प्रकृति व्यक्ति
के सम्मुख तथा इर्द-गिर्द वातावरण सृजित करके अपने निर्णय को प्रगट करती है, जबकि व्यक्ति
अपनी इच्छाओं के आलोक में अथवा भावनाओं के वशीभूत अथवा विवेक के अधीन अपने कर्तव्य
का निर्णय करता है । गुरू ने उपरोक्त मस्तिष्क की तीनों ही, नामत: इच्छा-भावना-विवेक
के प्रति ज्ञान का स्वरूप बता दिया, परन्तु कर्तव्य के निर्णय के लिये स्वयं अर्जुन को
कहा ।
रविवार, 31 दिसंबर 2017
शनिवार, 30 दिसंबर 2017
विचार द्वारा निर्णय
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि इस प्रकार मैंने तुम्हे समस्त ज्ञान बता दिया, इस पर भली भाँति विचार
करके, तुम्हे जो उचित
प्रतीत हो करो ।
शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017
स्वभाव और चैतन्य
गुरू का उपदेश
स्वभाव और आत्मानुभूति दोनों को एकाग्र करके परमात्मा की शरण ग्रहण करने के लिये
निर्देश करता है । स्वभाव जो कि पूर्व के कर्मों से सृजित है और आत्मानुभूति जो कि
सर्वोच्च ज्ञान का द्योतक है, इन दोनो को उस परमात्मा को अर्पित कर दो । यह अहंकार के पूर्ण समर्पण का
व्यवहारिक स्वरूप है ।
गुरुवार, 28 दिसंबर 2017
शाश्वत् धाम
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण बोले हे भारत (अर्जुन) तुम अपनी समस्त सामर्थ्य को एकाग्र कर उसकी शरण ग्रहण
करो । उसी की कृपा से तुम्हे शान्ति और शाश्वत् धाम प्राप्त होगा ।
बुधवार, 27 दिसंबर 2017
प्रयोजन
अज्ञान का निवारण
व्यक्ति का प्रथम लक्ष्य होना चाहिये । प्रत्येक जीव का सृजन किसी ईश्वरीय प्रयोजन
की पूर्ति के लिये हुआ है । जब तक व्यक्ति का अहंकार प्रधान रहता है तब तक व्यक्ति
अपनी इच्छाओं को प्रधान मानता है । परंतु ईश्वर के नियम-विधान का कोई उलन्घन नहीं
कर सकता है । ईश्वर के विधान को स्वीकारना और अहंकार का क्षय एक सत्य को दो प्रकार
से व्यक्त करना है ।
मंगलवार, 26 दिसंबर 2017
समस्त का मूल
सभी जीवों का अधार
ईश्वर स्वयं है । प्रकृति निर्मित शरीर कर्मफलों के भोग के लिये निर्मित है । यह
कर्मफल न्याय पर आधारित हैं । सृजन के विज्ञान के फल से व्यक्ति अपने आधार ईश्वर
से अनभिज्ञ है । इस अनभिज्ञता के कारण ही वह सन्सारी है परिच्छिन्न है । इस
परिच्छिन्नता की पूर्ति के लिये वह कर्म करता है । यह समस्त चक्र अनायास नहीं है ।
प्रश्न है कि व्यक्ति यदि इन तथ्यों को ग्राह्य बना सके ।
सोमवार, 25 दिसंबर 2017
सन्चालक
स्वभाव से बाध्य
कर्म प्रेरणा का विज्ञान बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि
ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में वास करता है और वह उन्हे इस प्रकार घुमा रहा है
कि मानो वे किसी यन्त्र पर चढे हुये हों ।
रविवार, 24 दिसंबर 2017
स्वभाव से बाध्य
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले हे कुन्ती पुत्र मोंह के भ्रम से तुम जिस कार्य को करने
से इन्कार कर रहे हो, उसे करने के लिये तुम्हारा स्वभाव तुम्हे बाध्य करेगा ।
शनिवार, 23 दिसंबर 2017
स्वभाव तथा भावना
जैसा कि गुरू ने
उपदेश किया कि व्यक्ति को अपने स्वभाव के अनुकूल कार्यों को करना चाहिये । स्वभाव
जो कि पूर्व के कर्मों के अनुसार सृजित होता है । इसलिये यह प्रकृति के अनुदेशों
के अनुकूल कहा जायेगा । प्रकृति के अनुदेश न्यायपूर्ण होते हैं । भावनायें
व्यवहारिक प्रतिक्रियाओं से सृजित होती हैं । इसीलिये गुरू ने कहा कि यदि तुम अपनी
भावना के अनुरूप निर्णय करोगे तो तुम्हारी अपनी प्रकृति ही उसे स्थिर नहीं होने
देगी ।
शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017
अहंकार के वशीभूत
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि यदि अहंकार के वशीभूत तुम यह निर्णय लेते हो कि “मैं
नहीं युद्ध करूँगा” तो तुम्हारा यह निर्णय निरर्थक है । तुम्हारी प्रकृति तुम्हे
विवश करेगी ।
गुरुवार, 21 दिसंबर 2017
मुक्ति अथवा त्रास-भोग
व्यक्ति मुक्ति
अथवा संसारी-त्रास भोग में से
किसी एक का चुनाव करने को स्वतंत्र है । यदि मोंह-वश व्यक्ति ऐसा सोचता है
कि वह ब्रम्ह की शक्ति के विरुद्ध कार्य कर सकता है तो निश्चय ही उसे सांसारिक-त्रास भोग झेलने
ही होंगे । परमात्मा की अवज्ञा अहंकार के कारण होती है ।
बुधवार, 20 दिसंबर 2017
अहंकार पतनकरी
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को बताये कि यदि आत्मा की अनुभूति में स्थिर होकर कार्य करोगे तो मेरी कृपा
से सारे विघ्न पार सकोगे, परंतु कन्चिद अहंकार के अधीन कार्य करोगे तो
विनष्ट हो जावोगे |
मंगलवार, 19 दिसंबर 2017
चैतन्य स्वरूप
आश्रय ग्रहण करने
