रविवार, 31 मई 2015

कर्म में सक्षमता

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि चार वर्णों की व्यवस्था मैंने ही बनायी है । यद्यपि कि मैं इस व्यवस्था की उत्पत्ति करने वाला हूँ फिरभी मैं किसी कर्म के लिये अक्षम हूँ और मुझ में कोई परिवर्तन सम्भव नहीं है । व्याख्याकार उपरोक्त कथन का विस्तार बताता है कि मनुष्यों में निहित कार्य करने की प्रकृति और कर्म विषेस के सम्पादन में वाँक्षित चतुराई पर आधारित विभाजन चतुर्वर्ण है । यह विभाजन कंचिद जन्म के वंश अथवा समाज के वर्ग पर आधारित नहीं है । कोई भी पुरुष किसी भी स्त्री के साथ पिता बनने में सक्षम पाया जाता है । इसलिये वर्ण का विभाजन कर्म में मनुष्य द्वारा प्रगट किये गये व्यवहार पर आधारित है । 

शनिवार, 30 मई 2015

एक ब्रम्ह

व्याख्याकार कहता है कि परम् ब्रम्ह एक है । समुदाय और देश की भिन्नता से मनुष्य जिसभी नाम और रूप में उससे याचना करता है सभी की प्रार्थना स्वीकार करने वाला वह एक ही है । विष्णु ही शिव हैं, शिव ही विष्णु हैं । विष्णु ही रूद्र हैं रूद्र ही ब्रम्हा हैं । शैव मतावलम्बी जिस शिव की पूजा करते हैं, वेदांति जिस ब्रम्हा की पूजा करते हैं, वह सभी स्वरूप एक ही परम् सत्य के ही हैं जो सभी की प्रार्थना स्वीकार करता है । सत्य एक है । सम्पूर्ण सत्य वही है । वह सत्य केवल सत्य है इसके अतिरिक्त उसका कोई दूसरा रूप नहीं है । 

शुक्रवार, 29 मई 2015

सर्व प्रकार से

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये कि जो भक्त मुझे जिसभी पथ से पाने की चेष्टा करता है मैं उसे उसी पथ से मिलता हूँ । व्याख्याकार गुरू के उपरोक्त कथन का विस्तार बताते हुये कहता है कि जो व्यक्ति मूर्ति आकार को भगवान मानकर पूजा करता है उसे भगवान उसी मूर्ति आकार के रूप में ही मिलते हैं । ब्रम्ह निराकार अचिंत्य है । इस प्रकार कोई भी मूर्ति आकार ब्रम्ह की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती है । फिरभी कोई मनुष्य बिना किसी सहारे के अचिंत्य का ध्यान नहीं कर सकता है इसलिये मूर्ति आकारों का भी महत्व है । मुख्य बात यह होती है कि कोई व्यक्ति परम् सत्य को जानने के लिये और उस परम् सत्य को पाने के लिये कितना जिज्ञासु है उसी जिज्ञासा की पूर्ति भगवान करते हैं । 

गुरुवार, 28 मई 2015

फल की कामना

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो भक्त मुझे जिस भी प्रकार से पाने की चेष्टा करता है मैं उसे उसी प्रकार से मिलता हूँ । व्याख्याकार गुरु के उपरोक्त कथन का विस्तार बताता है कि जो भक्त भगवान से कुछ भौतिक सुख पाने की कामना से विनय करता है उसे भगवान उस भौतिक सुख की उपलब्धि कराकर उसे संतुष्ट करते हैं । जो भक्त सच्चा ज्ञान पाने के लिये भगवान की उपासना करता है उसे भगवान आत्मज्ञान कराकर संतुष्ट करते हैं । 

