कोई भी व्यक्ति जबभी कोई प्रार्थना करता है, इससे सर्वप्रथम उसकी ईश्वर के प्रति आस्था
विदित होती है । इस आस्था के सहारे वह व्यक्ति अपने अंदर उपस्थित अभिमान, लालच, भय और इच्छाओं को जानने में सफल होता है । शनै: शनै: उसे ऐसा
अहसास होता है कि कंचिद उसे ईश्वर से ऐसी भौतिक वस्तुओं को नहीं माँगना चाहिये ।
पुन: अनुभव बढने पर वह ईश्वर से ज्ञान माँगने लगता है । परंतु यह प्रार्थना द्वारा
मांगने की समस्त प्रक्रिया मूल रूप से ईश्वर को अपनी इच्छाओं की पूर्ति का श्रोत
के रूप में प्रयोग करने का भाव प्रगट करती है । जबकि एक संत ईश्वर की सेवा अपने
आराध्य की सेवा के भाव से करता है और अपने को ईश्वर के सम्मुख एक सेवक के रूप में
प्रस्तुत करके विनय करता है कि हे ईश्वर मेरी सेवा आपको जैसे अनुकूल हो ग्रहण करें
। यही सर्वोत्तम स्वरूप है और भाव है ।
गुरुवार, 31 दिसंबर 2015
बुधवार, 30 दिसंबर 2015
अच्छों में सर्वोत्तम
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन
को बताये कि मेरे सभी उपासक अच्छे हैं परंतु जो संत मुझसे युक्त होने के लिये मुझे
ही अपना सर्वोच्च लक्ष्य निर्धारित करके मुझपर समर्पित भाव से निर्भर करता है वह
सर्वोत्तम होता है ।
मंगलवार, 29 दिसंबर 2015
सर्वाधिक प्रिय की व्याख्या
गुरू द्वारा बताये गये भक्तों के वर्गीकरण तथा उनमें सर्वश्रेष्ठ
का निरूपण का आधार यह है कि कौन कितना माया के लोक के प्रति आसक्त है और कौन कितना
ब्रम्ह के ज्ञान तथा उनकी मर्यादा के अनुरूप अपना जीवन यापन बनाने का जिज्ञासु है
। जिन्हे ब्रम्ह का ज्ञान हो गया है वे व्यक्ति मोंह की आसक्ति से मुक्त हो गये
हैं उनके लिये ब्रम्ह की सेवा ही सर्वोच्च धर्म है । ऐसे व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ हैं
।
सोमवार, 28 दिसंबर 2015
सतत् युक्त सर्वश्रेष्ठ
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि समस्त पूजने वालों में वह
व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ है जो कि प्रतिपल ब्रम्ह के साथ जुडे हुये हैं, जिनकी भक्ति एकनिष्ठ है । ऐसे व्यक्तिके
लिये ब्रम्ह ही सबसे प्रिय है और ब्रम्ह को ऐसे भक्त प्रिय हैं ।
रविवार, 27 दिसंबर 2015
वर्गीकरण की व्याख्या
गुरू बताये कि वह व्यक्ति जिन्हें दु:ख, दरिद्र, परेशानियाँ घेरे हुये हैं भगवान को
एक सहायता श्रोत के रूप में याद करते हैं । दूसरे वे लोग जिन्हे ढेर सा धन पाने की
कामना होती है वे भगवान को एक दानी श्रोत के रूप में याद करते हैं । तीसरे वह लोग
जिन्हे ज्ञान पाने की कामना है वे लोग भगवान की कृपा के लिये उनकी पूजा करते हैं ।
चौथे वह लोग जिन्हे ज्ञान प्राप्त है वे भगवान की सेवा को सर्वोच्च कर्म के रूप
में करते हैं ।
शनिवार, 26 दिसंबर 2015
वर्गीकरण
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मुझे चार प्रकार के
लोग पूजते । प्रथम वे जो परेशानियों में
होते हैं । द्वितीय वह जिन्हे धन की कामना है । तृतीय वह लोग जिन्हे ज्ञानपाने की
अभिलाषा है । चौथे वह जिन्हे ज्ञान प्राप्त है ।
शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015
सात्विक के पथसे
गुरू ने ब्रम्ह की शरण न ग्रहण करने वाले व्यक्तियों का वृतांत
बताया । ऐसे व्यक्तियों को प्रयत्नपूर्वक सद्वृत्ति में प्रवृत्त होने के लिये रज़स
और तमस का त्याग करना चाहिये । पुन: उन्हे सद्वृत्ति को भी त्यागना ही होगा
क्योंकि सद्वृत्ति भी बंधनकारी ही होता है । परंतु प्रारम्भिक अवस्था में उन्हे
रज़स और तमस से मुक्ति पाने के लिये सात्विक को पाना ही लक्ष्य करना होगा ।
गुरुवार, 24 दिसंबर 2015
दुर्वृत्तियों में सम्मलित
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि दुर्वृत्तियों में
सम्मलित व्यक्ति जो कि मानवता के मानको पर निम्न स्तर के हैं, जिनका मस्तिष्क मोंह और अज्ञान से आच्छादित
है, जोकि दुरात्माओं के दुष्कृतों में
सम्मलित होते हैं, वह मेरी शरण में नहीं आते हैं ।
बुधवार, 23 दिसंबर 2015
भ्रम का निमित्त
माया जो कि मनुष्य के मस्तिष्क में व्याप्त समस्त मोंह और भ्रम
की जननी होती है को गुरू ने अजेय बताया है । ब्रम्ह स्वयं इन गुणों का रचयिता है ।
मनुष्य ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति की रचना है जो कि ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति के
सहारे पर स्थिर है में कंचिद यह क्षमता नहीं है कि वह ब्रम्ह द्वारा निर्मित माया
की शक्ति का अतिक्रमण कर सके । इसका अतिक्रमण ब्रम्ह की कृपा द्वारा ही सम्भव है ।
मंगलवार, 22 दिसंबर 2015
कठिन माया
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मेरी माया जो कि
प्रकृति के तीन गुणों से युक्त होती है,
को जीत पाना किसी भी व्यक्ति के लिये अति दुष्कर है । परंतु जो व्यक्ति मुझमें शरण
ग्रहण करके प्रयत्न करता है वह ही इसे जीतने में सफल हो सकता है ।
सोमवार, 21 दिसंबर 2015
अनभिज्ञता का वृतांत
गुरू यह दु:ख व्यक्त किये कि संसार ब्रम्ह को जानता नहीं है ।
ब्रम्ह जो कि सदा विद्यमान रहने वाला है,
शुद्ध है, स्वतंत्र है, जिसे किसी विशिष्ट गुण द्वारा निरूपित नहीं
किया जा सकता है और जिसे जानने मात्र से समस्त दुर्वृत्तियों का अंत हो जाता है ।
हम संसार के रूपों को देखते हैं परंतु हम उस सत्य को नहीं देख पाते हैं जिससे इन
समस्त रूपों की उत्पत्ति हुई है ।
रविवार, 20 दिसंबर 2015
सत्य से अनभिज्ञ
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको बताये कि प्रकृति के इन्ही
तीनों गुणों के द्वारा पूरा संसार मोंह में फँसा है और मुझे नही जान पाता है कि इन
गुणों से परे अक्षर सत्य क्या है ।
शनिवार, 19 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 5 की व्याख्या
ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति के तीन गुणों की उत्पत्ति भी गुरू
ब्रम्ह से बताते हैं । निम्नतर प्रकृति इन्ही तीनों गुणों के द्वारा उच्चतर
प्रकृति आत्मा को अपने प्रति मोंह में आसक्त करती है । इस प्रकार यह ब्रम्ह का
अद्भुद विज्ञान है कि वह अपनी ही उच्चतर प्रकृति को अपनी ही निम्नतर प्रकृति के
मोंह में बाँधने के लिये आधार स्वयँ रचे हैं । इन्ही गुणों के प्रभाव द्वारा
स्वतंत्र आत्मा परतंत्र प्रकृति के वश में रहता है ।
शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015
रूप विस्तार चरण 5
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि प्रकृति के तीनो
गुण नामत: सत्व, रज़स, तमस का सृजनकर्ता मैं हूँ । मैं उनमें हूँ नहीं परंतु वह मुझसे
ही हैं ।
गुरुवार, 17 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 4 की व्याख्या
इस श्लोक में गुरू ने इच्छा
पूर्ति की कामना – काम, जो प्राप्त हो चुका है उसकी सुरक्षा – राग दो अलग शब्दों द्वारा व्यक्त किया
है । श्लोक के उत्तरार्ध में गुरू ने कहा कि जीवों में पायी जाने वाली सत्य को
जानने की कामना मैं हूँ । बिना इच्छा के तो कुछ पाया नहीं जा सकता है । व्यक्तिगत
इच्छा को वर्जित बताया गया है । इसके विपरीत सत्यको जानने की इच्छा के लिये ब्रम्ह
कहे कि मैं स्वयं हूँ ।
बुधवार, 16 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 4
ब्रम्ह के व्यापक विस्तार को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण कहे कि मेरे वीर योद्धा अर्जुन मैं बलवान का बल हूँ,