का सुझाव एवं समर्पण प्राप्त करने की जो विधि गुरू ने उपदेश किया उसका सीधा
अभिप्राय है कि ब्रम्ह को अपना चैतन्य स्वरूप अनुभव करो और कर्म को अर्पण का
अभिप्राय हुआ कि तुम स्वयं अकर्ता रहो । यह वेदांत का ज्ञान आत्मसात् करने का
साक्षात् उपाय गुरू ने उपदेश द्वारा प्रशस्थ किया है ।
सोमवार, 18 दिसंबर 2017
समर्पण विधि
समर्पण अर्पित
करने की विधि बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि अपने मस्तिष्क में मुझे सर्वोच्च समर्थ मानते हुये यह
अनुभव करोकि तुम मेरे आश्रय पर निर्भर हो और प्रत्येक कर्म को मुझे अर्पित करो तथा
अपने ध्यान को सतत् मुझ पर केंन्द्रित करके रखो ।
रविवार, 17 दिसंबर 2017
ज्ञान समर्पण कर्म
सन्यास और त्याग
के सम्बंध में गुरू के उपदेश का सार यह है कि व्यक्ति को व्यवहारिक जीवन में कर्म
के करने न करने के प्रकरण में इतने चुनाव के विकल्प तो उपलब्ध रहते नहीं है, इसलिये मर्यादित आचरण
यह है कि ज्ञान को धारण किये हुये और अधिष्ठान ब्रम्ह को सर्वोपरि सत्ता के रूप
में समर्पित रहते हुये समस्त कर्मों को करे, यही निर्वाण का पथ है ।
शनिवार, 16 दिसंबर 2017
अमर पद
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को बताये कि व्यक्ति मेरी शरण की क्षाया में स्थित रहकर निरंतर सभी प्रकार
के कर्मों को करता हुआ वह मेरी कृपा से शाश्वत् अमर पद को पाता है ।
शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017
ज्ञान समर्पण
ज्ञाता अथवा समर्पित
पूर्णपुरूष के साथ आत्मज्ञान और आत्मानुभव में एकाकार हो जाता है । ज्ञान और समर्पण
दोनो का एक ही लक्ष्य है । ब्रम्ह समाहित का अभिप्राय है कि ब्रम्ह से समर्पित दशा
मे निवास, उस ब्रम्ह में निवास
और उसके तदात्म्य में जीवित रहना है ।
गुरुवार, 14 दिसंबर 2017
समर्पण के फल
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि समर्पण के फल से व्यक्ति मेरे विस्तार को जान लेता
है और मेरे सत्य को भी जान जाता है, और तब, वह मेरे स्वरूप को जानकर उसमें समाहित हो
जाता है ।
बुधवार, 13 दिसंबर 2017
सर्वोत्तम शरण
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि ब्रम्ह के साथ एकाकार होकर और प्रशांतात्मा बनने पर
उसे न तो कोई शोक होता है और न कोई इच्छा ही होती है । सब प्राणियों को समान समझता
हुआ वह मेरी सर्वोच्च शरण को प्राप्त कर लेता है ।
मंगलवार, 12 दिसंबर 2017
समाहित हेतु आर्हताये : 3
समाहित दशा हेतु
आर्हताओं की गणना को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि अहंकार, बल, घमण्ड, इच्छा, क्रोध और सम्पत्ति
को त्यागकर, ममत्व की भावना
से रहित और शांत चित्त वाला व्यक्ति ब्रम्ह के साथ एकाकार होने के लिये योग्य हो
जाता है ।
सोमवार, 11 दिसंबर 2017
समाहित हेतु आर्हताये : 2
समाहित दशा हेतु
आर्हताओं की गणना को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि
एकांत में निवास करता हुआ, अल्प अहार करता हुआ, वाणी, शरीर और मन को
संयम में रखता हुआ और सदा ध्यान और एकाग्रता में लीन रहता हुआ और चैतन्य में शरण
लिये हुये .......सतत्
रविवार, 10 दिसंबर 2017
समाहित दशा हेतु आर्हताये : 1
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि विशुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, अपने-आप को दृढता
पूर्वक संयम में रखकर, शब्दादि विषयों को त्याग कर और राग तथा द्वेष को छोडकर ..... सतत्
शनिवार, 9 दिसंबर 2017
ज्ञान के सज्ञान
आचार्य आदि-शन्कर गुरू के
उपदेश की व्याख्या करते हुये कहते हैं कि जिस प्रकार व्यक्ति को अपने शरीर को
जानने के लिये किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है उसी प्रकार ब्रम्ह जो कि व्यक्ति
को आत्मा के रूप में उपलब्ध है को जानने के लिये किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं हैं
क्योंकि आत्मा तो उसकी शरीर से भी अधिक नजदीक है ।
शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017
निष्पादन
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले हे कुन्ती पुत्र अब तुम मुझसे सुनो कि व्यक्ति पूर्णता
की स्थिति प्राप्त् करके उस ब्रम्ह को कैसे पाता है जो कि ज्ञान का सर्वोच्च
निष्पादन है ।
गुरुवार, 7 दिसंबर 2017
नैष्कर्म्य
व्यक्ति का स्वरूप
आत्मा है । आत्मा सदैव अकर्ता है । अज्ञान निवारण के फल से जब व्यक्ति अपने स्वरूप
के सत्य परिचय से भिज्ञ हो जाता है तो वह कार्य तो करेगा परंतु कृतत्व का भाव
अकर्ता का भाव हो जायेगा । कार्य का त्याग तो किसी भी व्यक्ति के लिये सम्भव नहीं
हो सकता । जीवित रहते कार्य तो प्रत्येक को करना ही करना है । महत्वपूर्ण कृतत्व का
