शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

उपदेश चरण 7

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बताये कि असत् कभी अस्तित्व नहीं हो सकता है और सत्य जो अस्तित्व है वह कभी नाश नहीं हो सकता है । व्याख्याकार इस कथन की व्याख्या करते हुये कहता है कि शरीर असत् है और आत्मा सत् है जिसके लिये योगेश्वर ने यह बात कही है । 

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

उपदेश चरण 6

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण आत्मज्ञान के लिये आहर्ता बताते हुये कहते हैं कि जो पुरुष द्वैतों यथा सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद, शीत-ताप आदि से प्रभावित नहीं होता है और प्रकृति के कर्मों को बिना फल की कामना किये करता है वह आत्मज्ञान के लिये योग्य पात्र बन जाता है । जिसका जन्म हुआ है उस प्रत्येक की मृत्यु तो होगी । आत्मज्ञान मृत्यु से परे का ज्ञान है जिसपर मृत्यु का प्रभाव नहीं होता है । यह जीवन के मानको को मृत्यु से ऊपर उठाने की स्थिति है । मनुष्य यदि सांसारिक परिवर्तनों से प्रभावित होता है, मृत्यु-दु:ख उसे अपने कर्म से विचलित करते हैं तो निश्चित ही वह अज्ञान की परिधि में है ।  

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

उपदेश चरण 5

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बताये कि सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद, शीत-ताप यह सभी प्रकृतीय संसर्ग के फल होते हैं । परिवर्तित होते संसर्ग द्वारा यह सभी बदलते रहते हैं । आत्मा का अहंकार इन सभी की अनभूति कराता है । मुक्त स्वतंत्र आत्मा इन द्वैत अनुभूतियों को स्पर्ष तक नहीं करती है । मुक्त आत्मा जो भी स्थिति सम्मुख होती है उसे सहर्ष स्वीकार करती है । 

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

उपदेश चरण 4

गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण एक उदाहरण के द्वारा मोहासक्त अर्जुन को बताते हैं कि जिस प्रकार शरीर का शिशु अवस्था से युवावस्था में परिवर्तन होता है पुन: वृद्धावस्था में परिवर्तन होता है उसी प्रकार आत्मा का एक शरीर से दूसरे शरीर में परिवर्तन होता है । इसलिये संत पुरुष मृत्यु का शोक नहीं करते हैं । व्याख्याकार बताता है कि ज्ञान प्राप्ति के जिज्ञासुओं की ज्ञान प्राप्ति की यात्रा कई कई जन्मों में पूरी होति है । मृत्यु से आत्मा प्रभावित नहीं होती है ।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

उपदेश चरण 3 : व्याख्या 2

मुक्त आत्मा का निवास ब्रम्ह में होता है । आत्मा जब तक ब्रम्ह के धर्म के अनुकूल आचरण करती है तब तक वह ब्रम्ह स्वरूप ही होती है । इस स्वरूप में वह रूप धारण से पूर्व से अनंत पर्यंत काल तक रहती है । जब तक इस रूप संसार का विलय नहीं होता है तब तक बहुसंख्यक आत्माये अपने रूप के गुण के अनुरूप इसमें रहती हैं । बहुसंख्यक आत्माओं को इस रूप संसार से अलग नहीं किया जा सकता है । मुक्त आत्माये सत्य को जानते हुये मोंह से निर्लिप्त रहती हैं जबकि आसक्त आत्माये जन्म और मृत्यु को भोग करते बंधनकारी कर्मों को करते लिप्त दशा में रहती हैं । 

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

उपदेश चरण 3 : व्याख्या 1

इस रूपों के संसार के लिये बहु संख्यक आत्माधारी एक रचनागत सत्य हैं । प्रत्येक रूप का उदय शून्य से अस्तित्व स्वरूप पर्यंत हुआ है । असत् से सत् पर्यन्त । सभी रूपों का आधार ब्रम्ह है जबकि ब्रम्ह कोई रूप नहीं होता है । ब्रम्ह से समय की उत्पत्ति हुई है और समय का विलय ब्रम्ह में होता है । इस आधार पर प्रत्येक आत्मा अनादि काल से है और अनंत काल पर्यंत रहेगी । 

