योग शब्द का अर्थ होता है युक्त होना । परम् ब्रम्ह के साथ
युक्त होना लक्ष्य होता है । ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति आत्मा हम प्रत्येक के अंदर विद्यमान
होती है । परंतु यह आत्मा मोंह और अरुचि धारण करके त्रुटिपूर्ण हो जाती है }
योग द्वारा इस त्रुटिपूर्ण आत्मा को मोंह और अरुचि से मुक्त कराकर उसके मौलिक
ब्रम्ह स्वरूप में वापस पहुँचाना है । योगावस्था में कार्य का अभ्यास पथ है ।
सोमवार, 31 अगस्त 2015
रविवार, 30 अगस्त 2015
उपदेश का लक्ष्य
ब्रम्ह की निम्नतर-प्रकृति को प्रकृति कहा गया है । ब्रम्ह की उच्चतर
प्रकृति आत्मा है । यह ब्रम्ह का विज्ञान
है कि स्वतंत्र आत्मा परवश प्रकृति का दास बन जाता है । विडम्बना यह कि आत्मा का
मोंह उत्तरोत्तर बढता जाता है । गुरू समस्त स्थिति का ज्ञाता है । वह भ्रमित आत्मा
के उत्थान के लिये उपदेश द्वारा उसके अज्ञान का उसे बोध करता है और प्रेरित करता
है कि वह उत्थान के पथ पर अग्रसर होवे ।
शनिवार, 29 अगस्त 2015
मित्रवत् और शत्रुवत् की व्याख्या
शरीर की रचना दो भिन्न अवयवों प्रकृति और आत्मा के संयोग से
हुई है । आत्मा उच्च स्तरीय होता है । प्रकृति गुणों की धारक होती है । आत्मा
भ्रमवश प्रकृतीय गुणों में आसक्त हो जाती
है । परिणामत: अपनी मौलिक स्वतंत्रता खो बैठती है । कंचिद यदि गुरू के उपदेश के
प्रभाव से मोंह ग्रसित आत्मा अपने को मोंह से मुक्त करने को सचेष्ट होती है तो
यह उसका मित्रवत् आचरण होगा । अन्यथा की स्थिति में मोंह बढते जावेंगे । यह
शत्रुवत् आचरण होगा ।
शुक्रवार, 28 अगस्त 2015
मौलिक स्वरूप की व्याख्या
आत्मा परम् ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति है । निम्नतर-प्रकृति के
मध्य रहते,
प्रकृतीय गुणों का भोग करते आत्मा प्रकृतीय गुणों में आसक्त हो जाती है । गुरू का
कथन यह बताता है कि आत्मा में वह क्षमता है कि वह प्रकृतीय गुणों के आच्छादन से
मुक्त हो स्वतंत्र स्वरूप में रह सकती है । परंतु अज्ञानवश ऐसा होता नहीं । आत्मा
मोंह में बँधी ही रहती है । परंतु यह स्थिति आत्मा के हित में नहीं होती है ।
इसलिये गुरू शिष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर अग्रसर होने को प्रेरित करते हैं ।
गुरुवार, 27 अगस्त 2015
ब्रम्ह चेतना
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण आत्मा के सम्बंध में आगे बताये कि जिस व्यक्ति ने आत्मा के
ब्रम्ह स्वरूप को जानकर उसे प्रकृतीय मोंह से मुक्त कर लिया है उसके लिये उसकी
आत्मा मित्रवत् आचरण करती है परंतु जिस व्यक्ति की आत्मा अपने में ब्रम्ह स्वरूप
की चेतना से अचेत है फलत: मोंह और अप्रिय में लिप्त है उसकी आत्मा उसके लिये शत्रु
के समान आचरण करती है ।
बुधवार, 26 अगस्त 2015
गुरू के कथन का सार
गुरू
ने आत्मा को आत्मा का मित्र और शत्रु दोनो ही बताया और कहा कि आत्मा द्वारा ही
आत्मा का उत्थान सम्भव है । इस कथन का सार यह है कि आत्मा जब तक मोंह और अप्रिय के
मध्य है वह अपना ही शत्रु है । जब आत्मा इस मोंह और अप्रिय से अपने को अलग कर सत्य
के ध्यान की ओर उन्मुख हो जाती
है तो वह अपना उत्थान स्वयं करने में सक्षम हो जाती है ।
मंगलवार, 25 अगस्त 2015
बाधा की व्याख्या
गुरू
द्वारा बताये गये आत्मा का स्वरूप बोध, हम सभी के लिये बाधित अवस्था में होता
है । इस बाधा का विस्तार व्याख्याकार बताता है कि हम सभी की सकल व्यस्तता मोंह और
अप्रिय में सीमित है । कंचिद हम अपने मस्तिष्क पर छाये मोंह और अप्रिय के भ्रामक
