अर्जुन गुरू के सम्मुख अपनी विनय प्रार्थना
को और आगे बढाते हुये बोला कि हे सर्वस्य के स्वामी आपके मुखसे मैंने परम् ब्रम्ह
के अखण्ड अविभाज्य रूप के सम्बंध में जो कुछ भी सुना वह सब सत्य है परंतु हे प्रभु
मुझे कृपा पूर्वक अपने उस दिव्य स्वरूप के दर्शन कराइये ।
शनिवार, 31 दिसंबर 2016
शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016
जन्म और मृत्यु
अर्जुन अपनी मन:स्थिति को और आगे
व्यक्त करते हुये कहता है ! हे कमलनयन परम् ब्रम्ह स्वरूप मैं आपके मुखसे इस रूप
संसार के सृजन और उनके विलय के समबन्ध में विस्तार से सुना है ।
गुरुवार, 29 दिसंबर 2016
घबराहट की व्याख्या
अर्जुनके मस्तिष्क में इस रूप संसार
के रूपों के जन्म, उनके अस्तित्व की स्थिरता के
सम्बंध में, उसे जो कुछ भी उसकी पूर्व की
जानकारी थी, वह गुरू के अब तक के उपदेश के
प्रभाव से. इस समबंध में सत्य स्थिति क्या है का ज्ञान प्राप्त हुई, जिसके फल से भ्रामक प्रमाणित हुई । उसके
मस्तिसक में व्याप्त समस्त अस्थिरता उसके भ्रामक विचारों से ही जनित थी । इसलिये
सत्य स्थिति के ज्ञान से उसकी अस्थिरता क्षीण हुई । इसी स्थिति को उसने गुरू के
समक्ष व्यक्त किया ।
बुधवार, 28 दिसंबर 2016
घबराहट का क्षय
गुरू के अब तक के उपदेश द्वारा
अर्जुन के ऊपर जो प्रभाव हुआ उसे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि चर्मोत्कर्ष
ज्ञेय के विषय में आपके द्वारा मुझे जो भी दीक्षा मिली उसके प्रभाव से मुझमें जो
घबराहट व्याप्त हो गई थी वह नियंत्रित हो गई है ।
मंगलवार, 27 दिसंबर 2016
सीमन की व्याख्या
यह समस्त रूप संसार अखण्ड, अविभाज्य, अनंत ब्रम्ह की महिमा का मात्र आंशिक अभिव्यक्ति है । इस रूप
संसार में विकीर्ण समस्त वैभव ब्रम्ह की चमकती हुई महिमा मण्डल के मात्र एक किरण
से प्रकाशित है । ज्ञान के जिज्ञासु साधक को ब्रम्ह की इस महिमा का ध्यान कर
प्रयत्नमें संलग्न होना अपेक्षित होता है ।
इसके साथ विभूति योग नामक दशवाँ
अध्याय पूर्ण हुआ
सोमवार, 26 दिसंबर 2016
जिज्ञासा का सीमन
अर्जुन की जिज्ञासा की तुष्टि के
लिये समस्त रूप विस्तार सम्बंधी उपदेश करने के उपरांत गुरू योगेश्वर श्रीकृष्न
अर्जुन से कहे कि परंतु यह सब कुछ तुम्हे जानने की क्या आवश्यकता है ? मैं इस समस्त रूप संसार को मात्र अपने
अस्तित्व के अंश मात्र से इस रूप संसार के समस्त रूपों को वेध करके सम्बल देता हूँ
।
रविवार, 25 दिसंबर 2016
उपसंहार की व्याख्या
गुरू द्वारा इस रूप विस्तार के
सम्बंध में बताये गये उपदेश का साराँश यह है कि इस रूप संसार का प्रत्येक रूप
ब्रम्ह की महिमा द्वारा ही सृजित हुआ है,
उनकी कृपा द्वारा ही अपने रूप में स्थिर है, परंतु जो भी रूप अधिक सुंदर और वैभवयुक्त प्रगट होते हैं वह
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से व्यक्त करने वाले होते हैं । इस रूप संसार के दृष्य पटल
पर जो भी कीर्तिमानकृत, जो भी महानतम बलिदान, जो भी प्रखर बुद्धिमत्ता के कर्म सम्भव
होते हैं वह समस्त ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से व्यक्तकरने वाले प्रमाणित होते हैं ।
जो भी महाकाव्य, जो भी वीरगाथा मनुष्य के सीमित
मस्तिष्क के लिये अस्पष्ट अथवा अपरिभाष्य प्रतीत होते हैं वह सभी ब्रम्ह के मात्र
अंशमात्र वैभव द्वारा सम्भव हो जाते हैं ।
शनिवार, 24 दिसंबर 2016
रूप विस्तार का उपसंहार
अर्जुन द्वारा उठाये गये ब्रम्ह के
ध्यानकाल में मस्तिष्क में धारण करने के लिये ब्रम्ह के रूप सम्बंधी जिज्ञासा की
पुष्टि करते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस रूप संसार के विविध रूपों में से
कुछ एक का लक्षणात्मक उपदेश करने के उपरांत सार रूप में बताये कि किसी भी रूप
स्वरूप में जो कुछ भी गौरव, लावण्य, ओज़ प्रदान किया गया है उसे जानो कि वह मात्र मेरे अंश मात्र
द्वारा सम्भवहुआ है ।
शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 20
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को उपरोक्तानुसार कराने के उपरांत गुरु योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मेरे वैभव से सृजित हुये रूपों की गणना का कहीं अंत
नहीं है हे शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले अर्जुन जो कुछ भी मैंने बताया है वह
मेरी अन्तविहीन वैभव का मात्र प्रतीक अन्श है ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के
प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही
रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।
गुरुवार, 22 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 19