बुधवार, 27 मई 2015

मोक्ष

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि कितने ही मनुष्य जिन्होने अपने को मनोवेगों से रक्षित कर, भय और क्रोध का त्याग कर, मेरे प्रति समर्पित भाव से अपने आत्मबोध में संतुष्ट रहकर साधना किया वे सभी परम् ब्रम्ह में विलीन हो चुके हैं । व्याख्याकार गुरू के उपरोक्त कथन का विस्तार बताते हुये कहता है कि अवतार का उद्देष्य होता है कि आम मनुष्य को व्यवहारिक जीवन में उन्नति करने का एक उदाहरण दृष्टि से देखने के पथ से सुलभ हो और जिसके फल से उसे जीवन के चर्मोत्कर्ष स्थिति को प्राप्त करने का उत्साह जागृत हो । मुक्त आत्मा का व्यक्ति ही इस संसार में ब्रम्ह के प्रतिनिधि स्वरूप का उदाहरण होता है ।  

मंगलवार, 26 मई 2015

अनेको अवतार

गौतम बुद्ध ने कहा था कि हे बसेथा समय समय पर एक तथागत का जन्म संसार में होता है, जोकि पूर्ण आत्मज्ञानी होता है, जो कि ब्रम्हको पूर्ण समर्पित होता है, जिसे सत्य का पूर्णरूप से ज्ञान होता है, जो कि सत्य के ज्ञान से पूर्ण संतुष्ट रहता है, एक ज्ञानी बुद्ध । जीवन के उच्चतम स्तर को उसमें देखा जा सकता है । ऐसे पुरुष के उदाहरण से यह देखने को मिलता है कि हम प्रत्येक के अंदर किस ऊँचाई तक जाने की क्षमता विद्यमान है, यदि कंचिद हम उसे विकसित कर सकें । 

सोमवार, 25 मई 2015

दिव्य जन्म और दिव्य कर्म

व्याख्याकार कहता है कि अवतार पुरुष के उदाहरण से यह स्पष्ट विदित होता है कि आत्मा का अनुभव करके आत्मा की मर्यादा के अनुकूल जीवन में और मनुष्य के आम जीवन में कोई विरोधाभास की स्थिति नहीं होती है । अवतार के उदाहरण से यह स्पष्ट विदित होता है कि एक आम मनुष्य कैसे उन्नति करके अवतार पुरुष के स्तर तक पहुँच सकता है । ब्रम्ह का स्वरूप और उसकी कर्मविधि अवतार पुरुष के स्वरूप दर्शन और उसके कर्मविधा से सीखने का अवसर हर प्रत्येक मनुष्य को मिलता है । ब्रम्ह जो कि चिर, दिव्य, और आनंद का सत्य स्वरूप होता है वह कैसे सीता के हरण से दु:खी होकर उनके खोज़ में विह्वल दशा में दर दर भटकता है । योगेश्वर श्रीकृष्ण सभी मनुष्य का आह्वाहन करते हैं कि मेरे ऊपर समर्पित भाव से निर्भर करो मैं तुम्हे ब्रम्ह का ज्ञान और दर्शन कराऊँगा । 

रविवार, 24 मई 2015

ब्रम्ह का जन्म और कर्म

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो भी मनुष्य मेरे जन्म और कर्म को सही रूप में जान जाता है उसे उसकी तत्कालीन शरीर की मृत्यु के उपरांत दोबारा जन्म नहीं लेना होता है अपितु वह आत्मा ब्रम्ह में विलीन हो जाती है । व्याख्याकार उपरोक्त कथन का भाव स्पष्ट करते हुये कहता है कि अवतार पुरुष श्रीकृष्ण उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि कोई भी मनुष्य उत्थान करके कैसे ब्रम्ह स्वरूप पर्यंत उन्नति कर सकता है । अजन्में ब्रम्ह स्वरूप जन्मी हुई आत्मा में कैसे प्रगट हो सकता है यह अवतार पुरुष श्रीकृष्ण के दर्शन में विदित होता है । 

