रविवार, 31 जनवरी 2016

आध्यात्म

ब्रम्ह की दो प्रकार की प्रकृति प्रगट होती है । प्रथम वह जिसे आठ वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है । यह प्रकृति परिवर्तनशील होती है । यह रूप धारण करती है । द्वितीय वह जो कि प्रत्येक परिस्थिति में एक ही रहती है अ-परिवर्तनशील होती है । यह कोई रूप धारण नहीं करती है । यही आत्मा है । यह परिवर्तनशील प्रकृति द्वारा निर्मित शरीर अ-परिवर्तनशील प्रकृति आत्मा के अवलम्ब पर स्थिर होती है । यह आत्मा ही इस रूप संसार में ब्रम्ह का प्रतिनिधित्व करती है । यह इस वस्तु संसार के लिये विषय स्वरूप है । 

शनिवार, 30 जनवरी 2016

अक्षर ब्रम्ह

अर्जुन द्वारा पूछे गये प्रश्नों का उत्तर देते हुये योगेश्वर श्रीकृष्ण बताये कि ब्रम्ह अक्षर है जो कि ज्ञात लोकों के सभी ज्ञात ज्ञान से ऊपर है, उसकी अपरिवर्तनीय प्रकृति हमारी आत्मा है, कर्म वह सृजनात्मक ऊर्जाफल है जिससे समस्त जीव रूपों की उत्पत्ति हुई है । 

शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

जिज्ञासा की व्याख्या

कोई भी जिज्ञासु अपने लक्षित उद्देष्य को पाने के लिये कोई सार्थक प्रयत्न तभी कर सकता है जबकि उसे ल्क्ष्य का सही स्वरूप एवं लक्ष्य को पाने के लिये प्रयोग में लाये जा रहे साधनों की सही क्षमता का यथार्थ ज्ञान होगा । वर्तमान प्रकरण में लक्ष्य है ब्रम्ह, साधन है यह साधक की शरीर । अर्जुन अपने प्रश्नों के द्वारा इन्ही दोनों को जानने के लिये गुरू से निवेदन करता है । अर्जुन की जिज्ञासा है कि गुरू उसे मार्गदर्शन करावें कि ब्रम्ह का क्या स्वरूप वह मस्तिष्क में धारण करके वह प्रयत्न करे । अर्जुन की जिज्ञासा है उपरोक्त लक्ष्य को पानेके लिये इस शरीर की क्या क्षमता है और वह उसका कैसे प्रयोग करे ।      

गुरुवार, 28 जनवरी 2016

कर्म क्या है

जिज्ञासु अर्जुन अपने प्रश्नों का विस्तार लरते हुये पूँछता है कि हे मधुसूदन कृपया बतावें कि इस शरीर में कर्म का क्या क्षेत्र है ? कृपया बतावें कि आत्मनियंत्रित जीवनयापन करने वाले व्यक्ति को मोंह से मुक्ति के समय एकल ब्रम्ह का ध्यान कैसे रह सकता है

बुधवार, 27 जनवरी 2016

प्रश्न की व्याख्या

अर्जुन द्वारा पूछे गये प्रश्न इस रूप संसार की संरचना में प्रयुक्त अवयवों को अधिक विस्तार पूर्वक जानने की जिज्ञासा की पूर्ति के लिये हैं । इससे भी आगे इस रूप संसार की उत्पत्ति का निमित्त अर्थात् कर्म का विश्लेषणात्मक विज्ञान जानने की जिज्ञासा की पूर्ति के निमित्त से है । इन्ही जिज्ञासाओं को उसने प्रश्न के माध्यम से गुरू श्रेष्ठ के सम्मुख रखा है । उसकी जिज्ञासा मनुष्य की उत्पत्ति का विज्ञान तथा कर्म का विज्ञान से सम्बंधित है । 

मंगलवार, 26 जनवरी 2016

सत्य क्या है

गुरू द्वारा बताये गये समस्त रूप संसार की रचना के विज्ञान के प्रभाव से अर्जुन को और अधिक जानने की जिज्ञासा हुई जिसकी शांति के लिये उसने प्रश्न किया कि परम् सत्य क्या है ? जीव की आत्मा क्या है ? हे गुरूश्रेष्ठ ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति के अधीन क्या क्षेत्र है ? ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति का क्या क्षेत्र है

