कोई भी व्यक्ति जबभी कोई प्रार्थना करता है, इससे सर्वप्रथम उसकी ईश्वर के प्रति आस्था
विदित होती है । इस आस्था के सहारे वह व्यक्ति अपने अंदर उपस्थित अभिमान, लालच, भय और इच्छाओं को जानने में सफल होता है । शनै: शनै: उसे ऐसा
अहसास होता है कि कंचिद उसे ईश्वर से ऐसी भौतिक वस्तुओं को नहीं माँगना चाहिये ।
पुन: अनुभव बढने पर वह ईश्वर से ज्ञान माँगने लगता है । परंतु यह प्रार्थना द्वारा
मांगने की समस्त प्रक्रिया मूल रूप से ईश्वर को अपनी इच्छाओं की पूर्ति का श्रोत
के रूप में प्रयोग करने का भाव प्रगट करती है । जबकि एक संत ईश्वर की सेवा अपने
आराध्य की सेवा के भाव से करता है और अपने को ईश्वर के सम्मुख एक सेवक के रूप में
प्रस्तुत करके विनय करता है कि हे ईश्वर मेरी सेवा आपको जैसे अनुकूल हो ग्रहण करें
। यही सर्वोत्तम स्वरूप है और भाव है ।
गुरुवार, 31 दिसंबर 2015
बुधवार, 30 दिसंबर 2015
अच्छों में सर्वोत्तम
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन
को बताये कि मेरे सभी उपासक अच्छे हैं परंतु जो संत मुझसे युक्त होने के लिये मुझे
ही अपना सर्वोच्च लक्ष्य निर्धारित करके मुझपर समर्पित भाव से निर्भर करता है वह
सर्वोत्तम होता है ।
मंगलवार, 29 दिसंबर 2015
सर्वाधिक प्रिय की व्याख्या
गुरू द्वारा बताये गये भक्तों के वर्गीकरण तथा उनमें सर्वश्रेष्ठ
का निरूपण का आधार यह है कि कौन कितना माया के लोक के प्रति आसक्त है और कौन कितना
ब्रम्ह के ज्ञान तथा उनकी मर्यादा के अनुरूप अपना जीवन यापन बनाने का जिज्ञासु है
। जिन्हे ब्रम्ह का ज्ञान हो गया है वे व्यक्ति मोंह की आसक्ति से मुक्त हो गये
हैं उनके लिये ब्रम्ह की सेवा ही सर्वोच्च धर्म है । ऐसे व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ हैं
।
सोमवार, 28 दिसंबर 2015
सतत् युक्त सर्वश्रेष्ठ
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि समस्त पूजने वालों में वह
व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ है जो कि प्रतिपल ब्रम्ह के साथ जुडे हुये हैं, जिनकी भक्ति एकनिष्ठ है । ऐसे व्यक्तिके
लिये ब्रम्ह ही सबसे प्रिय है और ब्रम्ह को ऐसे भक्त प्रिय हैं ।
रविवार, 27 दिसंबर 2015
वर्गीकरण की व्याख्या
गुरू बताये कि वह व्यक्ति जिन्हें दु:ख, दरिद्र, परेशानियाँ घेरे हुये हैं भगवान को
एक सहायता श्रोत के रूप में याद करते हैं । दूसरे वे लोग जिन्हे ढेर सा धन पाने की
कामना होती है वे भगवान को एक दानी श्रोत के रूप में याद करते हैं । तीसरे वह लोग
जिन्हे ज्ञान पाने की कामना है वे लोग भगवान की कृपा के लिये उनकी पूजा करते हैं ।
चौथे वह लोग जिन्हे ज्ञान प्राप्त है वे भगवान की सेवा को सर्वोच्च कर्म के रूप
में करते हैं ।
शनिवार, 26 दिसंबर 2015
वर्गीकरण
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मुझे चार प्रकार के
लोग पूजते । प्रथम वे जो परेशानियों में
होते हैं । द्वितीय वह जिन्हे धन की कामना है । तृतीय वह लोग जिन्हे ज्ञानपाने की
अभिलाषा है । चौथे वह जिन्हे ज्ञान प्राप्त है ।
शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015
सात्विक के पथसे
गुरू ने ब्रम्ह की शरण न ग्रहण करने वाले व्यक्तियों का वृतांत
बताया । ऐसे व्यक्तियों को प्रयत्नपूर्वक सद्वृत्ति में प्रवृत्त होने के लिये रज़स
और तमस का त्याग करना चाहिये । पुन: उन्हे सद्वृत्ति को भी त्यागना ही होगा
क्योंकि सद्वृत्ति भी बंधनकारी ही होता है । परंतु प्रारम्भिक अवस्था में उन्हे