शनिवार, 23 मई 2015

धर्म

मनुष्य शरीर में ब्रम्ह की उच्चतर अपरिवर्तनीय प्रकृति आत्मा । मनुष्य के अंदर विद्यमान परम् सत्य का अविनाशी अंश । धर्म इस अविनाशी अंश आत्मा का आचरण निर्धारित करता है । धर्म व्यक्त करता है कि आत्मा अपने मौलिक स्वरूप में कैसा आचरण करेगा । प्रत्येक मनुष्य यदि अपनी प्रकृति के अनुरूप आचरण करता है तो उसका धर्मवत् आचरण है । इसके विपरीत यदि मनुष्य अपने मौलिक प्रकृति के विपरीत आचरण करता है तो अ-धर्मवत् आचरण है । धर्मवत् आचरण से सामाजिक सद्भाव सृजित होता है और अधर्मवत् आचरण से सामजिक कलह उत्पन्न होता है । जब मनुष्य समुदाय अपनी चुनाव की स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके सामाजिक कलह की स्थिति उत्पन्न कर लेता है तो ऐसी दशा से समाज को संकट से उबारने के लिये ब्रम्ह स्वयँ प्रगट होता है । 

शुक्रवार, 22 मई 2015

प्रगट होने का उद्देष्य

व्याख्याकार ब्रम्ह को किसी रूप विषेस में इस रूप संसार में प्रगट होने का उद्देष्य बताते हुये कहता है कि मानव समाज के तत्कालीन जीवन स्तर से उन्नति करके एक उच्चस्तरीय जीवन पद्धति में जिसमें प्रेम, शांति और परस्पर सद्भाव का वर्चस्व होता है पर्यंत उन्नति करने के लिये ब्रम्ह स्वयं अपने को किसी रूप में प्रगट करता है । उसका यह प्रगट रूप अन्य के लिये एक उदाहरण बनता है । धर्म अधर्म को परास्त करता है, सत्य असत्य को पराजित करता है, मृत्यु-रोग-पाप की वृत्तियों का दमन होता है और सत्य-विवेक-आनंद की वृत्तियों का वर्चस्व स्थापित होता है । 

गुरुवार, 21 मई 2015

साक्षात् उपस्थित

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जब जब सामाजिक व्यवस्था में धर्म का पतन होता है, और अधर्म का विस्तार बढ जाता है, तब तब मैं अपने को प्रगट रूप में उपस्थित करता हूँ । व्याख्याकार कहता है कि ब्रम्ह अपनी स्थापित व्यवस्था का संतुलन बिगडते देखते हैं तो वह मूक दृष्टा ही नहीं बने रहते हैं बल्कि वह किसी रूप में स्वयँ उपस्थित होकर अधर्म को नियंत्रित कर धर्म का साम्राज्य स्थापित करते हैं । 

बुधवार, 20 मई 2015

प्रकृतिम अधिष्ठाय

अपनी प्रकृति में अपने को स्थापित करना । ब्रम्ह अपने को रूप मे प्रगट करने के लिये अपनी प्रकृति को इस प्रकार से प्रयोग करते हैं कि वह कर्म के बंधन से मुक्त रहे । इस कथन से स्पष्ट होता है कि रूप मात्र दिखावा नहीं होता है । रूप का सृजन किसी निर्धारित प्रयोजन से होता है । यह ब्रम्ह की माया शक्ति होती है जो असम्भव को सम्भव बनाती है । ब्रम्ह रूप धारण करता है । योगमाया ब्रम्ह के स्वतंत्र विचार को कहा गया है । इस योगमाया द्वारा ब्रम्ह जो कि सत्य अस्तित्व है वह असत्य प्रकृति में अपने को प्रगट करता है, ब्रम्ह जो कि सर्वोच्च अस्तित्व है वह सीमित प्रकृति में प्रगट होता है, ब्रम्ह जो कि सर्व शक्तिमान है वह कमजोर में प्रगट  होता है । यह समस्त ऐसी स्थितियाँ हैं जोकि इस संसार के लिये ज्ञेय सत्य हैं । 

