गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस व्यक्ति को
मेरे इस फैले हुये रूप संसार रूपी वैभव का ज्ञान हो जाता है और वह इस समस्त फैले हुये वैभव के
उद्गम श्रोत के रूप में मुझे जानता है वह व्यक्ति अविचलित ध्यान द्वारा मुझमें
युक्त दशा में ही रहता है ।
बुधवार, 31 अगस्त 2016
मंगलवार, 30 अगस्त 2016
विभूति
ब्रम्ह की फैली हुई वैभवयुक्त रचनायें ब्रम्ह की विभूति हैं ।
इन विभूतियों के ज्ञान द्वारा ब्रम्ह के ज्ञान का पथ गुरू ने प्रशस्थ किया है । जिज्ञासु
को ज्ञान प्राप्ति के लिये गुरू मार्ग देते हैं । विभूतियाँ सामने हैं । इनका
अध्ययन और ज्ञान सुगम है । इसलिये इनके पथ से ब्रम्ह की ओर अग्रसर हुआ जाय, यह उपाय है ।
सोमवार, 29 अगस्त 2016
सनातन
गुरू ने ब्रम्ह के रहस्य का उपदेश करते हुये इस रूप संसार की
रचना में सहायक सप्तऋषि और मनु के सम्बंध में बताया । इन सप्तऋषियों और मनु की
रचना भी ब्रम्ह की प्रकृति से ही हुई है । इस उपदेश द्वारा गुरू ने ब्रम्ह की
रचनाओं के ज्ञान द्वारा ब्रम्ह को जानने का पथ प्रशस्थ किया है ।
रविवार, 28 अगस्त 2016
किवदंति
ऐसा बताया जाता है कि यह सप्तऋषि इस रूप संसार की रचना में
प्रयुक्त ऊर्जा श्रोतो के नियंत्रक थे । मनु के सम्बंध में बताया जाता है कि ये
मनुष्य की परम्परा में प्रथम मानव थे । इस रूप संसार की रचना इन्ही सप्तऋषियों और
मनु के माध्यम से ब्रम्ह ने की है ।
सप्तऋषि
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये कि प्राचीन सप्तऋषि
एवँ चारो मनु यह सभी मेरी ही प्रकृति से उत्पन्न हुये हैं और इन्ही से यह समस्त
रूप संसार सम्भव हुआ है ।
शुक्रवार, 26 अगस्त 2016
साराँश
गुरू ने उपदेश किया है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन में सृजित
होने वाली समस्त स्थितियाँ यथा बुद्धि,
विवेक, भ्रम से स्वतंत्रता, धैर्य, सत्य, बाह्य तथा आंतरिक नियंत्रण, सुखांभूति तथा दु:खानुभूति, अस्तित्व तथा अनस्तित्व, भय और भय से मुक्ति, अहिंसा, समता का भाव, संतोष, संयम,
दान, यश और अपयश इन समस्त का उद्भव ब्रम्ह से
होता है ।
गुरुवार, 25 अगस्त 2016
अपयश
किसी व्यक्ति के द्वारा कृत किसी निन्दनीय कर्म की समाज भर्तसना
करता है । उस कृति कर्म के प्रभाव से वह व्यक्ति समाज द्वारा हेय दृष्टि से देखा
जाता है । यह स्थिति उस व्यक्ति का अपयश है ।
बुधवार, 24 अगस्त 2016
यश
कोई सत्कर्म जिसे समाज उत्तम कर्म मानते हुये सराहना करता है ।
ऐसे कर्म को, उसके कर्ता व्यक्ति के संदर्भ में, सम्मानजनक भाव में वर्णन किया जाता है । यह
स्थिति उस कर्ता व्यक्ति का यश कही जाती है ।
मंगलवार, 23 अगस्त 2016
दान
बिना किसी प्रत्यावर्तन की कामना किये किसी असमर्थ की सहायता
में दिया गया वस्तु अथवा श्रम दान होता है । यह भी प्रकृतीय गुणों की परिधि में