रविवार, 22 फ़रवरी 2015

उपदेश चरण 3

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा हे अर्जुन आज से पूर्व भी कभी ऐसा समय नहीं था जबकि मैं नहीं था या यहाँ उपस्थित सभी नहीं थे और ना ही आगे कभी ऐसा समय आवेगा जबकि मैं नहीं होऊँगा अथवा यहाँ उपस्थित सभी नहीं होंगे । इस कथन में व्यापक संसार के सृजन सम्बंधी सिद्धांत निहित हैं । भिन्न व्याख्याकारों की भिन्न व्याख्यायें आगे के अंको में प्रस्तुत की जावेगी । 

शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

उपदेश चरण 2

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि हे अर्जुन तुम उन विषयों के लिये शोक कर रहे हो जिसके लिये तुम्हे शोक नहीं करना चाहिये । ज्ञानी पुरुष ना ही उनके लिये शोक करते हैं जो जीवित हैं और ना ही उनके लिये जो मृतक हो चुके हैं । व्याख्याकार उपरोक्त कथन की व्याख्या करता है कि हत्या, मृत्यु इसी प्रकार आक्रमण और हठात् नगर का कब्जा इन सभी कृतों को किसी नाटक के दृष्य के रूप में ग्रहण करो । बदलते हुये दृष्य और उठती हुई कराह को नाटक का अंग मानो । जीवन के बदलते हुये दायित्वों में मनुष्य की आत्मा नहीं भाग लेती है मात्र पार्थिव शरीर इस संसार के रंग मंच पर दायित्वो के अनुरूप आचरण करता है ।  

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

मौन की समीक्षा

मैं युद्ध नहीं करूँगा कहकर अर्जुन चुप हो गया । समीक्षाकार कहता है कि मौन व्यक्ति ही तो गुरू के उपदेश सुनेगा । अर्जुन के मौन पर गुरू श्रीकृष्ण मुस्कराये । समीक्षाकार इस मुस्कराने का रहस्य बताता है कि श्रीकृष्ण रक्षक ब्रम्ह स्वरूप में सभी मनुष्य के पाप कृतों एवं मन:संताप से भिज्ञ थे । अर्जुन ने अपने कर्तव्य से बिमुख होने का मंतव्य प्रगट कर पाप किया था और मुख से अपने पाप कृत के उद्देष्य को कारणयुक्त बताकर आवरण से ढक रहा था । 

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

अर्जुन का विषाद बढा

गुरू के उपदेश को सुनते ही मानों अर्जुन का विषाद और उमड पडा । कहने लगा कि सामने गुरू हैं भीष्म,-पितामह हैं सदैव मैंने उनके चरण छूए हैं उनका आशिर्वाद लिया है मैं उनकी हत्या कैसे करूं । यद्यपि कि यह अपने लाभ के विचार से ही युद्ध के लिये उपस्थित हुये हैं परंतु इसके उपरांत भी मेरा विवेक इनकी हत्या के लिये तत्पर नहीं हो रहा है । हे माधव मैं पूर्णतया हत्प्रद दशा में हो गया हूँ और समझ नहीं पा रहा हूँ कि मुझे क्या करना चाहिये । कृपया मुझे उचित मार्ग बतावे । इतना कहकर अर्जुन बिना गुरू के उत्तर की प्रतीक्षा किये कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा । ऐसा प्रतीत हुआ कि जैसे अर्जुन का असमंजस्य निर्णय में पर्णित हो गया । ऐसा कहकर अर्जुन शांत चुप हो गया ।  

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

उपदेश चरण 1

गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन की मन:दशा को देखते हुये सर्वप्रथम उसे उस सम्प्रदाय का स्मरण कराते है जिसमें उसका जन्म हुआ आर्य कहकर । आर्य मर्यादित आचरण एवं शालीन व्यवहार तथा स्पष्ट बुद्धि द्वारा सीधी अभिव्यक्ति के लिये जाने जाते हैं । कृष्ण कहते हैं हे आर्य इस निर्णायक अवसर पर तुम्हारे द्वारा व्यक्त विचार आर्य सम्प्रदाय के कुलीन, बीर योद्धा के अनुरूप नहीं हैं । तुम्हारा विषाद तुम्हे इस पृथ्वी पर अपयश देगा और स्वर्गलोक में स्थान मिलने के अवसर पर बाधा बनेगा । हे अर्जुन इस अ-सामयिक विषाद को त्याग कर उठो अपना कर्तव्य करो ।