मंगलवार, 19 मई 2015

जन्म का विज्ञान

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि यद्यपि कि मैं अजन्मा हूँ, अक्षर हूँ, सभी रूपों का आधार हूँ, फिरभी मैं अपने को अपनी प्रकृति में अपनी माया शक्ति द्वारा स्थापित करता हूँ । व्याख्याकार उपरोक्त कथन को स्पष्ट करते हुये कहता है कि सामान्य जीव प्रकृति के प्रभाव से जन्म पाता है परन्तु ब्रम्ह अपनी स्वतंत्र इच्छा से रूप धारण करता है । 

सोमवार, 18 मई 2015

पुनर्जन्म

अर्जुन ने जिज्ञासा व्यक्त किया कि विवस्वान तो आपके जन्म से पूर्व हुये थे तो कैसे आपने उन्हें ज्ञान उपदेश दिया था । इस जिज्ञासा के उत्तर में गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि आज से पूर्व भी मैं कई बार जन्म लिया हूँ और इस जन्म से पूर्व अनेकों बार आपका भी जन्म हुआ है और यहाँ पर उपस्थित सभी का अनेको बार जन्म हुआ है । मैं इन सभी जन्मों को जानता हूँ परंतु आप उन जन्मों को नहीं जानते हैं । 

रविवार, 17 मई 2015

अर्जुन को दिये

अर्जुन को प्राचीन उपदेश बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि यह कोई नया ज्ञान नहीं है अपितु प्राचीन ज्ञान जो समय के साथ लुप्त हो गया था उसे मैं आज तुम्हे बता रहा हूँ । व्याख्याकार बताता है कि सदैव इस उपदेश को प्रत्येक महापुरुष ने प्राचीन कहकर ही अपने शिष्यों को दिया है । इन महापुरुषों की गणना बताते हुये वह गौतम बुद्ध, महाबीर, शंकर, रामानुज आदि का नाम बताता है । वह इस प्राचीन उपदेश को उस ज्ञान की संज्ञा प्रदान करता है जिससे अन्य उपदेश की सत्यता परीक्षित की जाती है । यह वह ज्ञान है जिसे सृजित नहीं किया गया है फिर भी चिर है । पूर्व में भी था, आजभी है, और समय पर्यंत रहेगा । गुरू योगेश्वर बताये कि पुनर्स्थापना सदैव सम्भव होती है । इसके लिये ब्रम्ह के प्रति समर्पण व निष्ठा होनी चाहिये । ब्रम्ह सदैव अपने रहस्य को प्रगट करता है । वह सभी को सुलभ रहता है ।   

शनिवार, 16 मई 2015

प्राचीन उपदेश

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को प्राचीन उपदेश बताते हुये उपदेश की प्राचीन घोषणा का इतिहास बताते हैं कि मैंने इसे पूर्व समय में विवस्वान को बताया विवस्वान ने इसे मनु को बताया मनु ने इसे इक्छवाकु को बताया था । पुन: यह उपदेश समय के साथ लुप्त हो गया था । अब मैं इसे तुम्हे बता रहा हूँ । व्याख्याकार उपरोक्त कथन में लुप्त होने वाली दशा के सम्बंध में बताता है कि कोई भी उपदेश तब तक सार्थक होता है जब तक कोई भी व्यक्ति उसका अनुसरण कर वह सार्थक अनुभव हासिल कर सके एवं मस्तिष्क में उसकी पावनता की अनुभूति कर सके जिसे वह उपदेश संचरित करता है । जब ऐसा नहीं होता है तब किसी युगप्रवर्तक अवतार पुरुष का प्रादुर्भाव होता है जो कि उस उपदेश एवं उससे जनित होने वाली पावन अनुभूति को नवजीवन प्रदान करता है । 

शुक्रवार, 15 मई 2015

शत्रु का संहार

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इच्छा रूपी शत्रु के संहार का उपाय बताते हुये कहा कि आत्मबोध जो विवेक के भी परे होता है को धारणकर इस आत्मबोध के द्वारा शरीर की प्रकृति को नियंत्रित करके हे अर्जुन इच्छा रूपी शत्रु पर निर्मम प्रहार करो जिससे उसका पूर्ण संहार सम्भव होगा क्योंकि यह शत्रु अत्यधिक बलशाली होता है । 
इस उपदेश के साथ भागवद्गीता का कर्मयोग नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ |  

