हिंदू धर्म के सम्पूर्ण ग्रंथों में
केवल भगवद्गीता के ग्रंथकार नें इस शब्द का प्रयोग मात्र एक अवसर पर ही किया है ।
इस शब्द का अर्थ है “नियंत्रण करने वाली शक्ति” । नियंत्रक शक्तियाँ अनेक बतायी
गयी हैं परंतु “समय” सर्वाधिक शक्तिमान नियंत्रक होता है । प्रत्येक रूप एवं घटना
का नियंत्रक “समय” है ।
बुधवार, 30 नवंबर 2016
मंगलवार, 29 नवंबर 2016
प्रहलाद
प्रहलाद को दैत्यों के राजा हिरण्य
कष्यप का पुत्र बताया गया है । यह दैत्यों के वन्श परम्परागत स्वभाव के विपरीत
भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे । यहाँ तक कि अपने पिता राजा के आदेशों के विरुद्ध
एवं राजा के द्वारा उत्पन्न की गई अनेक यातनाओं को भोगते हुये भी यह अपनी विष्णु
भक्ति को सतत् ज़ारी रखे हुये थे । भगवद्पुराण में इनकी प्रचुर कथायें वर्णित है ।
इन्हे भक्ती का आदर्ष माना जाता है ।
सोमवार, 28 नवंबर 2016
दैत्य
हिंदू धर्ममें दैत्य असुरों के
समुदाय का दानवों के समान एक वर्ग है । इन्हे माता दिती और पिता कष्यप ऋषि की
संतान बताया जाता है । असुरों के दैत्य वर्ग और देवताओं के मध्य युद्ध के वृतांत
पुराणों में वर्णित हैं । इन युद्धों का कारण आपसी द्वेष बताया गया है क्योंकि
देवता इनके भाई तुल्य हैं ।
रविवार, 27 नवंबर 2016
रूप विस्तार : चरण 10
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि दैत्यों में मैं प्रहलाद हूँ,
नियंत्रण करने वालों में मैं काल हूँ,
पशुओं में मैं पशुओं का राजा शेर हूँ,
पक्षियों में मैं विनत का पुत्र गरुण हूँ ।
एक संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
शनिवार, 26 नवंबर 2016
यम
वेदों में जीव कोटि के पहले मरने
वाले को “यम” कहा गया है । मृतको में प्रथम होने के कारण यह मृतको के राजा हुये ।
एशिया के पूर्वी भागों में “यम” को मृतलोक के शासक के रूप में माना जाता है जो कि
मृतक होने वाले व्यक्तियों के कर्मों के न्यायिक परीक्षक होते हैं और नरक के देवता
हैं ।
शुक्रवार, 25 नवंबर 2016
वरूण
हिदू धर्म में जल के देवता को
“वरुण” कहा गया है । इन्हे जल के साम्राज्य के शासक के रूप में बताया गया है । यह
समुद्र साम्राज्य के अधिपति है ।
गुरुवार, 24 नवंबर 2016
नागा
भारतवर्ष के उत्तर पूर्व भाग में
बसने वाले अनेक कबीलों के समुदाय के लोग जो वस्त्र धारण नहीं करते हैं को नागा कहा
जाता है । परम्परा के अनुसार ये योद्धा वर्ग के लोग हैं जिन्हे अति-प्राचीन काल
में क्षत्रीय/योद्धा बताया जाता था ।
बुधवार, 23 नवंबर 2016
रूप विस्तार चरण 9
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से प्रगट
करने वाले स्वरूपों की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
बताये कि नागाओं में मैं अनंत हूँ,
जल में रहने वालों में मैं वरुण हूँ दिवंगत हुये पूर्वजों में मैं आर्यमा हूँ, कानून और व्यवस्था के रक्षकों में मैं यम
हूँ ।
एक संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
मंगलवार, 22 नवंबर 2016
वसुकी
नाग साँपों के राजा का नाम है
“वसुकी” । हिंदू धर्ममें साँपों के राजा को “वसुकी” बताया गया है । इनके मस्तक पर
एक मणि होती है जिसे नागमणि कहते हैं । इनकी बहन नाग का नाम “मनसा” बताया गया है
और वह भगनान शिव-शंकर के गले पर वास करती हैं ।
सोमवार, 21 नवंबर 2016
कंदर्प
उत्तम पुत्र उत्पन्न करने के लिये
उत्पन्न हुई काम वासना को कंदर्प बताया गया है । हिंदू धर्म में काम वासनाओं के
देवता “कंदर्प” ।
रविवार, 20 नवंबर 2016
कामधेनु
वेद ग्रंथों में इसे “सुरभि” देवी
के रूप में बताया गया है । हिंदू धर्ममें मान्यता है कि यह पवित्र गाय व्यक्ति की
समस्त इच्छाओं की पूर्ति का वरदान देने वाली दैवीय शक्ति है । कामधेनु को अम्बिका
के रूप में एक देव गाय के रूप में इसे सभी गायों की माता स्वरूप माना गया है । यह