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि सभी रूप धारी अस्तित्वों में बीर्य हूँ, हे अर्जुन इस संसार की कोई भी चल अथवा अचल रूप मेरे अवलम्ब के
बिना अपने रूप में स्थिर नहीं रह सकता है ।
एक संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
बुधवार, 21 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 18
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि दण्ड देने वालों में मैं दण्ड का मानक हूँ, जो लोग विजय प्राप्त करते हैं मैं उनकी नीति हूँ, गोपनीय वस्तुओं में मैं मौन हूँ और ज्ञान
प्राप्त ज्ञानियों में मै ज्ञान हूँ ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के
प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही
रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।
मंगलवार, 20 दिसंबर 2016
ब्यास
ब्यास संस्कृत भाषा का शब्द है
जिसका अर्थ होता है “ संकलित करने वाला” – “संग्रहित करने वाला” । महर्षि ब्यास
ग्रंथ महाभारत के रचयिता है । इन्होंने वेदों का वर्गीकरण किया था । इन्हे
वेदव्यास भी अनेको प्रसंगों में कहा गया है ।
सोमवार, 19 दिसंबर 2016
वृसिनि
वृसिनि यदु वंश के प्रथम राजा थे ।
श्रीमद्भागवद्पुराण में वर्णन आया है कि वृसिनि के वंशजो में बलरामजी उन्नीसवें
शासक थे और श्रीकृष्ण बीसवें शासक थे । संस्कृत शब्द “वृसिनि” का अर्थ “बंशजो में”
बताया गया है ।
रविवार, 18 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 17
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि वृसिनि में मैं वासुदेव हूँ,
पाण्डवों में मैं धन पर विजय करने वाला अर्जुन हूँ, बुद्धिमान विवेकी पंडितों में मैं ब्यास हूँ और कवियों में मैं
उस्ना हूँ ।
एक संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
शनिवार, 17 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 16
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि छल के क्षेत्र में मैं जूआ हूँ,
भव्य की मैं भव्यता हूँ, मैं विजय हूँ, मैं प्रयत्न हूँ और मैं अच्छे की अच्छाई
हूँ ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के
प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही
रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।
शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016
गायत्री मंत्र
वैदिक मंत्रों में सबसे अधिक गाया
जाने वाला मंत्र “गायत्री मंत्र” है । वेदों के अन्य मंत्रों की भाँति ही इस मंत्र
के रचयिता के रूप में किसी का नाम नहीं बताया जाता है । वेद के मंत्रों के विषय
में कहा जाता है कि वे प्रत्येक किसी ना किसी ऋषि के मस्तिष्क में स्वयं से ही
प्रगट हुये हैं । इस रूप में गायत्री मंत्र ऋषि विश्वामित्र के मस्तिष्क में स्वयं
से प्रगट हुआ था । यह ऋगवेद का मंत्र है ।
गुरुवार, 15 दिसंबर 2016
बृहतसम
सामवेद जो कि गायन के डृष्टिकोण से
अन्य तीन वेदों की अपेक्षा अधिक सम्पन्न बताया जाता है में निहित देवताओं को
प्रसन्न करने वाले गायन के गीतों में देवताओं के राजा इन्द्र की प्रसन्नता के लिये
गाया जाने वाला गीत “बृहतसम” है । इसका गायन काल मध्य रात्रि होती है । इसकी राग अत्यंत
मधुर है ।
बुधवार, 14 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 15
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि प्रशंसा गायन के गीतों में बृहतसम हूँ, ध्वनि में निरंतर नियमित गति सृजित करने वाली कविताओं में मैं
गायत्री मंत्र हूँ, माह/महीनों में मृगशिरा हूँ, ऋतुओं में मैं फूलों से भरी बसंत ऋतु हूँ ।
एक संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
मंगलवार, 13 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 14
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि मैं सभी जीवों को खा जाने वाली मृत्यु हूँ औय्र जिनका अभी इस संसार में
प्रादुर्भाव नहीं हुआ है उनका जन्म हूँ और जीवों के जीवन के स्त्रीलिंग स्वभाव के
परिवर्तनों में मैं उनकी ख्याति, सम्पन्नता, वाणी, स्मृति, बुद्धि कुशाग्रता,
दृढता और धर्य हूँ ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के
प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही
रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।
सोमवार, 12 दिसंबर 2016
सृजन कर्ता ब्रम्हा
इस रूप संसार के सृजन कर्ता ब्रम्हा
सभी रूपों के प्रधान रूप हैं । अनेकों ब्रम्हा को बताया गया है । चार मुख के
ब्रम्हा, आठ मुख के ब्रम्हा, सोलह मुख के ब्रम्हा आदि । अलघ अलग
सृष्टियों के अलग अलग ब्रम्हा । अलग सृष्टियों में ये प्रत्येक, ब्रम्ह, को निरूपित करने वाले होते हैं ।
रविवार, 11 दिसंबर 2016
