सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

रूप विस्तार चरण 4

ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से प्रगट करने वाले रूपोंकी गणनाको और आगे बढाते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले हे अर्जुन विद्वान पुजारी संतों में मुझे ब्रहस्पति जानो, वीर सेनापतियों में में मुझे स्कंध जानो,और जलाशय तालाबों में मुझे समुंद्र जानो । 

रविवार, 30 अक्टूबर 2016

अग्नि

ब्रम्ह की आठवर्गीय निम्नतर प्रकृति का यह एक घटक है ।इसकी उत्पत्ति घर्षण से होती है । इसकी प्रचण्ड ज्वाला अन्य रूपों को जलाकर भस्म करने में सक्षम होती है । समस्त बलि की ग्रहणकर्ता होती है ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।  

शनिवार, 29 अक्टूबर 2016

वसुओं

वेदों मे वसुओं को इंद्रके सहायक देवता के रूप में माना जाता है । इन्हे संख्या  में आठ बताया गया है । ये प्रकृति के आठ वर्गों के स्वामी देवता होते हैं । इस रूप में इन्हे अष्टवसु कहा जाता है । इनके नाम वसु का अर्थ होता है “वसने वाले” अथवा “वासिंदे” । 

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

कुबेर

हिंदू धर्म दर्शन में कुबेर को धन-सम्पत्ति के रूप में जाना जाता है । इन्हे यक्ष के शासक के रूप में जाना जाता है । स्मरणिय है कि यक्ष को अर्धपावन देवरूप माने जाते है । इन यक्षों की उत्पत्ति राक्षसों के साथ हुई परंतु सात्विक वृत्ति के होने के कारण इन्हे अर्ध-पावन देवता के रूप में पूजा भी जाता है । 
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।  

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

यक्ष और राक्षस

ब्रम्ह की शरीर से उत्पन्न हुये असुरों में से कुछ सात्विक वृत्ति के थे उन्हे यक्ष नाम दिया गया और कुछ चीख रहे थे कि ब्रम्हा को ही “खा जावो” उन्हे राक्षस नाम दिया गया । यक्ष को प्राचीन काल में जंगलों एवं गाँवो के देवता की मान्यता थी जो कि बाद के समयों में गडे हुये धन के खज़ाने के देवता के रूप में विस्तृत हुई । राक्षसों को विशाल और बलशाली शरीर के लिये जाना जाता है । 

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

शंकर

शंकर शब्द की विभक्ति करते हुये निकाले गये अर्थ बनते हैं (1) अच्छे कर्मों को करने वाले (2) शंसय का निवारण करने वाले । शिव भगवान को संगीतमय मधुर ध्वनि तरंगो के देवता के रूप में भी जाना जाता है । भगवद्गीता में ग्रंथ के ग्रंथकार ने गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुखसे “साम” शब्द से व्यक्ति के आत्मा की ब्रम्ह चेतना में तन्मयता को व्यक्त करनेके लिये किया है । भगवान शंकर इसी स्थिति के साक्षात् प्रगट रूप प्रतीक हैं ।  

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016

रूद्र

ऋग वेद में रूद्र को तेज हवाओं के तूफान के देवता के रूप में बताया गया है । इस नाम का रूपांतर करते हुये ऋगवेद में ही इन्हे “दहाडने वाले” के नाम  से भी कहा गया है । इन्हे शक्तिशालियों में सर्वाधिक शक्तिशाली बताया गया है । 

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

रूप विस्तार चरण 3

ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से व्यक्त करने वाले रूपों की गणना आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि रूद्रों में मैं शंकर हूँ, यक्ष और राक्षसों में मैं कुबेर हूँ, वसुओं में मैं अग्नि हूँ, पर्वत शिखरों में मैं मेरु हूँ । 

रविवार, 23 अक्टूबर 2016

चेतना

प्रत्येक रूप ब्रम्ह की प्रकृति का सृजन है । ब्रम्ह प्रकृति दो भागो में विभक्त की जाती है । निम्नतर प्रकृति पराधीन, रूपधारी, गुणयुक्त होती है जबकि उच्चतर प्रकृति स्वतंत्र, अरूपधारी, अक्षर होती है । यह उच्चतर प्रकृति रूपधारी प्रकृति के गुणों के अध्यास के फल से अपनी ब्रम्ह स्वरूप को कलंकित कर लेती है । इसी विस्मृत चेतना को जागृत करना तथा जागृत रखना धर्म दर्शन का प्रधान लक्ष्य होता है । 

शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

भूतानाम

ब्रम्ह की अभिव्यक्ति रूप हैं । अखण्ड, अक्षर, अव्यक्त ब्रम्ह जब अपने को विनाशशील, असत्य रूपों में प्रगट करता है तो वह एक रहस्य बन जाता है । यह रहस्य इतना विस्तृत हो जाता है कि व्यक्ति ब्रम्ह के प्रति ही अचेत हो जाता है । फिर यह अज्ञान से आच्छादित व्यक्ति अज्ञानके मध्य ही भटकता फिरता है । 

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

विवेक

यह भी ब्रम्ह की आठ वर्गीय निम्नतर प्रकृति का सातवाँ घटक होता है । यह बाह्य अथवा आंतरिक किसी भी विषय वस्तु के प्रति जागरूकता का मानक होता है । इस विवेक की प्रकृति का निरूपण अथवा अभिव्यक्ति धर्मदर्शन का गूढतम विषय होता है । मनुष्य का उत्कर्ष इस विवेक के प्रखर विकास एवं इसके द्वारा सक्षमता से मस्तिष्क की क्रियाँओं को नियंत्रित करने पर ही निर्भर करता है । 

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016

मस्तिष्क

मनुष्य शरीर की रचना मे प्रयुक्त ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति के आठ घटको में से यह छठा है । यह इंद्रियों के संचालन और नियंत्रण दोनों का ही केंद्र होता है । यह विवेक के अधीन कार्य करता है । इसकी क्रिया पद्धति धारणाओं पर आधारित होती है । उच्चतर प्रकृति की प्रतीक आत्मा इसी मस्तिष्क के कार्य पद्धति के पथ से ही प्रकृतीय मोंह से ग्रसित होती है । 

बुधवार, 19 अक्टूबर 2016

इंद्रियाँ

नसों का समूह जो कि किसी विशिष्ट ज्ञान चेतना को ग्रहण करने के लिये शरीरकी रचना में प्रयुक्त किया गया है । मनुष्य शरीर में पाँच विशिष्ट ज्ञान चेतना के ग्रहणकर्ता पथ उपलब्ध होते हैं जिन्हे नामत: दृष्टि, श्रवण, स्वाद, घ्राण तथा स्पर्ष कहा जाता है । 

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016

इंद्र

हिंदू धर्मदर्श्न में इंद्र को देवताओं के राजा के रूप में मान्यता है । इसलिये जितने भी सुखभोग तथा वैभव की कल्पना की जा सकती है उसके ये अधिपति होते हैं । वर्षा इनके आधिपत्य के क्षेत्र की मानी जाती है । 

सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

देव

देव शब्द में निहित भाव होता है - स्वर्ग के तुल्य - कोई आदर्णीय वैभव जिसे असाधारण माना जाय । हिंदू धर्ममें इसी शब्द के द्वारा किसी भी रूप को पूजा जाता है । बौद्ध धर्म में भी इस शब्द को उपरोक्त निष्ठा द्वारा ही मान्यता दी जाती है । यह शब्द संस्कृत और पाली लिपि से है । 

रविवार, 16 अक्टूबर 2016

सामवेद

यह हिंदू धर्म के प्राचीनतम संस्करण के लेख हैं जिन्हे कि वैदिक संस्कृत में प्राचीन भारत में लिपिबद्ध किया गया है । इनकी संख्या चार है (1) ऋगवेद (2) यजुर्वेद (3) सामवेद (4) अथर्वेद । इनमें देवताओं के कृतों को मनुष्य की भाषा में लिखा गया है । इन्हे लिपिबद्ध एवं श्रेणीबद्ध वेद्व्यास ऋषि ने किया था । ज्ञातव्य है कि भगवद्पुराण में ऋषि वेद्व्यास को भगवान के 24 अवतारों की गणना में एक बताया गया है । लिपिबद्ध होने से पूर्व यह श्रुति परम्परा द्वारा गुरू से शिष्य में अंतरण द्वारा संचरित हो रहे थे । इसलिये वेदांत में इन्हे श्रुति प्रमाण के सम्मानित शब्द द्वारा ही व्यक्त किया जाता है ।  

शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

वेद

यह हिंदू धर्म के प्राचीनतम संस्करण के लेख हैं जिन्हे कि वैदिक संस्कृत में प्राचीन भारत में लिपिबद्ध किया गया है । इनकी संख्या चार है (1) ऋगवेद (2) यजुर्वेद (3) सामवेद (4) अथर्वेद । इनमें देवताओं के कृतों को मनुष्य की भाषा में लिखा गया है । इन्हे लिपिबद्ध एवं श्रेणीबद्ध वेद्व्यास ऋषि ने किया था । ज्ञातव्य है कि भगवद्पुराण में ऋषि वेद्व्यास को भगवान के 24 अवतारों की गणना में एक बताया गया है । लिपिबद्ध होने से पूर्व यह श्रुति परम्परा द्वारा गुरू से शिष्य में अंतरण द्वारा संचरित हो रहे थे । इसलिये वेदांत में इन्हे श्रुति प्रमाण के सम्मानित शब्द द्वारा ही व्यक्त किया जाता है ।  

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

रूप विस्तार चरण 2

ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से व्यक्त करने वाले रूपों की गणना को और आगे बढाते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि वेदों में मैं सामवेद हूँ, देवताओं में मैं इंद्र हूँ, इंद्रियों में मैं मस्तिष्क हूँ, और प्राणियों में मैं विवेक हूँ । 

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

मरिसि

सप्तऋषियों के मण्डल को मरिसि बताया गया है । इन ऋषियों को प्रकृति के विभिन्न ऊर्जा श्रोतों का नियंत्रक बताया गया है । इस रूप संसार के सृजन काल में ब्रम्ह ने इन ऋषियों को रूप दिया था और इन्हे रूप संसार की रचना में अपने सहायक के रूप में प्रयोग किया था । पित्त और अग्नि के मध्य सम्बंध को भी इसी शब्द द्वारा व्यक्त किया जाता है । 

बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

मरुत

वेदों में इनका वर्णन आया है । इन्हे रूद्र का पुत्र बताया गया है । ऋगवेद में इन्हे वायु के तूफानों का देवता कहा गया है । इन्हे साहस और नैतिकता का प्रतीक योद्धा बताया गया है । इन्हे इंद्र के सहायक के रूप में भी बताया गया है । 

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

चंद्रमा

यह स्वयं प्रकाश श्रोत नहीं है । परंतु इसका विदित स्वरूप प्रकाश श्रोत के रूप में ही है । प्रकाश का सामान्य ताप इसमें नहीं है बल्कि शीतलता का प्रतीक है । ब्रम्ह के अद्भुद विज्ञान का गणमान्य उदाहरण है । ब्रम्ह के अद्वितीय स्वरूप को विशिष्टता से प्रगट करने वाला है । 

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

विकिरणकर्ता सूर्य

ब्रम्ह की अद्वितीय प्रतिभा – सभी रूपोंका आधार होते हुये भी वह किसी रूप में नहीं है, सभी कर्मों का प्रेरक होते हुये भी वह किसी कार्य का कर्ता नहीं है । ब्रम्ह के इन गुणों को प्रकाश के क्षेत्र में सूर्य प्रगट करता है । भू-मण्डल के समस्त रूपों को प्रकाशित करता है, परंतु किसी भी रूप से उसका सम्पर्क नहीं है । भू-मण्डल के समस्त रूप उस सूर्यसे उर्जा पाते हैं परंतु उस सूर्य का किसी भी रूप से सम्पर्क नहीं है । ब्रम्ह को निरूपित करने का प्रतीक चमकता सूर्य । 

रविवार, 9 अक्टूबर 2016

आदित्य

वेदों में वर्णित देवताओं को आदित्य कहा गया है । गुरू ने पूर्व के उपदेश में जिस तुलनात्मक अभिव्यक्ति का उपदेश किया था उसकी गणना कराते हुये गुरू ने ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से व्यक्त करेने में विष्णु को आदित्यों में सर्वश्र्ष्ठ अभिव्यक्ति का बताया । इस स्थल पर पुन: स्मरण कराना विषय के अनुरूप होगा कि ब्रम्ह की जो अद्वितीय महिमा उनके उच्चतर प्रकृति में है कि वह समस्त रूपों का उद्गम आधार होते हुये भी समस्त से अछूता रहती है । इसका परिचय विष्णु में सर्वाधिक देखा जा सकता है । 

