प्रकृति व्यक्ति
के सम्मुख तथा इर्द-गिर्द वातावरण सृजित करके अपने निर्णय को प्रगट करती है, जबकि व्यक्ति
अपनी इच्छाओं के आलोक में अथवा भावनाओं के वशीभूत अथवा विवेक के अधीन अपने कर्तव्य
का निर्णय करता है । गुरू ने उपरोक्त मस्तिष्क की तीनों ही, नामत: इच्छा-भावना-विवेक
के प्रति ज्ञान का स्वरूप बता दिया, परन्तु कर्तव्य के निर्णय के लिये स्वयं अर्जुन को
कहा ।
रविवार, 31 दिसंबर 2017
शनिवार, 30 दिसंबर 2017
विचार द्वारा निर्णय
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि इस प्रकार मैंने तुम्हे समस्त ज्ञान बता दिया, इस पर भली भाँति विचार
करके, तुम्हे जो उचित
प्रतीत हो करो ।
शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017
स्वभाव और चैतन्य
गुरू का उपदेश
स्वभाव और आत्मानुभूति दोनों को एकाग्र करके परमात्मा की शरण ग्रहण करने के लिये
निर्देश करता है । स्वभाव जो कि पूर्व के कर्मों से सृजित है और आत्मानुभूति जो कि
सर्वोच्च ज्ञान का द्योतक है, इन दोनो को उस परमात्मा को अर्पित कर दो । यह अहंकार के पूर्ण समर्पण का
व्यवहारिक स्वरूप है ।
गुरुवार, 28 दिसंबर 2017
शाश्वत् धाम
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण बोले हे भारत (अर्जुन) तुम अपनी समस्त सामर्थ्य को एकाग्र कर उसकी शरण ग्रहण
करो । उसी की कृपा से तुम्हे शान्ति और शाश्वत् धाम प्राप्त होगा ।
बुधवार, 27 दिसंबर 2017
प्रयोजन
अज्ञान का निवारण
व्यक्ति का प्रथम लक्ष्य होना चाहिये । प्रत्येक जीव का सृजन किसी ईश्वरीय प्रयोजन
की पूर्ति के लिये हुआ है । जब तक व्यक्ति का अहंकार प्रधान रहता है तब तक व्यक्ति
अपनी इच्छाओं को प्रधान मानता है । परंतु ईश्वर के नियम-विधान का कोई उलन्घन नहीं
कर सकता है । ईश्वर के विधान को स्वीकारना और अहंकार का क्षय एक सत्य को दो प्रकार
से व्यक्त करना है ।
मंगलवार, 26 दिसंबर 2017
समस्त का मूल
सभी जीवों का अधार
ईश्वर स्वयं है । प्रकृति निर्मित शरीर कर्मफलों के भोग के लिये निर्मित है । यह
कर्मफल न्याय पर आधारित हैं । सृजन के विज्ञान के फल से व्यक्ति अपने आधार ईश्वर
से अनभिज्ञ है । इस अनभिज्ञता के कारण ही वह सन्सारी है परिच्छिन्न है । इस
परिच्छिन्नता की पूर्ति के लिये वह कर्म करता है । यह समस्त चक्र अनायास नहीं है ।
प्रश्न है कि व्यक्ति यदि इन तथ्यों को ग्राह्य बना सके ।
सोमवार, 25 दिसंबर 2017
सन्चालक
स्वभाव से बाध्य
कर्म प्रेरणा का विज्ञान बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि
ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में वास करता है और वह उन्हे इस प्रकार घुमा रहा है
कि मानो वे किसी यन्त्र पर चढे हुये हों ।
रविवार, 24 दिसंबर 2017
स्वभाव से बाध्य
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले हे कुन्ती पुत्र मोंह के भ्रम से तुम जिस कार्य को करने
से इन्कार कर रहे हो, उसे करने के लिये तुम्हारा स्वभाव तुम्हे बाध्य करेगा ।
शनिवार, 23 दिसंबर 2017
स्वभाव तथा भावना
जैसा कि गुरू ने
उपदेश किया कि व्यक्ति को अपने स्वभाव के अनुकूल कार्यों को करना चाहिये । स्वभाव
जो कि पूर्व के कर्मों के अनुसार सृजित होता है । इसलिये यह प्रकृति के अनुदेशों
के अनुकूल कहा जायेगा । प्रकृति के अनुदेश न्यायपूर्ण होते हैं । भावनायें
व्यवहारिक प्रतिक्रियाओं से सृजित होती हैं । इसीलिये गुरू ने कहा कि यदि तुम अपनी
भावना के अनुरूप निर्णय करोगे तो तुम्हारी अपनी प्रकृति ही उसे स्थिर नहीं होने
देगी ।
शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017
अहंकार के वशीभूत
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि यदि अहंकार के वशीभूत तुम यह निर्णय लेते हो कि “मैं
नहीं युद्ध करूँगा” तो तुम्हारा यह निर्णय निरर्थक है । तुम्हारी प्रकृति तुम्हे
विवश करेगी ।
गुरुवार, 21 दिसंबर 2017
मुक्ति अथवा त्रास-भोग
व्यक्ति मुक्ति