रज़स और तमस से मुक्ति पाने के लिये सात्विक को पाना ही लक्ष्य करना होगा ।
गुरुवार, 24 दिसंबर 2015
दुर्वृत्तियों में सम्मलित
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि दुर्वृत्तियों में
सम्मलित व्यक्ति जो कि मानवता के मानको पर निम्न स्तर के हैं, जिनका मस्तिष्क मोंह और अज्ञान से आच्छादित
है, जोकि दुरात्माओं के दुष्कृतों में
सम्मलित होते हैं, वह मेरी शरण में नहीं आते हैं ।
बुधवार, 23 दिसंबर 2015
भ्रम का निमित्त
माया जो कि मनुष्य के मस्तिष्क में व्याप्त समस्त मोंह और भ्रम
की जननी होती है को गुरू ने अजेय बताया है । ब्रम्ह स्वयं इन गुणों का रचयिता है ।
मनुष्य ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति की रचना है जो कि ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति के
सहारे पर स्थिर है में कंचिद यह क्षमता नहीं है कि वह ब्रम्ह द्वारा निर्मित माया
की शक्ति का अतिक्रमण कर सके । इसका अतिक्रमण ब्रम्ह की कृपा द्वारा ही सम्भव है ।
मंगलवार, 22 दिसंबर 2015
कठिन माया
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मेरी माया जो कि
प्रकृति के तीन गुणों से युक्त होती है,
को जीत पाना किसी भी व्यक्ति के लिये अति दुष्कर है । परंतु जो व्यक्ति मुझमें शरण
ग्रहण करके प्रयत्न करता है वह ही इसे जीतने में सफल हो सकता है ।
सोमवार, 21 दिसंबर 2015
अनभिज्ञता का वृतांत
गुरू यह दु:ख व्यक्त किये कि संसार ब्रम्ह को जानता नहीं है ।
ब्रम्ह जो कि सदा विद्यमान रहने वाला है,
शुद्ध है, स्वतंत्र है, जिसे किसी विशिष्ट गुण द्वारा निरूपित नहीं
किया जा सकता है और जिसे जानने मात्र से समस्त दुर्वृत्तियों का अंत हो जाता है ।
हम संसार के रूपों को देखते हैं परंतु हम उस सत्य को नहीं देख पाते हैं जिससे इन
समस्त रूपों की उत्पत्ति हुई है ।
रविवार, 20 दिसंबर 2015
सत्य से अनभिज्ञ
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको बताये कि प्रकृति के इन्ही
तीनों गुणों के द्वारा पूरा संसार मोंह में फँसा है और मुझे नही जान पाता है कि इन
गुणों से परे अक्षर सत्य क्या है ।
शनिवार, 19 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 5 की व्याख्या
ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति के तीन गुणों की उत्पत्ति भी गुरू
ब्रम्ह से बताते हैं । निम्नतर प्रकृति इन्ही तीनों गुणों के द्वारा उच्चतर
प्रकृति आत्मा को अपने प्रति मोंह में आसक्त करती है । इस प्रकार यह ब्रम्ह का
अद्भुद विज्ञान है कि वह अपनी ही उच्चतर प्रकृति को अपनी ही निम्नतर प्रकृति के
मोंह में बाँधने के लिये आधार स्वयँ रचे हैं । इन्ही गुणों के प्रभाव द्वारा
स्वतंत्र आत्मा परतंत्र प्रकृति के वश में रहता है ।
शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015
रूप विस्तार चरण 5
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि प्रकृति के तीनो
गुण नामत: सत्व, रज़स, तमस का सृजनकर्ता मैं हूँ । मैं उनमें हूँ नहीं परंतु वह मुझसे
ही हैं ।
गुरुवार, 17 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 4 की व्याख्या
इस श्लोक में गुरू ने इच्छा
पूर्ति की कामना – काम, जो प्राप्त हो चुका है उसकी सुरक्षा – राग दो अलग शब्दों द्वारा व्यक्त किया
है । श्लोक के उत्तरार्ध में गुरू ने कहा कि जीवों में पायी जाने वाली सत्य को
जानने की कामना मैं हूँ । बिना इच्छा के तो कुछ पाया नहीं जा सकता है । व्यक्तिगत