आता है मात्र सात्विक होने के कारण अन्य गुणों के सापेक्ष शिरोमणि है ।
सोमवार, 22 अगस्त 2016
संयम
मनमोहक वासना वृत्तियों के प्रति आकर्षित होने की सहज़ वृत्ति को
विवेक के बल से अंकुश करना संयम है । किसी भी अतिकारक प्रवृत्तियों के प्रतिफल से
जनित होने वाले मानसिक उद्वेगों को विवेक के बल से नियंत्रित करना संयम है ।
रविवार, 21 अगस्त 2016
संतोष
प्रकृति ने जो कुछ दिया उसमें संतुष्ट रहना यह संतोष है । कर्म
करने में कर्म का कोई निमित्त होता है । यदि कर्म इच्छाजनित है तो फल की आकाँक्षा
होगी । फिर एक निश्चित मनोवाँक्षित फल की दशा में ही व्यक्ति संतुष्ट होगा ।
अन्यथा संतुष्ट नहीं होगा । सन्यासी का कर्म है तो प्रत्येक फल में वह व्यक्ति
संतुष्ट रहेगा । इसलिये कर्म करने का भाव के लिये संतोष एक निश्चयात्मक लक्षण है ।
शनिवार, 20 अगस्त 2016
समता का भाव
प्रत्येक जीव का उद्भव ब्रम्ह से है । प्रत्येक गति का प्रेरक
स्वयँ ब्रम्ह है । इन भावों का हृदयस्थ होने से समता के भाव का जन्म होता है । यह
अनुभूति होने की स्थित है । यह मात्र शिक्षा से ग्रहण नही हो सकती है ।
शुक्रवार, 19 अगस्त 2016
अहिंसा
किसी भी अन्य जीव को किसी भी भाँति कष्ट न पहुचाने की वृत्ति
अहिंसा है । इस वृत्ति का सहज अभ्यास होना अपेक्षित होता है । आत्मा किसी ऐसे कर्म
को पोषित ना करे जिससे किसी अन्य जीव को कष्ट पहुँचे ।
गुरुवार, 18 अगस्त 2016
भय से मुक्ति
अर्जित किये हुये सुख सामग्रियों के संचय की वृत्ति यदि कंचिद
क्षीण हो जाय तो व्यक्ति निर्भय स्थिति का भोग करेगा । भय से मुक्त स्थिति होगी । भय
एक मानसिक वेदना की अनुभूति होती है । इसलिये पुष्ट मानसिक दशा भय-मुक्ति को पोषित
करने वाली होगी ।
बुधवार, 17 अगस्त 2016
भय
व्यक्ति अपने इच्छाओं की पूर्ति में अर्जित करके संचित किये
हुये सुख साधनों की रक्षा करना चाहता है । इन्हीं संचित और रक्षित सुख शाधनों के
क्षय की आशंका और सम्भावना उसके मस्तिष्क में भय उत्पन्न करते है । एक मानसिक
वेदना जिसका जन्म किसी सम्भावित क्षति के चिंतन से सृजित होती है ।
मंगलवार, 16 अगस्त 2016
अन-अस्तित्व
कार्यों का प्रेरक ब्रम्ह है । कार्यों की कर्ता प्रकृति होती
है । आत्मा मात्र ब्रम्ह का प्रतिनिधि है । इस स्वरूप को ग्रहण करने पर कार्य का
स्वरूप बनता है कि ब्रम्ह की महिमा से प्रकृति द्वारा प्रेरित कर्मों को सम्पादन
स्वरूप में पर्णित करने के लिये आत्मा को उसमें सम्मलित होना आत्मा का सत्य धर्म
निर्वाह है । यही आत्मा का अ-कर्ता स्वरूप है ।
सोमवार, 15 अगस्त 2016
अस्तित्व
आत्मा कंचिद अपने को एक भिन्न अस्तित्व के रूप में बोध करे तो
इसे ही अहंकार कहा जाता है । कर्मो का प्रेरक ब्रम्ह है । आत्मा मात्र एक ब्रम्ह
का प्रतिनिधि स्वरूप है । अहंकार बोध को ज्ञान के जिज्ञासु के लिये वर्जित बताया
गया है ।
रविवार, 14 अगस्त 2016
