गुरू का उपदेश बताता है कि जो व्यक्ति जिस लक्ष्य को पाने की
कामना से उपासना करेगा उसे वही लक्ष्य मिलेगा । जो व्यक्ति देवलोक के सुखभोग के
लक्ष्य से वेदों में वर्णित पथ से पूजा करेगा उसे सुखभोग मिलेगा । जो व्यक्ति
ब्रम्ह की दिव्य शांति को लक्ष्य कर ब्रम्ह की पूजा करेगा उसे ब्रम्ह की दिव्य
शांति मिलेगी ।
मंगलवार, 31 मई 2016
सोमवार, 30 मई 2016
तुलनात्मक मुल्यांकन
गुरू ने बताया कि वेदों की उपासना पद्धति सुख-भोग की कामना से
देवपूजा करने वालों के लिये उपयोगी है जबकि ब्रम्ह को पाने का प्रयत्न करने वाले
ज्ञान के जिज्ञासुओं की उपासना ब्रम्ह की दिव्य शांति को पाने के लिये होती है । गुरू
वेदों में वर्णित उपासना पद्धति और आत्मा प्रधान जीवन के पथ से ब्रम्ह की उपासना
पद्धति की तुलनात्मक वृतांत बताकर अज्ञानी जिज्ञासु अर्जुन के मस्तिष्क में
व्याप्त संकल्प विकल्प की स्थिति को एक निर्णय तक पहुँचाने का प्रयत्न किये हैं ।
रविवार, 29 मई 2016
वेदों के ज्ञाता
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि वेदों के ज्ञाता
संत सोमरस का पान कर अपने पापों से मुक्त होकर, यज्ञ कर्म में आहुतियों को अर्पित करके स्वर्गलोक में वास करने
के लक्ष्य से मेरी अस्तुति करते हैं । ऐसे व्यक्ति स्वर्गलोक के अधिपति इंद्र के
राज्य में पहुँचते हैं और देवताओं के सुलभ सुख को भोगते हैं ।
शनिवार, 28 मई 2016
ताप तथा वर्षा
ब्रम्ह इस रूपधारी परंतु विनाशशील सृष्टि का मूल है । गुरू ने
बताया कि ब्रम्ह से ताप पुन: ताप से वर्षा पुन: वर्षा से अन्न पुन: अन्न से जीव की
उत्पत्ति है । एक समय अवधि तक जीव और रूप प्रगट रहने के बाद पुन: शून्य दशा है ।
यह शून्य दशा भी ब्रम्ह है । इस प्रकार यह चक्र ब्रम्ह से ही प्रारम्भ होकर ब्रम्ह
में ही समाहित हो जाता है । यह रहस्य ब्रम्ह का स्वरूप है |
शुक्रवार, 27 मई 2016
अमरत्व तथा मृत्यु
ब्रम्ह इस विनाशशील रूप संसार से भिन्न चिर है । मृत्यु इस रूप
संसार के लिये प्रभावी होती है जो कि ब्रम्ह की अभिव्यक्ति मात्र है । अभिव्यक्ति
विनाशशील है क्योंकि यह ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति द्वारा निर्मित है । ब्रम्ह की
उच्चतर प्रकृति अविनाशी है । इसीलिये गुरू के उपदेश मनुष्य को अपना जीवन ब्रम्ह की
उच्चतर प्रकृति के अनुरूप बनाने का पथ प्रशस्थ करते हैं ।
गुरुवार, 26 मई 2016
शून्य दशा की व्याख्या
ब्रम्ह निर्विवाद सत्य है जबकि उस निर्विवाद सत्य की अभिव्यक्ति
यह रूप संसार असत्य है । ब्रम्ह ही दोनों है । जब बह अपने को रूपों में प्रगट करता
है तो यह रूप संसार वर्तमान स्वरूप में होता है । जब वह अव्यक्त दशा में रहता है
तो वही रूप संसार की शून्य दशा होती है । उसी शून्य दशा से ही यह समस्त रूप प्रगट
होते हैं । परंतु यह समस्त रूप मात्र ब्रम्ह का निरूपण है ब्रम्ह नहीं हैं ।