मैं इच्छा और संचय की कामना से परे हूँ,
जीवों में ज्ञान प्राप्ति की चेतना मैं हूँ
मंगलवार, 15 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 3 की व्याख्या
गुरू ने ब्रम्ह के व्यापक विस्तार की गणना में इस श्लोक में उदाहरणों
को बताकर यह उपदेश किये हैं कि यह रूप संसार जोकि ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति
द्वारा बना है और ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति के अवलम्ब पर स्थिर है की निरंतरता
ब्रम्ह स्वयँ साधते हैं ।
सोमवार, 14 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 3
व्यापक ब्रम्ह के विस्तार को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे हे पार्थ मैं सभी जीवों की उत्पत्ति का सदैव रहने वाला
कभी नष्ट न होने वाला वीर्य हूँ, मैं बुद्धिमानों की बुद्धिमत्ता
हूँ, मैं प्रत्येक सुंदर स्वरूप की
सुंदरता हूँ ।
रविवार, 13 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 2 की व्याख्या
गुरू ब्रम्ह के व्यापक विस्तार
की गणना को आगे बढाते हुये कहे कि पृथ्वी का परिचय उसकी गंध, अग्नि का परिचय उसका तेज, जीव का परिचय उसका प्राण, तपस्वी का परिचय उसकी सरलता, यह सभी मैं स्वयं हूँ । स्मर्णीय है कि समस्त रूपो का
सृजन ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति के घटको द्वारा हुआ है जो अपने स्वरूप में ब्रम्ह
की उच्चतर प्रकृति आत्मा के सहारे स्थिर है । इन समस्त प्रकृतीय स्वरूपों की पहचान
स्वयं ब्रम्ह हैं ।
शनिवार, 12 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 2
ब्रम्ह के व्यापक विस्तार को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को बताये कि मैं पृथ्वी में गंध हूँ, मैं अग्नि में तेज हूँ, समस्त जीवों में प्राण हूँ और तपस्वी की सरलता हूँ ।
शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 1 की व्याख्या
गुरू बताये कि मैं जल में व्यप्त उसका स्वाद हूँ, चंद्रमा और सूर्य में विसर्जित होने वाला
प्रकाश हूँ, चारों वेदों में अक्षर ओइम् हूँ, आकाश में ध्वनि हूँ, और मानवो में मानवता हूँ । प्रत्येक उदाहरण
में चिर सत्य ब्रम्ह स्वयं है । जल का चिर सत्य स्वाद, चंद्रमा और सूर्य की पहचान उनका प्रकाश, वेदों में वर्णित अविनाशी सत्य ब्रम्ह है, आकाश की विलक्षणता ध्वनि संचार और मनुष्य
का आकर्षण उसकी मानवता ब्रम्ह स्वयं हैं ।
गुरुवार, 10 दिसंबर 2015
विस्तार : चरण 1
इस संसार की संरचना बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन
से कहे कि मैं जल में स्वाद हूँ, हे कुंती पुत्र अर्जुन मैं सूर्य
और चंद्रमा में प्रकाश हूँ, मैं वेदों में अक्षर ओइम् हूँ, मैं आकाश में ध्वनि हूँ और मानवों में
मानवता हूँ ।
बुधवार, 9 दिसंबर 2015
सर्वोच्च की व्याख्या
जिस ब्रम्ह की प्रकृति मात्र से यह समस्त संसार सृजित हुआ है उस
ब्रम्ह की तुलना में उसकी रचना स्वाभाविक रूप से छोटी ही है । गुरू द्वारा इस
तुलनात्मक अभिव्यक्ति को मुख्यत: क्षमता के निरूपण के लिये प्रयोग किया गया है ।
समस्त संसार ब्रम्ह की शक्ति द्वारा अपने स्वरूप में स्थिर है ।
मंगलवार, 8 दिसंबर 2015
सर्वोच्च
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि हे अर्जुन इस संसार
में मुझसे बडा कुछ भी नहीं है । यह पूरा संसार मुझ पर इस प्रकार लम्बित है जिस
प्रकार माले के तागे पर मणियाँ गुँथी रहती हैं ।
सोमवार, 7 दिसंबर 2015
सीमा की व्याख्या
गुरू द्वारा जीव के उत्पत्ति और विलय के सम्बंध में उपदेश यह
विदित करता है कि यह ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति एवं उच्चतर प्रकृति का संयोग है
जिससे यह रूप संसार सृजित हुआ है, उसी ब्रम्ह के सहारे द्वारा अपने
रूप में स्थिर है, और अंत में विलय भी उसी ब्रम्ह में
ही होगा । इस प्रकार इस दृष्य रूप संसार की उत्पत्ति, मध्य, अवसान सभी ब्रम्ह है ।
रविवार, 6 दिसंबर 2015
सीमा निर्धारण
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि प्रत्येक रूपधारी
जीव की उत्पत्ति इस प्रकार मुझसे ही सम्भव हुई है । मैं ही इस सृष्टि की उत्पत्ति
का मूल हूँ और इसका विलय भी मुझमें ही होता है ।
शनिवार, 5 दिसंबर 2015
अपरा में परा स्थापित
आठ वर्गीय निम्नतर प्रकृति द्वारा निर्मित शरीर में उच्चतर
प्रकृति आत्मा स्थापित है । यह आत्मा शरीर की इंद्रियों, मस्तिष्क, विवेक का प्रयोग करता है जिससे
अहंकार का जन्म होता है । यह अहंकार शरीर के अंगों का प्रयोग अपनी इच्छाओं की
पूर्ति मे करता है । प्रत्येक रूप एक क्षेत्र है जिसका कि आत्मा क्षेत्रज्ञ है ।
क्षेत्रज्ञ और क्षेत्र की परस्पर क्रिया द्वारा कर्म की उत्पत्ति होती है
शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015
रूप संसार की व्याख्या
परम् ब्रम्ह इस रूप संसार का वैयक्तिक स्वामी है । उसकी इस
सत्ता में, उसकी आठ वर्गीय निम्नतर प्रकृति
जिसे कि क्षेत्र कहा जाता है और उच्चतर प्रकृति आत्मा जिसे कि क्षेत्रज्ञ कहा जाता
है. रूप धारण कर फैले हुये हैं । शरीर रूपी क्षेत्र में आत्मा रूपी क्षेत्रज्ञ
निवास करता है । इस प्रकार इस रूप संसार के समस्त रूप उस अखण्ड परम् ब्रम्ह की
निम्नतर प्रकृति द्वारा निर्मित शरीरों के ढाँचे में उसकी उच्चतर प्रकृति आत्मा के
द्वारा शोभित शरीरों के रूप में उस ब्रम्ह की अभिव्यक्ति मात्र हैं जो कि पूर्णतया
भिन्न सत्य है ।
गुरुवार, 3 दिसंबर 2015
रूप संसार
अविभाज्य परम् ब्रम्ह एक मात्र सत्य है । यह अखण्ड सत्य समस्त
रूप संसार के रूपों में आत्मा नामक अपनी उच्चतर प्रकृति द्वारा विभाजित प्रतीत
होता है । अखण्ड ब्रम्ह एक सत्य है । यह रूप संसार उसकी अभिव्यक्ति है । अभिव्यक्ति
निम्नतर सत्य है परंतु भ्रम नहीं है ।
बुधवार, 2 दिसंबर 2015
परा एवं अपरा प्रकृति
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मैंने आपको जो आठ
वर्ग के विभाजन वाली प्रकृति बतायी वह मेरी निम्न वर्गीय प्रकृति है और अब मैं
तुम्हे अपनी उच्च वर्गीय प्रकृति आत्मा को बताता हूँ जो इस रूप संसार का आधार है ।
मंगलवार, 1 दिसंबर 2015
सत्य के प्रकृति की व्याख्या
गुरू द्वारा बतायी गई सत्य की प्रकृति ही इस रूप संसार की रचना
का आधार होती है । सत्य की अव्यक्त प्रकृति के यह आठ अंग जब रूप धारण करते है तो
यह रूप संसार प्रगट होता है । परंतु यह रूप संसार मात्र सत्य की प्रकृति का प्रगट
रूप है । यह सत्य अस्तित्व नहीं है । सत्य की प्रकृति और अधिक व्यापक है ।
सोमवार, 30 नवंबर 2015
सत्य की प्रकृति
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मेरी प्रकृति का पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मस्तिष्क, विवेक और अहंकार यह आठ प्रकार का विभाजन होता है ।
रविवार, 29 नवंबर 2015
यथास्थिति की व्याख्या
इस रूप संसार में सामान्य स्थिति में प्रत्येक मनुष्य प्रकृतीय
मोंह में जीवन यापन कर रहा है । गुरू कहते हैं कि हज़ारों में कोई एक व्यक्ति होता
है जो सत्य को जानने के लिये उद्यत होता है । इन उद्यमियों में से भी ज्यादातर लोग
योग की स्थिति प्राप्त नहीं कर पाते हैं । जो लोग योग की स्थिति प्राप्त भी कर लेते
हैं वह भी मेरे सत्य स्वरूप को नहीं जान पाते हैं ।