संहारक समय
समस्त ज्ञात संहारक शक्तियों में
“समय” सबका राजा है । सर्वाधिक शक्तिशाली है । इस रूप संसार का प्रत्येक रूप इस
“समय” के द्वारा ही अपने अंतिमगंतब्य पर पहुँचते हैं । यह “समय” सभी का संहारक
होता है । इस रूप में यह ब्रम्ह को व्यक्त करने वाला है ।
शनिवार, 10 दिसंबर 2016
अकार
संस्कृत भाषा की वर्णमाला का प्रथम
अक्षर वैदिक साहित्य का प्रथम अक्षर है । अकार के सन्योग होने से ही कोई भी ध्वनि
सम्भव होती है । इस प्रकार ध्वनि का मूल है “अकार” । इस रूप में यह ब्रम्ह स्वरूप
है ।
शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016
द्वंद:
यह शब्द संस्कृत भाषा से है । यह दो
ऐसे शब्दो का समूह होता है जिसमें प्रत्येक दोनों शब्द एक बराबर अर्थ तथा भाव के
होते हैं । उदाहरण – राम्कृष्ण, । इस समूह के दोनो शब्दों का अलग
पहचान होती है । इस समूह का कोई भी शब्द दूसरे शब्द के अधीन नहीं होता है । इस
समूह के प्रत्येक दोनो शब्द बराबर ओजस्वी होते हैं ।
गुरुवार, 8 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 13
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि वर्णमाला का मैं प्रथम अक्षर हूँ, मिश्रित में मैं द्वंद हूँ, मैं अक्षय समय हूँ और सृजनकर्ता में मैं ब्रम्हा हूँ जिसका मुख
प्रत्येक दिशा मैं है ।
एक संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
बुधवार, 7 दिसंबर 2016
तर्क-निष्कर्श-सत्य
हिंदू धर्मा दर्शन के विभिन्न
ग्रंथों में भिन्न भिन्न स्तर के तर्क की कवायद की गई है । इस प्रक्रिया में साक्ष्य
के रूप में उद्घृत दृष्टांतों को दर्शन में “जप” कहा गया है । पुन: एक तर्क को
दूसरे तर्क से परास्त करने के दृष्टांतों को “वितण्ड” कहा गया है । अंत में अंतिम
निर्णय के रूप में निकाले गये निष्कर्श को “वद” कहा गया है । इन समस्त “वद” के
परोक्ष में स्थित “परम् सत्य” को “प्रवद्तम” कहा गया है । “प्रवद्तम” ब्रम्ह
स्वरूप है ।
मंगलवार, 6 दिसंबर 2016
आत्मा का आत्मविज्ञान
आत्मा के आत्मविज्ञान का दर्शन हमें
अज्ञान के नाश का पथ प्रशस्थ करता है । आत्मा का आत्मविज्ञान हिंदू धर्मदर्शन के
अनेक ग्रंथों यथा चारो वेद, वेदांतसूत्र, 10 पुराणों, तथा भगवद्गीता में विस्तार पूर्वक वर्णित हैं । इस रूप में
उपरोक्त सभी ग्रंथ ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से व्यक्त करने वाले हैं ।
सोमवार, 5 दिसंबर 2016
आदि अंत और मध्य
इस रूप संसार की समस्त रूप रचनाओं
में प्रयुक्त बुनियादी पदार्थ ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति के अवयव हैं । इन समस्त
रूपों को उनके सृजित रूपों में स्थिर रखने का दायित्व ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति
निर्वाह करती है । अंत में इन समस्त रूपों का विलय भी “शिव” रूप ब्रम्ह में ही
होता है । यह समस्त प्रक्रिया ब्रम्ह की प्रकृति का ही सम्पादन है । इसी रूप में
ब्रम्ह ही समस्त रूप संसार के समस्त रूपों का आदि, मध्य तथा अवसान होता है ।
रविवार, 4 दिसंबर 2016
आदि अंत और मध्य
इस रूप संसार की समस्त रूप रचनाओं
में प्रयुक्त बुनियादी पदार्थ ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति के अवयव हैं । इन समस्त
रूपों को उनके सृजित रूपों में स्थिर रखने का दायित्व ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति
निर्वाह करती है । अंत में इन समस्त रूपों का विलय भी “शिव” रूप ब्रम्ह में ही
होता है । यह समस्त प्रक्रिया ब्रम्ह की प्रकृति का ही सम्पादन है । इसी रूप में
ब्रम्ह ही समस्त रूप संसार के समस्त रूपों का आदि, मध्य तथा अवसान होता है ।
शनिवार, 3 दिसंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 12
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि समस्त सृजित हुये रूपों का मैं आदि, मध्य और अवसान हूँ,
हे अर्जुन समस्त ज्ञात विज्ञानों में “आत्म विज्ञान” (spiritual scince of self) हूँ, तर्क द्वारा सत्य को जानने के प्रयत्नों में मैं अंतिम
निष्कर्श के रूप में आहरित होने वाला सत्य हूँ ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के
प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही
रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।
रूप विस्तार : चरण 11
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि पवित्र करने वालों में मैं “वायु” हूँ, वन में विचरण करने वाले शस्त्रधारियों में मैं “राम” हूँ, मछलियों में मैं “शार्क” हूँ, बहती हुई नदिंयों में मैं “गंगा” हूँ ।
एक
संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016
गरूण
हिंदू धर्म में गरुँण को एक देवता