बुधवार, 25 मई 2016
शून्य दशा
ब्रम्ह
के रहस्य को और आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि मैं ही
ताप का उद्भव हूँ, मैं ही वर्षा भी देता हूँ और मैं ही वर्षा को रोकने वाला भी हूँ,
मैं ही अमरत्व भी हूँ और मैं ही मृत्यु भी हूँ, मैं ही रूपों की दशा भी हूँ और मैं ही
शून्य दशा भी हूँ ।
मंगलवार, 24 मई 2016
अक्षर बीज़
गुरू ने उपदेश किया कि जीवों का न विनाश होने वाला वीर्य मैं
हूँ । सृष्टि की उत्पत्ति का मूल ब्रम्ह है । सृष्टि का रक्षक भी ब्रम्ह है । अंत में सृष्टि का विलय भी ब्रम्ह में ही होता है । विलय
काल में जीवों का वीर्य रक्षित रखना तथा अगली उत्पत्ति के समय पुन: उसका प्रयोग
करना ब्रम्ह की महिमा से ही सम्भव होता है ।
सोमवार, 23 मई 2016
शरण भी मित्र भी
ज्ञान प्राप्ति के जिज्ञासु अपने प्रयत्नों की सफलता के लिये
ब्रम्ह की शरण ग्रहण करते हैं । प्रयत्नशील जिज्ञासु माया के वशीभूत प्रयत्नकाल
में बार बार मोंह के पाश में लौट कर फँस जाते हैं, तो इस दशा से उबरने के लिये जब उन्हे अपने आंतरिक शक्ति पर
भरोसा नहीं रह जाता तो वह ब्रम्ह की शरण ग्रहण करते हैं । यदि जिज्ञासु की निष्ठा
सत्य हुई तो ब्रम्ह एक मित्र की भाँति उनकी मदद भी करता है । ब्रम्ह आदि, मध्य, अवसान सभी है । जिज्ञासु ब्रम्ह के सम्मुख जिसभी रूप में
उपस्थित होता है वह उसी रूप में ब्रम्ह को पाता है ।
रविवार, 22 मई 2016
लक्ष्य की अभिलाषा
जैसा कि रूप संसार की स्थिति है, आत्मा प्रकृतीय मोंह में आसक्त है । इस स्थिति के विपरीत
ब्रम्ह की चेतना का जागृत होना, यह ब्रम्ह की कृपा पर ही निर्भर
करता है । जैसा कि गुरू के उपदेश ब्रम्ह के रहस्य को विदित करते हैं, ब्रम्ह स्वयँ ही प्रत्येक दशा यथा ब्रम्ह
को जानने की जिज्ञासा, जानने के लिये प्रयत्नशील होना, प्रयत्नो में सफलता मिलना आदि का प्रेरक और
नियंत्रक ब्रम्ह स्वयँ ही होता है ।
शनिवार, 21 मई 2016
साक्षी भी
ब्रम्ह के रहस्य को और आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन से कहे कि ज्ञान के जिज्ञासु संतों का मैं ही लक्ष्य भी हूँ, मैं ही उन संतों में निहित लक्ष्य पाने की
जिज्ञासा भी हूँ, मैं ही उनके द्वारा किये जा रहे
प्रयत्नों का स्वामी भी हूँ, मैं ही उनके द्वारा किये जा रहे
प्रयत्नों का साक्षी भी हूँ, ऐसे संत अपने प्रयत्नो की सफलता के
लिये मेरा ही शरण भी ग्रहण करते हैं,
मैं ही उनके प्रयत्नो में उनका मित्र भी हूँ, मैं ही समस्त उत्पत्ति का मूल भी हूँ और अंत में सबका विलय भी
मुझमें ही होता है ।
शुक्रवार, 20 मई 2016
ब्रम्ह सर्वस्य
इस क्षणभँगुर रूप संसार का जीव जब, उदय होते रूपों एवं मृत्यु को प्राप्त होते जीवों की, उत्पत्ति के श्रोत तथा मरणोंपरांत गंतव्य
