गुरुवार, 30 नवंबर 2017

कार्य ही उपासना

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति, जिस ब्रम्ह से सभी जीवों की उत्पत्ति हुई है और जो समस्त रूप संसार में व्याप्त है, की उपासना, अपने कर्तव्य दायित्वों के सम्पादन के द्वारा करता है, उसे पूर्णता की स्थित प्राप्त होती है । 

बुधवार, 29 नवंबर 2017

स्वे स्वे कर्मणि अभिरत:

कर्म को करते हुये पूर्णता प्राप्त करने के सम्बन्ध में गुरु ने जो उपदेश किये हैं उसमें गुरु ने अपनी अभिव्यक्ति को “स्वे स्वे कर्मणि अभिरत:” द्वारा व्यक्त किया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “अपने अपने काम में निष्ठापूर्वक लगा हुआ” । उपरोक्त की व्याख्या है – प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अनुभूतियों और मनोवेगों के प्रति निष्ठावन होना चाहिये, स्वभाव के स्तर से ऊपर का कार्य करने की चेष्टा खतरनाक है । हमें अपने स्वभाव की शक्ति के अंदर रहते हुये पूर्णतया अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिये । 

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

कर्तव्य को समर्पित

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि व्यक्ति अपने कर्तव्य दायित्वों को समर्पित रहते हुये पूर्णता को प्राप्त हो जाता है, व्यक्ति कैसे, अपने कर्तव्य दायित्वों को समर्पित रहते पूर्णता को प्राप्त होता है, यह मुझसे सुनो ।  

सोमवार, 27 नवंबर 2017

पूर्णता का अवसर

गुरू द्वारा वर्ण के अनुसार कर्मो की विभक्ति का उपदेश किये गये हैं । यह निश्चय है कि इस अभिव्यक्ति का अभिप्राय जन्म के कुल से नहीं है । यह विभाजन व्यक्ति के स्वभाव से है, उसकी सहज रूचि से है, उसकी अपनी सहज कर्म के प्रति प्रवृत्ति से है । इस ज्ञान द्वारा व्यक्ति स्वयं यह निर्धारण कर सके कि उसकी क्षमता का सर्वाधिक विकास किस क्षेत्र में हो सकता है, स्वाभाविक है कि यह क्षेत्र उसकी अपने रूझान का होने पर ही होगा । 

रविवार, 26 नवंबर 2017

वैश्य और शुद्र के कार्य

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कृषि, पशुपालन और व्यापार ये वैश्य के स्वाभाविक कर्तव्य हैं । सुद्र का स्वभाविक कर्तव्य सेवा का कार्य करना है । 

शनिवार, 25 नवंबर 2017

क्षत्रीय के गुण

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको बताये कि वीरता, तेज, धीरता, सूझ-बूझ, युद्ध से मुंह न मोडना, दानशीलता और नेत्रित्व, ये क्षत्रीय के स्वाभाविक गुण हैं ।  

शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

अपेक्षित

गुरू द्वारा बताये गये ब्राम्हण के स्वाभाविक गुणों से विदित है कि यह ब्राम्हणत्व मात्र किसी विषेस कुल में जन्म की बात नहीं है अपितु कुछ निश्चित आर्हताओं के धारक व्यक्ति के लिये यह ब्राम्हण उपाधि निर्धारित की गई है । यदि किसी कुल विषेस में जन्मा व्यक्ति इन अपेक्षाओं की पूर्ति करता है तो वह सराहनीय और ग्राह्य माना जायेगा परंतु अन्यथा की परिस्थित में नहीं स्वीकारा जायेगा । 

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

ब्राम्हण के गुण

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि प्रशांतता, आत्म संयम, तपस्या, पवित्रता, सहनशीलता, ईमानदारी, ज्ञान, विज्ञान और धर्म में श्रद्धा, ये ब्राम्हण के स्वाभाविक गुण हैं ।