के रूप में माना गया है । यह पक्षी स्वरूप में हैं । इनका सिर और पंख चील्ह सदृष्य
है शेस शरीर मनुष्य के सम्मन बताया गया है । ये भगवान विष्णु के वाहन के प्रयोजन
में संलग्न हैं । इन्हे पक्षियों का राजा माना गया है । इन्हे “विनायक” नाम से भी
जाना जाता है । इन्हे विघ्नों का निवारक बताया जाता है । इनकी पूजा भगवान विष्णु
की पूजा के साथ ही होती है ।
गुरुवार, 1 दिसंबर 2016
काल
इस रूप संसार की प्रत्येक घटना एवं
रूप का नियंत्रक “समय” होता है । प्रत्येक उद्घृत रूप का समय के साथ अंत निश्चय है
। इस रूप में नियंत्रक शक्ति के रूप में “समय” ब्रम्ह स्वरूप है । इस प्रकार
नियंत्रक शक्तियों में “समय” ब्रम्ह को सर्वाधिक सक्षमता से निरूपित करने वाला
होता है ।
बुधवार, 30 नवंबर 2016
कलयतम
हिंदू धर्म के सम्पूर्ण ग्रंथों में
केवल भगवद्गीता के ग्रंथकार नें इस शब्द का प्रयोग मात्र एक अवसर पर ही किया है ।
इस शब्द का अर्थ है “नियंत्रण करने वाली शक्ति” । नियंत्रक शक्तियाँ अनेक बतायी
गयी हैं परंतु “समय” सर्वाधिक शक्तिमान नियंत्रक होता है । प्रत्येक रूप एवं घटना
का नियंत्रक “समय” है ।
मंगलवार, 29 नवंबर 2016
प्रहलाद
प्रहलाद को दैत्यों के राजा हिरण्य
कष्यप का पुत्र बताया गया है । यह दैत्यों के वन्श परम्परागत स्वभाव के विपरीत
भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे । यहाँ तक कि अपने पिता राजा के आदेशों के विरुद्ध
एवं राजा के द्वारा उत्पन्न की गई अनेक यातनाओं को भोगते हुये भी यह अपनी विष्णु
भक्ति को सतत् ज़ारी रखे हुये थे । भगवद्पुराण में इनकी प्रचुर कथायें वर्णित है ।
इन्हे भक्ती का आदर्ष माना जाता है ।
सोमवार, 28 नवंबर 2016
दैत्य
हिंदू धर्ममें दैत्य असुरों के
समुदाय का दानवों के समान एक वर्ग है । इन्हे माता दिती और पिता कष्यप ऋषि की
संतान बताया जाता है । असुरों के दैत्य वर्ग और देवताओं के मध्य युद्ध के वृतांत
पुराणों में वर्णित हैं । इन युद्धों का कारण आपसी द्वेष बताया गया है क्योंकि
देवता इनके भाई तुल्य हैं ।
रविवार, 27 नवंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 10
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि दैत्यों में मैं प्रहलाद हूँ,
नियंत्रण करने वालों में मैं काल हूँ,
पशुओं में मैं पशुओं का राजा शेर हूँ,
पक्षियों में मैं विनत का पुत्र गरुण हूँ ।
एक संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
शनिवार, 26 नवंबर 2016
यम
वेदों में जीव कोटि के पहले मरने
वाले को “यम” कहा गया है । मृतको में प्रथम होने के कारण यह मृतको के राजा हुये ।
एशिया के पूर्वी भागों में “यम” को मृतलोक के शासक के रूप में माना जाता है जो कि
मृतक होने वाले व्यक्तियों के कर्मों के न्यायिक परीक्षक होते हैं और नरक के देवता
हैं ।
शुक्रवार, 25 नवंबर 2016
वरूण
हिदू धर्म में जल के देवता को
“वरुण” कहा गया है । इन्हे जल के साम्राज्य के शासक के रूप में बताया गया है । यह
समुद्र साम्राज्य के अधिपति है ।
गुरुवार, 24 नवंबर 2016
नागा
भारतवर्ष के उत्तर पूर्व भाग में
बसने वाले अनेक कबीलों के समुदाय के लोग जो वस्त्र धारण नहीं करते हैं को नागा कहा
जाता है । परम्परा के अनुसार ये योद्धा वर्ग के लोग हैं जिन्हे अति-प्राचीन काल
में क्षत्रीय/योद्धा बताया जाता था ।
बुधवार, 23 नवंबर 2016
रूप विस्तार चरण 9
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से प्रगट
करने वाले स्वरूपों की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
बताये कि नागाओं में मैं अनंत हूँ,
जल में रहने वालों में मैं वरुण हूँ दिवंगत हुये पूर्वजों में मैं आर्यमा हूँ, कानून और व्यवस्था के रक्षकों में मैं यम
हूँ ।
एक संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
मंगलवार, 22 नवंबर 2016
वसुकी
नाग साँपों के राजा का नाम है
“वसुकी” । हिंदू धर्ममें साँपों के राजा को “वसुकी” बताया गया है । इनके मस्तक पर
एक मणि होती है जिसे नागमणि कहते हैं । इनकी बहन नाग का नाम “मनसा” बताया गया है
और वह भगनान शिव-शंकर के गले पर वास करती हैं ।
सोमवार, 21 नवंबर 2016
कंदर्प
उत्तम पुत्र उत्पन्न करने के लिये
उत्पन्न हुई काम वासना को कंदर्प बताया गया है । हिंदू धर्म में काम वासनाओं के
देवता “कंदर्प” ।
रविवार, 20 नवंबर 2016
कामधेनु
वेद ग्रंथों में इसे “सुरभि” देवी
के रूप में बताया गया है । हिंदू धर्ममें मान्यता है कि यह पवित्र गाय व्यक्ति की
समस्त इच्छाओं की पूर्ति का वरदान देने वाली दैवीय शक्ति है । कामधेनु को अम्बिका
के रूप में एक देव गाय के रूप में इसे सभी गायों की माता स्वरूप माना गया है । यह
