गुरू ने सत्य के रहस्य को बताया । पुन: बताया कि तमस् के पथ पर
चलते हुये असुरी कृतों को करने के फल से जीव बारम्बार पुनर्जन्म को प्राप्त होते, इस मोहिनी प्रकृति के भ्रम जाल में फँसे
जीवन जीता है और समस्त द्वैतों के त्रास को भोगते हुये उसे सत्य के ज्ञान का अवसर
नहीं मिलता है ।
शनिवार, 30 अप्रैल 2016
शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016
असुर
ब्रम्ह की महिमा से ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति द्वारा निर्मित
एवं उच्चतर प्रकृति द्वारा पोषित मनुष्य यदि ब्रम्ह के ज्ञान के प्रति जिज्ञासु है, प्रयत्नशील है तो उसके प्रयत्न वाँक्षना के
सुर में हैं, यदि वह ब्रम्ह के ज्ञान के प्रति
उदासीन है तो वह अपने विकास को उन्मुख नहीं है, और कंचिद वह क्रूर क्रियाओं में संलग्न है तो उसके कृत असुरी
श्रेणी के हैं ।
गुरुवार, 28 अप्रैल 2016
तमस् के पथ पर
गुरू सत्य का रहस्य अनुभव कराने के लिये पहले सत्य के विषय में
बताया, फिर बताया कि जो व्यक्ति मोंह
ग्रसित होते हैं वे सत्य के ज्ञान के प्रति जिज्ञासु नहीं होते हैं, और अब तीसरे चरण में बताते हैं कि जो
व्यक्ति क्रूर क्रियाँओं में सम्मलित होते हैं उनके कर्म के प्रति सारे प्रयत्न
व्यर्थ जाते हैं । यह क्रमिक अवस्थायें हैं । ज्ञान के जिज्ञासु । ज्ञान के प्रति
अचेत । ज्ञान के विपरीत भ्रष्ट आचरणी ।
बुधवार, 27 अप्रैल 2016
विवेकहीन
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति दुष्ट
आत्माओं और राक्षस आत्माओं के तामसिक कृतो में संलग्न होते हैं, उनके कर्म के प्रति सारी क्रियाँये ब्यर्थ
जाती हैं, और उन्हे उन कर्मों से सृजित होने
वाला ज्ञान व्यर्थ होता है और उनके सारे निर्णय अनुचित के प्रति होते हैं ।
मंगलवार, 26 अप्रैल 2016
सत्य के लिये उद्यम
व्यक्ति अपनी शरीर के बाह्य आवरण से भिज्ञ होता है । व्यक्ति
अपनी आत्मा की उपस्थिति से अनभिज्ञ होता है । जबकि व्यक्ति के जीवन का आधार वह
आत्मा ही है । जबतक व्यक्ति उस आत्मा से अनभिज्ञ है प्रकृतीय मोंह ही उसका परिचय
बना हुआ है । आत्मा को जानने मात्र से प्रकृतीय मोंह क्षीण होने लगता है । मोंह से
मुक्ति ही प्रशस्थ करना गुरू के उपदेश का लक्ष्य है ।
सोमवार, 25 अप्रैल 2016
सत्य को जाने
ब्रम्ह की अ-परिवर्तनीय प्रकृति आत्मा जो कि अ-रूपधारी होती है
ही व्यक्ति का सत्य परिचय होती है । आत्मा के अवलम्ब से प्रकृति का कार्यकारी रूप
सृजित होता है परंतु आत्मा का स्वयं अकर्ता होना अपेक्षित होता है । आत्मा का
निरंतर प्रकृति के संसर्ग में रहते हुये ब्रम्ह का प्रतिनिधित्व करने का स्वरूप है
। व्यक्ति का इस स्वरूप से अनभिज्ञ होना अज्ञान के अंधकार में भटकने के समान है ।
आत्मा के इस स्वरूप को जानना और इसकी मर्यादानुसार जीवन को ढालना मुक्ति पथ है ।
रविवार, 24 अप्रैल 2016
मोंह के वशीभूत
गुरू का कहना है कि जब तक हम अपनी आत्मा से अनभिज्ञ हैं तब तक
मानो हम अंधकार में जीवन जी रहे हैं । आत्मा को जानने और उसकी मर्यादा के अनुरूप जीवन
को पर्णित करने में जीवन की सार्थकता निहित होती है । जब तक हम ऐसा नहीं कर सकेंगे
तब तक हम प्रकृतीय मोंह के भ्रमात्मक जीवन में भटकते रहेंगे ।
शनिवार, 23 अप्रैल 2016
उपस्थिति से अनभिज्ञ
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि मोंह में भ्रमित