अपनी पौत्री नंदिनी की भाँति अपने भक्तों को इच्छापूर्ति का वरदान देती है ।
शनिवार, 19 नवंबर 2016
बज्र
बज्र संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका
अर्थ होता है “अविध्वंसनीय” तथा “अविनष्टनीय”। इस शब्द का धार्मिक प्रयोजनों में
एक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया जाता है विषेसतया ऐसे प्रयोजनों जहाँ ग्रहणकर्ता
वस्तु को किसी बाह्य बाधा से रक्षित करना लक्ष्य होया है । वस्तु की रक्षा के
लिये अविध्वंसनीय तथा अविनष्टनीय अस्त्र ।
शुक्रवार, 18 नवंबर 2016
रूप विस्तार चरण 8
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से प्रगट
करने वाले रूपों की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये
कि अस्त्रों में मैं बज्र हूँ, गायों में मैं कामधेनु हूँ, संतान उत्पन्न करने वालों में मैं कंदर्प
हूँ, सर्पों में मैं वसुकी हूँ ।
एक संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
गुरुवार, 17 नवंबर 2016
उच्चश्रवा
हिंदू धर्मदर्शन में उच्चश्रवा उस
दैविक घोडें का नाम है जिसके दो पंख भी थे । इसके अधिपति इंद्र हैं । यह पूर्ण
सफेद है । यह विश्व का सबसे तेज़ रफ्तार से दौडने वाला घोडा है । इसका उद्भव
समुंद्र मंथन में हुआ था जिसे देखते ही इंद्र ने इसे ले लिया था । तबसे ही इंद्र
इसके स्वामी हैं ।
बुधवार, 16 नवंबर 2016
रूप विस्तार चरण 7
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनसे
कहे कि घोडों में मैं उच्च्श्रवा हूँ जिसका जन्म अमृत से हुआ है, राजसी हाँथियों में मैं ऐरावत हूँ, मनुष्यों में मैं राजा हूँ ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप
के प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना
आपकी पूर्णता है ।
मंगलवार, 15 नवंबर 2016
कपिला
वैदिक संत कपिला “साँख्य दर्श” के
प्रवर्तक विद्वान हैं । “साँख्य दर्शन” का प्रादुर्भाव कपिला मुनि से सम्भव हुआ है
। हिंदू धर्म में मान्यता प्राप्त छ: धर्मदर्शन में “साँख्य दर्शन” एक है ।
भगवद्पुराण में कपिला मुनि का प्रचुर उल्लेख मिलता है । यह महानतम् विद्वान संत थे
।
सोमवार, 14 नवंबर 2016
चित्ररथ
गंधर्वों के राजा थे चित्ररथ ।
महाभारत में अर्जुन और चित्ररथ के युद्ध का वृतांत है । भगवद्पुराण में चित्ररथ और
नारद मुनि के एक साथ गायन के वृतांत है । चित्ररथ का शाब्दिक अर्थ सूर्य बताया गया
है । अलग अलग देश में अलग अलग धर्मों में चित्ररथ के अलग अलग अर्थ बताये गये हैं ।
रविवार, 13 नवंबर 2016
गंधर्व
हिंदू धर्मदर्शन में गंधर्व को एक
अलग प्रकार के जीव के रूप में बताया गया है जो कि केवल स्वर्ग लोक में ही पाये
जाते हैं । बौद्ध धर्म में भी इन्हे इसी मान्यता से जाना जाता है । महाभारत में
अर्जुन और गंधर्वों के मध्य युद्ध का वृतांत मिलता है । प्रतिभावान गायको को भी
गंधर्व कहा जाता है । हिंदू धर्म में प्रचलित अनेकों विवाह पद्धतियों में “गंधर्व
विवाह” भी एक पद्धति है ।
शनिवार, 12 नवंबर 2016
नारद
वेदों में वर्णित संत देवऋषि नारद
को ब्रम्हा का पुत्र बताया गया है । इन्होने विवाह नहीं किया था । यह ऐसे संत थे
जिन्हे कि इस विनाशहील संसार से ज़रा भी मोंह नहीं था । “नारद भक्ति सूत्र” इनका
रचा हुआ ग्रंथ है जो कि ईश्वर प्रेम के क्षेत्र में एक मानक ग्रंथ है । भक्ति
द्वारा ईश्वर प्राप्ति का पथ जानना है तो व्यक्ति को अध्ययन एवं अनुसरण करना होगा
“नारदभक्ति सूत्र” में व्यक्त पथ । नारद पुराण 18 पुराणों में से एक है ।
शुक्रवार, 11 नवंबर 2016
अस्वथा
अस्वथा वह पवित्र वृक्ष है जिसके
नीचे बैठ गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था । बताया जाता है कि इस वृक्ष की जडें
ऊपर की ओर हैं और शाख तथा पत्तियों का विस्तार नीचे की ओर है । ऊपर की ओर जडों का