का चिंतन करता है तो उसे प्रतीत होता है कि कोई एक अविनाशी अस्तित्व है जो कि इन
समस्त परिवर्तनो से परे अविनाशी अस्तित्व है जो कि किसी भी परिवर्तन से प्रभावित
नहीं होता है । गुरू का उपदेश उसी अपरिवर्तनीय सत्य अस्तित्व का रहस्य बताते हुये व्यक्त
करता है कि इस रूप संसार का उदय से लेकर
विलय पर्यंत सभी कुछ उसी ब्रम्ह द्वारा ही सम्भव हो रहा है ।
गुरुवार, 19 मई 2016
अक्षर ॐ
ब्रम्ह रहस्य को जानने के जिज्ञासु संतजन ब्रम्ह का ध्यान करने
के लिये अपनी समस्त इंद्रियों, मस्तिष्क, और विवेक को एकाग्र एकल ब्रम्ह में केंद्रित करने के प्रयत्न काल
में उपरोक्त सभी में तारतम्य स्थापित करने के लिये एक अक्षर ॐ का उच्चारण करते हैं
। यह ॐ नाद भी ब्रम्ह स्वरूप है ।
बुधवार, 18 मई 2016
आदि मध्य अवसान
गुरू द्वारा बताये गये ब्रम्ह के रहस्य के उपदेश के अनुसार
ब्रम्ह ही इस रूप संसार की उत्पत्ति का सनातन बीज़ है, उसी ब्रम्ह से ही इस रूप संसार के समस्त रूपों का उदय हुआ है ।
ब्रम्ह की ही शक्ति से यह रूप संसार यथा स्थित अपने रूप में स्थिर है । समयांतर से
इस रूप संसार का विलय भी ब्रम्ह की प्रकृति मे होता है ।
मंगलवार, 17 मई 2016
पिता माता रक्षक
ब्रम्ह का रहस्य बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
कहे कि मैं ही इस रूप संसार का पिता हूँ,
मैं ही इसकी माता हूँ, मैं ही इसे अपने रूप में स्थिर
रखने का अवलम्ब हूँ, मैं ही इन रूपों के लिये ज्ञेय
रहस्य हूँ, मैं ही अक्षर ॐ नाद हूँ ।
सोमवार, 16 मई 2016
लक्ष्य साधना
गुरू द्वारा उपदेशित ब्रम्ह के रहस्य से यह विदित होता है कि इस
रूप संसार में ब्रम्ह की प्रकृति ही ब्रम्ह की महिमा से समस्त रूपों में विस्तरित
है । इन समस्त विस्तरित रूपों के लिये उभयनिष्ठ लक्ष्य यह होता है कि उस ब्रम्ह
में ही विलय की स्थिति तक पहुँच सकें । इसी लक्ष्य की प्राप्ति का पथ भाँति-भाँति
से प्रगट किये हैं । इस यज्ञ कर्म में यज्ञ ब्रम्ह है, कर्ता ब्रम्ह है,
आहुति ब्रम्ह है, ग्रहणकर्ता अग्नि ब्रम्ह है । यह
रूप चित्र धारण करना ही ब्रम्ह को जानना है ।
रविवार, 15 मई 2016
कर्म का भाव
गुरू द्वारा उपदेशित “अर्पण
कर्म” में निहित भाव यह है कि ब्रम्ह की
प्रकृति हमें जिस रूप में मिली है,
हम उसे, बिना किसी प्रकार प्रदूषित किये, ब्रम्ह को ही अर्पित करें । ब्रम्ह की ही
प्रकृति है, ब्रम्ह की ही माया शक्ति द्वारा
उसे रूप मिला, उस रूप को, ब्रम्ह की ही प्रेरणा द्वारा, ब्रम्ह को ही अर्पित किया जाय । फल होगा श्रीपद में विलय ।
शनिवार, 14 मई 2016
ब्रम्ह से प्राप्त ब्रम्ह को अर्पित
गुरू ने पहले बताया कि पुण्यात्मा संत अपने पावन ज्ञान को
ब्रम्ह को आहुति कर पूजते हैं । पुन: इस आहुति कर्म और यज्ञ में प्रयुक्त समस्त
विस्तार में अपने को बताया । इस प्रकार की अभिव्यक्ति में गुरू का भाव यह है कि