व्यक्ति मुझे मनुष्य की शरीर में ढका हुआ निरर्थक अस्तित्व मानते हैं क्योंकि वह
मेरी उच्चतर प्रकृति आत्मा को जानते नहीं जो कि समस्त रूपों का आधार है ।
शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016
ब्रम्ह की माया
यदि इस संसार की उत्पत्ति के कारण की खोज़ की जाय तो कोई तर्क
संगत उत्तर नहीं मिलता है । यदि इसे ब्रम्ह के मनोरंजन के निमित्त कहा जाय तो
ब्रम्ह तो भोक्ता होता नहीं मात्र दृष्टा होता है । यदि इसे रूपों के मोक्ष का
अवसर माना जाय तो समस्त सृजन स्वयं ही मोंह का पथ है, मोक्ष विरोधी है । इस प्रकार न ही प्रश्न और न ही उत्तर ही
तुष्टिकारक हैं । यह ब्रम्ह की माया है कि समस्त रूप संसार अपने इस रूप में हैं । यही
एक मात्र तुष्टिकारक उत्तर है ।
गुरुवार, 21 अप्रैल 2016
मात्र दृष्टा
इस समस्त रूप संसार की उत्पत्ति ब्रम्ह से है । इस रूप संसार की
समस्त गति ब्रम्ह से है । फिरभी ब्रम्ह मात्र एक दृष्टा है । वह न ही किसी सृजन
में संलग्न है और न ही किसी गति में सम्मलित है । समस्त रूप सृजन व गति मात्र
ब्रम्ह के अद्भुद विज्ञान द्वारा है । ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति आत्मा से भी
उपरोक्त वर्णित ब्रम्ह के आचरण के अनुरूप ही कर्तव्य निर्वाह अपेक्षित होता है|
बुधवार, 20 अप्रैल 2016
बेधक और आधार फिरभी भिन्न
परम् ब्रम्ह समस्त रूप संसार के रूपों को बेधने में सक्षम तथा
समस्त रूपों को अपने स्वरूप में स्थिर रहने का अधार होते हुये भी सभी से भिन्न है
। उनकी प्रकृति ही समस्त रूपों की सृजनकर्ता है, समस्त रूपों का आधार है परंतु प्रकृति ब्रम्ह नहीं है ।
मंगलवार, 19 अप्रैल 2016
निर्देशन द्वारा
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मेरे निर्देशों का
पालन करते हुये प्रकृति इस रूप संसार के समस्त चल और अचल रूपों को पैदा करती है और
हे कुंती पुत्र इस सृजन का फल होता है कि इस रूप संसार की समस्त गतिविधियाँ चलने
लगती हैं ।
सोमवार, 18 अप्रैल 2016
असहाय अज्ञानी आत्मा
आत्मा प्रकृतीय मोंह से अपने को बचा नहीं पाती है । कार्यों को
प्रकृतीय गुणों के अधीन करती है । इसलिये वह कर्मफल से बंधती है । पुनर्जन्म के
लिये बाध्य होती है । यह उसके लिये असहाय स्थिति होती है । इस स्थिति से उबरने का
एक ही उपाय होता है । अज्ञान से उबरना । प्रकृतीय मोंह से उबरना । प्रकृतीय गुणों
के अधीन कार्य करने का अभ्यास त्यागना ।
रविवार, 17 अप्रैल 2016
कर्ता प्रकृति
ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति द्वारा निर्मित शरीर और उसमें उच्चतर
प्रकृति आत्मा के अवलम्ब से इस जीव रूप में कर्ता निम्नतर प्रकृति ही होती है और
आत्मा का तटस्थ भाव से ही कर्म में संलग्न होना अपेक्षित होता है । कर्म से
असम्बद्ध रहते हुये कार्य में संलग्न होना । यदि कंचिद आत्मा ऐसा कर सके तो वह
मुक्त रहे । फलत: पुनर्जन्म को बाध्य नहीं होगी ।
शनिवार, 16 अप्रैल 2016
कर्म संविधान से परे
ब्रम्ह यद्यपि कि प्रभव व प्रलय का नियंत्रक होता है परंतु
फिरभी वह इन कार्यों का कर्ता नहीं होता है । कर्म करने में कर्तापन का भाव ही
कर्म के प्रतिफल अर्थात् बंधन का कारण बनता है । ब्रम्ह प्रकृति के कार्यों को
सम्पादित करा देता है परंतु कर्ता नहीं होता है । इसलिये बंधन से मुक्त होता है । यही
अनुकरणीय है । मुक्ति का पथ है ।
शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016
अ-सम्बद्ध
कार्य करने की विधि बताते हुये योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
कहे कि मेरे यह कार्य मेरे लिये बंधनकारी नहीं होते हैं क्योंकि इन्हें करने में
मैं इनसे सम्बद्ध नहीं होता हूँ । मैं इन कार्यों से अनासक्त ही रहता हूँ ।
गुरुवार, 14 अप्रैल 2016
अज्ञान प्रकृति की दासता का फल
ब्रम्ह अपनी प्रकृति को अपने वश में रखता है जबकि ब्रम्ह की
उच्चतर प्रकृति आत्मा जिसकी स्थापना निम्नतर प्रकृति निर्मित शरीर में ब्रम्ह का
प्रतिनिधित्व करने के उद्देष्य से की जाती है, अज्ञान के प्रभाव से वह अपने मौलिक स्वरूप को विस्मृत कर, प्रकृतीय मोंह के प्रभाव से अहंकार का भाव
ग्रहण कर अपना दायित्व निर्वाह करने लगता है । फलत: वह बारम्बार जन्म लेने को
बाध्य होता है ।
बुधवार, 13 अप्रैल 2016
कर्तापन - अहंकार
अहंकार निम्नतर आठ वर्गीय प्रकृति का एक अंग होता है । यह
कर्मफल के नियम के प्रभाव से जागृत दशा धारण करता है । इसी के प्रभावी होने के फल
से आत्मा बारम्बार रूप प्रकृति में जन्म लेने को बाध्य होती है । आत्मा रूपों में
स्थापना काल में अपने कर्मों की स्वयं स्वामी नहीं रह जाती है । वह निम्नतर
प्रकृति के वर्चस्व को स्वीकारने को बाध्य होती है ।
मंगलवार, 12 अप्रैल 2016
अव्यक्त प्रकृति
अव्यक्त प्रकृति जब रूप धारण करती है और वह अरूपधारी उच्चतर
प्रकृति आत्मा द्वारा प्रकाशित हो जाती है तो रूप प्रगट हो जाते हैं । इस रूप
संसार की प्रगति का स्तर तत्समय प्रकृति में सुलभ आधार बीज़ के ऊपर निर्भर करता हैं
। परंतु इन सभी रूपों को सक्रिय एवं प्रभावी होनेके लिये अरूपधारी प्रकृति आत्मा
द्वारा प्रकाशित होना अनिवार्य दशा होती है ।
सोमवार, 11 अप्रैल 2016
असहाय जीव
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मैं अपनी प्रकृति
को अपने नियंत्रण में रखते हुये इन जीव रूपों को बारम्बार जन्म लेने को भेजता रहता
हूँ क्योंकि यह जीव रूप प्रकृति के अधीन होने के कारण असहाय और बाध्य होते हैं ।
रविवार, 10 अप्रैल 2016
निरंतर
समस्त जीव रूपों का उत्पन्न होना तथा पुन: प्रकृति में विलय
होना यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है । इस प्रक्रिया पर जीव कोटि का कोई
नियंत्रण अथवा वश नहीं होता है । इस प्रक्रिया में प्रयुक्त ब्रम्ह की निम्नतर
प्रकृति और उच्चतर प्रकृति तथा घटित होने वाली समस्त गतिविधियाँ जीव कोटि के लिये
एक रहस्य के रूप में होती हैं । इस समस्त प्रक्रिया का सृजनकर्ता एवं संचालक, ब्रम्ह, सर्वोच्च ज्ञेय रहस्य होता है ।
शनिवार, 9 अप्रैल 2016
उदय
गुरू का उपदेश विदित करता है कि यह ब्रम्ह के विज्ञान द्वारा
सृजित अद्भुद व्यवस्था है कि समय का चक्र एक निश्चित स्थल पर पहुँचने पर ब्रम्ह की
निम्नतर प्रकृति और ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति इन रूपों को उत्पन्न करना शुरू कर
देती हैं और एक निश्चित स्थल आने पर इन समस्त रूपों का प्रकृति में विलय हो जाता
है ।
शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016
विलय
गुरू का उपदेश विदित करता है कि जो जीव रूप समस्त संसार में
फैला हुआ है वह समय आने पर इस प्रकृति में विलय होने को बाध्य होता है । पुन: समय
आने पर वह रूप धारण करने को बाध्य होता है । इस प्रकार जीवों का उत्पन्न होना और