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

विषाद

भगवद्गीता का प्रथम अध्याय अर्जुन की आत्म-ग्लानि और मन:संताप के वृतांत के साथ समाप्त होता है । इसे भी योग कहा गया है क्योंकि ब्रम्ह को जानने की जिज्ञासा आत्म-ग्लानि के अंधकार में ही पैदा होती है । आत्म-ग्लानि का काला अंधकार ही ज्ञान के प्रकाश की ज्योति के दर्शन को लोलुप होता है । जीवन की प्रबलतम विकट स्थिति में जब मनुष्य का सामर्थ्य असहाय महसूस करता है तभी वह अज्ञात शक्ति की सहायता के लिये अधीर होता है । ऐसे में मनुष्य एकाकीपन, संदेह और अ-सुरक्षा की अनुभूति करता है । किसी भी मनुष्य को यदि कार्य करना है तो उसमें व्याप्त एकाकीपन, संदेह और अ-सुरक्षा का निवारण अनिवार्य है । 

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

अर्जुन कृष्ण संवाद

अर्जुन जब मोंह के वशीभूत अपने निर्धारित कर्म से विमुख होने को उद्यत होता है तो स्वयं उसके ही अंत:करण में विद्यमान सद्विचारों की छवि उससे प्रश्न करती है । यह प्रश्न उसे विदित तब हुये जब वह विषेस प्रयत्नों द्वारा मोंह को काटने में समर्थ हुआ । अंत:करण के धरातल में परम् सत्य विद्यमान रहता है । अर्जुन के अंत:करण के धरातल में श्रीकृष्ण हैं । मनुष्य और परम् सत्य में कोई दूरी नहीं है । परम् सत्य और मनुष्य के मिलन के लिये किसी अन्य माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है । केवल जिज्ञासु हृदय और सत्य निष्ठा की आवश्यकता होती है । मनुष्य अर्जुन और उसी के अंत:करण में उपस्थित श्रीकृष्ण के मध्य सतत् प्रश्न उत्तर तब तक होते हैं जब तक पूर्ण मानसिक सामंजस्य स्थापित नहीं हो जाता है । परम् सत्य कोई हमसे दूर का अस्तित्व नहीं है अपितु हमारे अंदर हमारे हितैषी के रूप में हमारे मित्र के समान विद्यमान है और हर पल हमारे साथ है ।

रविवार, 15 फ़रवरी 2015

योगशास्त्र

कुछ विद्वानों का मत है कि दर्शन अपरिवर्तनीय सत्य के लोक के ज्ञान के लिये प्रयोज्य है जबकि वास्तविक जीवन परिवर्तनशील संसार की घटनाओं से प्रभावित होता है । विद्वान मार्क्स का मत है कि दर्शन संसार की व्याख्या करता है जबकि वास्तविक कार्य संसार को सुधारना होता है । परंतु इस मत में व्यक्त दर्शन की संकीर्णता गीता पर प्रभावी नही है क्योंकि गीता परम् सत्य को जानने हेतु दार्शनिक व्याख्या ब्रम्हविद्या तथा संसार में जीवन जीते हुये मनुष्य जीवन के लिये उच्चतम आदर्श लक्ष्य को पाने के लिये पथ योगशास्त्र के द्वारा बताती है । गीता का मत है कि यह संसार मात्र दृष्य सम्भावना नहीं है अपितु कर्म का युद्धक्षेत्र है । संसार की प्रगति के लिये मनुष्य की रचनागत प्रकृति को सुधारने की आवश्यकता है । 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

ब्रम्हविद्या

परम् सत्य का विज्ञान । परम् सत्य क्या है ? इस संसार में प्रतिपल घटित हो रहे परिवर्तन ही सत्य है अथवा इन समस्त परिवर्तनों के परोक्ष में कोई अपरिवर्तनीय सत्य विद्यमान है ? वह कौन सा अस्तित्व है जिससे संसार के समस्त रूप प्रगट हुये हैं ? इस अनंत सम्भावनाओं के संसार के समस्त परिवर्तनों को गतिमान रखने वली सत्ता क्या है ? क्या इन समस्त परिवर्तनों के पृष्ठभूमि में कोई लक्ष्य निहित है अथवा क्या इन परिवर्तनों का कोई अर्थ है ? परम् सत्य के प्रकृति का ज्ञान कराना बोध कराना ब्रम्हविद्या का लक्ष्य होता है । तर्क द्वारा उत्पन्न होने वाले प्रश्नों के पथ से अग्रसर होने पर ब्रम्हज्ञान का पथ है । विद्वान शंकर का मत है कि जिस प्रकार प्रकाश के माध्यम से हम संसार के समस्त रूपों को देखते हैं उसी प्रकार तर्क द्वारा उत्पन्न होने वाले प्रश्नों के माध्यम से ब्रम्ह का अनुभव पाया जा सकता है । 