भाव है जो कि पूर्णता और बंधन में पर्णित होता है ।
बुधवार, 6 दिसंबर 2017
अज्ञान से मुक्त
भगवद्गीता में
इच्छा से मुक्त कर्म की अनुशंसा गुरू प्रारम्भ से ही करते आये हैं । इच्छापूर्ति
परिच्छिन्नता की अनुभूति से सृजित होती है । परिच्छिन्नता अध्यास है । यह सत्य
स्वरूप के प्रति अनिभिज्ञता है । आत्मा सदैव अकर्ता है । इसीलिये इच्छा से मुक्त
कर्म पूर्णता की उपलब्धि में पर्णित होगा ।
मंगलवार, 5 दिसंबर 2017
आसक्ति से मुक्त
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस व्यक्ति का विवेक किसी भी आसक्ति से मुक्त है, जिसने अपनी आत्मा
को वश में कर लिया है और जिसे कोई इच्छा शेष नहीं है, वह सन्यास द्वारा उस
सर्वोच्च दशा तक पहुंच जाता है, जो सभी प्रकार के कर्म से ऊपर है ।
सोमवार, 4 दिसंबर 2017
अनुकूल
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण बोले हे कुंती के पुत्र (अर्जुन), व्यक्ति को अपनी प्रकृति
के अनुकूल कार्य का परित्याग नहीं करना चाहिये, कंचिद वह कार्य दोष से
आच्छादित ही क्यों न हो क्योंकि प्रत्येक उद्यम दोष से आच्छादित होता है जैसे कि
धुँआ से अग्नि आच्छादित होती है ।
रविवार, 3 दिसंबर 2017
प्रकृति स्वभाव
गुरू के उपदेश के
अनुसार, जैसा कि तेरहवें
अध्याय में था, समस्त कर्मों की
कर्ता प्रकृति है, ब्रम्हस्वरूप आत्मा सदैव अकर्ता है । व्यक्ति का स्वभाव उसके
पूर्व के कर्मों के अनुरूप होता है । सृष्टि का संचालन कर्म और कर्मफल के सिद्धांत
पर प्रकृति द्वारा संचालित हो रहा है । प्रकृति न्याय पर आधारित है । न्यायविरूद्ध
कृत पाप है ।
शनिवार, 2 दिसंबर 2017
स्वभाव धर्म
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि व्यक्ति यदि अपने स्वभाव के अनुरूप कर्म को चाहे
उतनी सक्षमता से न भी कर सके जितना कि दूसरे के स्वभाव के अनुरूप कर्म को कर सकता
है तो भी उसके अपने स्वभाव के अनुरूप के कर्म को करने से वह किसी पाप का भागीदार
नहीं होगा ।
शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017
पूर्णता
गुरु के उपदेश में
उपासना के माध्यम के रूप में कर्म दायित्व का सम्पादन बताने का आधार व्यक्ति के
स्वभाव से सम्बंधित है । स्वभाव का मूल उस व्यक्ति के पूर्व के जन्मों के आधार पर
सृजित हुआ होता है । इस प्रकार यदि व्यक्ति प्रकृति के संविधान के तदात्म्य में
अपने को प्रस्तुत करता है तो निश्चय ही वह पूर्णता के लिये योग्य पात्र है ।
गुरुवार, 30 नवंबर 2017
कार्य ही उपासना
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति, जिस ब्रम्ह से सभी जीवों
की उत्पत्ति हुई है और जो समस्त रूप संसार में व्याप्त है, की उपासना, अपने कर्तव्य
दायित्वों के सम्पादन के द्वारा करता है, उसे पूर्णता की स्थित प्राप्त होती है ।
बुधवार, 29 नवंबर 2017
स्वे स्वे कर्मणि अभिरत:
कर्म को करते हुये
पूर्णता प्राप्त करने के सम्बन्ध में गुरु ने जो उपदेश किये हैं उसमें गुरु ने अपनी
अभिव्यक्ति को “स्वे स्वे कर्मणि अभिरत:” द्वारा व्यक्त किया है, जिसका शाब्दिक
अर्थ है “अपने अपने काम में निष्ठापूर्वक लगा हुआ” । उपरोक्त की व्याख्या है –
प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अनुभूतियों और मनोवेगों के प्रति निष्ठावन होना चाहिये, स्वभाव के स्तर
से ऊपर का कार्य करने की चेष्टा खतरनाक है । हमें अपने स्वभाव की शक्ति के अंदर
रहते हुये पूर्णतया अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिये ।
मंगलवार, 28 नवंबर 2017
कर्तव्य को समर्पित
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को बताये कि व्यक्ति अपने कर्तव्य दायित्वों को समर्पित रहते हुये पूर्णता
को प्राप्त हो जाता है, व्यक्ति कैसे, अपने कर्तव्य दायित्वों
को समर्पित रहते पूर्णता को प्राप्त होता है, यह मुझसे सुनो ।
सोमवार, 27 नवंबर 2017
पूर्णता का अवसर
गुरू द्वारा वर्ण
के अनुसार कर्मो की विभक्ति का उपदेश किये गये हैं । यह निश्चय है कि इस
अभिव्यक्ति का अभिप्राय जन्म के कुल से नहीं है । यह विभाजन व्यक्ति के स्वभाव से
है, उसकी सहज रूचि से
है, उसकी अपनी सहज
कर्म के प्रति प्रवृत्ति से है । इस ज्ञान द्वारा व्यक्ति स्वयं यह निर्धारण कर
सके कि उसकी क्षमता का सर्वाधिक विकास किस क्षेत्र में हो सकता है, स्वाभाविक है कि
यह क्षेत्र उसकी अपने रूझान का होने पर ही होगा ।
रविवार, 26 नवंबर 2017
वैश्य और शुद्र के कार्य
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कृषि, पशुपालन और व्यापार ये वैश्य के स्वाभाविक कर्तव्य