विलय होना यह दोनों ही समय बद्ध प्रक्रिया है । इनके लिये कोई अलग से कारण नहीं
सृजित होता है । यह ब्रम्ह के विज्ञान का फल है ।
गुरुवार, 7 अप्रैल 2016
चक्र
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि हे कुंतीपुत्र यह सभी
जीव रूप चक्र में समय आने पर मेरी ही प्रकृति में विलीन हो जाते हैं और समय आने पर
दूसरे चक्र के प्रारम्भ पर मैं इन्हे पुन: उत्पन्न होने को भेजता हूँ ।
बुधवार, 6 अप्रैल 2016
सबका आधार परंतु भिन्न
जिस प्रकार वायु आकाश में है परंतु फिरभी आकाश वायु में नहीं है
। वायु में आकाश का कोई अंश अथवा गुण नहीं है । इसी रूप में प्रत्येक रूप ब्रम्ह
में है परंतु फिरभी ब्रम्ह किसी रूप में नहीं है । ब्रम्ह रूपों के उत्पत्ति का
निमित्त है फिरभी किसी रूप में नहीं है । ब्रम्ह पूर्णतया पारलौकिक है । यह समस्त
रूप संसार उस ब्रम्ह की सृजनात्मक शक्ति द्वारा उत्पन्न हुआ है फिरभी ब्रम्ह पूर्नतया
अपनी उत्पत्ति से भिन्न है ।
मंगलवार, 5 अप्रैल 2016
सर्वव्यापी आकाश
गुरू द्वारा ब्रम्ह का रहस्य व्यक्त करने के लिये उद्घृत किये
गये दृष्टांत आकाश सच्चे अर्थों में संसार का है, संसार के लिये है,
सर्वत्र व्याप्त है, सभी क्रियाओं के लिये स्थल है, स्थिर है, बिना किसी रूप का है और् प्रत्येक से अछूता है । ब्रम्ह जिसका
कोई रूप बताया नहीं जा सकता है फिर भी सभी रूपों का आधार है । संसार की समस्त
गतिविधियों का आधार है ।
सोमवार, 4 अप्रैल 2016
अछूता आकाश
ब्रम्ह का रहस्य बोध कराने के उद्देष्य से दिये गये दृष्टांत
में विशिष्ट बात यह है कि आकाश इस रूप संसार के लिये सीमा का निर्धारण करता है
परंतु कोई भी वस्तु रूप उसे छू नहीं सकता है । वह सदैव सर्व से अछूता ही रहता है ।
उसी प्रकार इस रूप संसार के सम्स्त रूप ब्रम्ह में निवास करते हैं परंतु किसी भी
रूप से वह अछूता ही रहता है ।
रविवार, 3 अप्रैल 2016
आकाश द्वारा सीमित
एक दृष्टांत के माध्यम द्वारा ब्रम्ह का रहस्य बताते हुये गुरु
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि जिस प्रकार सभी जीवों का प्राण आधार वायु
सर्वत्र स्वतंत्र विचरण करती है फिर भी वह आकाश की सीमा में समाहित है उसी रूप में
उसी प्रकार सभी जीव मेरे अंदर समाहित निवास करते हैं ।
शनिवार, 2 अप्रैल 2016
रूप सीमित अभिव्यक्ति
यह रूप संसार मात्र ब्रम्ह का निरूपण है । यह किसी भाँति उसे
व्यक्त करने वाला नहीं है । यह संसार यदि न भी होता तो ब्रम्ह जैसा है वैसा ही
रहता जबकि यदि ब्रम्ह न होता तो यह संसार होता ही नहीं । कोई भी सीमित स्वरूप उस
ब्रम्ह को निरूपित नहीं कर सकता है । संसार के किसी भी रूप में ब्रम्ह को चिन्हित
नहीं किया जा सकता है यद्यपि कि प्रत्येक रूप उसके प्रकृति की ही उत्पत्ति है ।
शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016
दैविक शक्ति का योग
ब्रम्ह की शक्ति की महिमा है और ब्रम्ह के विज्ञान की लीला है
कि यह समस्त रूप संसार इस रूप में प्रगट हुआ और इस रूप में स्थिर है जबकि ब्रम्ह
इस रूप संसार से इतना ज्यादा अछूता है कि उसे किसी भी भाँति इस रूप संसार के साथ
जुडा हुआ नहीं कहा जा सकता है । यह संसार मात्र ब्रम्ह की शक्ति और विज्ञान का
समंवित उद्भव है । ब्रम्ह पूर्णतया इस रूप संसार से भिन्न है ।
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