बुधवार, 22 नवंबर 2017

भेद का आधार

गुरू ने उपदेश में चतुर्वर्ण के विषय में जो कुछ भी व्यक्त किया है उसका सम्बंध व्यक्ति के जन्म के वंश से सम्बंध नहीं है । गुरू ने प्रकृति के गुणों का प्रभाव ज्ञान पर, कर्म पर और कर्ता पर भी बताया । चतुर्वण का विभाजन कर्म पर आधारित और कर्म की गुणवत्ता का आँकलन कर्ता व्यक्ति के स्वभाव पर प्रकृति के गुणों के वर्चस्व पर आधारित बताया है । 

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

चतुर्वर्ण

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि हे शत्रुओं के विजेता (अर्जुन), चाहे ब्राम्हण, चाहे क्षत्रिय, चाहे वैश्य और चाहे सूद्र मे भी, उनके कृत कर्मों को, उनके प्रकृति के गुणों के आधार पर ही पहचाना जाता है ।  

सोमवार, 20 नवंबर 2017

प्रकृति के गुण

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कोई भी जीव चाहे वह पृथ्वी पर है चाहे वह देव लोंको मे है, प्रकृति के तीन गुणों के प्रभाव से आच्छदित है । 

रविवार, 19 नवंबर 2017

सुख का आधार

सुख की कामना प्रत्येक व्यक्ति में होती है । परंतु प्रत्येक व्यक्ति को किसी एक नियत वस्तु, स्थान, माध्यम अथवा कर्म से सुख नहीं मिलता है । व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार स्वभाव के अनुसार सुख का माध्यम भिन्न होता है । पुन: सुख कितने समय तक उस व्यक्ति को सुखी रख सकेगा यह निर्भर करता है सुख की प्रकृति पर । 

शनिवार, 18 नवंबर 2017

तामसिक सुख

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो सुख आत्मा को आरम्भ से अंत तक भ्रम मे रखता है और जिसकी उत्पत्ति निद्रा, आलस्य और प्रमाद से होती है उसे तामसिक सुख कहा जाता है । 

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

राजसिक सुख

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो सुख इंद्रियों के अपने विषय के साथ सन्योग करने से सृजित होते हैं, जो कि प्रारंभ में अमृत के समान प्रतीत होते हैं परंतु अंत में विष के समान प्रतीत होते हैं, ऐसे हुखों को राजसिक सुख कहा जाता है । 

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

सात्विक सुख

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो सुख प्रारम्भ में विष के समान लगता है और अंत में अमृत के समान लगता है, जिसकी उत्पत्ति आत्मबोध के शाश्वत ज्ञान से होती है उसे सात्विक सुख कहा जाता है । 

बुधवार, 15 नवंबर 2017

सुख से आनन्द पर्यंत

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले हे भरतॉ में श्रेष्ठ, अब तू मुझसे तीन प्रकार के सुख के विषय में सुन । जिस सुख से मनुष्य दीर्घ अभ्यास के द्वारा आनंद का अनुभव करता है |  

सुख से आननद पर्यंत

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले हे भरतॉ में श्रेष्ठ, अब तू मुझसे तीन प्रकार के सुख के विषय में सुन । जिस सुख से मनुष्य दीर्घ अभ्यास के द्वारा आनंद का अनुभव करता है |  

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

तामसिक धृति

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस धृति के द्वारा कोई मूर्ख व्यक्ति निद्रा, भय, शोक, विषाद और अभिमान को नहीं त्यागता, हे पार्थ (अर्जुन), वह तामसिक प्रकार की होती है । 

सोमवार, 13 नवंबर 2017

राजसिक धृति

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस धृति के द्वारा मनुष्य अपने कर्तव्य का सम्पादन, आनंद और सम्पत्ति से बँधा हुआ फलों की कामना से बँधा रहये करता है, हे पार्थ (अर्जुन) उसे राजसिक धृति कहा जाता है । 

रविवार, 12 नवंबर 2017

धृति

ध्यान की स्थिरता, जिसके द्वारा हम उन बहुत सी बातों को जान पाते हैं, जिन्हे हमारी साधारण दृष्टि देख पाने में समर्थ नहीं है । इसकी शक्ति अतीत के लिये पश्चाताप और भविष्य के लिये चिंताओं के साथ हमारी अनासक्ति के अनुपात में होती है । 