हैं । सुद्र का स्वभाविक कर्तव्य सेवा का कार्य करना है ।
शनिवार, 25 नवंबर 2017
क्षत्रीय के गुण
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुनको बताये कि वीरता, तेज, धीरता, सूझ-बूझ, युद्ध से मुंह न
मोडना, दानशीलता और
नेत्रित्व, ये क्षत्रीय के
स्वाभाविक गुण हैं ।
शुक्रवार, 24 नवंबर 2017
अपेक्षित
गुरू द्वारा बताये
गये ब्राम्हण के स्वाभाविक गुणों से विदित है कि यह ब्राम्हणत्व मात्र किसी विषेस
कुल में जन्म की बात नहीं है अपितु कुछ निश्चित आर्हताओं के धारक व्यक्ति के लिये
यह ब्राम्हण उपाधि निर्धारित की गई है । यदि किसी कुल विषेस में जन्मा व्यक्ति इन
अपेक्षाओं की पूर्ति करता है तो वह सराहनीय और ग्राह्य माना जायेगा परंतु अन्यथा
की परिस्थित में नहीं स्वीकारा जायेगा ।
गुरुवार, 23 नवंबर 2017
ब्राम्हण के गुण
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि प्रशांतता, आत्म संयम, तपस्या, पवित्रता, सहनशीलता, ईमानदारी, ज्ञान, विज्ञान और धर्म
में श्रद्धा, ये ब्राम्हण के
स्वाभाविक गुण हैं ।
बुधवार, 22 नवंबर 2017
भेद का आधार
गुरू ने उपदेश में
चतुर्वर्ण के विषय में जो कुछ भी व्यक्त किया है उसका सम्बंध व्यक्ति के जन्म के
वंश से सम्बंध नहीं है । गुरू ने प्रकृति के गुणों का प्रभाव ज्ञान पर, कर्म पर और कर्ता
पर भी बताया । चतुर्वण का विभाजन कर्म पर आधारित और कर्म की गुणवत्ता का आँकलन
कर्ता व्यक्ति के स्वभाव पर प्रकृति के गुणों के वर्चस्व पर आधारित बताया है ।
मंगलवार, 21 नवंबर 2017
चतुर्वर्ण
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि हे शत्रुओं के विजेता (अर्जुन), चाहे ब्राम्हण, चाहे क्षत्रिय, चाहे वैश्य और चाहे
सूद्र मे भी,
उनके
कृत कर्मों को, उनके प्रकृति के
गुणों के आधार पर ही पहचाना जाता है ।
सोमवार, 20 नवंबर 2017
प्रकृति के गुण
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कोई भी जीव चाहे वह पृथ्वी पर है चाहे वह देव लोंको
मे है, प्रकृति के तीन
गुणों के प्रभाव से आच्छदित है ।
रविवार, 19 नवंबर 2017
सुख का आधार
सुख की कामना
प्रत्येक व्यक्ति में होती है । परंतु प्रत्येक व्यक्ति को किसी एक नियत वस्तु, स्थान, माध्यम अथवा कर्म
से सुख नहीं मिलता है । व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार स्वभाव के अनुसार सुख का
माध्यम भिन्न होता है । पुन: सुख कितने समय तक उस व्यक्ति को सुखी रख सकेगा यह
निर्भर करता है सुख की प्रकृति पर ।
शनिवार, 18 नवंबर 2017
तामसिक सुख
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो सुख आत्मा को आरम्भ से अंत तक भ्रम मे रखता है और
जिसकी उत्पत्ति निद्रा, आलस्य और प्रमाद से होती है उसे तामसिक सुख कहा
जाता है ।
शुक्रवार, 17 नवंबर 2017
राजसिक सुख
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो सुख इंद्रियों के अपने विषय के साथ सन्योग करने
से सृजित होते हैं, जो कि प्रारंभ में अमृत के समान प्रतीत होते हैं परंतु अंत में
विष के समान प्रतीत होते हैं, ऐसे हुखों को राजसिक सुख कहा जाता है ।
गुरुवार, 16 नवंबर 2017
सात्विक सुख
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो सुख प्रारम्भ में विष के समान लगता है और अंत में
अमृत के समान लगता है, जिसकी उत्पत्ति आत्मबोध के शाश्वत ज्ञान से होती है उसे
सात्विक सुख कहा जाता है ।
बुधवार, 15 नवंबर 2017
सुख से आनन्द पर्यंत
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले हे भरतॉ में श्रेष्ठ, अब तू मुझसे तीन प्रकार
के सुख के विषय में सुन । जिस सुख से मनुष्य दीर्घ अभ्यास के द्वारा आनंद का अनुभव
करता है
|
सुख से आननद पर्यंत
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले हे भरतॉ में श्रेष्ठ, अब तू मुझसे तीन प्रकार
के सुख के विषय में सुन । जिस सुख से मनुष्य दीर्घ अभ्यास के द्वारा आनंद का अनुभव
करता है
|
मंगलवार, 14 नवंबर 2017
तामसिक धृति
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस धृति के द्वारा कोई मूर्ख व्यक्ति निद्रा, भय, शोक, विषाद और अभिमान
को नहीं त्यागता, हे पार्थ (अर्जुन), वह तामसिक प्रकार की होती है ।
सोमवार, 13 नवंबर 2017
राजसिक धृति
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस धृति के द्वारा मनुष्य अपने कर्तव्य का सम्पादन, आनंद और सम्पत्ति
से बँधा हुआ फलों की कामना से बँधा रहये करता है, हे पार्थ (अर्जुन) उसे
राजसिक धृति कहा जाता है ।
रविवार, 12 नवंबर 2017
धृति
ध्यान की स्थिरता, जिसके द्वारा हम
उन बहुत सी बातों को जान पाते हैं, जिन्हे हमारी साधारण दृष्टि देख पाने में समर्थ