अपनी पौत्री नंदिनी की भाँति अपने भक्तों को इच्छापूर्ति का वरदान देती है ।
शनिवार, 19 नवंबर 2016
बज्र
बज्र संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका
अर्थ होता है “अविध्वंसनीय” तथा “अविनष्टनीय”। इस शब्द का धार्मिक प्रयोजनों में
एक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया जाता है विषेसतया ऐसे प्रयोजनों जहाँ ग्रहणकर्ता
वस्तु को किसी बाह्य बाधा से रक्षित करना लक्ष्य होया है । वस्तु की रक्षा के
लिये अविध्वंसनीय तथा अविनष्टनीय अस्त्र ।
शुक्रवार, 18 नवंबर 2016
रूप विस्तार चरण 8
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से प्रगट
करने वाले रूपों की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये
कि अस्त्रों में मैं बज्र हूँ, गायों में मैं कामधेनु हूँ, संतान उत्पन्न करने वालों में मैं कंदर्प
हूँ, सर्पों में मैं वसुकी हूँ ।
एक संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
गुरुवार, 17 नवंबर 2016
उच्चश्रवा
हिंदू धर्मदर्शन में उच्चश्रवा उस
दैविक घोडें का नाम है जिसके दो पंख भी थे । इसके अधिपति इंद्र हैं । यह पूर्ण
सफेद है । यह विश्व का सबसे तेज़ रफ्तार से दौडने वाला घोडा है । इसका उद्भव
समुंद्र मंथन में हुआ था जिसे देखते ही इंद्र ने इसे ले लिया था । तबसे ही इंद्र
इसके स्वामी हैं ।
बुधवार, 16 नवंबर 2016
रूप विस्तार चरण 7
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनसे
कहे कि घोडों में मैं उच्च्श्रवा हूँ जिसका जन्म अमृत से हुआ है, राजसी हाँथियों में मैं ऐरावत हूँ, मनुष्यों में मैं राजा हूँ ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप
के प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना
आपकी पूर्णता है ।
मंगलवार, 15 नवंबर 2016
कपिला
वैदिक संत कपिला “साँख्य दर्श” के
प्रवर्तक विद्वान हैं । “साँख्य दर्शन” का प्रादुर्भाव कपिला मुनि से सम्भव हुआ है
। हिंदू धर्म में मान्यता प्राप्त छ: धर्मदर्शन में “साँख्य दर्शन” एक है ।
भगवद्पुराण में कपिला मुनि का प्रचुर उल्लेख मिलता है । यह महानतम् विद्वान संत थे
।
सोमवार, 14 नवंबर 2016
चित्ररथ
गंधर्वों के राजा थे चित्ररथ ।
महाभारत में अर्जुन और चित्ररथ के युद्ध का वृतांत है । भगवद्पुराण में चित्ररथ और
नारद मुनि के एक साथ गायन के वृतांत है । चित्ररथ का शाब्दिक अर्थ सूर्य बताया गया
है । अलग अलग देश में अलग अलग धर्मों में चित्ररथ के अलग अलग अर्थ बताये गये हैं ।
रविवार, 13 नवंबर 2016
गंधर्व
हिंदू धर्मदर्शन में गंधर्व को एक
अलग प्रकार के जीव के रूप में बताया गया है जो कि केवल स्वर्ग लोक में ही पाये
जाते हैं । बौद्ध धर्म में भी इन्हे इसी मान्यता से जाना जाता है । महाभारत में
अर्जुन और गंधर्वों के मध्य युद्ध का वृतांत मिलता है । प्रतिभावान गायको को भी
गंधर्व कहा जाता है । हिंदू धर्म में प्रचलित अनेकों विवाह पद्धतियों में “गंधर्व
विवाह” भी एक पद्धति है ।
शनिवार, 12 नवंबर 2016
नारद
वेदों में वर्णित संत देवऋषि नारद
को ब्रम्हा का पुत्र बताया गया है । इन्होने विवाह नहीं किया था । यह ऐसे संत थे
जिन्हे कि इस विनाशहील संसार से ज़रा भी मोंह नहीं था । “नारद भक्ति सूत्र” इनका
रचा हुआ ग्रंथ है जो कि ईश्वर प्रेम के क्षेत्र में एक मानक ग्रंथ है । भक्ति
द्वारा ईश्वर प्राप्ति का पथ जानना है तो व्यक्ति को अध्ययन एवं अनुसरण करना होगा
“नारदभक्ति सूत्र” में व्यक्त पथ । नारद पुराण 18 पुराणों में से एक है ।
शुक्रवार, 11 नवंबर 2016
अस्वथा
अस्वथा वह पवित्र वृक्ष है जिसके
नीचे बैठ गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था । बताया जाता है कि इस वृक्ष की जडें
ऊपर की ओर हैं और शाख तथा पत्तियों का विस्तार नीचे की ओर है । ऊपर की ओर जडों का
होना यह विदित करता है कि इस संसार की रचना अज्ञात ब्रम्ह द्वारा सम्भव हुई है । इस
वृक्ष को ज्ञान वृक्ष भी कहा जाता है ।
गुरुवार, 10 नवंबर 2016
जपयज्ञ
ब्रम्ह का ध्यान । ध्यान की
प्रक्रिया में साधक व्यक्ति अपने मस्तिष्क को अभ्यास का अवसर प्रदान करता है ।
अभ्यास अपने अंत:करण में स्थित उस परम् सत्य की क्षवि को अनुभव करने का जिसके
प्रसाद से साधक का अस्तित्व है । ध्यान की दशा में केंन्द्रित मस्तिष्क अन्य
सांसारिक विषयों से मुक्त दशा में होने से शांति की अनुभूति करता है ।
बुधवार, 9 नवंबर 2016
रूप विस्तार चरण 6
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनसे
कहे कि मैं सभी वृक्षों में अस्वथा हूँ,
मैं देव ऋषियों में नारद हूँ, गंधर्वोमें मैं चित्ररथ हूँ, सिद्ध पुरुषों में मैं कपिल हूँ ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।
मंगलवार, 8 नवंबर 2016
