शनिवार, 31 जनवरी 2015

अर्जुन का विषाद

प्रकृतीय मोंह में जीवन जीते हुये प्रत्येक मनुष्य को प्रकृतीय रूपों से लगाव हो जाता है । जब उस लगाव को त्यागने की स्थिति सम्मुख होती है उसे ऐसा लगता है कि जब सब छूट ही जावेगा तो फिर जीयेंगे किस लिये । यह भय उसे सन्यास का रूप विदित करता है । सन्यास का स्वरूप अनुभव आने पर वह सन्यासी नहीं बनना चाहता है इसलिये वह अपना वास्तविक भय व्यक्त नहीं करता और कुछ अन्य कारण बाधा के रूप में बताता है । सत्य बात यह होती है कि मनुष्य एक अज्ञात लोक को जाने के लिये अपने ज्ञात लोक को त्यागना नहीं चाहता है । इस स्थिति को भ्रामक अभिव्यक्ति द्वारा प्रगट करता है । 

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