नहीं है । इसकी शक्ति अतीत के लिये पश्चाताप और भविष्य के लिये चिंताओं के साथ
हमारी अनासक्ति के अनुपात में होती है ।
शनिवार, 11 नवंबर 2017
अविचलित धृति
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि वह
अविचलित धृति, जिसकी शक्ति से
एकाग्रता द्वारा मनुष्य मस्तिष्क, प्राण, और इंद्रियों की गतिविधियों को नियंत्रण
में रखता है, हे पार्थ
(अर्जुन), वह धृति सात्विक
प्रकार की होती है ।
शुक्रवार, 10 नवंबर 2017
विकृत रूप
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण बोले कि हे पार्थ (अर्जुन),
जिस बुद्धि के द्वारा अंधकार में समाहित हुआ व्यक्ति अधर्म को धर्म समझता
है और सब बातो को एक विकृत रूप में देखता है, वह बुद्धि तामसिक होती है
।
गुरुवार, 9 नवंबर 2017
राज़सिक बुद्धि
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण बोले, हे पार्थ
(अर्जुन), कि जिस बुद्धि
द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म को, करने योग्य कार्य और न करने योग्य कार्य को गलत
ढंग से समझता है, वह बुद्धि राजसिक होती है ।
बुधवार, 8 नवंबर 2017
तीक्ष्ण-विवेक
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण बोले, हे पार्थ
(अर्जुन), कि जो बुद्धि
कर्म और अकर्म को समझती है, जो करने योग्य कार्य और न करने योग्य कार्य को
समझती है, जो इस बात को
समझती है कि किससे डरना चाहिये और किससे नहीं डरना चाहिये, क्या आत्मा को बंधन में
डालता है और क्या उसे मुक्त करता है वह बुद्धि सात्विक होती है ।
मंगलवार, 7 नवंबर 2017
धारण करने की शक्ति
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले कि हे धन को जीतने वाले (अर्जुन), अब तुम गुणों के
अनुसार बुद्धि और धारण करने की शक्ति के तीन भेदों को सुनो, जिन्हे मैं
पूर्णतया और प्रथक प्रथक करके बताता हूँ ।
सोमवार, 6 नवंबर 2017
तामसिक कर्ता
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति असंतुलित, असन्स्कृत, हठी, धोखेबाज़, द्वेषी, आलसी, दु:खी मनोभावो से
आच्छादित और काम को टालने वाला होता है, वह तामसिक कर्ता कहलाता है ।
रविवार, 5 नवंबर 2017
राजसिक कर्ता
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो कर्ता मनोभावों से प्रभावित होता है, जो कर्मफल के
लिये उत्सुक रहता है, जो लालची होता है, जो क्षतिपूर्ण वृत्ति का होता है, अपवित्र होता है, जो हर्ष और विषाद
से विचलित होता है, उसे राजसिक कर्ता कहा जाता है ।
शनिवार, 4 नवंबर 2017
सात्विक कर्ता
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो कर्ता आसक्ति से रहित रहता है, जो अहंकारपूर्ण आचरण
नहीं करता है, जो उत्साहित
कृतसंकल्प दशा में सफलता तथा असफलता से अविचलित रहता है उसे सात्विक कर्ता कहा
जाता है ।
शुक्रवार, 3 नवंबर 2017
तामसिक कर्म
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो कर्म अज्ञान के कारण हानि या हिंसा का विचार किये
बिना और अपनी मानवीय क्षमता का विचार किये बिना किया जाता है, वह तामसिक कर्म
कहलाता है ।
गुरुवार, 2 नवंबर 2017
सात्विक राजसिक भेद
गुरू के उपदेश में
बताये सात्विक कर्म और राजसिक कर्म में मौलिक भेद कर्म को करने में कर्म के कारण
से सृजित होता है । कारण यदि सद्भाव से सृजित हुआ है तो कर्ता व्यक्ति की कर्म
करने की मानसिकता में उत्साह, निष्ठा एवं सुखांभूति का समंवय रहेगा । कारण यदि इच्छापूर्ति
अथवा अहंकार की तुष्टि से सृजित है तो कर्ता व्यक्ति की मानसिकता राग, द्वेष और स्पर्धा
से ओतप्रोत रहेगी ।
बुधवार, 1 नवंबर 2017
राजसिक कर्म
कर्म की गुणवत्ता
को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस कर्म को
व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत इच्छा की पूर्ति हेतु, अथवा अपने अहंकार भाव की
संतुष्टि हेतु, किसी फल विशेस को
प्राप्त करने के लिये करता है उसे राजसिक कर्म कहा जाता है ।
मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017
सात्विक कर्म
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि प्रकृति द्वारा आदेशित कर्म, जिसे बिना आसक्ति के, बिना किसी मोंह
अथवा घृणा की भावना से युक्त हुये, जिसे बिना किसी फल की अपेक्षा से किया जाता है उसे
सात्विक कर्म कहा जाता है ।
सोमवार, 30 अक्टूबर 2017
तामसिक ज्ञान
गुणों के विज्ञान
में ज्ञान के वर्गीकरण को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये
कि परंतु जो ज्ञान किसी एक कार्य को ही सब कुछ मान लेता है और उसके कारण का कोई
ध्यान नहीं रखता और तत्वार्थ को नहीं समझ पाता और जो संकीर्ण है, वह तामसिक ढंग का