यज्ञ में अर्पण
ब्रम्ह को अर्पण । ब्रम्ह की उपासना
की प्रक्रिया में ब्रम्हको अर्पित करना । उपासक व्यक्ति अपने आराध्य को, अपनी प्रिय निधि को श्रद्धाभाव से अर्पित
करता है । यज्ञरूपी ब्रम्ह को अर्पित की जाने वाली निधि भी ब्रम्ह स्वरूप ही होती
है और ब्रम्ह को अर्पण करने वाला व्यक्ति भी ब्रम्ह का ही रूप होता है ।
सोमवार, 7 नवंबर 2016
“ॐ”
धर्म के क्षेत्रमें “ॐ” शाश्वत्
ध्वनि है । इसे आत्मप्रतीक के रूप में प्रयोगकिया जाता है । यह एक मंत्र है । इस
मंत्र की मान्यता हिंदू धर्म, जैनधर्म और बौद्धधर्म में एक समान
है ।
रविवार, 6 नवंबर 2016
भृगु
महर्षि भृगु सप्त ऋषियों में से एक
थे । महर्षि भृगु अनेक प्रजापतियों में से एक थे । प्रजापति इस सृष्टि की रचना
करने में ब्रम्हा के सहायक थे । भृगु ज्योतिष शास्त्र अर्थात् भविष्तको जानने की
विद्या के उद्भवकर्ता ऋषि हैं । इनकी रचना भृगु संहिता ज्योतिष शास्त्र का मूल
ग्रंथ है ।
शनिवार, 5 नवंबर 2016
रूप विस्तार चरण 5
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनसे
कहे कि ऋषियों में मुझे भृगु जानो,
उच्चारण में मुझे अक्षर ॐ जानो, यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ और अचल
अधिष्ठानो में मैं हिमालय पर्वत हूँ ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप
के प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना
आपकी पूर्णता है ।
शुक्रवार, 4 नवंबर 2016
समुद्र
पृथ्वी के समस्त क्षेत्र के 71% भाग
में लगभग 14.108 घन कीलो मीटर समुद्र का जल फैला हुआ है । इस जल के व्यापकता से
ज्ञान का जिज्ञासु ब्रम्ह की व्यापक अखण्ड अस्तित्व की कल्पना ग्रहण करता है ।
गुरुवार, 3 नवंबर 2016
जलाशय तालाब
पृथ्वी को “जलग्रह” कहा जाता है ।
इसके सम्पूर्ण क्षेत्रपल का 71% में समुद्र का विस्तार फैला हुआ है । पृथ्वी की
सम्पूर्ण जलसम्पदा का शेस भाग जो कि पेय जल के रूप में है मुख्यत: तालाबों अथवा
वर्फ के रूप में है अथवा भूगर्भ में है ।
बुधवार, 2 नवंबर 2016
बृहस्पति
बृहस्पति को देवताओं के गुरू के रूप
में जाना जाता है । इनका रथ हाँथी सदृष्य बडा और आठ घोडों के द्वारा हाँका जाता है
। गुरू बृहस्पति महाभारत की कथा का खण्डन करते हुये बताये कि पाण्डवों और कौरवों
के पूर्वजों की जन्म कथा क्या थी ।
मंगलवार, 1 नवंबर 2016
स्कंद
वेदों में वर्णित देवताओं में
“स्कंद” एक प्रसिद्ध देवता हैं । इन्हे भगवान शिव का पुत्र बताया गया है । इनके
अन्य प्रलित तनाम “कीर्तिकेय” “मरुगन” सुब्रामन्या” हैं । स्कंद पुराण में
“कार्तिकेय” की लीलाओं का प्रचुर वृतांत है । ज्ञातव्य है कि स्कंद पुराण समस्त 18
पुराणों में सबसे अधिक लेख सामग्री का धारक है ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप
के प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना
आपकी पूर्णता है ।
सोमवार, 31 अक्टूबर 2016
रूप विस्तार चरण 4
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से प्रगट
करने वाले रूपोंकी गणनाको और आगे बढाते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले हे
अर्जुन विद्वान पुजारी संतों में मुझे ब्रहस्पति जानो, वीर सेनापतियों में में मुझे स्कंध जानो,और जलाशय तालाबों में मुझे समुंद्र जानो ।
रविवार, 30 अक्टूबर 2016
अग्नि
ब्रम्ह की आठवर्गीय निम्नतर प्रकृति
का यह एक घटक है ।इसकी उत्पत्ति घर्षण से होती है । इसकी प्रचण्ड ज्वाला अन्य
रूपों को जलाकर भस्म करने में सक्षम होती है । समस्त बलि की ग्रहणकर्ता होती है ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप
के प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना
आपकी पूर्णता है ।
शनिवार, 29 अक्टूबर 2016
वसुओं
वेदों मे वसुओं को इंद्रके सहायक
देवता के रूप में माना जाता है । इन्हे संख्या
में आठ बताया गया है । ये प्रकृति के आठ वर्गों के स्वामी देवता होते हैं ।
इस रूप में इन्हे अष्टवसु कहा जाता है । इनके नाम वसु का अर्थ होता है “वसने वाले”
अथवा “वासिंदे” ।
शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016
कुबेर
हिंदू धर्म दर्शन में कुबेर को
धन-सम्पत्ति के रूप में जाना जाता है । इन्हे यक्ष के शासक के रूप में जाना जाता
है । स्मरणिय है कि यक्ष को अर्धपावन देवरूप माने जाते है । इन यक्षों की उत्पत्ति
राक्षसों के साथ हुई परंतु सात्विक वृत्ति के होने के कारण इन्हे अर्ध-पावन देवता
के रूप में पूजा भी जाता है ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप
के प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना
आपकी पूर्णता है ।
गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016