सोमवार, 25 जनवरी 2016

ज्ञान विज्ञान योग

गुरू ने अर्जुन को साँख्य बताया पुन: योग बताया । परंतु मनुष्य की मानसिकता ऐसी होती है कि वह किसी भी ज्ञान को ग्रहण करने से पूर्व उसका विस्तार और विश्लेषण जानना चाहता है । गुरू अर्जुन को रूप संसार के सृजन का विज्ञान उसके मस्तिष्क की इसी जिज्ञासा की पूर्ति के उद्देष्य से ही बताये । ब्रम्ह एक सत्य है । शेस संसार उसी सत्य का मात्र अभिव्यक्ति है । मनुष्य ब्रम्ह की प्रकृति का सृजित रूप है । इस मनुष्य के जीवन का स्वरूप यदि कंचिद ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति आत्मा के प्रधानता के अनुरूप हो तो वह अपेक्षाकृत ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति के प्रधानता के जीवन स्वरूप से उत्कृष्ठ होगा । उत्पत्ति यदि अपने उद्गम श्रोत के प्रति निष्ठावन होगी, समर्पित होगी तो फलत: वह श्रेष्ठतर होगी । 

रविवार, 24 जनवरी 2016

सफल ज्ञाता की व्याख्या

गुरू का कथन इस बात पर बल देता है कि जिस समय व्यक्ति के एकाग्रता का अंतरण होता है उस समय उसके मस्तिष्क की एकाग्रता ब्रम्ह को उन्मुख होनी चाहिये । इसका अभिप्राय इस प्रकार है कि मोंहके विषयों का अंतरण नहीं वाँक्षित है बल्कि मोंह का त्याग वाँक्षित होता है । इस त्याग के साथ एकाग्रता का अंतरण ब्रम्ह को उन्मुख होना अपेक्षित होता है । 

शनिवार, 23 जनवरी 2016

भौतिक एवं दैविक

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति मुझे भौतिक एवं दैविक गतिविधियों का नियंत्रक, सभी कर्म आहुतियों का ग्रहणकर्ता के रूप में जानता है और मुझमें अपने मस्तिष्क को एकीकृत रखते हुये प्रकृतीय मोंह से मुक्त होता है, वह व्यक्ति मुझे जानने में सफल होता है । 

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

आध्यात्म की व्याख्या

ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति आत्मा के आधार पर ब्रम्ह की आठ वर्गों में विभाज्य निम्नतर प्रकृति द्वारा निर्मित शरीर लम्बित होता है । परंतु यह दोनों ही ब्रम्ह की प्रकृति हैं ब्रम्ह नहीं हैं । उस ब्रम्ह को जानना सम्भवतया इन दोनों ही प्रकृतियों के ज्ञान क्षेत्र के परे का ज्ञान है । उस परम् सत्य ब्रम्ह को जानने का एक मात्र उपाय उसी ब्रम्ह को ही समर्पित होना ही है ।

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

आध्यात्म

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति मुझे शरणागत होकर वृद्धावस्था तथा मृत्यु जैसे भय से मुक्त होने को सचेष्ट होता है वह व्यक्ति अपनी आत्मा के आधार ब्रम्ह का जान पाता है । 

बुधवार, 20 जनवरी 2016

पाप की व्याख्या

पाप कृत कोई संविधान के उलंघन जैसा कृत नहीं होता है, बल्कि अविद्या के प्रभाव से अहंकार की भावना से युक्त प्रकृतीय मोंहके अधीन स्वार्थपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति के लिये किये जाने वाले कर्म पाप की श्रेणी में आते हैं । गुरू बताये कि इस प्रकार पाप कृतों से मुक्त व्यक्ति जिसको कि स्वाभाविक प्रतिफल के रूप में द्वैतों के त्रास से मुक्ति मिल गई होगी वही व्यक्ति ब्रम्ह को केंद्रित ध्यान से उपासना करेगा । 

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको बताये कि जिन व्यक्तियों के पाप का अंत हो गया है, जो व्यक्ति प्रकृतीय मोह से उत्पन्न होने वाले द्वैतो के त्रास से मुक्त हो गये हैं, वे व्यक्ति पूर्ण निष्ठा से समर्पित भाव से मेरी उपासना करते हैं । 

सोमवार, 18 जनवरी 2016

मोंह और द्वैतों का जन्म

आत्मा के संस्कार उसके साथ जाते हैं । विगत जन्म के संस्कार के अनुसार मोंहग्रसित आत्मा को नई शरीर मिलती है । इस प्रकार जीव का जन्म मोंह और भ्रम के मध्य ही होता है । पुन: इस जन्मजात मोंह के प्रभाव से नये जन्म में इच्छायें और अरुचियाँ जन्म लेती हैं । इनके प्रभाव से सांसारिक द्वैतों का त्रास भोगते जीव जीवन जीता है । 

