गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि सूर्य में जो तेज है, जो इस सारे संसार को प्रकाशित करता
है और चंद्रमा में और अग्नि में जो तेज है, उसको तू मेरा ही तेज समझ ।
सोमवार, 31 जुलाई 2017
रविवार, 30 जुलाई 2017
आत्मा में स्थित
आत्मा के सम्बंध में आगे बताते हुये
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि यत्नपूर्वक साधना में लगे हुये योगी
लोग उसे आत्मा में स्थित देखते हैं,
परंतु अबुद्धिमान और अनुशासनहीन आत्माओं वाले लोग यत्नकरके भी उसे नहीं देख पाते ।
शनिवार, 29 जुलाई 2017
ज्ञान की आंख
आत्मा के सम्बंध में आगे बताते हुये
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जब वह शरीर को छोडता है या उसमें रहता
है या गुणों के सम्पर्क में आकर उपयोग करता है, उस समय मूढ लोग (अंतर्वासी आत्मा को) नहीं देख पाते । परंतु
जिनके ज्ञान की आंख है (या ज्ञान जिनकी आंख है) वे उसे देख पाते हैं ।
शुक्रवार, 28 जुलाई 2017
विषयों का भोग
आत्मा के सम्बंध में आगे बताते हुये
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि वह कान, आँख, स्पर्ष की इंद्रिय, स्वाद की इंन्द्रिय और नासिका तथा मन का
उपयोग करता हुआ इंद्रियों के विषयों का आनंद लेता है ।
गुरुवार, 27 जुलाई 2017
धारण और त्याग
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जब ईश्वर शरीर धारण करता है और जब वह शरीर को छोडता है, तब वह इन (इंद्रियों और मन) को साथ ले जाता
है, जैसे कि वायु सुगंधों को उनके
स्थान से ले जाती है ।
बुधवार, 26 जुलाई 2017
महान विद्वानो के मत
अभिव्यक्ति “ममैवांशे” के सम्बंध
में महान विद्वान आदिशंकर बताये कि यह अभिव्यक्ति “घटाकाश” सदृष्य है । घडे के
स्वरूप में आकाश बँधा प्रतीत होता है परंतु वास्तविकता में घडे के स्वरूप से आकाश
सीमित नहीं होता है । यह मात्र सीमित की अनुभूति होती है । महान विद्वान रामानुज
का बताना है कि आत्मा वास्तव में ब्रम्ह का अंश है जो कि सीमित शरीर में रहकर
इंद्रीय वासनाओं की पूर्ति के कर्मों में संलग्न होकर सांसारिक सुख दु:ख का भोग
करता है ।
मंगलवार, 25 जुलाई 2017
ममैवांश
गुरू के उपदेश में “ममैवांश” शब्द
का प्रयोग ग्रंथकार ने किया है जिसका शाब्दिक अर्थ होगा “मेरा ही अंश” परंतु कंचिद
ब्रम्ह विभाज्य सत्ता नहीं है । इस अभिव्यक्ति का अभिप्राय बनता है कि आत्मा वह
केंद्र है जो कि विकसित स्वरूप में समस्त संसार का अधिपति है । आत्मा व्यक्त
स्वरूप में भले ही एक सीमित शरीर में निहित है परंतु इसकी वास्तविक क्षमता उस
अखण्ड दिव्य ब्रम्ह स्वरूप है ।
सोमवार, 24 जुलाई 2017
संसार धारा
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको
बताये कि मेरा अपना ही एक अंश नित्य जीव बनकर जीवन के संसार में पाँच इंद्रियों और
उनके साथ छठे मन को, जो कि प्रकृति मे स्थित हैं, अपनी ओर खींच लेता है ।
रविवार, 23 जुलाई 2017
परम् धाम
शाश्वत् पद को बताते हुये गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि उसे ना तो सूर्य प्रकाशित करता है, ना चंद्रमा और ना ही अग्नि । वह मेरा परम्
धाम है, जहाँ पहुँचकर फिर वापस नहीं लौटना
होता ।
शनिवार, 22 जुलाई 2017
पथ निर्देश
शाश्वत् पद कि दशा को प्राप्ति के