आवरण को हटा सकें तो हम अपने अंदर विद्यमान ब्रम्ह के अंश आत्मा का अनुभव कर
सकेंगे । हमारी आत्मा जब तक इस मोंह और अप्रिय के मध्य रहती है वह अपने ही स्वरूप
से अनभिज्ञ रहती है ।
सोमवार, 24 अगस्त 2015
अन्य दृष्टांत
भागवद्गीता
में गुरू द्वारा बताये गये “आत्मा ही आत्मा का मित्र भी हो सकता है
और आत्मा ही आत्मा का शत्रु भी हो सकता है” के अनुरूप धम्मपद में कहा गया है कि
“आत्मा ही आत्मा का स्वामी होता है” तथा “आत्मा ही आत्मा का लक्ष्य होता है” ।
रविवार, 23 अगस्त 2015
आत्मस्वरूप
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मस्वरूप का अनुभव कराने के लिये बताये कि अपनी
आत्मा द्वारा ही आत्मा का उत्थान सम्भव है, कृपया आत्मा को पतन को ना प्राप्त होने
दें क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र भी हो सकता है और आत्मा ही आत्मा का शत्रु भी
हो सकता है ।
शनिवार, 22 अगस्त 2015
सन्यास का उदय
हम
जिस ब्रम्ह का अनुभव पाने के लिये सचेष्ट हैं उस ब्रम्ह के प्रयोजन में बिना किसी
त्रुटि के सम्मलित होने का लक्ष्य मस्तिष्क में स्थापित कर अग्रसर होने पर यह
अनिवार्य वाँक्षना बन जाती है कि स्व की अनुभूति को शून्य किया जाय और इस स्व के शून्य
होने पर संकल्प शून्य होगा फलत: सन्यास उदय होगा ।
शुक्रवार, 21 अगस्त 2015
पूर्ण आत्मसमर्पण
संकल्प
का उद्गम स्व की अनुभूति से होता है । इसलिये संकल्प शून्य होने के लिये अपनी आत्म
अनुभूति को ब्रम्ह में पूर्ण समर्पण करना वाँक्षित होता है । यह वह दशा है जब
समर्पित व्यक्ति ब्रम्ह के आदेशानुसार ही समस्त कार्य करता है । उसके अपने मोंह और
अरुचि का पूर्ण दमन हो जाता है । वह ब्रम्ह का प्रतिनिधि ही रह जाता है ।
गुरुवार, 20 अगस्त 2015
दृष्टांत
मनु
कहते हैं कि समस्त इच्छाओं का जन्म संकल्प से होता है । महाभारत में वृतांत वर्णित
है कि “ हे इच्छा मैं तुम्हारे मूल से परिचित हूँ । मैं कोई संकल्प करूँगा ही नहीं
इसलिये तुम्हारा जन्म सम्भव नही होगा । “
बुधवार, 19 अगस्त 2015
संकल्प का उद्गम
संकल्प
का उद्गम अहंकार से होता है । जब व्यक्ति अपने को परम् ब्रम्ह से भिन्न एक
अस्तित्व के रूप मानता है तब ही उसके मस्तिष्क में कुछ पाने का और उस पाने के लिये
यत्न के रूप में कुछ करने का संकल्प सृजित होता है । संकल्प की पूर्ति में किया
जाने वाला कर्म बंधनकारी होगा ।
मंगलवार, 18 अगस्त 2015
सर्वसंकल्पसन्यासी
भगवद्गीता
के अज्ञात ग्रंथकार ने गुरू द्वारा बताये गये सन्यास के सम्बंध में दिये गये उपदेश को व्यक्त
करने के लिये सर्वसंकल्पसन्यासी शब्द का प्रयोग किया है । इच्छाओं का जन्म होता है
मानसिक संकल्प से । इसलिये जिस व्यक्ति के इंद्रीय वासना वस्तुओं के मोंह के अधीन आने वाले विषयों के प्रति
मानसिक संकल्प शून्य हो जावेंगे परिणामत: वह व्यक्ति इच्छा शून्य हो जावेगा । ऐसे व्यक्ति
को सर्वसंकल्पसन्यासी कहा जावेगा । इच्छाशून्य होना है तो उसे संकल्पशून्य होना होगा
सोमवार, 17 अगस्त 2015
सन्यास : चरण 2
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ज्ञान के जिज्ञासु के लिये प्रयत्न के चरण 2 के रूप में बताते
हैं कि जब जिज्ञासु इंद्रीय वासना वस्तुओं के प्रति मोंह से मुक्त होकर इस मानसिक
स्थिति में पहुँच जाता है कि उसे अपनी इच्छा पूर्ति के लिये कोई कर्म करने की
जिज्ञासा अथवा आवश्यकता नहीं रह जाता है तब वह योग की स्थिति प्राप्त कर लेता है ।
रविवार, 16 अगस्त 2015
करण : चरण 1 की व्याख्या