शनिवार, 28 नवंबर 2015
यथास्थिति
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि हज़ारो में से कोई एक व्यक्ति
सत्य को जानने के लिये अपनी पूर्णता के लिये प्रयत्नशील होता है | इन प्रयत्नशील जिज्ञासुओं में से जो कोई
अपने को पूर्ण योगी बनाने में सफल भी हो जाता है, वह भी मेरे सत्य रूप को नहीं जान पाता है ।
शुक्रवार, 27 नवंबर 2015
सत्य के ज्ञान की व्याख्या
गुरू जिज्ञासु अर्जुन को आत्मा का सत्य स्वरूप तथा इस सत्य
स्वरूप का संसार की रचना के साथ कारणयुक्त सम्बंध बताने का लक्ष्य करते हैं । किसी
भी ज्ञान के जिज्ञासु के हृदय में मस्तिष्क में मात्र सत्य के निर्विकार, निरंकार, निरंजन स्वरूप से पूर्ण संतोष नहीं मिलता है इसीलिये गुरू उस
सत्य का संसार के रूपों के साथ कारण्युक्त सम्बंध भी बताने को कहे ।
गुरुवार, 26 नवंबर 2015
सत्य का ज्ञान
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि मैं तुम्हे सत्य का
ज्ञान व उस सत्य का विस्तार पूर्ण रूप से बताउँगा जिसे जानने के बाद तुम्हे इस
संसार का कोई अन्य ज्ञान जानना शेस नहीं रह जावेगा ।
बुधवार, 25 नवंबर 2015
व्यापक स्वरूप की व्याख्या
गुरू ज्ञान के जिज्ञासु अर्जुन को आत्मज्ञान तथा आत्मस्वरूप का
ब्रम्ह के साथ युत होने का उपदेश करने के उपरांत उसे और आगे ब्रम्ह का विस्तार
संसार के समस्त रूपों में बताने और अनुभव कराने के उद्देष्य से आगे उपदेश करते हैं
।
मंगलवार, 24 नवंबर 2015
व्यापक रूप
ध्यान योग का समस्त विस्तार बताने के बाद गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे हे अर्जुन अब तुम सुनो कि जो व्यक्ति योग की अवस्था में अपने को
स्थापित कर अपने मस्तिष्क को पूर्ण रूप से मेरे ध्यान में संलग्न कर मुझे जानना ही
अपना सम्पूर्ण लक्ष्य निर्धारित कर प्रयत्न करता है वह निष्चय ही मुझे जानने में
सफल होता है ।
सोमवार, 23 नवंबर 2015
व्यवहारिक स्वरूप
ब्रम्ह व्यापक दिव्य स्वत:अस्तित्व है । उसने अपने को अपनी माया
शक्ति द्वारा संसार के समस्त रूपों में विस्तृत किया है । प्रत्येक रूप में
विद्यमान उसकी ही उच्चतर प्रकृति आत्मा का यह दायित्व है कि वह अपने उद्गम के मूल
ब्रम्ह को जाने, उसकी मर्यादा के अनुकूल आचरण करे, अपने को उस ब्रम्ह के प्रतिनिधि के रूप में
प्रस्तुत करे । योग यही लक्ष्य प्राप्त करने का पथ है । इसी योग को व्यवारिक जीवन
में चरितार्थ करने के लिये समस्त विस्तार भगवद्गीता के ग्रंथकार ने इस ध्यानयोग
नामक छठे अध्याय में गुरू योगेशवर श्रीकृष्ण के उपदेश के माध्यम से प्रस्तुत किया है । यह अध्याय पूर्ण हुआ ।
रविवार, 22 नवंबर 2015
योगाभ्यास का साराँश
गुरू द्वारा योग के सम्बंध में उसके समस्त पहलुओं के उपदेश का
सार यह है कि प्रत्येक रूप में विद्यमान आत्मा और उस रूप की प्रकृति के मध्य
नियंत्रित परस्पर को स्थापित करना तथा यह सुनिश्चित करना कि इस परस्पर में आत्मा
अपने मौलिक स्वरूप में सतत् आचरण करे । यही जो कर सके वह योगी है । ब्रम्ह की ही
उच्चतर प्रकृति आत्मा है । ब्रम्ह की ही निम्नतर प्रकृति रूप की प्रकृति है । माया
भी ब्रम्ह के ही विज्ञान की शक्ति है । यह समस्त व्यूह ब्रम्ह की लीला है । उनकी
कृपा द्वारा ही कुछ भी सम्भव हो सकेगा ।
शनिवार, 21 नवंबर 2015
भक्तयोगी की व्याख्या
वह योगी जो भक्तिपूर्वक ब्रम्ह को समर्पित रहता है उसे गुरू द्वारा
सबसे प्रिय बताने का अभिप्राय यह बनता है कि योग की सकल साधना ब्रम्ह की कृपा के
अधीन ही होती है । माया इतनी प्रबल शक्तिशाली होती है कि इसे कोई काट नहीं पाता है
। इसलिये मुक्त आत्मा की स्थिति शीघ्र बनती नहीं है । इस सब उपलब्धि के लिये
ब्रम्ह की कृपा का अवलम्ब अनिवार्य होता है ।
शुक्रवार, 20 नवंबर 2015
भक्तयोगी
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि समस्त योगियों में
वह योगी जो श्रद्धापूर्वक मेरी पूजा करता है मेरी भक्ति करता है और उसकी आत्मा
सदैव मुझमें ही बसती है मैं उसे सबसे अधिक प्रिय मानता हूँ ।
गुरुवार, 19 नवंबर 2015
सर्वश्रेष्ठ की व्याख्या
ब्रम्ह को पाने के लिये जितने भी मार्ग
बताये गये हैं गुरू उन सभी की तुलना करते हैं । योगी जो अपने को ब्रम्ह के साथ युत
करता है जोडता है । ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति आत्मा हम सभी के अंदर विद्यमान है ।
आत्मा को ब्रम्ह के साथ जोडना – आत्मा में ब्रम्ह की अनुभूति करना – आत्मा का
अनुभव पाना यह योग का क्षेत्र है । तपस्वी भी उसी ब्रम्ह का अनुभव पाने के लिये
अपने को समस्त सुख से वंचित कर तपस्या द्वारा साधना करता है । ध्यान के पथ से
साधना कर ज्ञानमार्गी भी उसी ब्रम्ह का अनुभव पाना चाहता है । वेदों में वर्णित
यज्ञ क्रियाँओं द्वारा कर्मकाण्डी भी उसी ब्रम्ह का ज्ञान पाने को चेष्टारत होता
है । परंतु गुरू इन सभी में योगी को सर्व श्रेष्ठ बताते हैं ।
बुधवार, 18 नवंबर 2015
योगी सर्वश्रेष्ठ
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि योगी उनसे श्रेष्ठ
होता है जो अपने को आराम और व्यसन से वंचित कर तपस्वी है, योगी उनसे भी श्रेष्ठ होता है जो सत्य के ज्ञाता हैं, योगी उनसे भी श्रेष्ठ होता है जो
कर्मकाण्डी हैं इसलिये हे अर्जुन तुम प्रयत्नपूर्वक योगी बनो ।
मंगलवार, 17 नवंबर 2015
दृढ उद्यम की व्याख्या
गुरू द्वारा बताये गये उपदेश से प्रत्येक जिज्ञासु साधक के लिये
एक अवलम्ब मिलता है कि यदि कंचिद कमजोरियों के कारण पूर्ण सफलता इस जन्म में ना भी
मिली तो प्रयत्न नष्ट नहीं जायेगे बल्कि आगे के जन्मों में इस जन्म के प्रयत्न
सहायक होंगे और साधना सिद्धि की ओर आगे बढेगी । भगवद्गीता का संदेश यह आस्था जागृत
करने वाला है कि प्रत्येक व्यक्ति को ब्रम्ह स्वरूप तक उत्थान कराना प्रकृति का
लक्ष्य है ।
सोमवार, 16 नवंबर 2015
दृढ उद्यम
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति अपने
समस्त मानसिक विकारों को नियंत्रित करके योग की साधना में प्रयत्न करता है और
पूर्ण सफलता पाने के लिये सतत् कई जन्मों तक प्रयत्नों को ज़ारी रखता है उसे
योगावस्था की उच्चतम उपलब्धि प्राप्त होती है ।
रविवार, 15 नवंबर 2015
तुलनात्मक स्थिति की व्याख्या
गुरू द्वारा व्यक्त वेदों द्वारा ब्रम्ह का ज्ञान तथा योग
द्वारा ब्रम्ह का अनुभव की तुलनात्मक अभिव्यक्ति का अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार
किसी व्यक्ति को यदि कोई नदी पार करना है तो उसे नौका चाहिये परंतु जिस व्यक्ति ने
नदी पार कर लिया है तो उसे नौका से क्या प्रयोजन रहेगा उसी प्रकार वेद का ज्ञान
ब्रम्ह तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्थ करता है जबकि योग व्यक्ति को ब्रम्ह का
साक्षात् अनुभव करा देता है इसलिये योगी को वेद के ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है
।
शनिवार, 14 नवंबर 2015
योग का सामर्थ्य
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि व्यक्ति के पूर्व
के जन्म के योग के अभ्यास के बल से नये जन्म में प्रयत्न प्रारम्भ करने पर
प्रयत्नकाल में ही उसे ब्रम्ह का अनुभव वेद द्वारा व्यक्त ब्रम्ह के ज्ञान से अधिक
ही हो जाता है जो कि अभ्यास की पूर्णता पर इतना शक्तिशाली हो जाता है कि उस
व्यक्ति को पुन: मोंह व्याप्त होता ही नहीं है ।