ज्ञान कहलाता है ।
रविवार, 29 अक्टूबर 2017
राजसिक ज्ञान
गुणों के विज्ञान
में ज्ञान के वर्गीकरण को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये
कि जिस ज्ञान के द्वारा विभिन्न प्राणियों में उनकी पृथकता के कारण अस्तित्व की
विविधता दिखाई पडती है, उस ज्ञान को राजसिक ज्ञान समझना ।
शनिवार, 28 अक्टूबर 2017
सात्विक ज्ञान
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जिस ज्ञान के द्वारा सब वस्तुओं और प्राणियों में
एक ही अनश्वर सत्ता दिखाई पडती है, जो विभक्तों में भी अविभक्त रूप में विद्यमान है, उस ज्ञान को तू
सात्विक ज्ञान समझ ।
शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017
गुणों का विज्ञान
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि गुणों के विज्ञान में, ज्ञान, कर्म और कर्ता को
गुणों के अन्तर के अनुसार केवल तीन प्रकार के बताये गये हैं । अब तू इनके विषय में
ठीक ठीक सुनो ।
गुरुवार, 26 अक्टूबर 2017
योजित क्रियांवन
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कार्य को योजित करने में तीन अवयव है ज्ञान, ज्ञानका उद्देष्य
और ज्ञान-योजित-कर्ता । इसी प्रकार
कार्य के क्रियांवन में तीन अवयव हैं साधन, कर्म और कार्य का कर्ता ।
बुधवार, 25 अक्टूबर 2017
प्रतिनिधि रूप
आचार्य आदिशंकर
बताये कि ज्ञानी भी कार्य करता है परंतु उसका कार्य मात्र एक ब्रम्ह के प्रतिनिधि
के रूप में होता है । कार्य में कर्ता व्यक्ति की मानसिक स्थिति का अधिक महत्व है
। व्यक्तिगत इच्छा की पूर्ति में किया गया कार्य वर्जित बताया गया है ।
मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017
अहंकार से मुक्त
कर्म और कर्ता को
आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर अर्जुन को बताये कि जो अहंकार की भावना से मुक्त है, जिसकी
बुद्धि मलीन नहीं है, वह इन मनुष्यों को मारता हुआ भी मारता
नहीं है और वह बंधन में नहीं पडता है ।
सोमवार, 23 अक्टूबर 2017
एकमात्र कर्ता
गुरू के उपदेश में
एक मात्र कर्ता शब्द के प्रयोग को आदिशंकर स्पष्ट करते हुये बताये कि “विशुद्ध
आत्मा को कर्ता समझता है ।” यदि इसे अभिव्यक्ति का भावार्थ माना जाय तो निश्चय ही
वह तथ्य को नहीं समझता है परंतु सामान्यतया जीव को कर्ता समझा जाता है, तो वह
मानवीय कर्म के मुख्य निर्धारकों में से, जो सबके सब प्रकृति
के उपज है केवल एक है ।
रविवार, 22 अक्टूबर 2017
अ-प्रशिक्षित बुद्धि
कर्म के कारणों को
आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि ऐसी दशा में जो विकृत
मन वाला मनुष्य अपनी अ-प्रशिक्षित बुद्धि के कारण अपने आप को कर्ता समझता
है, वह सच्ची स्थिति
को नहीं देख रहा होता ।
शनिवार, 21 अक्टूबर 2017
उचित या अनुचित
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मनुष्य अपने शरीर, वाणी या मन द्वारा जो भी
कोई उचित या अनुचित कर्म करता है, उनमें ये पाँच उपकरण अवश्य होते हैं ।
शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017
दैवम्
कर्म सिद्धांत के
अनुसार प्रत्येक कर्म से कर्मफल सृजित होता है । पूर्व के जन्मों के संचित कर्मफलो
को भोगने हेतु वर्तमान शरीर होती है । इसलिये व्यक्ति को ऐसी परिस्थितियों का भी
सामना करना पडता है जिसका औचित्य उस व्यक्ति के वर्तमान जन्म के कर्मों से नहीं
जुडता है । ऐसे स्थितियों को भाग्य कहकर समाधान किया जाता है । इसी को गुरू ने
दैवम् शब्द द्वारा व्यक्त किया है ।
गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017
कर्ता
शाब्दिक अर्थ के
भाव में कार्य को करने वाला । गुरू के उपदेश के अनुसार कर्ता कर्म के पाँच कारणों
मे से एक है । साँख्य सिद्धांत के अनुसार आत्मा केवल साक्षी है । उचिततम
अभिव्यक्ति में आत्मा अकर्ता है । प्रकृति आत्मा की उपस्थिति मात्र से गतिमान हो
जाती है इसलिये गुरू ने उसे कर्म के कारणों में सम्मलित किया है ।
बुधवार, 18 अक्टूबर 2017
पाँचवा भाग्य
कार्य के उपकरणों
का विस्तार बताते हुए गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कार्य का स्थान
और इसी प्रकार कर्ता, विविध प्रकार के साधन, विविध प्रकार की
चेष्टायें और पाँचवा भाग्य ।
मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017
पाँच उपकरण
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा हे महाबाहु (अर्जुन), अब तू मुझसे सब कर्मों को
करने के लिये आवश्यक इन पाँच उपकरणों को समझ ले, जैसे कि उन्हे साँख्य
सिद्धांत में बताया गया हैं ।
सोमवार, 16 अक्टूबर 2017
प्रिय अप्रिय मिश्रित