गुरू
के द्वारा बताये गये कर्म करने के कारण का स्वरूप की व्याख्या
करते हुये बताया गया कि आत्मा की यथास्थिति उसके कर्म सम्पादन की गुणवत्ता द्वारा
ही परीक्षित की जा सकती है । आत्मा पर आच्छादित मोंह के निवारण के प्रयत्न भी कर्म
के मार्ग से ही आत्मा की शुद्धि के लिये प्रयोग किये जाते है । मोंह से मुक्त
आत्मा ही कार्य के परिणाम से सम्बंध रखे बगैर कार्य सम्पादन कर सकती है । अन्यथा
की परिस्थिति में कर्म फल की उद्विग्नता प्रतिपल विद्यमान रहेगी ।
शनिवार, 15 अगस्त 2015
करण : चरण 1
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि ज्ञान के जिज्ञासु के लिये कार्य ही कार्य करने
का कारण के रूप में रहता है परंतु जिस क्षण वह कार्य को करना प्रारम्भ कर देता है
तो तत्काल सन्यास उसका लक्ष्य बन जाता है । सन्यास ही शांति/आनंद की अंतिम मंजिल
होती है ।
शुक्रवार, 14 अगस्त 2015
अनुशासित कर्म की व्याख्या
गुरू
द्वारा बताये गये अनुशासित कर्म की व्याख्या करते हुये व्याख्याकार कहता है कि
अनुशासित कर्म करने के लिये व्यक्ति को अंत:करण के भाव को नियंत्रित करना होग्ग ।
कर्म जब तक इच्छाओं की पूर्ति के लिए किया जावेगा तब तक बंधनकारी होगा । व्यक्ति
जब इच्छाओं का त्याग कर सकेगा तभी वह कर्म को कर्मफल की अपेक्षा से मुक्त होकर कर सकेगा
। इसीलिये गुरू ने उपदेश किया कि योग के लिये सन्यास अनिवार्य दशा है ।
गुरुवार, 13 अगस्त 2015
अनुशासित कर्म
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति अनुशासित रह कर कर्म करता है
वही योगी बन सकता है और योगी होने के लिये सन्यास
अर्थात् कर्म के फल से अनासक्त होना अनिवार्य दशा है ।
बुधवार, 12 अगस्त 2015
सन्यास की व्याख्या
व्याख्याकार
गुरू द्वारा बताये गये सन्यास की व्याख्या करते हुये कहता है कि सन्यास व्यक्ति के
अंत:करण के भाव से सम्बंधित होता है जिसके द्वारा व्यक्ति कर्म में प्रेरित होता
है,
कर्म करने की प्रेरणा ग्रहण करता है ना कि बाह्य कर्म द्वारा जो कि कर्म का मात्र
संचालन होता है ।
मंगलवार, 11 अगस्त 2015
सन्यास
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति कर्म के फल की कामना किये बगैर
कर्म को करता है वही सच्चा सन्यासी है वही सच्चा योगी है ना कि वह जो व्यक्ति जो
पवित्र अग्नि का त्याग करता है और जो आहुत कर्म का त्याग करता है ।
सोमवार, 10 अगस्त 2015
सर्व समर्थ
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति मुझे सभी बलिदानों और सत्
कर्मों का भोक्ता/ग्रहणकर्ता, सम्पूर्ण रूप संसार का स्वामी,
सभी रूपों का मित्र के रूप में जानता है वह दिव्य शांति को प्राप्त होता है ।
इस
प्रकार भगवद्गीता का कर्म परित्याग द्वारा ब्रम्ह के साथ युति
नामक पाँचवा अध्याय पूर्ण हुआ
रविवार, 9 अगस्त 2015
केंद्रीकरण
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति बाह्य वस्तुओं से अपने मस्तिष्क
को पूर्णरूप से हटाकर, अपनी दृष्टि को अपनी दोनो भौहो के मध्य केंद्रित कर, अपने नाक
में चलने वाली दोनो प्रकार की वायु (अंदर आती और बाहर जाती) को नाक के अंदर ही
सीमित कर,
जिसका मस्तिष्क और विवेक पूर्ण नियंत्रण में है, जिसने इंद्रियों को पूर्ण वश में किया
हुआ है,
जिसने इच्छा क्रोध भय से मुक्ति पा ली है ऐसा व्यक्ति जब पूर्ण निष्ठा से मुक्ति
के लिये प्रयत्नशील होता है तो वह ब्रम्ह के साथ पूर्ण युक्त हो जाता है ।
शनिवार, 8 अगस्त 2015
आदर्श स्थिति