रविवार, 17 जनवरी 2016

मोंह और भ्रम के मध्य

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि हे भारत अर्जुन सभी जीवों का जन्म ही मोंह और भ्रम में हुआ है और वे सभी सांसारिक द्वैतों के त्रास को भोगते हैं क्योंकि इन द्वैतों का उदय इच्छा और अरुचि से होता है । 

शनिवार, 16 जनवरी 2016

त्रिकालज्ञ की व्याख्या

सभी जीवों की उत्पत्ति ब्रम्ह से है । इसलिये वह हर प्रत्येक का ज्ञाता है । सभी जीवों का विलय ब्रम्ह में ही होता है इसलिये जो मृतक हो चुके हैं ब्रम्ह उनका भी ज्ञाता होता है । जिनकी मृत्यु होती है उनका जन्म अवश्य होता है इसलिये जिनका जन्म अभी आगे होना है ब्रम्ह उनका भी ज्ञाता होता है । 

शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

त्रिकालज्ञ

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि हे अर्जुन मैं उन सभी जीवों को जानता हूँ जो वर्तमान हैं, जो मृतक हो चुके हैं और जिनका जन्म अभी आगे होना है परंतु मुझे कोई नहीं जानता है ।

गुरुवार, 14 जनवरी 2016

योगमाया की व्याख्या

रूप सृजन करने की क्षमता माया है । यह माया जब प्रकृति के तीनो गुणों से मुक्त होकर कार्य करती है तो इसे योगमाया कहा जाता है । यह एक विद्वान का मत है । दूसरे विद्वान का मत है कि माया जब इच्छा के साथ युक्त होकर कार्य करती है तो यह योगमाया है । ब्रम्ह मात्र रूप संसार तक ही सीमित सत्य नहीं है । वह इस संसार से परे भी है । इसलिये उसे इस संसार के किसी रूप विषेस में सीमित कल्पना करना अर्थविहीन है । 

बुधवार, 13 जनवरी 2016

योगमाया

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मैं अपनी योगमाया से ढका हुआ रहता हूँ इसलिये यह संसार मुझे जानता नहीं है । मैं अजन्मा हूँ । मैं परिवर्तनों से रहित हूँ । 
  

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

अद्वितीय की व्याख्या

ब्रम्ह को किसी रूप द्वारा निरूपित नहीं किया जा सकता है । यह हमारी कमज़ोरी है कि हम उस परम् सत्य का ध्यान नही कर पाते है और अपनी इस कमज़ोरी का निराकरण करते हैं कि किसी रूप में हम ब्रम्ह की कल्पना को पिरोते हैं । हम जिस भी रूप को ब्रम्ह का नाम देकर पूजते हैं वह मात्र हमारी कल्पना है सत्य नहीं है । ब्रम्ह तो प्रत्येक परिवर्तित होते रूप के परोक्ष में एक अपरिवर्तनीय सत्य है । उसका कोई रूप नहीं है । वह तो एकमात्र अरूपधारी सत्य है जो कि समस्त परिवर्तनों का मात्र दृष्टा है । 

सोमवार, 11 जनवरी 2016

सत्य अद्वितीय

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि अज्ञानी व्यक्ति मुझे रूपधारी समझते हैं यद्यपि कि मैं सदा बिना रूप के हूँ । ऐसे ही व्यक्ति मेरी उच्चतर प्रकृति आत्मा को भी नहीं जानते हैं जो कि सदा अपरिवर्तनीय है और महानतम है । 

रविवार, 10 जनवरी 2016

आंशिक उपलब्धि

जो व्यक्ति निर्गुण, निराकार, निरंजन ब्रम्ह की साधना नहीं कर पाते हैं वे व्यक्ति अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिये मेरे प्रकृति निर्मित रूप की आराधना द्वारा अपनी इच्छाओं की पूर्ति करते हैं । वास्तविक उपलब्धि मोंह से मुक्ति द्वारा होती है इसलिये इच्छाओं की पूर्ति के रूप में हुई उपलब्धि मात्र उनका संतोष है । मोंह से मुक्ति तो योगाभ्यास द्वारा ही मिलती है । 

शनिवार, 9 जनवरी 2016

श्रद्धानुसार फल

अन्य देवताओं की पूजा करने वाले व्यक्तियों के सम्बंध में गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि ऐसे व्यक्तियों द्वारा अपनी इच्छा की पूर्ति के लिये की गई श्रद्धा तथा उस श्रद्धा के प्रत्युत्तर में प्राप्त फल यह मात्र क्षणिक लाभ के हैं । जो व्यक्ति मेरी प्रकृति में आस्था जागृत कर अपनी आस्था का फल प्राप्त करता है वह इसी प्रकृति में ही रहता है जबकि मुझमें आस्था करने वाला मुझमें समाहित होता है |  