कर्म के फल के
त्याग के सम्बंध में गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिन्होने त्याग
नहीं किया है, उन्हे मृत्यु के
पश्चात् तीन प्रकार के प्रिय, अप्रिय और मिश्रित, फल निलते है परंतु
जिन्होने त्याग कर दिया है उन्हे कोई फल नहीं मिलता है ।
रविवार, 15 अक्टूबर 2017
त्यागी
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कर्म का पूर्ण त्याग किसी भी जीवधारी के लिये असम्भव
है, परंतु जो व्यक्ति
कर्म के फल का त्याग कर देता है वही त्यागी कहलाता है ।
शनिवार, 14 अक्टूबर 2017
बुद्धिमान व्यक्ति
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुनको बताये कि उस बुद्धिमान व्यक्ति को, जो त्याग करता है, जिसके संशय
समाप्त हो गये हैं और जिसका स्वभाव सात्विक है, अप्रिय कर्म से कोई घृणा
नहीं होती और प्रिय कर्म से कोई अनुराग नहीं होता है ।
शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017
सात्विक त्याग
त्याग के सम्बंध
में आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर अर्जुन को बताये कि परन्तु जो व्यक्ति नियत
कर्तव्य को अपना करने योग्य कार्य मान कर करता है और उसके प्रति सम्पूर्ण आसक्ति
तथा फल को त्याग देता है, उसका त्याग सात्विक माना जाता है ।
गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017
राजसिक त्याग
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्तिन कर्तव्य का त्याग इसलिये कर देता है कि
उसे करने में कष्ट होता है, या उसमें शारीरिक दु:ख का भय है, वह राजसिक प्रकार
का त्याग करता है, और उसे त्याग का फल नहीं मिलता है ।
बुधवार, 11 अक्टूबर 2017
तामसिक त्याग
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि किसी भी नियत किये गये कर्म का त्याग उचित नहीं है ।
अज्ञान के कारण इस प्रकार के कर्म का त्याग तामसिक ढंग का त्याग कहलाता है ।
मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017
कर्मयोग का अभ्यास
यज्ञ, दान और तप के
कर्मों के सम्बंध में गुरू ने जो उपदेश किया है वह उनके द्वारा पूर्व में बताये
गये कर्मयोग की पुन: पुष्टि के समान है । गुरू के उपदेश में सर्वत्र इसी मत की
अनुशंसा है कि कर्म का त्याग नही अपितु इच्छा से प्रेरित कर्म का त्याग और त्याग
को अधिक स्पष्ट करते हुये बताये कि किये जाने वाले कर्म के परिणाम से जनित होने
वाले फल का त्याग होना चाहिये ।
सोमवार, 9 अक्टूबर 2017
सुनिश्चित अंतिम
यज्ञ, दान और तप के
कर्मों के विषय में आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये कि
परंतु इन कर्मों को भी आसक्ति को और फलों की इच्छा को त्यागकर ही करना चाहिये । हे
पार्थ (अर्जुन) यह मेरा सुनिश्चित और अंतिम मत है ।
रविवार, 8 अक्टूबर 2017
पवित्र करने वाले
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये कि यज्ञ, दान और तप के कर्मो का त्याग नहीं करना चाहिये, अपितु उन्हे करते
ही रहना चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप बुद्धिमान लोगों को पवित्र करने वाले
होते हैं ।
शनिवार, 7 अक्टूबर 2017
त्याग का सत्य
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले कि हे भरतों में श्रेष्ठ (अर्जुन्) अब तू मुझसे त्याग के
सम्बंध में सच्चाई को सुन हे मानवों मे श्रेष्ठ (अर्जुन) त्याग तीन प्रकार का
बताया गया है ।
शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017
यज्ञ दान तप
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कुछ विद्वानो का मत है कि “कर्म को दोष समझकर त्याग
देना चाहिये”, जबकि अन्य
विद्वानों का मत है कि “यज्ञ दान और तप” के कर्मों का त्याग नही करना चाहिये ।
गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017
सन्यास और त्याग
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि बुद्धिमान लोग
इच्छाजनित कर्मो के त्याग को “सन्यास” कहते है और विद्वान लोग सभी कर्मों के फलो
के त्याग को “त्याग” कहते हैं
।
बुधवार, 4 अक्टूबर 2017
मुक्ति पथ
भगवद्गीता में
इच्छा का त्याग करके कर्म करने को सन्यास बताया गया है इस आलोक में कर्म के फल का
त्याग, को, त्याग का
लक्ष्यार्थ माना जायेगा । मुक्ति त्याग से मिलती है । इच्छाओं के त्याग द्वारा फल
का त्याग स्वत: प्राप्त हो जायेगा |
मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017
सन्यास और त्याग
अर्जुन योगेश्वर
के समक्ष जिज्ञासा व्यक्त करता है कि हे महाबाहु (कृष्ण), मैं सन्यास और त्याग का
पृथक पृथक सच्चा रूप जानना चाहता हूँ, हे हृषीकेश (कृष्ण), हे केशिनिषूदन
(कृष्ण) !