शुक्रवार, 13 नवंबर 2015
सतत् प्रयत्न की व्याख्या
गुरू ने बताया कि सिद्ध योगी की स्थिति पानेके लिये सतत्
प्रयत्न करना होगा । किसी एक जन्म में व्यक्ति ब्रम्ह के साथ जो रिश्ता स्थापित
करता है और इस रिश्ते से जो बल अर्जित करता है वह मृत्यु होने पर समाप्त नहीं होता
है । व्यक्ति के अगले जन्म के प्रयत्नों का प्रारम्भ वहीं से होता है जहाँ तक
पहुँच कर पूर्व जन्म के प्रयत्न मृत्यु के कारण स्थगित हो गये थे । इन प्रयत्नो के
लिये मृत्यु कोई सीमा रेखा नहीं होती है ।
गुरुवार, 12 नवंबर 2015
पुन: अवसर का फल
योगी के कुल में जन्म का फल बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन से कहे कि सिद्ध योगी के कुल के वातावरण के प्रभाव से उस व्यक्ति द्वारा
पूर्व के जन्म में किये गये योगाभ्यास के प्रयत्नों की स्मृति पुन: जागृत हो
जावेगी और वह व्यक्ति पूर्व के जन्म में जहाँ तक योगाभ्यास में सफलता हासिल कर
चुका था वहाँ से आरम्भ करके सिद्ध की स्थिति की ओर अग्रसर होगा ।
बुधवार, 11 नवंबर 2015
पुन: अवसर का विस्तार
अर्जुन के भय के निवारण के लिये गुरू योगेश्वर श्री कृष्ण आगे
बताते हुये कहे कि उसे ऐसे योगी के कुल में जन्म दिया जायेगा जिन्हे सत्य का पूर्ण
ज्ञान प्राप्त हो गया है । हे अर्जुन ऐसे योगी के घर में जन्म पाना इस संसार में
किसी अन्य प्रयत्न से सम्भव नहीं होगा ।
मंगलवार, 10 नवंबर 2015
पुन: अवसर
अर्जुन के भय निवारण के लिये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण आगे बताये
कि यदि कोई व्यक्ति योग की स्थिति में कई वर्षों तक रहने के बाद भी विचलित हो जाता
है तो भी उसे पुन: योग अभ्यास के लिये अवसर प्रदान करने के निमित्त से उसे शुद्ध
और प्रगतिशील व्यक्ति के कुल में जन्म दिया जाता है ।
सोमवार, 9 नवंबर 2015
भयमुक्त की व्याख्या
गुरू का कथन व्यक्त करता है कि जो कार्य व्यक्ति ब्रम्ह से
युक्त होकर करेगा उस कार्य को ब्रम्ह स्वयं देख रहा है कि किस निष्ठा से वह
व्यक्ति उस कार्य को कर रहा है इसलिये असफलता की कल्पना कर के भयभीत मत होवो
ब्रम्ह सदैव न्यायपूर्ण ही करेगा । आप अपनी निष्ठा के प्रति सज़ग रहो । आप अपनी
निष्ठा को सत्य रखो ।
रविवार, 8 नवंबर 2015
भयमुक्त भविष्य
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन के मस्तिष्क में व्याप्त भय को जानने
के बाद बोले हे पार्थ जो व्यक्ति योग का पथ अपनाता है उसका ना ही इस जन्म में और
ना ही बाद के जन्मों में कोई भी अहित नहीं हो सकता है यहाँ तक कि हे मित्र जो
व्यक्ति योग का पथ अपनाता है उसे किसी दु:ख का सामना नहीं करना पडता है ।
शनिवार, 7 नवंबर 2015
भविष्य का भय : चरण 3
अर्जुन अपने मस्तिष्क का भय व्यक्त करते हुये जैसे एकदम त्रस्त
दशा का अनुभव कर कहता है हे कृष्ण कृपया मेरे मस्तिष्क में उत्पन्न हुये संदेह का
निवारण कीजिये क्योंकि आप के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है जो मेरे भय का निवारण कर
सके ।
शुक्रवार, 6 नवंबर 2015
भविष्य का भय : चरण 2
अर्जुन अपने मस्तिष्क में व्याप्त भय को आगे व्यक्त करते हुये
कहता है कि हे महाबाहो क्या ऐसा व्यक्ति जिसे योग की दशा प्राप्त होने में सफलता
नहीं मिल पाती है वह दोनो से ही वंचित नहीं रह जाता है और आत्मा प्रधान जीवन पाने
की राह में लावारिस भटकता है । क्या उसका विनाश नहीं हो जाता है ।
गुरुवार, 5 नवंबर 2015
भविष्य का भय : चरण 1
अर्जुन अपने मस्तिष्क में व्याप्त भविष्य के प्रति भय को व्यक्त
करते हुये कहता है हे कृष्ण जो व्यक्ति अपने को योग की वाँक्षनाओं के अनुरूप
नियंत्रित नहीं कर पाता है यद्यपि कि उसे आस्था है, जिसका मस्तिष्क योग की वाँक्षना के अनुरूप केंद्रित ध्यान की स्थिति
नहीं प्राप्त कर पाता है तो ऐसा व्यक्ति किस गति को प्राप्त होता है ।
बुधवार, 4 नवंबर 2015
दुष्कर परंतु साध्य
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको बताये कि
जिन व्यक्तियों को अपनी आत्मा पर नियंत्रण नहीं है उन्हे योग की अवस्था पाना
दुष्कर अवश्य होता है परंतु जिन्हे अपनी आत्मा पर नियंत्रण है वह यदि उचित पथ से
प्रयत्न करते हैं तो उन्हे योगावस्था प्राप्त होती है ।
मंगलवार, 3 नवंबर 2015
तपस्या
मनुष्य के अंदर विद्यमान सत्य अस्तित्व आत्मा जब विजातीय असत्
प्रकृति के साथ मोंह सम्बंध कर लेती है तो फलत: अस्थिरता, उद्विग्नता, अनिश्चय की मानसिक स्थितियाँ जन्म
लेती हैं । गुरू द्वारा सुझाये गये निदान, मोंह का त्याग करने में क्लेष उठाना पडता है । इसी को तपस्या कहा
जाता है । परंतु सत्य को पाने के लिये तपस्या अनिवार्य होती है ।
सोमवार, 2 नवंबर 2015
निदान की व्याख्या
प्रकृतीय मोंह का जीवन यापन करते हुये मस्तिष्क का आम अभ्यास बन
जाता है कि वह अपनी इच्छा की पूर्ति को लक्षित कर उपलब्ध सम्भावनाओं में से हल
खोजता है । इस प्रक्रिया द्वारा मस्तिष्क अपनी अशांति और उद्विग्नता स्वयं आमंत्रित
करता है । गुरू इसका सरल निदान बताये कि मोंह को त्याग दो समस्त मानसिक चंचलता
शांत हो जावेगी ।
रविवार, 1 नवंबर 2015
मुक्ति द्वारा नियंत्रण
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन की समस्या सुन कर कहे कि हे
महाबाहो मस्तिष्क की चंचल स्थिति. उद्विग्नता, जिसका जन्म मोंह से हुआ है, का नियंत्रण मोंह को काटने से ही सम्भव होगा ।
शनिवार, 31 अक्टूबर 2015
अर्जुन की समस्या की व्याख्या
प्रकृति असंख्य सम्भावनाये प्रस्तुत करती है । आत्मा का सम्बंध
उन सम्भावनाओं से नहीं होना चाहिये । परंतु प्रकृतीय मोंह से ग्रसित आत्मा उन
सम्भावनाओं में से चयन करने में संलग्न हो जाती है । इस त्रुटि के कारण ही समस्त
तनाव की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं । इसी त्रुटिपूर्ण स्थिति का अर्जुन सामना कर
रहा था ।
शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015
अर्जुन की समस्या सतत्
अर्जुन योगेश्वर को अपने मस्तिष्क की दशा बताते हुये आगे कहता
है कि मस्तिष्क अति चंचल दशा में है,
भावुकता के वशीभूत है इसे वश में करना मेरे लिये अति दुष्कर हो रहा है ।
गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015
अर्जुन की समस्या
गुरू द्वारा योग का विस्तार सुन कर अर्जुन कहा कि हे मधुसूदन
आपने बताया कि योग की स्थिति के लिये मस्तिष्क की समता की स्थिति होनी चाहिये
परंतु मैं अपने मस्तिष्क में व्याप्त व्यग्रता के कारण ऐसा महसूस करता हूँ कि समता
की स्थिति पाने के लिये मेरे पास कोई स्थिर आधार नहीं है
बुधवार, 28 अक्टूबर 2015
सनता की व्याख्या
प्रथम चरण में आत्म अनुभूति का होना पुन: आत्मा में ब्रम्ह स्वरूप
का बोध होना । इन भावो के प्रतिफल से उसे प्रत्येक स्वरूप में ब्रम्ह के विद्यमान
होने का अनुभव होने लगता है । ऐसी दशा प्राप्त होने पर व्यक्ति प्रत्येक के प्रति
आदर भाव से युक्त हो जाता है विनम्र हो जाता है । उसकी इच्छायें क्षीण हो जाती है
इसलिये वह सुख और दु:ख की अनुभूति से मुक्त हो जाता है ।
मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015
समता
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि हे अर्जुन जो व्यक्ति सभी को एक
समता के भाव से देखता है, सभी में ब्रम्ह के विद्यमान होने
की अनुभूति करता है, चाहे वह सुख में हो अथवा दु:ख में