गुरुवार, 14 मई 2015

जागृति के चरण

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि इंद्रियाँ अत्यधिक बलशाली होती हैं, परंतु उनसे बलशाली मस्तिष्क होता है, उससे भी बलशाली विवेक होता है, और विवेक से भी बलशाली आत्मा होती है । व्याख्याकार उपरोक्त कथन के संदर्भ से बताता है कि उत्थान की जागृति क्रमबद्ध होती है । हम जितना ही जागृत होंगे उतना ही मुक्त दशा पायेगें । यदि हम इंद्रीय वासनाओं के वशीभूत कार्य करेगें तो बंधन में रहेंगे । उच्चतम स्वतंत्रता का स्तर तब मिलेगा जब हमारे कृत विवेक के द्वारा पोषित होंगे और हमारा विवेक आत्मा की अनुभूति से प्रकाशित रहेगा । 

बुधवार, 13 मई 2015

इच्छा शत्रु का वेध

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि इच्छा इंद्रियों से प्रवेष करती है, फिर मस्तिष्क को आच्छादित करके विवेक पर प्रभाव डालती है और अंतिम चरण में आत्मा को आच्छादित करती है । इसलिये हे अर्जुन इसका शमन बिलकुल प्रारम्भिक अवस्था में ही करना चाहिये ताकि यह मस्तिष्क और विवेक को दूषित ना कर सके । 

मंगलवार, 12 मई 2015

शत्रु का शमन

व्याख्याकार कहता है कि इच्छा पूर्ति का प्रयत्न उसकी भोग वस्तु के सेवन द्वारा कभी भी सफल नहीं होता है । उल्टे इच्छा और बढ जाती है । जिसके पास जितना ही अधिक धन है उसको उतनी ही अधिक और धन की कामना भी होती है । इच्छा का शमन इच्छा ना करने द्वारा ही सम्भव हो सकता है । हम जब तक नश्वर की कामना करेंगे तब तक मात्र कलह, त्रास, और मानसिक अशांति ही पायेंगे । 

सोमवार, 11 मई 2015

शत्रु की यथास्थिति

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस प्रकार अग्नि धूआँ से ढका हुआ रहता है, जिस प्रकार दर्पण धूल से ढक जाता है, जिस प्रकार जीव भ्रूण अवस्था में गर्भ से ढका हुआ रहता है उसी प्रकार ज्ञान मोंह से ढका हुआ रहता है । व्याख्याकार कहता है ज्ञान को ढकने वाली होती है मनुष्य की इच्छा । इस इच्छा की अग्नि कभी भी शांत नहीं होती है । इच्छा की पूर्ति उसके भोग वस्तु से कभी भी सम्भव नहीं होती है । 

रविवार, 10 मई 2015

शत्रु का परिचय

 गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि मनुष्य की इच्छायें और क्रोध उसके ज्ञान प्राप्ति के प्रयत्नों में शत्रु के समान आचरण करने वाले होते हैं । व्याख्याकार कहता है कि मनुष्य की प्रकृति अपनी रचना के अनुरूप रुचियों और अरुचियों के माध्यम से मनुष्य से कार्य करा लेती है । 

शनिवार, 9 मई 2015

अर्जुन का प्रश्न

योगेश्वर द्वारा कर्म प्रेरित करने के लिये विवेक के प्रयोग का उपदेश सुनकर अर्जुन ने जिज्ञासा व्यक्त किया कि वह कौन सी शक्ति है जो मनुष्य को उसकी इच्छा के विपरीत उसे पाप कर्म करने के लिये उद्यत करती है । 