अथवा संसारी-त्रास भोग में से
किसी एक का चुनाव करने को स्वतंत्र है । यदि मोंह-वश व्यक्ति ऐसा सोचता है
कि वह ब्रम्ह की शक्ति के विरुद्ध कार्य कर सकता है तो निश्चय ही उसे सांसारिक-त्रास भोग झेलने
ही होंगे । परमात्मा की अवज्ञा अहंकार के कारण होती है ।
बुधवार, 20 दिसंबर 2017
अहंकार पतनकरी
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को बताये कि यदि आत्मा की अनुभूति में स्थिर होकर कार्य करोगे तो मेरी कृपा
से सारे विघ्न पार सकोगे, परंतु कन्चिद अहंकार के अधीन कार्य करोगे तो
विनष्ट हो जावोगे |
मंगलवार, 19 दिसंबर 2017
चैतन्य स्वरूप
आश्रय ग्रहण करने
का सुझाव एवं समर्पण प्राप्त करने की जो विधि गुरू ने उपदेश किया उसका सीधा
अभिप्राय है कि ब्रम्ह को अपना चैतन्य स्वरूप अनुभव करो और कर्म को अर्पण का
अभिप्राय हुआ कि तुम स्वयं अकर्ता रहो । यह वेदांत का ज्ञान आत्मसात् करने का
साक्षात् उपाय गुरू ने उपदेश द्वारा प्रशस्थ किया है ।
सोमवार, 18 दिसंबर 2017
समर्पण विधि
समर्पण अर्पित
करने की विधि बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि अपने मस्तिष्क में मुझे सर्वोच्च समर्थ मानते हुये यह
अनुभव करोकि तुम मेरे आश्रय पर निर्भर हो और प्रत्येक कर्म को मुझे अर्पित करो तथा
अपने ध्यान को सतत् मुझ पर केंन्द्रित करके रखो ।
रविवार, 17 दिसंबर 2017
ज्ञान समर्पण कर्म
सन्यास और त्याग
के सम्बंध में गुरू के उपदेश का सार यह है कि व्यक्ति को व्यवहारिक जीवन में कर्म
के करने न करने के प्रकरण में इतने चुनाव के विकल्प तो उपलब्ध रहते नहीं है, इसलिये मर्यादित आचरण
यह है कि ज्ञान को धारण किये हुये और अधिष्ठान ब्रम्ह को सर्वोपरि सत्ता के रूप
में समर्पित रहते हुये समस्त कर्मों को करे, यही निर्वाण का पथ है ।
शनिवार, 16 दिसंबर 2017
अमर पद
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को बताये कि व्यक्ति मेरी शरण की क्षाया में स्थित रहकर निरंतर सभी प्रकार
के कर्मों को करता हुआ वह मेरी कृपा से शाश्वत् अमर पद को पाता है ।
शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017
ज्ञान समर्पण
ज्ञाता अथवा समर्पित
पूर्णपुरूष के साथ आत्मज्ञान और आत्मानुभव में एकाकार हो जाता है । ज्ञान और समर्पण
दोनो का एक ही लक्ष्य है । ब्रम्ह समाहित का अभिप्राय है कि ब्रम्ह से समर्पित दशा
मे निवास, उस ब्रम्ह में निवास
और उसके तदात्म्य में जीवित रहना है ।
गुरुवार, 14 दिसंबर 2017
समर्पण के फल
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि समर्पण के फल से व्यक्ति मेरे विस्तार को जान लेता
है और मेरे सत्य को भी जान जाता है, और तब, वह मेरे स्वरूप को जानकर उसमें समाहित हो
जाता है ।
बुधवार, 13 दिसंबर 2017
सर्वोत्तम शरण
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि ब्रम्ह के साथ एकाकार होकर और प्रशांतात्मा बनने पर
उसे न तो कोई शोक होता है और न कोई इच्छा ही होती है । सब प्राणियों को समान समझता
हुआ वह मेरी सर्वोच्च शरण को प्राप्त कर लेता है ।
मंगलवार, 12 दिसंबर 2017
समाहित हेतु आर्हताये : 3
समाहित दशा हेतु
आर्हताओं की गणना को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि अहंकार, बल, घमण्ड, इच्छा, क्रोध और सम्पत्ति
को त्यागकर, ममत्व की भावना
से रहित और शांत चित्त वाला व्यक्ति ब्रम्ह के साथ एकाकार होने के लिये योग्य हो
जाता है ।
सोमवार, 11 दिसंबर 2017
समाहित हेतु आर्हताये : 2
समाहित दशा हेतु
आर्हताओं की गणना को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि
एकांत में निवास करता हुआ, अल्प अहार करता हुआ, वाणी, शरीर और मन को
संयम में रखता हुआ और सदा ध्यान और एकाग्रता में लीन रहता हुआ और चैतन्य में शरण
लिये हुये .......सतत्
रविवार, 10 दिसंबर 2017
समाहित दशा हेतु आर्हताये : 1
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि विशुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, अपने-आप को दृढता