हमारा सम्पूर्ण प्रकृति निर्मित अस्तित्व ब्रम्ह से है, हमें ब्रम्ह से मिला है, हम इसे पूर्ण रूप से ब्रम्ह को ही अर्पित करते हैं ।
शुक्रवार, 13 मई 2016
यज्ञ कर्म आहुति सभी ब्रम्ह
ब्रम्ह के रहस्य को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को बताये कि धार्मिक कर्म मैं हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ,
मैं ही आदि कालीन आहुति हूँ, मैं ही पावन मंत्र हूँ, मैं ही घी हूँ, मैं ही अग्नि हूँ,
मैं ही यज्ञ कर्ता हूँ ।
गुरुवार, 12 मई 2016
सदैव सम्मुख
गुरू ने ब्रम्ह के स्वरूप रहस्य को बताते हुये कहा कि समस्त रूप
संसार मेरे में निहित है । इस कथन की अंतर्निहित व्यापकता को व्यक्त करते हुये व्याख्याकार
कहता है कि उपासक को सदैव सम्मुख दीखने वाला व्यापक ब्रम्ह है । उपासक जिसभी दिशा
से उसे पूजता है वह ब्रम्ह उसके सम्मुख रहकर उसकी पूजा को ग्रहण करता है ।
बुधवार, 11 मई 2016
अद्वैत और विशिष्टाद्वैत
व्याख्याकार गुरू द्वारा ब्रम्ह के स्वरूप के सम्बंध में उपदेश को स्पष्ट करते
हुये बताता है कि ब्रम्ह एक है उससा कोई दूसरा नहीं है । दूसरा व्याख्याकार कहता
है कि ब्रम्ह की अभिव्यक्ति के स्वरूप को भी ब्रम्ह का स्वरूप ही माना जाय । तीसरा
व्याख्याकार कहता है कि ब्रम्ह तो एकही है परंतु विशिष्ट प्रयोजन यथा धारणा स्थिर
करने के लिये उसकी अभिव्यक्ति को भी ब्रम्ह स्वरूप माना जाय ।
मंगलवार, 10 मई 2016
उपास्य
गुरू उपदेश के द्वारा ब्रम्ह के व्यापक स्वरूप का अनुभव
जिज्ञासु को कराने के लक्ष्य से उसे बताते हैं कि उपासक संत जब ब्रम्ह के स्वरूप
की धारणा धारण करने में असहाय महसूस करने लगता है तो वह अपने विवेक और ज्ञान को
उसी ब्रम्ह को ही आहुति करके उससे विनय करता है कि मैं जितनी भी कल्पना कर सकता हूँ
वह आपको जानने के लिये अल्प प्रमाणित हो रही है इसलिये आपही कृपा पूर्वक मुझे
मार्ग प्रशस्थ करें ।
सोमवार, 9 मई 2016
अर्पण द्वारा
पुण्यात्मा संत ब्रम्ह को किस रूप में धारण कर, किस भाव को हृदय में संजोये हुये उसे पूजते
हैं को बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि ऐसे संत अपने विवेक
और ज्ञान की आहुति अर्पित करके मुझे पूजते हैं और मुझे एक एकाकी, अतिविशिष्ट और प्रत्येक दिशा से देखने पर
सामने दीखने वाले रूप में ग्रहण करके मुझे पूजते हैं ।
रविवार, 8 मई 2016
तीन वाँक्षनायें
ज्ञान प्राप्ति की सर्वोच्च उपलब्धि के लिये गुरू द्वारा पुण्यात्मा संतों के उदाहरण के माध्यम से तीन अनिवार्य वाँक्षनाये बतायी गई हैं (1) उचित का विवेक, (2) समर्पित भाव तथा (3) सतत अपने कर्म दायित्व में
संलग्न रहना ।
शनिवार, 7 मई 2016
उच्चतम पूर्णता
गुरू द्वारा बताये गये पुण्यात्मा संतों की विशिष्ट पैनी उपासना
विधि के वृतांत में प्रयुक्त “ ज्ञानत्व,