शनिवार, 11 नवंबर 2017

अविचलित धृति

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि वह अविचलित धृति, जिसकी शक्ति से एकाग्रता द्वारा मनुष्य मस्तिष्क, प्राण, और इंद्रियों की गतिविधियों को नियंत्रण में रखता है, हे पार्थ (अर्जुन), वह धृति सात्विक प्रकार की होती है । 

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

विकृत रूप

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले कि हे पार्थ (अर्जुन),  जिस बुद्धि के द्वारा अंधकार में समाहित हुआ व्यक्ति अधर्म को धर्म समझता है और सब बातो को एक विकृत रूप में देखता है, वह बुद्धि तामसिक होती है ।

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

राज़सिक बुद्धि

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले, हे पार्थ (अर्जुन), कि जिस बुद्धि द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म को, करने योग्य कार्य और न करने योग्य कार्य को गलत ढंग से समझता है, वह बुद्धि राजसिक होती है । 

बुधवार, 8 नवंबर 2017

तीक्ष्ण-विवेक

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले, हे पार्थ (अर्जुन), कि जो बुद्धि कर्म और अकर्म को समझती है, जो करने योग्य कार्य और न करने योग्य कार्य को समझती है, जो इस बात को समझती है कि किससे डरना चाहिये और किससे नहीं डरना चाहिये, क्या आत्मा को बंधन में डालता है और क्या उसे मुक्त करता है वह बुद्धि सात्विक होती है । 

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

धारण करने की शक्ति

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले कि हे धन को जीतने वाले (अर्जुन), अब तुम गुणों के अनुसार बुद्धि और धारण करने की शक्ति के तीन भेदों को सुनो, जिन्हे मैं पूर्णतया और प्रथक प्रथक करके बताता हूँ । 

सोमवार, 6 नवंबर 2017

तामसिक कर्ता

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति असंतुलित, असन्स्कृत, हठी, धोखेबाज़, द्वेषी, आलसी, दु:खी मनोभावो से आच्छादित और काम को टालने वाला होता है, वह तामसिक कर्ता कहलाता है । 

रविवार, 5 नवंबर 2017

राजसिक कर्ता

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो कर्ता मनोभावों से प्रभावित होता है, जो कर्मफल के लिये उत्सुक रहता है, जो लालची होता है, जो क्षतिपूर्ण वृत्ति का होता है, अपवित्र होता है, जो हर्ष और विषाद से विचलित होता है, उसे राजसिक कर्ता कहा जाता है ।

शनिवार, 4 नवंबर 2017

सात्विक कर्ता

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो कर्ता आसक्ति से रहित रहता है, जो अहंकारपूर्ण आचरण नहीं करता है, जो उत्साहित कृतसंकल्प दशा में सफलता तथा असफलता से अविचलित रहता है उसे सात्विक कर्ता कहा जाता है । 

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

तामसिक कर्म

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो कर्म अज्ञान के कारण हानि या हिंसा का विचार किये बिना और अपनी मानवीय क्षमता का विचार किये बिना किया जाता है, वह तामसिक कर्म कहलाता है । 

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

सात्विक राजसिक भेद

गुरू के उपदेश में बताये सात्विक कर्म और राजसिक कर्म में मौलिक भेद कर्म को करने में कर्म के कारण से सृजित होता है । कारण यदि सद्भाव से सृजित हुआ है तो कर्ता व्यक्ति की कर्म करने की मानसिकता में उत्साह, निष्ठा एवं सुखांभूति का समंवय रहेगा । कारण यदि इच्छापूर्ति अथवा अहंकार की तुष्टि से सृजित है तो कर्ता व्यक्ति की मानसिकता राग, द्वेष और स्पर्धा से ओतप्रोत रहेगी । 

बुधवार, 1 नवंबर 2017

राजसिक कर्म

कर्म की गुणवत्ता को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस कर्म को व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत इच्छा की पूर्ति हेतु, अथवा अपने अहंकार भाव की संतुष्टि हेतु, किसी फल विशेस को प्राप्त करने के लिये करता है उसे राजसिक कर्म कहा जाता है ।