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

उपनिषद भगवद्गीता

भगवद्गीता में परम् सत्य का विज्ञान ब्रम्हविद्या, तथा उस परम् सत्य का वास्तविक अनुभव पाने का पथ योगशास्त्र दोनों ही श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद के माध्यम द्वारा प्रस्तुत किये गये हैं । अर्जुन आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिये एक निष्ठावन जिज्ञासु है । गुरु श्रीकृष्ण उसे परम् सत्य का दर्शन एवं उसका साक्षात्   पाने का पथ भी बताते है । 

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

गीता का संदेश

गीता के संदेश की सीमा समय और आकाश दोनों की सीमा से परे है । यह सर्वकाल में सत्य है और पूरे मानव समाज के हित के अनुरूप है । अपने उत्थान के लिये प्रयत्नशील प्रत्येक मनुष्य के लिये यह प्रभावी है । यह संदेश दुर्वृत्तियों के शमन और देवत्व की पुनर्स्थापना के लिये है । मोंह का त्याग कठिन अवश्य होता है परंतु प्राप्त होने वाले उच्चस्तरीय जीवन के लिये यह त्याग अनिवार्य होता है । 

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

स्वतंत्र आत्मा

गीता में वर्णित युद्ध हर प्रत्येक उस उनुष्य के हृदय में होने वाला युद्ध है जो देवत्व के उच्चस्तरीय जीवन को पाने को उद्यत होता है । यह युद्ध मनुष्य को अपने ही अंदर विद्यमान दुर्वृत्तियों का शमन करने के लिये लडना पडता है । यह युद्ध अपनी ही आत्मा को प्रकृति की दासिता से मुक्त कराने के लिये लडना होता है । मोंहपर विजय पानेकी दशा में मुक्त आत्मा आनंद की स्थिति का भोग करती है । 

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

प्रभुता की पुनर्स्थापना

हम अपने अंदर विद्यमान ब्रम्ह को विस्मृत कर प्रकृतीय मोंह में आसक्त हैं । ब्रम्ह का मौलिक स्वरूप निर्लिप्त, निरंकार होता है । प्रकृति से अप्रभावित । परंतु अज्ञानवश जब हमारी आत्मा मोंह में आसक्त हो प्रकृति की दास बन बैठती है तो हमारा पुनीत कर्तव्य बन जाता है कि हम अपनी आत्मा को प्रकृतीय मोंह से मुक्त करावें । गीता में यही मुक्ति का पथ निर्दिष्ट किया गया है । आत्मा को अपने मौलिक स्वरूप में पुनर्स्थापित करने का पथ । 

सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

देवत्व जागृत करें

प्रत्येक मनुष्य के अंत:करण में ब्रम्ह का अंश विद्यमान है । परंतु उसे विस्मृत कर हर प्रत्येक प्रकृतीय मोंह में बँधा है । जब भी इस प्रकृतीय मोंह को त्याग देवत्व के उच्च स्तर पर जीवन को उठाने की बात आती है तो प्रकृतीय मोंह उस मनुष्य की मन:स्थिति को उसी प्रकार अकर्मण्यता का असमंजस्य उत्पन्न करती है जैसा कि अर्जुन के माध्यम द्वारा गीता में व्यक्त किया गया है । 

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

मोंह का फल

कर्मयोग कर्तव्य के कर्मों को, फल की कामना से रहित होकर, करने की अनुशंसा करता है । मोंह कर्मफल पहले ही ढूढता है । अर्जुन कहता है कि युद्ध से अमुक अमुक त्रासदा सृजित होगी अर्थात् कर्मफल पहले ही घोषित करता है । यह पूर्णरूप से कर्मयोग के विपरीत आचरण हुआ । यह मोंह का फल है । युद्ध त्रासदा के संग मर्यादा की स्थापना भी है । हम युद्ध द्वारा अपने अंदर व्याप्त मोंह का नाश करके मर्यादित आत्मज्ञान का जीवन पाते हैं । 