सुखांभूति दु:खांभूति
प्रकृतीय गुणो की भोक्ता आत्मा होती है । जब तक वह इच्छाजनित
कर्मों का पोषण करेगी तब तक वह इच्छानुकूल कर्मफल से सुख की अनुभूति करेगी तथा
इच्छा के प्रतिकूल कर्मफल से दु:ख की अनुभूति करेगी । गुरू ने ज्ञान के जिज्ञासु
के लिये इन दोनो ही अनुभूतियाँ को वर्जित बताया है । इन्ही कारणों इनके जनित होने
के श्रोत ‘इच्छाजनित कर्मों के पोषण” को
वर्जित बताया गया है ।
शनिवार, 13 अगस्त 2016
साम
आत्मा को अन-अपेक्षित कर्मो के प्रेरण में सम्मलित होने के
प्रति सहज़ अरुचि के अभ्यास को सृजित करना आत्मा की वृत्तियों को नियंत्रित करना है
। इस प्रक्रिया को भगवद्गीता के ग्रंथकार ने साम शब्द द्वारा व्यक्त किया
है ।
शुक्रवार, 12 अगस्त 2016
दम
ज्ञान के जिज्ञासु को,
बाह्य इंद्रीय वासनायें जिनमें सम्मलित होने से आत्मा प्रकृतीय मोंह में आसक्ति
जनित करती है, से बचने का गुरू ने उपदेश किया है
। आत्मा को ऐसी वृत्तियों से रोकना अपेक्षित बताया गया है । भगवद्गीता के ग्रंथकार
ने इसे दम शब्द द्वारा व्यक्त किया है ।
गुरुवार, 11 अगस्त 2016
नियंत्रण
अन-अपेक्षित कार्यों में सम्मलित होने से व्यक्ति पापकृतों का
कर्ता बनता है । इसे गुरू वर्जित बताये हैं । आत्मा की इस वृत्ति पर अंकुश करना
नियंत्रण है । नियंत्रण को दो भागो में विभाजित करके अपनाने से प्रभावी परिणाम
मिलते हैं । यह विभाजन जनित होने वाले फल के प्रभाव स्थल बाह्य अथवा आंतरिक पर
आधारित किया जाना चाहिये ।
बुधवार, 10 अगस्त 2016
सत्य
व्यक्ति उपस्थित होने वाली स्थितियों को अपने मस्तिष्क में
व्याप्त इच्छाओं के आलोक में ही ग्रहण करता है । उपस्थित हुई स्थितियाँ सत्य रूप
में क्या परिलक्षित कर रहीं हैं अथवा किस कर्म की अपेक्षा व्यक्त कर रही हैं इसका
सहीं मूल्याँकन करना सत्य को ग्रहण करना है ।
मंगलवार, 9 अगस्त 2016
धैर्य
बाह्य परिस्थितियों के प्रभाव से उत्पन्न होने वाले मानसिक
विक्षेपों को बर्दाश्त करने की सहन शक्ति को धैर्य कहा जाता है । बाह्य
परिस्थितियाँ हर्ष अथवा विषाद दोनो ही प्रकार के विक्षेपों की कारक हो सकती है ।
यह दोनो के लिये ही प्रभावि माप है । परिस्थितियों के प्रभाव की प्रतिक्रिया से
उत्पन्न होने वाले विचलन की सहन सीमा है ।
धैर्य
बाह्य परिस्थितियों के प्रभाव से उत्पन्न होने वाले मानसिक
विक्षेपों को बर्दाश्त करने की सहन शक्ति को धैर्य कहा जाता है । बाह्य
परिस्थितियाँ हर्ष अथवा विषाद दोनो ही प्रकार के विक्षेपों की कारक हो सकती है ।
यह दोनो के लिये ही प्रभावि माप है । परिस्थितियों के प्रभाव की प्रतिक्रिया से
उत्पन्न होने वाले विचलन की सहन सीमा है ।
सोमवार, 8 अगस्त 2016
भ्रम से मुक्ति
विवेक के प्रभाव से यदि कंचिद व्यक्ति अपने को प्रकृतीय मोंह की
ओर प्रवृत्त होने से रोकने में सफल होता है तो फलत: वह भ्रम की स्थिति से