सोमवार, 2 अक्टूबर 2017
असत्
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको
बताये कि बिना श्रद्धा के जो यज्ञ किया जाता है, जो दान दिया जाता है,
जो तप किया जाता है या कोई कर्म किया जाता है, हे पार्थ (अर्जुन) वह ‘असत्’ कहलाता है, उसका ना तो इस लोक में और ना तो परलोक नें ही कोई लाभ होता है
।
इस प्रकार “श्रद्धाके तीन प्रकार के
भेद का योग” नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ
रविवार, 1 अक्टूबर 2017
सत् का विस्तार
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको
बताये कि यज्ञ, तप और दान में दृढता से स्थित रहना
भी ‘सत्’ कहलाता है और इसी प्रकार इन प्रयोजनों के लिये किया गया कोई भी
कार्य ‘सत्’ कहलाता है ।
शनिवार, 30 सितंबर 2017
सत्
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि “सत्” शब्द का प्रयोग
वास्तविकता और अच्छाई के अर्थ में किया जाता है, और हे पार्थ (अर्जुन), “सत्” शब्द का प्रयोग प्रशासनिक कार्य के लिये भी किया जाता है
।
शुक्रवार, 29 सितंबर 2017
तत्
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने
अर्जुनको बताया कि “तत्” शब्द का उच्चारण करके यज्ञ और तप और दान की विविध
क्रियाँए प्रतिफल की इच्छा रखे बिना मोक्ष की इच्छा रखने वाले लोगों द्वारा की
जाती हैं ।
गुरुवार, 28 सितंबर 2017
शास्त्रोक्त
“ॐ तत् सत्” के विषय में आगे बताते
हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्णने अर्जुन को बताये कि इसलिये ब्रम्हचारी लोगो द्वारा
शास्त्रों द्वारा बतायी गई यज्ञ, दान और तप की क्रियाँये ॐ शब्द का
उच्चारण करके की जाती हैं ।
बुधवार, 27 सितंबर 2017
ॐ तत् सत्
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि “ॐ तत् सत्” यह ब्रम्ह का तीन प्रकार का प्रतीक समझा जाता है । प्राचीन
काल में इसके द्वारा ब्राम्हण, वेद और यज्ञों का विधान किया गया
था ।
मंगलवार, 26 सितंबर 2017
तामसिक दान
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो दान गलत स्थान पर या गलत समय पर या अयोग्य व्यक्ति को बिना किसी धर्म क्रिया
के द्वारा अपमान-पूर्वक किया जाता है, उसे तामसिक दान माना जाता है ।
सोमवार, 25 सितंबर 2017
राजसिक दान
गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको
बताये कि परंतु जो दान किसी प्रतिफल की आशा से या भविष्य में किसी लाभ की आशा से
किया जाता है, और जिस दान को देने में क्लेश होता
है, उसे राजसिक दान माना जाता है ।
रविवार, 24 सितंबर 2017
सात्विक दान
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो दान ऐसे व्यक्ति को, जिससे किसी प्रतिफल की आशा नहीं है, इस भावना से दिया जाता है कि दान देना
हमारा कर्तव्य है, और जो उचित स्थान में,उचित समय पर और योग्य व्यक्ति को दिया जाता
है, वह दान सात्विक दान माना जाता है ।
शनिवार, 23 सितंबर 2017
तामसिक तप
गुरू तोगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो तप मूर्खतापूर्ण दुराग्रह के साथ अपने आपको कष्ट देकर या दूसरों को
हाँनि पहुँचाने के लिये किया जाता है,
वह तामसिक तप कहलाता है ।
शुक्रवार, 22 सितंबर 2017
राजसिक तप
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो तप सत्कार, सम्मान या प्रतिष्ठा पाने के लिये
किया जाता है या प्रदर्शन के लिये किया जाता है, वह राजसिक तप कहलाता है । यह अस्थिर और अस्थायी होता है ।
गुरुवार, 21 सितंबर 2017
सात्विक तप
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि यदि तीन प्रकार के तप (शरीर का तप, वाणी का तप, मानसिक तप) को संतुलित मन वाले
व्यक्तियों द्वारा फल की इच्छा रखे बिना,
पूर्ण श्रद्धा के साथ किया जाय, तो वह सात्विक तप कहलाता है ।
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