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

मोंह बंधन

यदि जीवन में आदर्श हासिल करना है, न्याय और प्यार पाना है, तो हमें मोंह को त्यागने में होने वाले दु:खों को झेलना होगा, पीडा को बर्दाश्त करना होगा । अर्जुन को युद्ध सम्मुख होते ही अनिश्चय का सामना करना पडा था । कारण उसका प्रकृतीय मोंह था । उसको प्रकृति की आसक्ति याद आ रही थी जो उसे युद्ध से विमुख होने को प्रवृत्त कर रही थी । वह जो मुख से स्वजनो और सगे सम्बंधियों की त्रासदा की बाते कर रहा था इसमें उसका उनके प्रति प्रेम नहीं था अपितु वह अपने स्वयं के मोंह को त्यागने में अपने को असमर्थ पा रहा था । 

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

भौतिक सुख

इस मनुष्य शरीर के सृजन का कंचिद लक्ष्य भौतिक सुखों को खोजना अथवा यत्न करके पाना नहीं होता है । यह भौतिक सुख तो यदि कोई प्रयत्न करके हासिल भी कर लेवे तो भी उसे छोडना ही पडेगा । वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर, शरीर जीर्ण होने पर और अंत में मृत्यु होने पर । इसलिये यदि कोई अपने जीवन के सार्थक प्रयत्न इन भौतिक सुखों को पाने के लिये करता है तो उसके प्रयत्नो को नष्ट होना निश्चित ही है ।  

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

अज्ञानवश मोंह

अर्जुन को यह ज्ञात नहीं था कि स्वयं उसकी रचना का क्या विज्ञान है, उसके सम्मुख खडे शत्रुओं के साथ उसके सम्बंध का क्या रहस्य है, इस विश्व की रचना का क्या विज्ञान है एवँ इसकी उत्पत्ति का निमित्त क्या है । इन समस्त का ज्ञान ना होना ही उसकी मानसिक पीडा एवँ त्रासदा के कारण थे । 

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

अज्ञात लक्ष्य का भय

प्रकृतीय संसर्ग में रहते हुये प्रकृतीय मोंह मे आसक्त व्यक्ति स्वप्न में भी आत्मज्ञान और परम् सत्य की अनुभूति में निहित सुख की कल्पना नहीं कर सकता है । इसलिये अज्ञात लक्ष्य को पाने के लिये प्रयत्नशील होने के लिये उसे उपलब्ध प्रकृतीय मोंह का त्याग अत्यंत भयकारक प्रतीत होता है । इस स्थिति को गीता के ग्रंथकार ने अर्जुन के मोंह के माध्यम से व्यक्त किया है । 

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

सत्य के पथ में

अर्जुन श्रीकृष्ण से कहता है कि इस युद्ध में मैं अपने ही स्वजनों को, सगे सम्बंधियों को मारेंगे उनकी हत्या करेंगे परिणामत: उनके परिवारगण पीडित होंगे उनकी स्त्रियाँ विधवा होंगी । ऐसे नर संहार द्वारा जो राज्य मुझे मिलेगा उससे मुझे क्या सुख मिलेगा । परम् सत्य को पाने के लिये जब प्रकृतीय मोंह का त्याग करने की स्थिति आती है तो ऐसा अनुभव हर प्रत्येक व्यक्ति को आता है । 

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

अन्य नाम

अवतार पुरुष श्रीकृष्ण के लिये गीता में जो अन्य नाम प्रयोग किये गये हैं, मधुसूदन मधु राक्षस के संहारक, अरिसूदन शत्रुओं का नाश करने वाले, गोविंद आत्मज्ञान कराने वाले, वासुदेव वासुदेव के पुत्र, यदव युदु के वंशज, केशव सुंदर केशों वाले, माधव लक्ष्मी के पति, हृषीकेश इंद्रियों के नियंत्रक, जनार्दन मनुष्यों को मुक्ति दिलाने वाले । 

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

अर्जुन की पीडा

युद्ध के मैदान में जब दोनो पक्ष की सेनायें युद्ध के लिये तत्पर हो सामने सामने खडी हुई और शंख नाद द्वारा सभी ने अपनी युद्ध के प्रति तत्परता और तैयारी को पूर्ण व्यक्त किया तो अर्जुन को अत्यधिक मानसिक पीडा की अनुभूति हुई । उसने अपने स्वयं के विश्लेषण में यह पाया कि अब तक के जीवन के सम्बंधों के जो मूल्य थे वह सब युद्ध में तोडने होंगे । यहीं मोंह का त्यागना पीडा का कारण था । परंतु विडम्बना यह है कि बिना मोंह त्यागे नया जीवन मिलेगा ही नहीं ।