हो एक समान ही रहता है वह व्यक्ति योगी होता है ।
सोमवार, 26 अक्टूबर 2015
ब्रम्हसमाहित की व्याख्या
गुरू का कथन व्यक्ति के मस्तिष्क के भाव से सम्बन्ध रख्ता है ।
जिस व्यक्ति के मस्तिष्क में ब्रम्हचेतना सतत् स्थिर रहती है उसका अहंकार क्षीण हो जाता है । कार्य तो वह
प्रकृति की अपेक्षानुसार करेगा ही परंतु उसे ब्रम्ह की मर्यादा का स्मरण सतत्
विद्यमान रहने से वह कर्तापन के भाव से मुक्त रहेगा और ब्रम्ह के प्रतिनिधि के रूप
में कार्य करेगा ।
रविवार, 25 अक्टूबर 2015
ब्रम्हसमाहित
योग की अवस्था प्राप्त व्यक्ति के लिये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
बतये कि जो व्यक्ति ब्रम्हके साथ युति की दशा प्राप्त कर लिया है वह व्यक्ति संसार
के समस्त रूपों में ब्रम्हको विद्यमान देखते हुये ब्रम्ह में ही जीवन यापन करता है
भले ही वह किसी कर्म में रत हो ।
शनिवार, 24 अक्टूबर 2015
सर्वव्यापी की व्याख्या
गुरू का कथन कि वह व्यक्ति न ही ब्रम्हसे बिक्षुडता है और ना ही
ब्रम्ह उस व्यक्ति को विस्मृत करता है व्यापकता का ज्ञोतक है । व्यक्ति अपने आत्म
अनुभूति को जितना ही अपना गहन अनुभव बनाता है उतना ही वह प्रत्येक रूप में ब्रम्ह
की अनुभूति से ओतप्रोत हो जाता है । व्यक्ति जितना ही अपने को प्रकृति के मोंह से
काट अपने को ब्रम्ह के ध्यान में केंद्रित करता है उतना ही उसके विचार व्यापक हो
जाते हैं ।
शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015
सर्वव्यापी
योग की स्थिति प्राप्त हो जाने पर उसके स्थायी लाभ को बताते
हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि जिस व्यक्ति को रूप संसार के प्रत्येक रूप
में ब्रम्ह का दर्शन मिलने लगता है और समस्त रूप संसार ब्रम्ह में प्रतीत होने
लगता है वह प्रतिपल ब्रम्ह के संसर्ग मे रहता है वह न ही ब्रम्ह से विछुडता है और
न ही ब्रम्ह उससे बिछुडता है ।
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015
लक्षण की व्याख्या
आत्मा का ब्रम्ह के साथ युक्त दशा योग है । यह ब्रम्ह का
साक्षात् अनुभव है । इस अनुभूति मात्र से यह भाव पैदा होता है कि प्रत्येक प्राणी
में वह ब्रम्ह साक्षात् विद्यमान है और यह समूचा रूप संसार उस ब्रम्ह में ही निहित
है । यह योग के अनुभव की ही व्यापक अनुभूति का विस्तार है ।
बुधवार, 21 अक्टूबर 2015
योगी के लक्षण
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बताये कि जिस व्यक्ति ने योग की स्थिति
प्राप्त कर लिया है उसे प्रत्येक प्राणी में ब्रम्ह विद्यमान दीखने लगता है और
प्रत्येक प्राणी उस ब्रम्ह के अंदर निहित प्रतीत होने लगता है ।
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015
फल की व्याख्या
सत्य का ज्ञान मात्र मानसिक स्तर की खोज नहीं है अपितु आत्मा की
सत्य अनुभूति होगी । योग साधना का अभ्यास व्यक्ति को इसी सत्य अनुभूति तक पहुँचाता
है । गुरू यही बताते हैं कि इंद्रियों को नियंत्रण में रखते हुये अनुशासित
मस्तिष्क को ब्रम्ह के ध्यान में केंद्रित रखने का अभ्यास करने वाला व्यक्ति
ब्रम्ह की शांति की अनुभूति करता है ।
सोमवार, 19 अक्टूबर 2015
योग का फल
योग साधना की चर्मोत्कर्ष उपलब्धि बताते हुये गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण कहे कि साधक व्यक्ति सतत् ब्रम्ह के साथ युक्त रहते हुये यह फल पायेगा
कि उसे ब्रम्ह की चिर शांति उसकी अपनी अनुभूति बन जावेगी ।
रविवार, 18 अक्टूबर 2015
योग साधना विधि : चरण 4 की व्याख्या
गुरू ने योग साधना विधि के चरण 1 में इच्छाओं का त्याग और
इंद्रियों का नियंत्रण बताया । चरण 2 में बताया कि चरण के सफलता पूर्वक क्रियांवन
पर फल के रूप में शांति की अनुभूति मिलेगी । चरण 3 में चरण 1 के प्रयत्नों की सतत्
समीक्षा के लिये बताया । अब चरण 4 में कहा कि आनंद की अनुभूति चरण 1 की सही
क्रियांवन पर आश्रित होता है ।
शनिवार, 17 अक्टूबर 2015
योग साधना विधि : चरण 4
योग साधना विधि को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे
कि साधक व्यक्ति को ब्रम्ह की चिर शांति की अनुभूति तभी मिलेगी जब उसका मस्तिष्क
पूर्णतया विषयों से मुक्त हो और उसकी बलशाली मोंह आसक्तियाँ शांत हो चुकी हों और
उसका मस्तिष्क आत्मा के चिंतन में लीन होगा ।
शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015
योग साधना विधि : चरण 3 की व्याख्या
गुरू ने योग साधना विधि के चरण 1 में बताया कि समस्त इच्छाओं का
परित्याग किया जाय तथा इंद्रियों को पूर्ण नियंत्रण में रखा जाय । अब उस चरण 1 की
स्थिति की सतत् समीक्षा की बात गुरू ने चरण 3 में कही है । निमित्त का निर्धारण करते
हुये व्याख्याकार कहता है कि एक समय स्थल पर प्रयास पूर्वक इच्छा का त्याग किया
व्यक्ति ने परंतु समयांतर से नयी इच्छा के जन्म को सम्भव पाते हुये गुरू ने सतत् समीक्षा
के लिये कहा है ।
गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015
योग साधना विधि : चरण 3
योग साधना विधि को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे
कि जो भी कारण मस्तिष्क के केंद्रित ध्यान को विचलित करते पाये जाँय उन्हे तत्काल
नियंत्रित किया जाय और मस्तिष्क को आत्मा के नियंत्रण में आत्मचिंतन में ही
निवेशित रखा जाय ।
बुधवार, 14 अक्टूबर 2015
योग साधना विधि : चरण 2 की व्याख्या
मोंह से ग्रसित व्यक्ति के मस्तिष्क की समस्त व्यस्तता इंद्रीय
वासना वस्तुओं की पूर्ति, संचय एवं रक्षा में ही रहती है तथा प्रकृतीय गुणों के अधीन कार्यों को नियोजित करने में रहती है । इसलिये गुरू के
द्वारा बताये गये चरण 1 के उपदेश यथा इच्छाओं के त्याग एवं इंद्रियों के नियंत्रण के क्रियांवन के फल से मस्तिष्क की व्यस्तता
क्षीण होगी और तत्फलम् शांति का अनुभव आयेगा और इस शांत स्थित के मस्तिष्क को
ब्रम्ह के ध्यान में व्यस्त करने का गुरू ने योग साधना के दूसरे चरण में उपदेश किया है ।
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015
योग साधना विधि : चरण 2
योग साधना विधि को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को बताये कि मस्तिष्क की अशांत स्थिति नियंत्रित होने पर साधक को शनै: शनै:
शांति का आनंद अनुभव होने लगेगा जिससे उसे एकाग्र ब्रम्ह के ध्यान में मस्तिष्क को
केंद्रित करने का लक्ष्य करना होगा ।
सोमवार, 12 अक्टूबर 2015
योग साधना विधि : चरण 1 की व्याख्या
गुरू ने योग की अवस्था पाने के लिये प्रथम अनिवार्य दशा के रूप
में सम्पूर्ण इच्छाओं का परित्याग बताया । वह इच्छायें जो इंद्रीय वासनाओं की
पूर्ति के निमित्त पैदा हुई हैं अथवा प्रकृतीय गुणों के सम्मोहन द्वारा जागृत हुई
हैं । इनके रहते मस्तिष्क ब्रम्ह की ओर अग्रसर हो ही नहीं सकता है । दूसरी
अनिवार्य दशा गुरू ने समस्त इंद्रियों को
मस्तिष्क के नियंत्रण में रखने की बतायी है । इससे साधना अवधि में नये विकार का
जन्म सम्भव नहीं होगा ।
रविवार, 11 अक्टूबर 2015
योग साधना विधि : चरण 1
योग साधना विधि बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को कहे
कि बिना किसी अपवाद के प्रत्येक इच्छा का त्याग करके मस्तिष्क द्वारा समस्त
इंद्रियों को पूर्ण नियंत्रण में रखते हुये ।
शनिवार, 10 अक्टूबर 2015
अभ्यास से शक्ति पर्यंत