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि ऐसे व्यक्ति जिनकी पवित्र आत्मा इच्छा और
क्रोध से नुक्त हो गई हैं और जिनका मस्तिष्क नियंत्रित कार्य करता है और जिन्हे
अपनी आत्मा का बोध हो गया है दिव्य ब्रम्ह की शांति का अनुभव करते हैं ।
शुक्रवार, 7 अगस्त 2015
सर्वभूतहितेरत:
जिस
संत को आत्मबोध हो जाता है वह स्वार्थ और अभिमान के कैद से मुक्त हो जाता है ।
उसका विवेक व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठ प्रकृति के कर्ता स्वरूप को ग्रहण कर लेता है और वह प्रकृति की प्रेरणा
से कर्मों को कर हर्षित रहता है । वह प्रत्येक प्राणी में ब्रम्ह की अनुभूति करते
हुये प्रत्येक प्राणी को आदर भाव से व्यवहृत करता है । इस प्रकार आत्मा की
प्रधानता वाला जीवन जन-मानस के प्रति प्रेम और सौहार्द को बढाता है ।
गुरुवार, 6 अगस्त 2015
पूर्णता का स्वरूप
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस संत ने अपने समस्त पापों का नाश कर
लिया है,
जिसके मस्तिष्क में द्वैत का भेद सदैव स्पष्ट रहता है, जिसका मस्तिष्क सदैव शाश्वत विवेक के
अधीन अनुशासित कार्य करता है, जो सर्वहिताय कार्य करने में रूचि लेता
है वह योगी ब्रम्ह की दिव्य शांति का भोग करता है ।
बुधवार, 5 अगस्त 2015
आत्मबोध
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति अपनी आत्मा की अनुभूति में
आनंदित रहता है, अपनी आत्मा की अनुभूति से हर्षित होता है,
जिसे अपनी आत्मा में ब्रम्ह के प्रकाश की अनुभूति होती है वह योगी ब्रम्ह स्वरूप
हो जाता है । व्याख्याकार गुरू के उपरोक्त कथन का विस्तार बताते हुये कहता है कि
आत्मा की अनुभूति ब्रम्ह का दर्शन कराती है, ब्रम्ह की दिव्य शांति की अनुभूति होती
है ।
मंगलवार, 4 अगस्त 2015
वाँक्षना
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति इस जीवन के रहते इच्छा और क्रोध
पर अंकुश करने में सफल हो जाता है वह ही सुखी इंसान है । व्याख्याकार कहता है कि
प्रकृतीयमोंह से मुक्ति प्रशस्थ करती है शांति – स्वतंत्रता – हर्ष । इसके विपरीत
मोंह जन्म देता है इच्छा को । इच्छा की पूर्ति ना होने पर क्रोध उत्पन्न होता है ।
इसीलिये गुरू ने साराँश बात कही कि जो व्यक्ति इच्छा और क्रोध पर विजय करने में
सफल होगा उसकी उपलब्धि होगी शांति – स्वतंत्रता – हर्ष ।
सोमवार, 3 अगस्त 2015
अनित्य
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मनुष्य को जो भी सुख प्रकृतीय संसर्ग से
प्राप्त होता है वह मात्र दु:ख का साधन होता है । इन सभी सुखों का कोई प्रारम्भ और
कोई अंत नीयत होता है । इसलिये हे अर्जुन कोई भी ज्ञानी संत कभी भी इन प्रकृतीय
संसर्ग के सुखों में हर्षित नहीं होता है ।
रविवार, 2 अगस्त 2015
आत्मसुख
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस व्यक्ति की आत्मा प्रकृतीय रूपों में
आसक्ति से परे रहती है वह व्यक्ति अपनी आत्मा में निहित सुख का अनुभव करता है ।
ऐसा व्यक्ति ही आत्मा का सुख अनुभव करते हुये ब्रम्ह की अनुभूति करने में सफल होता
है ।
शनिवार, 1 अगस्त 2015
ब्रम्हस्थिति
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि वह व्यक्ति जो मनो-नुकूल दशा के प्राप्त होने पर हर्षित
नहीं होता है और मन के विपरीत दशा के प्राप्त होने पर दु:खी नहीं होता है,
जो अपने मस्तिष्क को सम भाव में रखकर उसे विचलित नहीं होने देता
है ऐसा निष्ठावन व्यक्ति ब्रम्ह के भाव में स्थापित हो जाता है ।
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