यक्ष और राक्षस
ब्रम्ह की शरीर से उत्पन्न हुये
असुरों में से कुछ सात्विक वृत्ति के थे उन्हे यक्ष नाम दिया गया और कुछ चीख रहे
थे कि ब्रम्हा को ही “खा जावो” उन्हे राक्षस नाम दिया गया । यक्ष को प्राचीन काल
में जंगलों एवं गाँवो के देवता की मान्यता थी जो कि बाद के समयों में गडे हुये धन
के खज़ाने के देवता के रूप में विस्तृत हुई । राक्षसों को विशाल और बलशाली शरीर के
लिये जाना जाता है ।
बुधवार, 26 अक्टूबर 2016
शंकर
शंकर शब्द की विभक्ति करते हुये
निकाले गये अर्थ बनते हैं (1) अच्छे कर्मों को करने वाले (2) शंसय का निवारण करने
वाले । शिव भगवान को संगीतमय मधुर ध्वनि तरंगो के देवता के रूप में भी जाना जाता
है । भगवद्गीता में ग्रंथ के ग्रंथकार ने गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुखसे “साम”
शब्द से व्यक्ति के आत्मा की ब्रम्ह चेतना में तन्मयता को व्यक्त करनेके लिये किया
है । भगवान शंकर इसी स्थिति के साक्षात् प्रगट रूप प्रतीक हैं ।
मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016
रूद्र
ऋग वेद में रूद्र को तेज हवाओं के
तूफान के देवता के रूप में बताया गया है । इस नाम का रूपांतर करते हुये ऋगवेद में
ही इन्हे “दहाडने वाले” के नाम से भी कहा
गया है । इन्हे शक्तिशालियों में सर्वाधिक शक्तिशाली बताया गया है ।
सोमवार, 24 अक्टूबर 2016
रूप विस्तार चरण 3
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से व्यक्त
करने वाले रूपों की गणना आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये
कि रूद्रों में मैं शंकर हूँ, यक्ष और राक्षसों में मैं कुबेर
हूँ, वसुओं में मैं अग्नि हूँ, पर्वत शिखरों में मैं मेरु हूँ ।
रविवार, 23 अक्टूबर 2016
चेतना
प्रत्येक रूप ब्रम्ह की प्रकृति का
सृजन है । ब्रम्ह प्रकृति दो भागो में विभक्त की जाती है । निम्नतर प्रकृति पराधीन, रूपधारी, गुणयुक्त होती है जबकि उच्चतर प्रकृति स्वतंत्र, अरूपधारी, अक्षर होती है । यह उच्चतर प्रकृति रूपधारी प्रकृति के गुणों के
अध्यास के फल से अपनी ब्रम्ह स्वरूप को कलंकित कर लेती है । इसी विस्मृत चेतना को
जागृत करना तथा जागृत रखना धर्म दर्शन का प्रधान लक्ष्य होता है ।
शनिवार, 22 अक्टूबर 2016
भूतानाम
ब्रम्ह की अभिव्यक्ति रूप हैं ।
अखण्ड, अक्षर, अव्यक्त ब्रम्ह जब अपने को विनाशशील, असत्य रूपों में प्रगट करता है तो वह एक रहस्य बन जाता है । यह
रहस्य इतना विस्तृत हो जाता है कि व्यक्ति ब्रम्ह के प्रति ही अचेत हो जाता है ।
फिर यह अज्ञान से आच्छादित व्यक्ति अज्ञानके मध्य ही भटकता फिरता है ।
शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016
विवेक
यह भी ब्रम्ह की आठ वर्गीय निम्नतर
प्रकृति का सातवाँ घटक होता है । यह बाह्य अथवा आंतरिक किसी भी विषय वस्तु के
प्रति जागरूकता का मानक होता है । इस विवेक की प्रकृति का निरूपण अथवा अभिव्यक्ति
धर्मदर्शन का गूढतम विषय होता है । मनुष्य का उत्कर्ष इस विवेक के प्रखर विकास एवं
इसके द्वारा सक्षमता से मस्तिष्क की क्रियाँओं को नियंत्रित करने पर ही निर्भर
करता है ।
गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016
मस्तिष्क
मनुष्य शरीर की रचना मे प्रयुक्त
ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति के आठ घटको में से यह छठा है । यह इंद्रियों के संचालन
और नियंत्रण दोनों का ही केंद्र होता है । यह विवेक के अधीन कार्य करता है । इसकी
क्रिया पद्धति धारणाओं पर आधारित होती है । उच्चतर प्रकृति की प्रतीक आत्मा इसी
मस्तिष्क के कार्य पद्धति के पथ से ही प्रकृतीय मोंह से ग्रसित होती है ।
बुधवार, 19 अक्टूबर 2016
इंद्रियाँ
नसों का समूह जो कि किसी विशिष्ट
ज्ञान चेतना को ग्रहण करने के लिये शरीरकी रचना में प्रयुक्त किया गया है । मनुष्य
शरीर में पाँच विशिष्ट ज्ञान चेतना के ग्रहणकर्ता पथ उपलब्ध होते हैं जिन्हे नामत:
दृष्टि, श्रवण, स्वाद, घ्राण तथा स्पर्ष कहा जाता है ।
मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016
इंद्र
हिंदू धर्मदर्श्न में इंद्र को
देवताओं के राजा के रूप में मान्यता है । इसलिये जितने भी सुखभोग तथा वैभव की
कल्पना की जा सकती है उसके ये अधिपति होते हैं । वर्षा इनके आधिपत्य के क्षेत्र की
मानी जाती है ।
सोमवार, 17 अक्टूबर 2016
देव
देव शब्द में निहित भाव होता है -
स्वर्ग के तुल्य - कोई आदर्णीय वैभव जिसे असाधारण माना
जाय । हिंदू धर्ममें इसी शब्द के द्वारा किसी भी रूप को पूजा जाता है । बौद्ध धर्म
में भी इस शब्द को उपरोक्त निष्ठा द्वारा ही मान्यता दी जाती है । यह शब्द संस्कृत
और पाली लिपि से है ।
रविवार, 16 अक्टूबर 2016