भक्त्या, नित्ययुक्त: “ यह इंगित करते हैं
कि ब्रम्ह में समाहित स्थित के यह तीनों ही पर्याय स्वरूप हैं । ब्रम्ह का रहस्य
मस्तिष्क में स्पष्ट रहना, ब्रम्ह की सेवा में आदर पूर्वक
समर्पित रहना, ब्रम्ह के भाव से युक्त रहकर कार्य
में संलग्न होना प्रतिपल ब्रम्ह में समाहित रहना है ।
शुक्रवार, 6 मई 2016
ज्ञानत्व भक्तया नित्ययुक्त:
गुरू द्वारा बताये गये पुण्यात्मा संतों के उपासना विधि और
वृतांत में तीन प्रधान वाँक्षनाये जिनके प्रभाव से उनकी उपासना ब्रम्ह को उनके
प्रति आकृष्ट होने पर बाध्य करती हैं की गणना में प्रथम ज्ञान से ओतप्रोत रहते
हुये अर्थात ब्रम्ह के रहस्य को सतत अपनी धारणा मे स्थिर किये हुये द्वितीय भक्तया
अर्थात भक्ति के भाव से सतत युक्त रहकर तृतीय नित्ययुक्त: सतत ब्रम्ह के साथ जुडे
हुये रहकर उपासना करना बताया गया है ।
गुरुवार, 5 मई 2016
आराध्य को
पुण्यात्मा संतों के कृतो को और आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये कि ऐसे दृढ प्रतिज्ञ संत अटल समर्पित भाव को संजोये
हुये मेरी महिमामण्डल में भक्तिपूर्वक पूजते हैं और सदैव मर्यादित आचरण बर्तते हैं
।
बुधवार, 4 मई 2016
पथभ्रम
यह मोहिनी प्रकृति जीव को अपने आकर्षण में ढगती है । ईंद्रीय
वासनाओं के पथ से यह जीव को अपने मोंह में आसक्त करती है । गुरू का उपदेश है कि इस
पथभ्रम से बचने के लिये व्यक्ति को जागृत विवेक की आवश्यकता होती है । विवेक जो कि
सत्य ब्रम्ह की मर्यादा एवं मोहिनी प्रकृति का भ्रम दोनो को स्पष्ट विभेद से अलग
अलग देखता रहे और उचित मर्यादित पथ पर व्यक्ति को चलाता रहे ।
मंगलवार, 3 मई 2016
गंतव्य
परिवर्तनशील आठ वर्गीय निम्नतर प्रकृति द्वारा निर्मित यह रूप
संसार विनाशशील है । ब्रम्ह अविनाशी अक्षर है । उसकी उच्चतर प्रकृति इस रूप संसार
का आधार है । जो व्यक्ति विनाशशील प्रकृति को आत्मा के प्रति समर्पित कर उस अक्षर
ब्रम्ह की आराधना करता है, अपने को उस अक्षर ब्रम्ह के
प्रतिनिधि के रूप में वर्तता है वह सत्य गंतव्य को उन्मुख है ।
सोमवार, 2 मई 2016
दो मार्ग
व्यक्ति कंचिद अहंकार बोध के वशीभूत अपने को एक अलग अस्तित्व के
रूप में प्रस्तुत करता है वह इच्छाओं का पीछा करते हुये पुनर्जन्म के चक्र में
चलता रहता है । कंचिद जो व्यक्ति समस्त जीव रूपों के आधार एकल सत्य ब्रम्ह के
प्रति सचेत अपने को उसके सेवक के रूप में प्रस्तुत करता है वह मोंह से मुक्ति की
ओर अग्रसर होता है ।
रविवार, 1 मई 2016
दैवीय प्रकृति
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि हे अर्जुन वे लोग जो
कि आत्मचेतना का जीवन जीते हैं और मुझे सभी जीव रूपों का अक्षर आधार जान कर
अविचलित मस्तिष्क से सतत् मेरी आराधना करते हैं वे पुण्य आत्मा हैं ।
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