शनिवार, 8 अक्टूबर 2016

रूप विस्तार : चरण 1

ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से व्यक्त करने वाले रूपों की गणना कराते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि आदित्यों में मैं विष्णू हूँ, प्रकाश में मैं चमकता हुआ सूर्य हूँ, मरुतों में मैं मारीच हूँ, और तारों में मैं चंद्रमा हूँ । 

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

समता का विस्तार

समस्त भू-लोक पर फैला हुआ मानव समाज जिसमें भाषायें भिन्न है, मान्यतायें भिन्न हैं, वृत्तियाँ भिन्न हैं परंतु इन समस्त भिन्नताओं के रहते हुये भी यह समस्त एक सूत्र में बँधा हुआ है । गुरू का उपदेश प्रशस्थ करता है कि इस बंधन का रहस्य यह है कि प्रत्येक का अस्तित्व एक ब्रम्ह की कृपा पर आधारित है । 

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

समता की डोर

इस ब्रम्हाण्ड के समस्त अवयव घटक यथा पृथवी, समुंद्र, आकाश, सौर मण्डल सभी एक संतुलन के साथ अपने रूपों में स्थिर हैं । गुरू का उपदेश बताता है कि इन समस्त को यह रूप और संतुलन ब्रम्ह की कृपा द्वारा मिला है । इसकी स्थिरता भी ब्रम्ह की कृपा पर ही निर्भर है । अंत समय आने पर इस संतुलन का विध्वंस भी ब्रम्ह में विलय में ही होगा । 

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

हृदय में वासी

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले हे गुणाकेश (अर्जुन) मैं प्रत्येक जीव के हृदय में वास करता हूँ । मैं ही इस रूप संसार में व्याप्त समता का प्रारम्भ हूँ. मैं ही इस समता का अंतिम अंत भी हूँ । 

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

तुलनात्मक दृष्टांत

ब्रम्ह की अविनाशी प्रकृति के विद्यमान होने पर ही रूप अपनी प्रकृति ग्रहण करता है, स्वरूप में स्थिर होता है । फिरभी कुछ रूप अपेक्षाकृत ब्रम्ह की उपस्थिति को अधिक सक्षमता से निरूपित करते हैं यथा ज़ड पदार्थों की अपेक्षा जीव रूप, जीवन की अपेक्षा विवेक, साधारण जनसमुदाय की अपेक्षा संत, ब्रम्ह की उपस्थिति को अधिक सक्षमता से प्रगट करने वाले होते हैं । 

सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

आशिर्वचन की व्याख्या

गुरू का उपदेश है कि ब्रम्ह के विस्तार का अंत नहीं है, फिरभी अध्ययन काल में ब्रम्ह की अभिव्यक्ति तुलनात्मकरूप से कुछ रूपों में अधिक विदित दीखने वाली होती है । इसलिये गुरू ने जिज्ञासु को प्राम्भिक काल में ध्यान के लिये कुछ मुख्य मुख्य रूपो को बताने के लिये कहा है । इस स्थल पर स्मरणीय है कि जिज्ञासु अर्जुन ने यही जिज्ञासा व्यक्त की थी कि मैं ध्यान करने के समय किस रूप का ध्यान कर ब्रम्ह में मस्तिष्क को ध्यान काल में केंद्रित करूँ । 

रविवार, 2 अक्टूबर 2016

गुरू का आशिर्वचन

जिज्ञासु अर्जुन के द्वारा व्यक्त अपने मानसिक प्रश्नों की तुष्टि करते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले हे कुरू श्रेष्ठ अर्जुन मैं तुम्हे अपने दैविक रूपों को बताऊँगा जिन्हे तुम अधिक सरलता से ग्रहण कर सकोगे क्योंकि हमारे विस्तार का कहीं अंत नहीं है । 

शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

जिज्ञासा का रहस्य

ज्ञानका जिज्ञासु अर्जुन, गुरू योगेश्वर जो कि स्वयं ब्रम्ह स्वरूप हैं, से उस ब्रम्ह की उस अद्भुद शक्ति को बताने का आग्रह करना चाहता है अथवा किया है, कि ब्रम्ह किस प्रकार इस रूप संसार के प्रत्येक रूप को अपनी प्रकृति प्रदान करता है । निर्विवाद रूप से ब्रम्ह की यह शक्ति अद्भुद है जिसके द्वारा उसने समस्त रूपों को सजीव कर दिया है ।