सन्जय धृतराष्ट्र
से आगे कहता है कि जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी पार्थ (अर्जुन) हैं, मुझे लगता है कि
श्री (सौभाग्य), विजय, कल्याण और नीति
भी अवश्य वहीं रहेगी ।
इस प्रकार ‘सन्यास द्वारा
मोक्ष’ नामक अठारहवां
अध्याय पूर्ण हुआ ।
सन्जय धृतराष्ट्र
से आगे कहता है कि जब जब मैं हरि (कृष्ण) के उस अत्यन्त आश्चर्यजनक विराट रूप को
याद करता हूँ, तो मुझे बहुत
विस्मय होता है, मैं बार-बार
पुलकित हो उठता हूँ ।
सन्जय धृतराष्ट्र से आगे कहता है कि हे महाराज, मैं केशव (कृष्ण)
और अर्जुन के इस अद्भुद और पवित्र संवाद को बारम्बार स्मरण करके आनन्द से पुलकित
हो रहा हूँ ।
सन्जय ने
धृतराष्ट्र से आगे बताते हुये सन्जय ने कहा कि व्यास की कृपा से मैंने स्वयं इस
परम् रहस्यपूर्ण योग को साक्षात योगेश्वर कृष्ण द्वारा उपदेश देते हुये सुना है ।
सन्जय ने
धृतराष्ट्र से बताया कि इस प्रकार मैंने वासुदेव (श्रीकृष्ण) और महान् आत्मा वाले
पार्थ (अर्जुन) के मध्य हुये इस आश्चर्यजनक संवाद को सुना है, जिससे मेरे
रोंगटे खडे हो गये हैं ।
अर्जुन का युद्ध
करने के निश्चय,
में निहित
हैं दो अवयव,
पहला उसके अपने पूर्व
के अपने सन्कल्प का समर्पॅण और दूसराप्रकृति के आदेश को शिरोधार्य करने का
निश्चय है । व्यक्ति के सन्कल्प को भी गुरू के उपदेश में नकारा गया है । प्रकृति के
आदेश को शिरोधार्य करने की गुरू के उपदेश में अनुशंसा की गई है । इस प्रकार अर्जुन
ने जो युद्ध करने का निश्चय किया वह गुरू के उपदेश को शिरोधार्य करने के फल से सम्भव
हुआ है ।
अर्जुन ने ज्ञान
के उपदेश के फल से, नीयत कर्म अर्थात् प्रकृति द्वारा आदेशित कर्म को करने का
निश्चय किया । उपदेश के पूर्व इसी कर्म को करने से अर्जुन विमुख होने का निश्चय कर
रहा था । एक निश्चय और अनिश्चय की परिधि में था । गुरू के उपदेश से अर्जित हुई
मानसिक शक्ति द्वारा, जागृत हुये विवेक से वह एक निश्चयात्मक निर्णय को करने में
समर्थ हुआ ।