लिये आर्हता को बताते हुये गुरू योगेश्वर अर्जुन को बताये कि जो लोग अभिमान और मोंह
से मुक्त हो गये हैं, जिन्होने बुरी आसक्तियों को जीत
लिया है, जिसकी सब इच्छाये शांत हो गई है, जो सदा परमात्मा की भक्ति में लगे रहते है, जो सुख और दु:ख के रूप से ज्ञात द्वैतों से
मुक्त हो गये हैं, और मूढता से रहित हो गये हैं, वे इस शाश्वत् पद की दशा को प्राप्त होते
हैं ।
शुक्रवार, 21 जुलाई 2017
पथ की खोज
पक्की ज़डों वीले अश्वत्थ (पीपल
वृक्ष) को अनासक्ति की दृढ तलवार से काटकर को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि तब यह कहते हुये कि “मैं उस आद्य पुरुष में शरण लेता
हूँ, जिससे यह विश्व की प्राचीन धारा
निकली है” उस मार्ग को खोज करनी चाहिये,
जिसपर गये हुये लोग फिर वापस नहीं लौटते ।
गुरुवार, 20 जुलाई 2017
बंधन मुक्ति
अनश्वर अश्वत्थ (पीपल वृक्ष) के
सम्बंध में आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि इस प्रकार
इसका वास्तविक रूप यहाँ दिखाई नहीं पडता,
ना ही इसका अंत, ना ही इसका प्रारम्भ और ना ही इसका
आधार ही दिखाई पडता है । इस पक्की ज़डों वीले अश्वत्थ (पीपल वृक्ष) को अनासक्ति की
दृढ तलवार से काटकर...
बुधवार, 19 जुलाई 2017
अश्वत्थ विस्तार
अनश्वर अश्वत्थ (पीपल वृक्ष) के
सम्बंध में आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि इसकी
शाखायें ऊपर और नीचे फैली हुई है, जिसका पोषण गुणों द्वारा होता है ।
इसकी टहनियाँ इंद्रियों के विषय हैं और नीचे मनुष्य लोक में इसकी जडे फैली हुई हैं, जिसके परिणामस्वरूप कर्म होते हैं ।
मंगलवार, 18 जुलाई 2017
उर्ध्वमुख जडे
संसार वृक्ष का यह स्वरूप बताया
जाता है । समस्त रूप नाम की उत्पत्ति एक ब्रम्ह से है । इस प्रकार समस्त फैले हुये
रूप और नाम उस वृक्ष के विस्तार के समान हैं जिसकी उत्पत्ति उस ब्रम्ह से है । रूप
और नाम की उत्पत्ति ब्रम्ह से है इसलिये जडों की कल्पना ऊपर की ओर की गई है जबकि
फैला हुआ नाम रूप इसका विस्तार है जो कि नीचे है । अतिप्राचीन मान्यताओं के अनुसार
इस संसार का पालन वैदिक उपासनाओं पर लम्बित होता है इसलिये इन्हें संसार वृक्ष की
पत्तियों के समान बताया गया हैं जो कि वृक्ष और शाखाओं को सन्युक्त और जीवित रखता
है ।
सोमवार, 17 जुलाई 2017
अश्वत्थ
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि लोग उस अनश्वर अश्वत्थ (पीपल का पेड) के विषय में बताते हैं, जिसकी की जडे ऊपर की ओर हैं और शाखायें
नीचे की ओर हैं । उसके पत्ते वेद हैं,
और जो इस बात को जान लेता है, वह वेदों का ज्ञाता है ।
रविवार, 16 जुलाई 2017
अव्यक्त का धाम
गुरू ने उपदेश किया कि “मैं अक्षर
और अनश्वर ब्रम्ह के, शाश्वत् धर्म और परम् आनंद का
निवास स्थान हूँ” । आदिशंकर गुरू के उपरोक्त कथन का वैकल्पिक अर्थ व्यक्त करते
हुये बताये, ब्रम्ह वैयक्ति ईश्वर के रूप में
“मैं जो कि असीमित और अनिर्वचनीय हूँ,
उस वैयक्तिक ईश्वर का निवास स्थान हूँ, जो कि अमर और अविभाज्य है” ।
इस प्रकार “तीनो गुणों के विभेद का
योग” नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।
अव्यक्त का धाम
गुरू ने उपदेश किया कि “मैं अक्षर
और अनश्वर ब्रम्ह के, शाश्वत् धर्म और परम् आनंद का
निवास स्थान हूँ” । आदिशंकर गुरू के उपरोक्त कथन का वैकल्पिक अर्थ व्यक्त करते