स्वतंत्रता की स्थिति को प्राप्त होगा । मोंह से बंधन सृजित होता है । मोंह से
मुक्ति स्वतंत्रता है ।
रविवार, 7 अगस्त 2016
विवेक
प्रकृतीय मोंह की ओर अग्रसर होना यह सहज़ प्रवृत्ति होती है ।
परंतु उचित के चुनाव द्वारा इस सहज़ वृत्ति को अंकुश करना यह विवेक है । प्रकृतीय
मोंह अज्ञान है । इस मोंह की ओर प्रवृत्त होना आसक्ति है । इससे पाप कर्मों की ओर
व्यक्ति अग्रसर होता है । विवेक के प्रभाव से ही अज्ञान से मुक्ति मिलती है ।
शनिवार, 6 अगस्त 2016
बुद्धि
यह आठ वर्गीय निम्नतर प्रकृति का एक घटक है । उचित और अनुचित के
मध्य भेद, सत्य और असत्य के मध्य भेद, उच्चतर प्रकृति और निम्नतर प्रकृति के मध्य
भेद प्रगट करने का यह केंद्र होता है । यह घटक जितना सक्षमता से कार्य करेगा जीवन
उतना ही उत्कर्ष की ओर अग्रसर होगा ।
शुक्रवार, 5 अगस्त 2016
जीवन की स्थितियाँ
जीव के जीवन में सृजित होने वाली विभिन्न स्थितियों की गणना
कराते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बताये कि विवेक, बुद्धि, भ्रम से स्वतंत्रता, धैर्य, सत्य, आत्म नियंत्रण, शांति, सुख और दु:ख, अस्तित्व तथा अस्तित्व विहीन, भय तथा भय से मुक्ति, अहिंसा, समता, संतुष्टि, सद्विचार, दया, यश और अपयश यह सभी स्थितियाँ मुझसे ही जनित होती हैं ।
गुरुवार, 4 अगस्त 2016
मोंह ही अज्ञान
समस्त पापकृतों का जन्म अज्ञान से होता है । असत्य प्रकृति में
सत्य का आभास अज्ञान है । इसीलिये विवेक का विषेस महत्व होता है । विवेक जो कि
सत्य ब्रम्ह और असत्य प्रकृति के भेद को प्रतिपल स्पष्ट विभक्त विदित रखे ।
तत्फलम् असत्यप्रकृति के प्रति मोंहासक्ति से व्यक्ति बचा रह सकेगा । मोंहासक्ति
से बचना और अज्ञान से बचना एक दूसरे के पर्याय हैं ।
बुधवार, 3 अगस्त 2016
भ्रम से मुक्त
गुरु का उपदेश व्यक्त करता है कि जो व्यक्ति प्रत्येक रूप को
ब्रम्ह से उत्पन्न हुआ अनुभव करता है उसे प्रत्येक रूप में ब्रम्ह की क्षवि के
दर्शन होने लगते हैं । इस प्रकार वह किसी भी रूप के प्रति मोंह जनित आसक्ति में
नहीं बँधता है । फलत: वह पापमुक्त दशा को प्राप्त होता है ।
मंगलवार, 2 अगस्त 2016
पाप से मुक्त
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जो व्यक्ति मुझे
अजन्मा, अनादि, और इस रूप संसारके शासक के रूप में जानता है वह किसी भी प्रकार
मतिभ्रम में नहीं पडता है और समस्त पापों से मुक्त हो जाता है ।
सोमवार, 1 अगस्त 2016
प्राचीनतम
समस्त रूपों का उद्गम ब्रम्ह से हुआ है । इसलिये कोई भी रूप
उद्गम श्रोत ब्रम्ह की उत्पत्ति को नहीं जानता है । सभी उत्पन्न हुये रूप समय की सीमा
से बँधे हुये है जबकि ब्रम्ह अनादि काल से है और अनंत काल तक सत्य के स्तम्भ के
रूप में रहेगा । वही एक मात्र शश्वत् सत्य है । वह अद्वितीय है ।
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