शुक्रवार, 8 मई 2015

प्रकृति और दायित्व : चरण 2

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मनुष्य के अपने विवेक का निर्णय जिसे वह कंचिद पूर्णता से ना भी क्रियांवित कर सके अपेक्षाकृत अधिक अच्छा है वनस्पति दूसरे द्वारा आदेशित निर्णय के जिसे कि वह अधिक पूर्णता से क्रियांवित कर सकता है । अपने निर्णय को क्रियांवित करने में यदि मनुष्य की मृत्यु भी हो जाय तो भी यह दूसरे के जोखिम विहीन निर्णय की अपेक्षा अधिक अच्छा है । व्याख्याकार कहता है अपने कर्म दायित्व का निर्णय अपने विवेक द्वारा ही करना चाहिये । यदि कंचिद विवेक का निर्णय रुचि के विपरीत है कडुआ है तो भी हमें विवेक के निर्णय पर ही मृत्यु पर्यंत सत्यनिष्ठा से आचरण करना चाहिये । विवेक ही कर्म की गुणवत्ता का मानक है । 

गुरुवार, 7 मई 2015

प्रकृति और दायित्व : चरण 3

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि प्रत्येक इंद्री को, उसकी वासना वस्तु के प्रति, कुछ रुचियाँ और कुछ अरुचियाँ होती हैं । प्रकृति के संचालन द्वारा मनुष्य इन्ही रुचियों और अरुचियों के सीमा में आचरण करता है । व्याख्याकार गुरू के कथन की व्याख्या करते हुये कहता है कि हमें अपने विवेक के द्वारा इन रुचियों और अरुचियों के क्रियांवन में हस्तक्षेप करना चाहिये । यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो हमारे कृत पूर्णतया भावुकता द्वारा संचालित होंगे । हमारी रुचियाँ और अरुचियाँ ही हमारा स्वरूप बन जावेगीं । जब तक हम कोई कार्य करते हैं इसलिये कि वह करना हमें प्रिय लगता है अथवा कोई कार्य हम नहीं करते इसलिये कि हमें वह कार्य करना हमें अप्रिय लगता है तब तक हमारे कर्म बंधनकारी होंगे । परंतु यदि हम इन रुचियों और अरुचियों को अपने विवेक द्वारा नियंत्रित कर सकें और कर्म को दायित्व के बोध और वाँक्षनानुसार करें तो हम प्रकृति के खिलौने नहीं रह जावेंगे । मनुष्य की स्वतंत्रता विवेक के प्रयोग के अधीन होती है । प्रकृति की दासता बाध्यता नहीं है । 

बुधवार, 6 मई 2015

प्रकृति और दायित्व : चरण 1

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि ज्ञानी पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुरूप कार्य करते हैं । प्रत्येक मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुरूप कार्य करता है । मनुष्य की रुचिंयाँ अपने को कर्म में व्यक्त करती हैं । व्याख्याकार उपरोक्त कथन को स्पष्ट करते हुये कहता है कि प्रत्येक मनुष्य का जन्म एक मस्तिष्क के साथ हुआ है जिसका संचालन प्रकृति करती है । इस यंत्र की गुणवत्ता उसके पूर्व जन्म के कर्मों के अनुरूप रहती है । इसके क्रिया सम्पादन को भगवान भी नहीं रोक सकते हैं । इस यंत्र का संचालन प्रकृति की सतत् चलने वाली प्रक्रिया करती है इसलिये इसमें कोई विघ्न भी सम्भव नहीं होता है । आत्मा मात्र दृष्टा होती है । इससे व्यक्त होता है कि प्रकृति अति शक्तिशाली व्यवस्था है जो आत्मा को अपनी योजना के अनुरूप कार्य करने को बाध्य करती है । यही जीव के अस्तित्व का नियम भी है । यह गुरू का कथन आह्वाहन करता है कि हम अपने सत्य प्रकृति को जाने तथा तद्नुसार अपने सत्य स्वरूप में अपने को प्रस्तुत करें । 