हुये बताये, ब्रम्ह वैयक्ति ईश्वर के रूप में
“मैं जो कि असीमित और अनिर्वचनीय हूँ,
उस वैयक्तिक ईश्वर का निवास स्थान हूँ, जो कि अमर और अविभाज्य है” ।
शनिवार, 15 जुलाई 2017
करुणा हेतु
गुरू ने उपदेश किया कि “मैं अक्षर
और अनश्वर ब्रम्ह के, शाश्वत् धर्म और परम् आनंद का
निवास स्थान हूँ” । आदिशंकर गुरू के उपरोक्त कथन का अर्थ व्यक्त करते हुये बताये
“परमेश्वर इस अर्थ में ब्रम्ह हैं कि वह ब्रम्ह का अव्यक्त रूप हैं । ब्रम्ह अपने
भक्तों पर अपनी करुणा ईश्वर-भक्ति के द्वारा दिखाता है और वह परमेश्वर व्यक्त
शक्ति है और इसलिये वह स्वयं ब्रम्ह ही है” ।
शुक्रवार, 14 जुलाई 2017
ईश्वर ब्रम्ह
अखण्ड भक्ति से युक्त होकर गुरू
स्वरूप साक्षात् ब्रम्ह की सेवा का रहस्य बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को बताये कि मैं अक्षर और अनश्वर ब्रम्ह के, शाश्वत धर्म और परम् आनंद का निवास स्थान हूँ ।
गुरुवार, 13 जुलाई 2017
अबाधित भक्ति
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो व्यक्ति अखण्ड भक्ति से युक्त होकर मेरी सेवा करता है, वह तीनों गुणों के प्रभाव से ऊपर उठ जाता
है उसके फलसे वह ब्रम्ह विलय के लिये योग्य पात्र बन जाता है ।
बुधवार, 12 जुलाई 2017
मनोवेगों से अप्रभावित
त्रिगुणातीत के स्वरूप को आगे बताते
हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले त्रिगुणातीत व्यक्ति मान और अपमान की दशाओं में
समान व्यवहार करता है, वह मित्र और शत्रु के साथ एक समान
व्यवहार करता है, वह किसी इच्छाजनित कार्य को करने
को प्रेरित नहीं होता है ऐसे व्यक्ति को त्रिगुणातीत कहा जाता है ।
मंगलवार, 11 जुलाई 2017
द्वैतों से अप्रभावित
त्रिगुणातीत के स्वरूप को आगे बताते
हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले त्रिगुणातीत व्यक्ति सुख और पीडा को एक भाव से
ग्रहण करता है, वह अपनी आत्मा में लीन दशा में
रहता है, वह मिट्टी के टुकडे एक पत्थर के
टुकडे और एक सोने के टुकडे को एक सम व्यवहृत करता है, वह मनोनुकूल स्थितियों को तथा मन के विपरीत स्थितियों को सम
भाव से स्वीकार करता है, वह दृढ मस्तिष्क का होता है, वह लाक्षँन एव प्रशंसा को एक रूप में ग्रहण
करता है ।
सोमवार, 10 जुलाई 2017
तटस्थ अप्रभावित
त्रिगुणातीत के स्वरूप को आगे बताते
हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले त्रिगुणातीत व्यक्ति गुणों से नि:स्पर्ष रहते
हुये, गुणों से विचलित ना होते हुये बैठा
रहता है, वह यह समझता है, कि केवल गुण ही समस्त कार्म कर रहे हैं, अप्रभावित स्थिति में कर्म से अप्रभावित
रहता है ।
रविवार, 9 जुलाई 2017
उदासीन अकाम
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन के
प्रश्नों का उत्तर देते हुये बोले हे पाण्डव (अर्जुन) त्रिगुणातीत व्यक्ति सत्व, रज़स् और तमस् के उत्पन्न होने पर ना ही
उनकी उपस्थिति को बुरा मानता है और ना ही उनकी अनुपस्थिति में उनकी कामना करता है
।
शनिवार, 8 जुलाई 2017
त्रिगुणातीत की जिज्ञासा
गुरू के उपदेश को सुनकर अर्जुन में
स्वाभाविक जिज्ञासा जागृत होती है और वह प्रश्न करता है कि हे प्रभु त्रिगुणातीत
की क्या पहचान होती है ? उसके जीवन का स्वरूप क्या होता है ? वह इन तीनों गुणों से परे कैसे पहुँचता है ?