होना यह विदित करता है कि इस संसार की रचना अज्ञात ब्रम्ह द्वारा सम्भव हुई है । इस
वृक्ष को ज्ञान वृक्ष भी कहा जाता है ।
गुरुवार, 10 नवंबर 2016
जपयज्ञ
ब्रम्ह का ध्यान । ध्यान की
प्रक्रिया में साधक व्यक्ति अपने मस्तिष्क को अभ्यास का अवसर प्रदान करता है ।
अभ्यास अपने अंत:करण में स्थित उस परम् सत्य की क्षवि को अनुभव करने का जिसके
प्रसाद से साधक का अस्तित्व है । ध्यान की दशा में केंन्द्रित मस्तिष्क अन्य
सांसारिक विषयों से मुक्त दशा में होने से शांति की अनुभूति करता है ।
बुधवार, 9 नवंबर 2016
रूप विस्तार चरण 6
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनसे
कहे कि मैं सभी वृक्षों में अस्वथा हूँ,
मैं देव ऋषियों में नारद हूँ, गंधर्वोमें मैं चित्ररथ हूँ, सिद्ध पुरुषों में मैं कपिल हूँ ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।
मंगलवार, 8 नवंबर 2016
यज्ञ में अर्पण
ब्रम्ह को अर्पण । ब्रम्ह की उपासना
की प्रक्रिया में ब्रम्हको अर्पित करना । उपासक व्यक्ति अपने आराध्य को, अपनी प्रिय निधि को श्रद्धाभाव से अर्पित
करता है । यज्ञरूपी ब्रम्ह को अर्पित की जाने वाली निधि भी ब्रम्ह स्वरूप ही होती
है और ब्रम्ह को अर्पण करने वाला व्यक्ति भी ब्रम्ह का ही रूप होता है ।
सोमवार, 7 नवंबर 2016
“ॐ”
धर्म के क्षेत्रमें “ॐ” शाश्वत्
ध्वनि है । इसे आत्मप्रतीक के रूप में प्रयोगकिया जाता है । यह एक मंत्र है । इस
मंत्र की मान्यता हिंदू धर्म, जैनधर्म और बौद्धधर्म में एक समान
है ।
रविवार, 6 नवंबर 2016
भृगु
महर्षि भृगु सप्त ऋषियों में से एक
थे । महर्षि भृगु अनेक प्रजापतियों में से एक थे । प्रजापति इस सृष्टि की रचना
करने में ब्रम्हा के सहायक थे । भृगु ज्योतिष शास्त्र अर्थात् भविष्तको जानने की
विद्या के उद्भवकर्ता ऋषि हैं । इनकी रचना भृगु संहिता ज्योतिष शास्त्र का मूल
ग्रंथ है ।
शनिवार, 5 नवंबर 2016
रूप विस्तार चरण 5
ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनसे
कहे कि ऋषियों में मुझे भृगु जानो,
उच्चारण में मुझे अक्षर ॐ जानो, यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ और अचल
अधिष्ठानो में मैं हिमालय पर्वत हूँ ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप
के प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना
आपकी पूर्णता है ।
शुक्रवार, 4 नवंबर 2016
समुद्र
पृथ्वी के समस्त क्षेत्र के 71% भाग
में लगभग 14.108 घन कीलो मीटर समुद्र का जल फैला हुआ है । इस जल के व्यापकता से
ज्ञान का जिज्ञासु ब्रम्ह की व्यापक अखण्ड अस्तित्व की कल्पना ग्रहण करता है ।
गुरुवार, 3 नवंबर 2016
जलाशय तालाब
पृथ्वी को “जलग्रह” कहा जाता है ।
इसके सम्पूर्ण क्षेत्रपल का 71% में समुद्र का विस्तार फैला हुआ है । पृथ्वी की
सम्पूर्ण जलसम्पदा का शेस भाग जो कि पेय जल के रूप में है मुख्यत: तालाबों अथवा
वर्फ के रूप में है अथवा भूगर्भ में है ।
बुधवार, 2 नवंबर 2016
बृहस्पति
बृहस्पति को देवताओं के गुरू के रूप
में जाना जाता है । इनका रथ हाँथी सदृष्य बडा और आठ घोडों के द्वारा हाँका जाता है
। गुरू बृहस्पति महाभारत की कथा का खण्डन करते हुये बताये कि पाण्डवों और कौरवों
के पूर्वजों की जन्म कथा क्या थी ।
मंगलवार, 1 नवंबर 2016
स्कंद
वेदों में वर्णित देवताओं में
“स्कंद” एक प्रसिद्ध देवता हैं । इन्हे भगवान शिव का पुत्र बताया गया है । इनके
अन्य प्रलित तनाम “कीर्तिकेय” “मरुगन” सुब्रामन्या” हैं । स्कंद पुराण में
“कार्तिकेय” की लीलाओं का प्रचुर वृतांत है । ज्ञातव्य है कि स्कंद पुराण समस्त 18
पुराणों में सबसे अधिक लेख सामग्री का धारक है ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप
के प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना
आपकी पूर्णता है ।
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