मंगलवार, 5 मई 2015

कर्म विधि

आत्मा का सत्य मौलिक रूप, प्रकृति और उसके गुण, कर्ता तथा दृष्टा समस्त बताने के उपरांत अर्जुन को उपरोक्त सभी ज्ञान को कर्म में चरितार्थ करने की विधि सुझाते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन तुम अपने समस्त कर्मों को मुझे अर्पित करके, मात्र अपने अहंकार और इच्छा को नियंत्रण में रखते हुये, कार्य करो । व्याख्याकार गुरू के उपरोक्त कथन को स्पष्ट करते हुये कहता है कि मनुष्य इसी सही के चुनाव में ही तो धोखा खाता है । अपनी इच्छा के कर्मों को वह दायित्व के कर्म मान बैठता है । इसलिये योगेश्वर बताये कि कर्मों को मुझे अर्पित करो । अर्थात् चुनाव भी मुझपर छोड दो । यही विश्वास का स्थल होता है । फिर यदि ईश्वर रोके तो रुकना भी चाहिये । यही स्थिति सही और गलत का भेद उत्पन्न करती है । 

सोमवार, 4 मई 2015

द्वैत की सत्य क्षवि

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जो पुरुष आत्मा का शुद्ध मौलिक स्वरूप तथा गुणात्मक प्रकृति और उसके गुणों द्वारा किये जा रहे कर्मों का स्पष्ट भेद अच्छे से देखते रहते हैं वे पुरुष समस्त कर्मों को होते देख यह पाते हैं कि प्रकृति के गुण गुणों पर कैसे प्रभाव डाल सारे कार्य कर रहे हैं । सच्चे स्वरूप में आत्मा कर्मों की मात्र दृष्टा होती है । 

रविवार, 3 मई 2015

मौलिक स्वरूप

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि आत्मा का सत्य मौलिक स्वरूप शाश्वत् ब्रम्हरूप होता है जो कि अपने सत्य आचरण के लिये सचेत होता है । परंतु जब आत्मा अपने आचरण के प्रति अचेत होकर प्रकृति के गुणों से मोहित होकर इच्छाजनित कर्मों को प्रेरित करने को उद्यत हो जाता है तो आत्मा का यह अहंकारी स्वरूप उसे प्रकृति का दास बना देता है । सच्चे स्वरूप में आत्मा किसी कर्म का कर्ता नहीं होता है । 

शनिवार, 2 मई 2015

भ्रामक परिचय

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि यद्यपि कि समस्त कर्मों की कर्ता गुणात्मक प्रकृति है परंतु वह आत्मा जिसे अहंकार का भ्रमकारी मोंह व्याप्त रहता है उन कार्यों को अपना कह कर बताती है । उस भ्रमित आत्मा को यह विस्मृत हो जाता है कि प्रकृति स्वयं दूसरी शक्तियों पर आश्रित होती है । अपने इस दुर्गुण के कारण आत्मा का कर्म प्रेरण दोषयुक्त हो जाता है । ऐसी भ्रमित आत्मा उस प्रकृति का दास बनकर रह जाता है । 

शुक्रवार, 1 मई 2015

कर्म की व्याख्या

विगत अंकों में कर्म करने की विधि के सम्बंध में निष्कर्म, यज्ञ स्वरूप कर्म, तथा आत्मबोध शीर्षकों में जितने भी वृतांत प्रस्तुत किये गये हैं उनमें उभयनिष्ठ रूप से जो बाते विद्यमान हैं (1) समस्त रूप संसार के प्रत्येक रूप में एक एकल सत्य ब्रम्ह विद्यमान है (2) प्रकृति ब्रम्ह की रचना है जिसकी उत्पत्ति ब्रम्ह के विज्ञान द्वारा सम्भव हुई है (3) समस्त कर्मों का प्रेरक स्वयँ ब्रम्ह है (4) समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है । इन तथ्यों को मस्तिष्क में विधिवत् धारण करने पर मोंह और अहंकार स्वत: की अनुभूति में एक भ्रमके समान लगने लगेगा । इन प्रकृति निर्मित रूपों की रचागत कमी होती है कि जन्म से ही वह मोंह और अहंकार को अपनी धरोहर के रूप में मानने लगता है । इन्ही भ्रमकारी दोषों के निवारण के लिये ही समस्त कर्म करने के सही उपाय सुझाये गये हैं ।