गुरू ने अभी तक के उपदेश में जिज्ञासु अर्जुन को बताये गये योग
के अभ्यास का विस्तार,
योग की स्थिति प्राप्त
होने पर मिलने वाली शांति, योग की शक्ति से दु:खों का अंत
पर्यंत समस्त विस्तार बताये हैं । इन उपदेशो को स6कलित करते हुये अनुभवी
व्याख्याकार कहता है कि व्यक्ति को बिना मस्तिष्क में किसी प्रकार का अन्यथा विचार
लाये अपनी सम्पूर्ण शक्ति का निवेश कर योग का अभ्यास करना चाहिये । योगावस्था
प्राप्त होना निष्चय ही इस संसार की सर्वोच्च उपलब्धि होती है।
शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2015
योग शक्ति
ब्रम्ह के साथ एकीकृत होने के अनुभव के स्थायी स्वरूप को बताने
के उपरांत गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि इस युति को योग जानिये
और यह इस योग की महिमा है कि आप दु:खों से मुक्ति पा जाते हैं । इसलिये इस योग का, बिना मस्तिष्क में किसी अन्य विचार के लाये हुये, निश्चय पूर्वक दृढ -अभ्यास करिये ।
गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015
स्थायी उत्कर्ष की व्याख्या
गुरू द्वारा बताये गये आत्म अनुभव के मिलने पर व्यक्ति ब्रम्ह
के साथ एकीकृत महसूस करने लगता है । यह इस संसार का महानतम् अनुभव है । मोंह के
अधीन अनुभव होने वाला सुख अथवा दु:ख दोनो ही क्षणिक होते हैं, परिवर्तनशील होते हैं । ब्रम्ह के संसर्ग
का सुख चिर होता है । इस अनुभव के समान कोई दूसरा अनुभव सम्भव नहीं है ।
बुधवार, 7 अक्टूबर 2015
योग का उत्कर्ष
योग में स्थापित योगी का वृतांत और आगे बताते हुये गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि जिसके मस्तिष्क में अन्य विचार पूर्णत: शून्य स्थिति
में हो गये हों, जिसका मस्तिष्क एक मात्र विषय
आत्मा पर पूर्ण केंद्रित हो, जिसकी आत्मा ही आत्मा का नियंत्रण
करती हो और जिसकी आत्मा आत्मसुख में ही हर्षित रहती हो वह योगी योग में पूर्ण
स्थापित कहा जावेगा |
मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015
उत्कर्ष फल की व्याख्या
इंद्रीय ज्ञान अथवा मानसिक विश्लेषण द्वारा जो अनुभव व्यक्ति
ग्रहण करता है की तुलना यदि उस अनुभव से की जाय जिसे कंचिद व्यक्ति के मस्तिष्क को
समस्त ज्ञात लोक से अलग कर दिया जाय और वह मस्तिष्क केंद्रित प्रयत्नों से यह
अनुभूति ग्रहण करे कि हमारे शरीर में संचरित हो रही समस्त गति विधियों को उर्जा
कहाँ से प्राप्त हो रही है तो यह निष्कर्श निकलेगा कि पूर्व में वर्णित अनुभव
परिवर्तनशील हैं जबकि उत्तरार्ध में वर्णित अनुभव नित्य है । सही और उचित का
निर्णय जब हमारे नित्य/सत्य अनुभव पर आधारित होगा तो हम
परम् सत्य के साथ एकीकृत अनुभव करेंगे
सोमवार, 5 अक्टूबर 2015
उत्कर्ष का फल
योग की उत्कर्ष दशा का जो वृतांत गत श्लोक में गुरू ने बताया उस
दशा के प्राप्त होने पर योगी की क्या उपलब्धि होगी उसे बताते हुये गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण कहे कि जिस व्यक्ति की आत्मा आत्म-सुख में हर्षित रहेगी उसके विवेक
में इस सुख का अनुभव आयेगा क्योंकि यह सुख इंद्रीय ज्ञान सीमा के परे का होता है, और ऐसी दशा को प्राप्त योगी फिर इस सुख को
छोड किसी दूसरी कामना की ओर उन्मुख नहीं होगा ।
रविवार, 4 अक्टूबर 2015
उत्कर्ष दशा की व्याख्या
गुरू द्वारा योग की उत्कर्ष स्थिति बताने में मस्तिष्क की दशा
शांत (विचारों के स्थगन से) और केंद्रित (आत्म-चिंतन में) को विषेस महत्वपूर्ण
बताया है । यह स्थिति प्रकृति निर्मित मस्तिष्क के लिये है इसलिये अभ्यास द्वारा
प्राप्त की जाने वाली है । गुरू ने दूसरी बात कही है आत्मा द्वारा आत्मा का
नियंत्रण और आत्मा का आत्म-सुख में हर्षित रहना जो कि अनुभव के क्षेत्र के हैं ।
इस भाग को वही व्यक्ति साध्य बना सकेगा जिसे आत्मा का अनुभव प्राप्त हो गया है ।
शनिवार, 3 अक्टूबर 2015
योग का उत्कर्ष
योग में स्थापित योगी का वृतांत और आगे बताते हुये गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि जिसके मस्तिष्क में अन्य विचार पूर्णत: शून्य स्थिति
में हो गये हों, जिसका मस्तिष्क एक मात्र विषय
आत्मा पर पूर्ण केंद्रित हो, जिसकी आत्मा ही आत्मा का नियंत्रण
करती हो और जिसकी आत्मा आत्मसुख में ही हर्षित रहती हो वह योगी योग में पूर्ण
स्थापित कहा जावेगा |
शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015
अ-विचलित की व्याख्या
गुरू द्वारा बताये गये दीपक के ज्योति लौ के उदाहरण को स्पष्ट
करते हुये व्याख्याकार कहता है कि मस्तिष्क में ब्रम्हचेतना की ज्योति निर्विघ्न
बिना विचलन के दीप्तमान रहना चाहिये । ऐसी स्थिति होने पर पीछे छूटा हुआ मोंह पुन:
अवसर पाकर मस्तिष्क को आच्छादित नहीं कर सकेगा ।
गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015
अ-विचलित
पूर्ण योगी की स्थिति को और आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को कहे कि जिस प्रकार वायु संचरण से मुक्त स्थान पर दीपक की
ज्योति बिना कम्पन के निर्विघ्न एक लौ स्थापित किये जलती है उसी प्रकार योगी का
मस्तिष्क सतत् ब्रम्ह के ध्यान से युक्त अविचलित रहता है ।
बुधवार, 30 सितंबर 2015
उपलब्धि की व्याख्या
गुरू द्वारा बताये गये योग में स्थापित व्यक्ति की स्थिति की
व्याख्या करते हुये कहा गया कि अहंकार का पूर्ण समर्पण होने पर ही योग की स्थिति
पायी जा सकती है । सत्य ब्रम्ह है । आत्मा मात्र किसी कार्य विषेस के लिये किसी
विशिष्ट शरीर में स्थापित है ।
मंगलवार, 29 सितंबर 2015
मस्तिष्क पर विजय
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जिस व्यक्ति का
अनुशासित और नियंत्रित मस्तिष्क कार्य करते हुये सतत् आत्मा के ध्यान में संलग्न
रहता है उस व्यक्ति को योग में स्थापित कहा जाता है ।
सोमवार, 28 सितंबर 2015
योग की उपलब्धि
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि इस प्रकार
अनुशासित रहते हुये, नियंत्रित मस्तिष्क द्वारा जो
व्यक्ति ब्रम्ह के साथ युक्त रहते हुये कार्य करता है वह ब्रम्ह निर्वाण की शांत
दशा को प्राप्त करता है जो कि मुझमें समाहित होनेका फल होता है । वह कार्य करता है
परंतु उसके आत्मा की दशा शांत ही रह्ती है ।
रविवार, 27 सितंबर 2015
अतिकारक त्याज्य
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि योगाभ्यासी व्यक्ति
को शरीर को अतिकारक स्थितियों से बचाना चाहिये यथा अधिक भोजन, अधिक निद्रा आदि । गुरू ने उपरोक्त कथन का
विलोम भी कहा कि योगाभ्यासी व्यक्ति को संयमित भोजन तथा संयमित निद्रा का जीवन
रखते नियंत्रित मस्तिष्क द्वारा कार्य का अभ्यास करने के फल से वह योग की मर्यादा
का प्रसाद पाता है । इस योग के फल से उसके समस्त संताप का निवारण हो जाता है ।
शनिवार, 26 सितंबर 2015
योगी का कार्य
योगाभ्यासी जब पूर्णतया प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो जाता है, उसका चित्त पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाता है
तो ऐसी दशा प्राप्त होने पर उसे ब्रम्ह का शाश्वत् धर्म ग्राह्य हो जाता है । उसे
सत्य का दर्शन मिलता है । यह शाश्वत् दर्शन, दूषित करने वाले मोंह से मुक्त होने पर ही मिलता है । सत्य का
दर्शन पाने वाला योगी ब्रम्ह की शाश्वत् चिर शांति का भोग करता है । वह कार्य तो