पूर्वक संयम में रखकर, शब्दादि विषयों को त्याग कर और राग तथा द्वेष को छोडकर ..... सतत्
शनिवार, 9 दिसंबर 2017
ज्ञान के सज्ञान
आचार्य आदि-शन्कर गुरू के
उपदेश की व्याख्या करते हुये कहते हैं कि जिस प्रकार व्यक्ति को अपने शरीर को
जानने के लिये किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है उसी प्रकार ब्रम्ह जो कि व्यक्ति
को आत्मा के रूप में उपलब्ध है को जानने के लिये किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं हैं
क्योंकि आत्मा तो उसकी शरीर से भी अधिक नजदीक है ।
शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017
निष्पादन
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले हे कुन्ती पुत्र अब तुम मुझसे सुनो कि व्यक्ति पूर्णता
की स्थिति प्राप्त् करके उस ब्रम्ह को कैसे पाता है जो कि ज्ञान का सर्वोच्च
निष्पादन है ।
गुरुवार, 7 दिसंबर 2017
नैष्कर्म्य
व्यक्ति का स्वरूप
आत्मा है । आत्मा सदैव अकर्ता है । अज्ञान निवारण के फल से जब व्यक्ति अपने स्वरूप
के सत्य परिचय से भिज्ञ हो जाता है तो वह कार्य तो करेगा परंतु कृतत्व का भाव
अकर्ता का भाव हो जायेगा । कार्य का त्याग तो किसी भी व्यक्ति के लिये सम्भव नहीं
हो सकता । जीवित रहते कार्य तो प्रत्येक को करना ही करना है । महत्वपूर्ण कृतत्व का
भाव है जो कि पूर्णता और बंधन में पर्णित होता है ।
बुधवार, 6 दिसंबर 2017
अज्ञान से मुक्त
भगवद्गीता में
इच्छा से मुक्त कर्म की अनुशंसा गुरू प्रारम्भ से ही करते आये हैं । इच्छापूर्ति
परिच्छिन्नता की अनुभूति से सृजित होती है । परिच्छिन्नता अध्यास है । यह सत्य
स्वरूप के प्रति अनिभिज्ञता है । आत्मा सदैव अकर्ता है । इसीलिये इच्छा से मुक्त
कर्म पूर्णता की उपलब्धि में पर्णित होगा ।
मंगलवार, 5 दिसंबर 2017
आसक्ति से मुक्त
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस व्यक्ति का विवेक किसी भी आसक्ति से मुक्त है, जिसने अपनी आत्मा
को वश में कर लिया है और जिसे कोई इच्छा शेष नहीं है, वह सन्यास द्वारा उस
सर्वोच्च दशा तक पहुंच जाता है, जो सभी प्रकार के कर्म से ऊपर है ।
सोमवार, 4 दिसंबर 2017
अनुकूल
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण बोले हे कुंती के पुत्र (अर्जुन), व्यक्ति को अपनी प्रकृति
के अनुकूल कार्य का परित्याग नहीं करना चाहिये, कंचिद वह कार्य दोष से
आच्छादित ही क्यों न हो क्योंकि प्रत्येक उद्यम दोष से आच्छादित होता है जैसे कि
धुँआ से अग्नि आच्छादित होती है ।
रविवार, 3 दिसंबर 2017
प्रकृति स्वभाव
गुरू के उपदेश के
अनुसार, जैसा कि तेरहवें
अध्याय में था, समस्त कर्मों की
कर्ता प्रकृति है, ब्रम्हस्वरूप आत्मा सदैव अकर्ता है । व्यक्ति का स्वभाव उसके
पूर्व के कर्मों के अनुरूप होता है । सृष्टि का संचालन कर्म और कर्मफल के सिद्धांत
पर प्रकृति द्वारा संचालित हो रहा है । प्रकृति न्याय पर आधारित है । न्यायविरूद्ध
कृत पाप है ।
शनिवार, 2 दिसंबर 2017
स्वभाव धर्म
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि व्यक्ति यदि अपने स्वभाव के अनुरूप कर्म को चाहे
उतनी सक्षमता से न भी कर सके जितना कि दूसरे के स्वभाव के अनुरूप कर्म को कर सकता
है तो भी उसके अपने स्वभाव के अनुरूप के कर्म को करने से वह किसी पाप का भागीदार
नहीं होगा ।
शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017
पूर्णता
गुरु के उपदेश में
उपासना के माध्यम के रूप में कर्म दायित्व का सम्पादन बताने का आधार व्यक्ति के
स्वभाव से सम्बंधित है । स्वभाव का मूल उस व्यक्ति के पूर्व के जन्मों के आधार पर
सृजित हुआ होता है । इस प्रकार यदि व्यक्ति प्रकृति के संविधान के तदात्म्य में
अपने को प्रस्तुत करता है तो निश्चय ही वह पूर्णता के लिये योग्य पात्र है ।
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