सामवेद
यह हिंदू धर्म के प्राचीनतम संस्करण
के लेख हैं जिन्हे कि वैदिक संस्कृत में प्राचीन भारत में लिपिबद्ध किया गया है ।
इनकी संख्या चार है (1) ऋगवेद (2) यजुर्वेद (3) सामवेद (4) अथर्वेद । इनमें
देवताओं के कृतों को मनुष्य की भाषा में लिखा गया है । इन्हे लिपिबद्ध एवं
श्रेणीबद्ध वेद्व्यास ऋषि ने किया था । ज्ञातव्य है कि भगवद्पुराण में ऋषि
वेद्व्यास को भगवान के 24 अवतारों की गणना में एक बताया गया है । लिपिबद्ध होने से
पूर्व यह श्रुति परम्परा द्वारा गुरू से शिष्य में अंतरण द्वारा संचरित हो रहे थे
। इसलिये वेदांत में इन्हे श्रुति प्रमाण के सम्मानित शब्द द्वारा ही व्यक्त किया
जाता है ।
शनिवार, 15 अक्टूबर 2016
वेद
यह हिंदू धर्म के प्राचीनतम संस्करण
के लेख हैं जिन्हे कि वैदिक संस्कृत में प्राचीन भारत में लिपिबद्ध किया गया है ।
इनकी संख्या चार है (1) ऋगवेद (2) यजुर्वेद (3) सामवेद (4) अथर्वेद । इनमें
देवताओं के कृतों को मनुष्य की भाषा में लिखा गया है । इन्हे लिपिबद्ध एवं
श्रेणीबद्ध वेद्व्यास ऋषि ने किया था । ज्ञातव्य है कि भगवद्पुराण में ऋषि
वेद्व्यास को भगवान के 24 अवतारों की गणना में एक बताया गया है । लिपिबद्ध होने से
पूर्व यह श्रुति परम्परा द्वारा गुरू से शिष्य में अंतरण द्वारा संचरित हो रहे थे
। इसलिये वेदांत में इन्हे श्रुति प्रमाण के सम्मानित शब्द द्वारा ही व्यक्त किया जाता
है ।
शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016
रूप विस्तार चरण 2
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से व्यक्त
करने वाले रूपों की गणना को और आगे बढाते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि वेदों में मैं सामवेद हूँ,
देवताओं में मैं इंद्र हूँ, इंद्रियों में मैं मस्तिष्क हूँ, और प्राणियों में मैं विवेक हूँ ।
गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016
मरिसि
सप्तऋषियों के मण्डल को मरिसि बताया
गया है । इन ऋषियों को प्रकृति के विभिन्न ऊर्जा श्रोतों का नियंत्रक बताया गया है
। इस रूप संसार के सृजन काल में ब्रम्ह ने इन ऋषियों को रूप दिया था और इन्हे रूप
संसार की रचना में अपने सहायक के रूप में प्रयोग किया था । पित्त और अग्नि के मध्य
सम्बंध को भी इसी शब्द द्वारा व्यक्त किया जाता है ।
बुधवार, 12 अक्टूबर 2016
मरुत
वेदों में इनका वर्णन आया है ।
इन्हे रूद्र का पुत्र बताया गया है । ऋगवेद में इन्हे वायु के तूफानों का देवता
कहा गया है । इन्हे साहस और नैतिकता का प्रतीक योद्धा बताया गया है । इन्हे इंद्र
के सहायक के रूप में भी बताया गया है ।
मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016
चंद्रमा
यह स्वयं प्रकाश श्रोत नहीं है ।
परंतु इसका विदित स्वरूप प्रकाश श्रोत के रूप में ही है । प्रकाश का सामान्य ताप
इसमें नहीं है बल्कि शीतलता का प्रतीक है । ब्रम्ह के अद्भुद विज्ञान का गणमान्य
उदाहरण है । ब्रम्ह के अद्वितीय स्वरूप को विशिष्टता से प्रगट करने वाला है ।
सोमवार, 10 अक्टूबर 2016
विकिरणकर्ता सूर्य
ब्रम्ह की अद्वितीय प्रतिभा – सभी
रूपोंका आधार होते हुये भी वह किसी रूप में नहीं है, सभी कर्मों का प्रेरक होते हुये भी वह किसी कार्य का कर्ता
नहीं है । ब्रम्ह के इन गुणों को प्रकाश के क्षेत्र में सूर्य प्रगट करता है ।
भू-मण्डल के समस्त रूपों को प्रकाशित करता है, परंतु किसी भी रूप से उसका सम्पर्क नहीं है । भू-मण्डल के
समस्त रूप उस सूर्यसे उर्जा पाते हैं परंतु उस सूर्य का किसी भी रूप से सम्पर्क
नहीं है । ब्रम्ह को निरूपित करने का प्रतीक चमकता सूर्य ।
रविवार, 9 अक्टूबर 2016
आदित्य
वेदों में वर्णित देवताओं को आदित्य
कहा गया है । गुरू ने पूर्व के उपदेश में जिस तुलनात्मक अभिव्यक्ति का उपदेश किया
था उसकी गणना कराते हुये गुरू ने ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से व्यक्त करेने में
विष्णु को आदित्यों में सर्वश्र्ष्ठ अभिव्यक्ति का बताया । इस स्थल पर पुन: स्मरण
कराना विषय के अनुरूप होगा कि ब्रम्ह की जो अद्वितीय महिमा उनके उच्चतर प्रकृति
में है कि वह समस्त रूपों का उद्गम आधार होते हुये भी समस्त से अछूता रहती है ।
इसका परिचय विष्णु में सर्वाधिक देखा जा सकता है ।
शनिवार, 8 अक्टूबर 2016
रूप विस्तार : चरण 1
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से व्यक्त
करने वाले रूपों की गणना कराते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि
आदित्यों में मैं विष्णू हूँ, प्रकाश में मैं चमकता हुआ सूर्य
हूँ, मरुतों में मैं मारीच हूँ, और तारों में मैं चंद्रमा हूँ ।
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