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

आस्था की व्याख्या

ब्रम्ह ने अपने को अपनी प्रकृति द्वारा सृजित रूपों में प्रगट किया है । कोई व्यक्ति सत्य ब्रम्ह के स्थान पर उसके प्रकृति निर्मित रूप में ही अपनी निष्ठा पिरोता है, वह भी कुछ पाने के लिये तो प्रत्युत्तर में ब्रम्ह उस व्यक्ति की इस निष्ठा का भी मूल्याँकन करता है । उस व्यक्ति की इच्छा की पूर्ति कर उसे कुछ देता है । परंतु यह आस्था उस सत्य के प्रति नहीं है बल्कि उसकी प्रकृति के प्रति है

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

आस्था फलीभूत

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बताये कि कतिपय व्यक्ति अपनी इच्छा की पूर्ति की कामना से अन्य देवताओं में आस्था जागृत कर उन देवताओं को प्रसन्न करके उनकी कृपा से अपनी इच्छा का फल पाते हैं यद्यपि कि वह फल उन्हे मेरे आदेशों से ही मिलता है । 

बुधवार, 6 जनवरी 2016

विश्वास का रक्षक

गुरू बताते हैं कि ब्रम्ह भक्त के विश्वास का रक्षक होता है । इसलिये वह भक्त जिस भी रूप में सत्य विश्वास करके सच्चे भाव से प्रार्थना अर्पित करता है ब्रम्ह उसी रूप में प्रगट होकर उसकी प्रार्थना पूर्ण करता है और उसके मन के विश्वास की रक्षा करता है । 

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

विश्वास की व्याख्या

गुरू मूर्ति पूजा में विश्वास को विधि सम्मत बतलाते हैं । गुरू का कहना है कि ब्रम्ह भक्त की आस्था को महत्व देते हैं । यदि भक्त की आस्था दृढ है तो ब्रम्ह भक्त की प्रार्थना सुनकर स्वयं झुक जाते हैं । ब्रम्ह के ही रूप का विस्तार समस्त संसार में है । इसलिये भक्त जिसभी रूप में अपनी आस्था दृढ करके उसे ब्रम्ह स्वरूप मानकर प्रार्थना करता है, ब्रम्ह भक्त की आस्था को देख उसी रूप में प्रगट होकर उसे वाँक्षित फल देकर उसकी उस रूप में आस्था को दृढ कर देते हैं । 

सोमवार, 4 जनवरी 2016

विश्वास का फल

विभिन्न देवताओं की वंदना करने वाले व्यक्तियों के सम्बंध में गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण आगे बताये कि जिस भी रूप के समक्ष व्यक्ति अपनी इच्छापूर्ति की कामना से बंदना करता है मैं उसकी इच्छा की पूर्ति करके उसकी आस्था को उसी रूप में दृढ कर देता हूँ । 

रविवार, 3 जनवरी 2016

अन्य देवता

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि ऐसे व्यक्ति जिनका मस्तिष्क इच्छाओं के वशीभूत विकृत दशा में है वे अपनी इच्छा पूर्ति की कामना से, अपनी प्रकृति के वशीभूत होकर, विभिन्न प्रकार की आहुतियाँ अर्पित करके अन्य देवताओं की बंदना करते हैं । 

शनिवार, 2 जनवरी 2016

वासुदेव सर्वस्य

एक स्थिति जब कि मनुष्य की निम्नतर प्रकृति अपनी ही उच्चतर प्रकृति के वर्चस्व को स्वीकार कर लेवे, निम्नतर प्रकृति उच्चतर प्रकृति की अनन्य बन जाय, निम्नतर प्रकृति पूर्णतया उच्चतर प्रकृति में विलय कर जाय यहाँ तक कि मनुष्य का स्वरूप उसकी उच्चतर प्रकृति ही निरूपित करे तो ऐसे व्यक्ति के लिये कहा जावेगा वासुदेव सर्वस्य । 

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

प्रकृति का प्रलय

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये कि कई जन्मों पर्यंत प्रयत्नो को करते हुये, मनुष्य को यह ज्ञान होता है कि स्वयं मेरे ही अंदर विद्यमान ब्रम्ह ही सर्वस्य है, तब वह पूर्ण रूप से ब्रम्ह को समर्पित हो जाता है । हे अर्जुन ऐसी आत्मायें विरले ही मिलती हैं ।