करता है परंतु उसकी आत्मा अविचलित शांति स्थिति में कायम रहती है । इस स्थित का
उदाहरण कमल के पत्ते से दिया जाता है जो पानी में रहते हुये भी पानी से अछूता रहता
है ।
शुक्रवार, 25 सितंबर 2015
योग : मर्यादा की स्थापना
आत्मा अपने मौलिक स्वरूप में पूर्णतया प्रकृति से अछूती रहती है
। परंतु प्रकृति के मध्य रहते, प्रकृति के गुणो का भोग करते वह
मोंह आसक्ति जनित कर लेती है । यत्न द्वारा आत्मा को आच्छादित मोंह से मुक्त करना
तथा इसे अपने मौलिक स्वरूप में पुनर्स्थापित करना मर्यादा की स्थापना है । योग खोई
हुई मर्यादा की पुनर्स्थापना है ।
गुरुवार, 24 सितंबर 2015
एकाग्रता
गुरू ने ध्यान योग की विधि बतायी । पुन: ध्यान योग के अभ्यास
काल में सम्भावित बाधाओं तथा उन बाधाओं से बचने के उपाय बताये । लक्ष्य प्राप्ति
के दो अंग है । पहला आत्मा को उस पर आच्छादित मोंह से उबार कर उसे उसके मौलिक
स्वरूप में वापस लाना दूसरा प्रकृति जो कि अपने गुणॉं तथा आकर्षणों से युक्त रहकर
आत्मा को अपने सत्य मौलिक स्वरूप से विचलित कर उसे दूषित करने के लिये सदैव
उपस्थित रहती है से आत्मा को रक्षित रखना । सत्य का चिंतन ध्यान व उसका अनुभव पाने
के लिये एकाग्र मस्तिष्क अनिवार्य वाँक्षना होती है ।
बुधवार, 23 सितंबर 2015
गुरू का उपदेश
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जो व्यक्ति शांत
प्रसन्न मुद्रा में किसी भी प्रकार का भय न रखते हुये तथा दृढता से लैंगिक सम्भोग
को वर्जित रखते हुये अपने मस्तिष्क को पूर्ण वश में करके ब्रम्ह का ध्यान करता
है और ब्रम्ह के ज्ञान के लिये पूर्ण समर्पित रहता है उसे सफलता मिलती है ।
मंगलवार, 22 सितंबर 2015
धर्मदर्शन में मान्यता
हिंदू धर्म दर्शन में ब्रम्हचर्य का पालन अनेको प्रसंगो में
अनिवार्य बताया गया है । इंद्र 101 वर्षों पर्यंत ब्रम्हचर्य का पालन करते हुये
तपस्या करके ब्रम्हाजी के पास आये तब ब्रम्हाजी ने इंद्र को सत्य के दर्शन कराये । ज्ञान
प्राप्ति के लिये इस ब्रम्हचर्य को महत्वपूर्ण बताते हुये इसे पालन करने को कहा
गया है । अन्य धर्मों में भी ज्ञान प्राप्ति के लिये ब्रम्हचर्य को पालन करने को
अनिवार्य बताया गया है ।
सोमवार, 21 सितंबर 2015
ब्रम्हचर्य
ब्रम्हचर्य की परिभाषा करते हुये कहा गया है कि व्यक्ति के
विचार में, बचन में व क्रिया में साथ ही
प्रत्येक काल में प्रत्येक स्थान पर लैंगिक सम्भोग से वंचित रहना ब्रम्हचर्य होता
है ।
रविवार, 20 सितंबर 2015
नियंत्रण
गुरू ने योगावस्था प्राप्त करने के लिये जिज्ञासु को समस्त
इंद्रियों, मस्तिष्क, पूर्व जीवन की स्मृतियों आदि सभी को नियंत्रित तथा अनुशासित
रखने के लिये उपदेश किया है । वास्तविकता में योग अनुशासन की स्थापना है । अनुशासन
नियंत्रण द्वारा ही स्थापित हो सकता है । इस प्रक्रिया के ठीक विपरीत प्रकृति के
प्रति मोंह आत्मा का अनियंत्रित अनुशासन विहीन आचरण होता है ।
शनिवार, 19 सितंबर 2015
चित्तशुद्धि
आत्मा की प्रधानता का जीवन पानेके लिये प्रकृतीय मोंह के जीवन
का त्याग अपरिहार्य आवश्यकता होती है । अभ्यासी का पूर्व का समस्त जीवन प्रकृतीय
मोंह का ही रहा होता है । इसलिये विगत जीवन की स्मृतियों का त्याग । चित्तशुद्धि ।
स्मृतियों के संचय को ही चित्त कहा जाता है । इसी चित्तशुद्धि के लिये ही गुरू ने
उपाय सुझाये, फल की कामना बिना किये कर्म को
करने का अभ्यास, अपने मस्तिष्क और इंद्रियों को
नियंत्रित रखना आदि । प्रकृति आत्मा को चित्त के मार्ग से ही अपने मोंह में आकर्षित
करती है ।
शुक्रवार, 18 सितंबर 2015
विद्वानो का मत : 3
विद्वान दार्शनिक एवं सत्यदर्शी प्लूटो का मत है कि हमें सत्य
के ज्ञान की आवश्यकता इसलिये है कि हम अपने मानसिक स्तर को इतना ऊँचा उठा सके कि
समस्त अच्छाई जानने की हममें क्षमता जागृत हो सके । इस सत्य के ज्ञान के लिये हमें
एकांत शांत स्थान पर शांत अंत:करण द्वारा उस सत्य को जानने के लिये एकाग्र
प्रयत्न करने की आवश्यकता होती है ।
गुरुवार, 17 सितंबर 2015
विद्वानो का मत : 2
विद्वान सत्यदर्शी शंकर का कहना है कि सत्य के ज्ञान के
जिज्ञासु के लिये जिन गुणों की आवश्यकता हैं वह हैं – सत्य और प्रकृति के मध्य भेद
का स्पष्ट विवेक व दृष्टि, किये जाने वाले दायित्व के कर्मों
के कर्मफल के प्रति जिज्ञासा का ना होना,
आत्म नियंत्रण और सत्य के ज्ञान के लिये प्रबल जिज्ञासा ।
बुधवार, 16 सितंबर 2015
विद्वानो का मत : 1
विद्वान सत्यदर्शी दार्शनिक पाइथागोरस से यह पूँछे जाने पर कि
आप अपने को दार्शनिक क्यों कहते हैं के उत्तर में उन्होने एक दृष्टांत के माध्यम
से अपने को व्यक्त किया था । उन्होने कहा कि मनुष्य का जीवन ओलम्पिक खेलों के समान होता है
जहाँ पूरे संसार के लोग खेलगाँव एकत्रित होते हैं । कुछ लोग वहाँ व्यवसाय करके
आनंदित होते हैं, कुछ स्पर्धाओं की होड में व्यस्त
रहते हैं और कुछ लोग मात्र सभी कुछ हो रहे के दृष्टा होते हैं । दार्शनिक उपरोक्त
अंतिम श्रेणी का होता है । दार्शनिक अपने को आवश्यकताओं और समस्याओं से परे रखता
है ।
मंगलवार, 15 सितंबर 2015
अभ्यास का विस्तार
सर्वोच्च सत्य जिसका अस्तित्व ज्ञान के लिय उपलब्ध इंद्रियों, मस्तिष्क और विवेक की सीमा के परे का है के
स्वरूप की धारणा स्थापित करना तथा अनुभव प्राप्त करने का लक्ष्य लेकर किये जा रहे
प्रयत्नों में उद्यमी व्यक्ति को अपने अंत:करण में उठने वाली सूक्ष्मतम स्थितियों
का अध्ययन करना अपेक्षित होगा । यह अनुभूति क्या होगी इसे निश्चय पूर्वक कोई भी
नहीं बता सकता है । यहाँ तक कि अनुभूति होने पर स्वयँ वह व्यक्ति भी नहीं बता
सकेगा । परंतु गुरू का कहना है कि इस अभ्यास द्वारा आत्मा जो कि प्रकृतीय मोंह में
बँधी हुई है उसे मुक्ति मिलेगी ।
सोमवार, 14 सितंबर 2015
ध्यानयोग की व्याख्या
परम् सत्य जो कि इंद्रियों, मस्तिष्क एवं विवेक के ज्ञान क्षेत्र के
परे का स्वत: अस्तित्व है का ध्यान करने और अनुभूति को अपनी धारणा में स्थापित
करने के लिये व्यक्ति को इस नश्वर परिवर्तनशील संसार के समस्त सम्बंधों से अपने को
अलग करने की अनुशंसा की गुरू ने । मस्तिष्क में संचित पूर्व के सम्बंधों से भी
अपनी रक्षा करने की अनुशंसा की गुरू ने । साधना काल में सम्भावित विघ्नों का ध्यान
कर गुरु नें इंद्रियों को नियंत्रण में करने की वाँक्षना बतायी है ।
रविवार, 13 सितंबर 2015
ध्यानयोग
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि
एक शांत एकांत स्थान पर पवित्र आसन पर बैठकर अपने स्मृति के संचित विचारों तथा
इंद्रियों को अपने पूर्ण नियंत्रण में रखते हुये अपने मस्तिष्क को एकल ब्रम्ह के
ध्यान में संलग्न कर अपनी आत्मा की शुचिता के लिये योग का अभ्यास करना चाहिये।
शनिवार, 12 सितंबर 2015
सत्य का परिचय
भगवद्गीता में वर्णित गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण के उपदेशों का लक्ष्य है कि प्रत्येक व्यक्ति ब्रम्ह का अनुभव स्वयं कर
सके । सत्य हम सभी के अंत:करण में विद्यमान है । इस सत्य को जानने के लिये हमें
किसी अन्य सत्य की सहायता की आवश्यकता नहीं है । मात्र जो आवरण उस सत्य को ढके
हुये है उसे हटाना है । सत्य को ढकने वाला आवरण असत्य है । यह असत्य हमारे ज्ञेय
क्षेत्र का है । उस असत्य के प्रति हमें भ्रामक मोंह बाँधे हुये है । मोंह इस शरीर
से, मोंह इसके व्यसन से यह सभी नश्वर
