अर्जुन से कहा कि
प्रकृति द्वारा आरोपित कर्म से विमुख होना तुम्हारा धर्मवत् आचरण नहीं है । अर्जुन
के मस्तिष्क में
व्याप्त प्रकृतीय मोंह को गुरू ने इस अधर्मवत् कृत का कारण होना बताया ।
शुक्रवार, 5 जून 2015
कर्म और अकर्म : चरण 2
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि पहले कर्म को जानो, पुन: त्रुटिपूर्ण कर्म को जानो फिर
अकर्म को जानो । इन सब से कठिन होगा जानना कि कर्म करने की सही विधि क्या है ।
व्याख्याकार कहता है कि सामान्य मनुष्य सही कर्म और उसे करने की सही कर्म विधि
नहीं अपना पाता है । कुछ तत्कालीन परिस्थितियाँ, कुछ पुरातन मान्यतायें,
कुछ उसके अपना विवेक यह सभी मिलकर मनुष्य को अस्पष्ट स्थिति का सामना कराते हैं ।
ज्ञानी पुरुष इस प्रकार के अस्पष्ट अनिश्चितता का निवारण अपरिवर्तनीय सत्य को आधार
बनाकर करते हैं ।
गुरुवार, 4 जून 2015
कर्म और अकर्म : चरण 1
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जानो कर्म क्या है ?
यह जानो कि अकर्म क्या है ? इसे जानने में ज्ञानी भी भ्रमित हो
जाते हैं । मैं तुम्हे बताउँगा कि कर्म क्या है और यह जान कर तुम पाप से मुक्त हो
जावोगे ।
बुधवार, 3 जून 2015
कर्म और प्रकृति
इस
रूप सन्सार का सृजन कर्म के लिये ही हुआ है । रूप संसार में प्रतिपल होने वाले
परिवर्तन कर्म द्वारा ही होते है । कर्म की उत्पत्ति आत्मा और प्रकृति के परस्पर
क्रिया द्वारा होती है । कर्मों की कर्ता प्रकृति होती है । परंतु प्रकृति के कर्म
उसी दशा में सम्भव हो सकते हैं जब आत्मा उसमें सम्मलित होवे । प्रकृति आत्मा को
अपने कर्मों में सम्मलित करने के लिये अपने गुणों का सहारा लेती है । कंचिद आत्मा जब प्रकृति के गुणों में
आसक्त हो कार्य सम्पादन को सम्भव बनाती है तो वह बंधन में रहती है । यदि आत्मा
प्रकृति के गुणों में आसक्त हुये बगैर अपना कर्तव्य दायित्व निर्वाह करते हुये
कार्य सम्पादित कराती है तो वह मुक्त रहती है । यही सार गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को अनेको विधि से बताये हैं ।
मंगलवार, 2 जून 2015
प्रदूषण से मुक्त
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि ना ही कोई कर्म करने से मेरी आत्मा
प्रदूषित होती है ना ही किसी किये हुये कर्म के फल की मुझे कोई जिज्ञासा ही होती
है । जो भी मनुष्य अपनी आत्मा को इस रूप में ग्रहण करता है उसके लिये कोई भी कर्म बंधनकारी
नहीं होता है । इस ज्ञान को ग्रहण करके पूर्व समय में अनेको मनुष्य मुक्त हो चुके
हैं । इसलिये हे अर्जुन तुम भी इस ज्ञान के अनुरूप कर्म करो ।
सोमवार, 1 जून 2015
अकर्तारम्
व्याख्याकार
गुरू द्वारा कर्म में अक्षम एवं किसी भी परिवर्तन की सम्भावना से इंकार की
व्याख्या करते हुये बताता है कि मुक्त आत्मा के अवतार पुरुष योगेश्वर श्रीकृष्ण
किसी भी प्रकार के प्रकृतीय मोंह से पूर्णातया परे हैं इसलिये वह किसी कर्म के
कर्ता नहीं हैं । बंधन मोंह के अधीन किये गये कर्मों द्वारा उत्पन्न होता है ।
आत्मा में विक्षेप मोंह से ही सृजित होता है । इसलिये मोंह से मुक्त पुरुष किसी भी
कर्म का कर्ता नहीं होता है और ना ही किसी कर्म द्वारा उसकी आत्मा में कोई विक्षेप
ही पैदा होता है ।
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