इच्छा को वर्जित बताया गया है । इसके विपरीत सत्यको जानने की इच्छा के लिये ब्रम्ह
कहे कि मैं स्वयं हूँ ।
बुधवार, 16 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 4
ब्रम्ह के व्यापक विस्तार को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण कहे कि मेरे वीर योद्धा अर्जुन मैं बलवान का बल हूँ,
मैं इच्छा और संचय की कामना से परे हूँ,
जीवों में ज्ञान प्राप्ति की चेतना मैं हूँ
मंगलवार, 15 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 3 की व्याख्या
गुरू ने ब्रम्ह के व्यापक विस्तार की गणना में इस श्लोक में उदाहरणों
को बताकर यह उपदेश किये हैं कि यह रूप संसार जोकि ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति
द्वारा बना है और ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति के अवलम्ब पर स्थिर है की निरंतरता
ब्रम्ह स्वयँ साधते हैं ।
सोमवार, 14 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 3
व्यापक ब्रम्ह के विस्तार को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे हे पार्थ मैं सभी जीवों की उत्पत्ति का सदैव रहने वाला
कभी नष्ट न होने वाला वीर्य हूँ, मैं बुद्धिमानों की बुद्धिमत्ता
हूँ, मैं प्रत्येक सुंदर स्वरूप की
सुंदरता हूँ ।
रविवार, 13 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 2 की व्याख्या
गुरू ब्रम्ह के व्यापक विस्तार
की गणना को आगे बढाते हुये कहे कि पृथ्वी का परिचय उसकी गंध, अग्नि का परिचय उसका तेज, जीव का परिचय उसका प्राण, तपस्वी का परिचय उसकी सरलता, यह सभी मैं स्वयं हूँ । स्मर्णीय है कि समस्त रूपो का
सृजन ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति के घटको द्वारा हुआ है जो अपने स्वरूप में ब्रम्ह
की उच्चतर प्रकृति आत्मा के सहारे स्थिर है । इन समस्त प्रकृतीय स्वरूपों की पहचान
स्वयं ब्रम्ह हैं ।
शनिवार, 12 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 2
ब्रम्ह के व्यापक विस्तार को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को बताये कि मैं पृथ्वी में गंध हूँ, मैं अग्नि में तेज हूँ, समस्त जीवों में प्राण हूँ और तपस्वी की सरलता हूँ ।
शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 1 की व्याख्या
गुरू बताये कि मैं जल में व्यप्त उसका स्वाद हूँ, चंद्रमा और सूर्य में विसर्जित होने वाला
प्रकाश हूँ, चारों वेदों में अक्षर ओइम् हूँ, आकाश में ध्वनि हूँ, और मानवो में मानवता हूँ । प्रत्येक उदाहरण
में चिर सत्य ब्रम्ह स्वयं है । जल का चिर सत्य स्वाद, चंद्रमा और सूर्य की पहचान उनका प्रकाश, वेदों में वर्णित अविनाशी सत्य ब्रम्ह है, आकाश की विलक्षणता ध्वनि संचार और मनुष्य
का आकर्षण उसकी मानवता ब्रम्ह स्वयं हैं ।
गुरुवार, 10 दिसंबर 2015
विस्तार : चरण 1
इस संसार की संरचना बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन
से कहे कि मैं जल में स्वाद हूँ, हे कुंती पुत्र अर्जुन मैं सूर्य
और चंद्रमा में प्रकाश हूँ, मैं वेदों में अक्षर ओइम् हूँ, मैं आकाश में ध्वनि हूँ और मानवों में
मानवता हूँ ।
बुधवार, 9 दिसंबर 2015
सर्वोच्च की व्याख्या
जिस ब्रम्ह की प्रकृति मात्र से यह समस्त संसार सृजित हुआ है उस
ब्रम्ह की तुलना में उसकी रचना स्वाभाविक रूप से छोटी ही है । गुरू द्वारा इस
तुलनात्मक अभिव्यक्ति को मुख्यत: क्षमता के निरूपण के लिये प्रयोग किया गया है ।