है । मृत्यु अपरिहार्य है । परंतु फिर भी हमारे सारे प्रयत्न इसी शरीर के सुख आराम
के लिये ही हैं । यह मोंह कंचिद कटेगा तो सत्य सम्मुख ही मिलेगा ।
शुक्रवार, 11 सितंबर 2015
एकीकृत
ब्रम्ह के साथ एकीकृत । जीवन के सभी छोटे बडे कार्यों को करने
में अपनी आत्मा को ब्रम्ह के साथ एकीकृत रखना योगी का लक्ष्य होता है । कार्यों की
कर्ता प्रकृति होती है । कार्यों का प्रेरक आत्मा होती है । आत्मा इंद्रियों, मस्तिष्क, और विवेक के ज्ञेय क्षेत्र से परे होता है । इसलिये आत्मा की
यथास्थिति उसके द्वारा प्रेरित कर्म की गुणवत्ता द्वारा ही पता लगती है । यदि
आत्मा कार्य के निमित्त तथा कार्य के फल से सम्बंध न रखते हुये मात्र उसके प्रेरण को अपने दायित्व के रूप में सम्बंध रखती है तो उसका आचरण धर्मवत है । यही स्थिति हासिल करने के
लिये आत्मा को ब्रम्ह के भाव से एकीकृत रखना योगी का लक्ष्य होता है । इसी का
अभ्यास योगाभ्यास है ।
गुरुवार, 10 सितंबर 2015
हृदय
धर्म के प्रकरण में हृदय – concept – धारण को कहा जाता है । ज्ञान की ग्राह्यता
सर्वप्रथम धारणा में ही होती है । ब्रम्ह जो कि इंद्रियों, मस्तिष्क और विवेक की सीमा से परे का अस्तित्व होता है उसके
ज्ञान के लिये उसकी धारणा स्थापित करना एक दुर्गम लक्ष्य होता है । इसमें पूर्व के
ज्ञान अथवा अनुभव सहायक नहीं होते हैं । धारणाशून्य स्थिति सहायक हो सकती है ।
ब्रम्ह स्वयं ही जिज्ञासु को अपना अनुभव करा देगा । इसी स्थिति को भक्ति पथ में
विश्वास कहा जाता है ।
बुधवार, 9 सितंबर 2015
यतचित्तात्मा
गुरू द्वारा बताये गये योगाभ्यास को व्यक्त करने में भगवद्गीता
के अज्ञात् ग्रंथकार ने इस शब्द का प्रयोग किया है- यतचित्तात्मा । चित् अर्थात
स्मृति आत्मा और स्मृति एकीकृत । मानसिक एकाग्रता का विचलन स्मृति से प्रारम्भ
होता है । इसलिये गुरू ने कहा कि ब्रम्ह के चिंतन काल में मानसिक एकाग्रता को
बनाये रखने के लिये जिज्ञासु साधक को चित्त को आत्मा के नियंत्रण में रखना होगा ।
मंगलवार, 8 सितंबर 2015
सतत् अभ्यास
गुरू द्वारा बताये गये योग की अभ्यास विधि में सतत् अभ्यास को
भी केंद्रित मस्तिष्क के सदृष्य ही बल दिया गया है । प्राचीन अभ्यास को छोड नये
अभ्यास को ग्रहण करने के लिये सतत् अभ्यास महत्वपूर्ण है । ऐसा करने से योग
मस्तिष्क की आम क्रिया पद्धति बनेगी ।
सोमवार, 7 सितंबर 2015
केंद्रित मस्तिष्क
गुरू द्वारा बताये गये योग अभ्यास विधि में केंद्रित मस्तिष्क
के लिये बल दिया गया है । इससे साधक की सम्पूर्ण ऊर्जा एक प्रयोजन विषेस के लिये
प्रयोज्य हो जाती है । एकाग्र केंद्रित मस्तिष्क से स्वच्छ निर्मल विवेक जागृत होता
है । निर्मल विवेक के फल से हम योग के अभ्यास के लिये तत्पर होते हैं । योग के साधना
द्वारा, हम प्रयोग और प्रयोग के परिणामों
पर आधारित जीवन को उच्चस्तरीय सत्य पर आधारित जीवन में उन्नति के लिये अपने को
सक्षम बनाते हैं ।
रविवार, 6 सितंबर 2015
अभ्यास विधि की व्याख्या
व्याख्याकार गुरू द्वारा बताये गये योगाभ्यास विधि का विस्तार
बताते हुये कहता है कि सामान्य जीवन यापन में प्रत्येक व्यक्ति भौतिक सुखों एवं
वासना वस्तुओं को प्राप्त करने एवं संचय करने के प्रयत्नों में व्यस्त रहता है ।
इस व्यस्तता के कारण उसका मस्तिष्क ब्रम्ह के प्रति अचेत दशा में रहता है । इसलिये
गुरू उपदेश किये कि अपने विवेक को ब्रम्ह के ध्यान में केंद्रित करें ।
शनिवार, 5 सितंबर 2015
अभ्यास विधि
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण योग की अवस्था प्राप्त करने के लिये
उपाय बताते हुये कहे कि योग के लिये प्रयत्नशील व्यक्ति को अपने को पूर्ण नियंत्रण
में एकाग्र रखते हुये सतत् अपने विवेक को परम् ब्रम्ह पर केंद्रित रखने का अभ्यास
करना चाहिये ।
शुक्रवार, 4 सितंबर 2015
उपलब्धि : लक्षण 3
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को, योगावस्था प्राप्त दशा के
व्यक्ति के लक्षणों को बताते हुये कहे कि वह व्यक्ति "शत्रु और मित्र" के मध्य रहते हुये, उन व्यक्तियों के मध्य जो “उदासीन और
निष्पक्ष हैं” रहते हुये, उन व्यक्तियों के मध्य जो “घृडित
और सम्बंधित हैं” रहते हुये भी समभाव का आचरण करता है ऐसे व्यक्ति के कार्य में
कोई त्रुटि नहीं होती है । उसके कार्य सदा दोष मुक्त होते हैं ।
गुरुवार, 3 सितंबर 2015
योगावस्था की व्याख्या
एक योगी प्रति पल अपने को इस परिवर्तनशील संसार के परोक्ष में
विद्यमान अपरिवर्तनीय सत्य के साथ युक्त रखता है | अपने को उससे जोडे हुये रहता है ।
इसलिये उसे इस संसार में प्रतिपल हो रहे परिवर्तनों के द्वारा किसी प्रकार का
मानसिक विक्षेप नहीं होता है ।
वह उस अपरिवर्तनीय सत्य की चिर सत्यता में स्थिर रहता है ।
बुधवार, 2 सितंबर 2015
उपलब्धि : लक्षण 2
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस व्यक्ति की
आत्मा ज्ञान (मौलिक ब्रम्ह स्वरूप) विज्ञान (ब्रम्ह और प्रकृति के मध्य भेद) सतत्
धारण किये हुये रहती है और जिसे अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण है ऐसे व्यक्ति
के लिये एक मिट्टी के टुकडे, एक पत्थर के टुकडे और एक सोने के टुकडे
में कोई अंतर नहीं होता है ।
मंगलवार, 1 सितंबर 2015
उपलब्धि: लक्षण 1
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस व्यक्ति की
आत्मा इंद्रीय वासना वस्तुओं और प्रकृतीय गुणों के प्रति मोंह और अरुचि से मुक्त
होकर मौलिक ब्रम्ह स्वरूप में स्थिर हो जाती है, उसे सांसारिक द्वैत के विषय, सुख और
दु:ख की अनुभूति नहीं करा पाते है और वह सतत् चिर शांति की अनुभूति करता है ।
सोमवार, 31 अगस्त 2015
योगावस्था
योग शब्द का अर्थ होता है युक्त होना । परम् ब्रम्ह के साथ
युक्त होना लक्ष्य होता है । ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति आत्मा हम प्रत्येक के अंदर विद्यमान
होती है । परंतु यह आत्मा मोंह और अरुचि धारण करके त्रुटिपूर्ण हो जाती है }
योग द्वारा इस त्रुटिपूर्ण आत्मा को मोंह और अरुचि से मुक्त कराकर उसके मौलिक
ब्रम्ह स्वरूप में वापस पहुँचाना है । योगावस्था में कार्य का अभ्यास पथ है ।
रविवार, 30 अगस्त 2015
उपदेश का लक्ष्य
ब्रम्ह की निम्नतर-प्रकृति को प्रकृति कहा गया है । ब्रम्ह की उच्चतर
प्रकृति आत्मा है । यह ब्रम्ह का विज्ञान
है कि स्वतंत्र आत्मा परवश प्रकृति का दास बन जाता है । विडम्बना यह कि आत्मा का
मोंह उत्तरोत्तर बढता जाता है । गुरू समस्त स्थिति का ज्ञाता है । वह भ्रमित आत्मा
के उत्थान के लिये उपदेश द्वारा उसके अज्ञान का उसे बोध करता है और प्रेरित करता
है कि वह उत्थान के पथ पर अग्रसर होवे ।
शनिवार, 29 अगस्त 2015
मित्रवत् और शत्रुवत् की व्याख्या
शरीर की रचना दो भिन्न अवयवों प्रकृति और आत्मा के संयोग से
हुई है । आत्मा उच्च स्तरीय होता है । प्रकृति गुणों की धारक होती है । आत्मा
भ्रमवश प्रकृतीय गुणों में आसक्त हो जाती
है । परिणामत: अपनी मौलिक स्वतंत्रता खो बैठती है । कंचिद यदि गुरू के उपदेश के
प्रभाव से मोंह ग्रसित आत्मा अपने को मोंह से मुक्त करने को सचेष्ट होती है तो
यह उसका मित्रवत् आचरण होगा । अन्यथा की स्थिति में मोंह बढते जावेंगे । यह
शत्रुवत् आचरण होगा ।
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