शुक्रवार, 7 जुलाई 2017
देहसमुद्भवान
भगवद्गीता के ग्रंथकार ने
“देहसमुद्भवान” शब्द का प्रयोग किया है । “सत्व, रज़स्,
तमस् गुणों के वीर्य
में शरीर को जन्म मिला है” इस शब्द मे स्वयं धारित है । आदिशंकर इसका भावार्थ
बताते हैं कि सत्व को भी अपनी पूर्ण स्थापना के लिये अपने विरोधी रज़स् और तमस् से
संघर्ष करना पडता है । सत्व की पूर्ण स्थापना के उपरांत उसका भी त्याग करके
व्यक्ति गुणातीत स्थिति को प्राप्त होता है । यह कथन इस दृष्टांत के सदृष्य है कि
एक काटाँ को निकालेने के लिये दूसरे काँटे का प्रयोग किया जाता है । काँटा निकल
जाने पर दोनो ही काँटे को फेंक दिया जाता है ।
गुरुवार, 6 जुलाई 2017
त्रिगुणों से परे
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि आत्मा जब गुणों के अध्यास,
जो कि प्रकृति से उत्पन्न हुये है,
से मुक्त हो जाती है, तो वह जीव जन्म और मृत्यु के चक्र
से मुक्त हो जाता है ।
बुधवार, 5 जुलाई 2017
गति का श्रोत
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जब व्यक्ति ऐसा महसूस करता है कि प्रत्येक गति इन गुणों की प्रेरणा से
सृजित हो रहीं है और उसे भी जानता है जो कि इन गुणों की परिधि से परे है वह
व्यक्ति मेरी समाहित दशा को प्राप्त करता है ।
मंगलवार, 4 जुलाई 2017
उन्नति क्रम
मोक्ष अंतिम लक्ष्य होता है । मोक्ष
– अज्ञान से मुक्ति । सत्व, रज़स् और तमस् अज्ञान की जननी हैं ।
इन गुणो से मुक्ति अज्ञान से मुक्ति है । परंतु जैसा कि यथास्थिति है, प्रत्येक जीव असंख्य जन्मों से इस अज्ञान से
आच्छादित, जीवन मृत्यु के चक्र में चलता रहा
है । इसलिये गुरू इनका विस्तार से परिचय बताये, पुन: इनका फल बताये,
पुन: इनके प्रभाव से जीवन का स्वरूप बताये हैं । गुरू का प्रयत्न हैं कि जीव
वर्तमान में किसी भी स्तर पर हैं उसे हताश होने की आवश्यकता नहीं है बल्कि क्रमबद्ध
उन्नति को प्रयत्नशील होना अपेक्षित है ।
सोमवार, 3 जुलाई 2017
उन्नति मध्य पतन
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो लोग सत्व गुण में स्थित होते हैं, वे उन्नति की ओर उठते है, रज़ोगुण वाले लोग मध्य में रहते है और तामसिक प्रवृत्ति वाले
लोग जघन्य कर्मों में लगे रहकर पतन की गर्त को उन्मुख होते हैं ।
रविवार, 2 जुलाई 2017
ज्ञान लोभ भ्रम
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रज़ोगुण से लोभ उत्पन्न होता है और तमोगुण से भ्रम मूढता
उत्पन्न होता है ।
शनिवार, 1 जुलाई 2017
सुख दु:ख अज्ञान
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि अच्छे (सात्विक) कर्म का फल सात्विक और निर्मल कहा जाता है, राज़सिक कर्मों का फल दु:ख होता है और
तामसिक कर्म का फल अज्ञान होता है ।
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