समस्त संसार ब्रम्ह की शक्ति द्वारा अपने स्वरूप में स्थिर है ।
मंगलवार, 8 दिसंबर 2015
सर्वोच्च
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि हे अर्जुन इस संसार
में मुझसे बडा कुछ भी नहीं है । यह पूरा संसार मुझ पर इस प्रकार लम्बित है जिस
प्रकार माले के तागे पर मणियाँ गुँथी रहती हैं ।
सोमवार, 7 दिसंबर 2015
सीमा की व्याख्या
गुरू द्वारा जीव के उत्पत्ति और विलय के सम्बंध में उपदेश यह
विदित करता है कि यह ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति एवं उच्चतर प्रकृति का संयोग है
जिससे यह रूप संसार सृजित हुआ है, उसी ब्रम्ह के सहारे द्वारा अपने
रूप में स्थिर है, और अंत में विलय भी उसी ब्रम्ह में
ही होगा । इस प्रकार इस दृष्य रूप संसार की उत्पत्ति, मध्य, अवसान सभी ब्रम्ह है ।
रविवार, 6 दिसंबर 2015
सीमा निर्धारण
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि प्रत्येक रूपधारी
जीव की उत्पत्ति इस प्रकार मुझसे ही सम्भव हुई है । मैं ही इस सृष्टि की उत्पत्ति
का मूल हूँ और इसका विलय भी मुझमें ही होता है ।
शनिवार, 5 दिसंबर 2015
अपरा में परा स्थापित
आठ वर्गीय निम्नतर प्रकृति द्वारा निर्मित शरीर में उच्चतर
प्रकृति आत्मा स्थापित है । यह आत्मा शरीर की इंद्रियों, मस्तिष्क, विवेक का प्रयोग करता है जिससे
अहंकार का जन्म होता है । यह अहंकार शरीर के अंगों का प्रयोग अपनी इच्छाओं की
पूर्ति मे करता है । प्रत्येक रूप एक क्षेत्र है जिसका कि आत्मा क्षेत्रज्ञ है ।
क्षेत्रज्ञ और क्षेत्र की परस्पर क्रिया द्वारा कर्म की उत्पत्ति होती है
शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015
रूप संसार की व्याख्या
परम् ब्रम्ह इस रूप संसार का वैयक्तिक स्वामी है । उसकी इस
सत्ता में, उसकी आठ वर्गीय निम्नतर प्रकृति
जिसे कि क्षेत्र कहा जाता है और उच्चतर प्रकृति आत्मा जिसे कि क्षेत्रज्ञ कहा जाता
है. रूप धारण कर फैले हुये हैं । शरीर रूपी क्षेत्र में आत्मा रूपी क्षेत्रज्ञ
निवास करता है । इस प्रकार इस रूप संसार के समस्त रूप उस अखण्ड परम् ब्रम्ह की
निम्नतर प्रकृति द्वारा निर्मित शरीरों के ढाँचे में उसकी उच्चतर प्रकृति आत्मा के
द्वारा शोभित शरीरों के रूप में उस ब्रम्ह की अभिव्यक्ति मात्र हैं जो कि पूर्णतया
भिन्न सत्य है ।
गुरुवार, 3 दिसंबर 2015
रूप संसार
अविभाज्य परम् ब्रम्ह एक मात्र सत्य है । यह अखण्ड सत्य समस्त
रूप संसार के रूपों में आत्मा नामक अपनी उच्चतर प्रकृति द्वारा विभाजित प्रतीत
होता है । अखण्ड ब्रम्ह एक सत्य है । यह रूप संसार उसकी अभिव्यक्ति है । अभिव्यक्ति
निम्नतर सत्य है परंतु भ्रम नहीं है ।
बुधवार, 2 दिसंबर 2015
परा एवं अपरा प्रकृति
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मैंने आपको जो आठ
वर्ग के विभाजन वाली प्रकृति बतायी वह मेरी निम्न वर्गीय प्रकृति है और अब मैं
तुम्हे अपनी उच्च वर्गीय प्रकृति आत्मा को बताता हूँ जो इस रूप संसार का आधार है ।
मंगलवार, 1 दिसंबर 2015
सत्य के प्रकृति की व्याख्या
गुरू द्वारा बतायी गई सत्य की प्रकृति ही इस रूप संसार की रचना
का आधार होती है । सत्य की अव्यक्त प्रकृति के यह आठ अंग जब रूप धारण करते है तो
यह रूप संसार प्रगट होता है । परंतु यह रूप संसार मात्र सत्य की प्रकृति का प्रगट
रूप है । यह सत्य अस्तित्व नहीं है । सत्य की प्रकृति और अधिक व्यापक है ।
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