मंगलवार, 31 मार्च 2015

ज्ञानी संत : लक्षण 4

ज्ञानी संत का चौथा लक्षण बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह अपनी इंद्रियों की वासनाओं को समेट कर लुप्त कर लेता है । इस कथन को अधिक स्पष्ट करने हेतु कछुवे का उदाहरण देते हैं कि जिस प्रकार कछुआ अपनी गर्दन को अपनी कूबड में समेट लेता है । ज्ञानी संत विवेक को विचलित करने वाली समस्त बाधाओं से अपने को पूर्ण रक्षित कर अपने विवेक को आत्मज्ञान में केंद्रित रखता है ।

सोमवार, 30 मार्च 2015

ज्ञानी संत : लक्षण 3

ज्ञानी संत का तीसरा लक्षण बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो हर्ष में हर्षित नहीं होता है और शोक में दु:खी नहीं होता है जिस प्रकार फूल खिलते हैं और कालांतर से मुरझा जाते हैं । फूल को ना ही खिलने का हर्ष होता है और ना ही मुरझाने का शोक होता है । ज्ञानी संत के सम्मुख जो भी स्थिति जिस भी रूप में आती है वह उसे उसी रूप में बिना किसी प्रतिक्रिया के ग्रहण करता है । उसका विवेक दृढता से आत्मज्ञान में स्थिर रहता है । 

रविवार, 29 मार्च 2015

ज्ञानी संत : लक्षण 2

ज्ञानी संत का दूसरा लक्षण बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि जो विषमतम स्थितियों में भी विचलित नहीं होता है, हर्ष के उत्कर्ष वातावरण में भी किसी इच्छा की जिज्ञासा नहीं करता है, जिसको उत्तेजना, भय, द्वेष व क्रोध का लेशमात्र भी असर नहीं होता है वह संत अपने विवेक के केंद्रित अवस्था में परम् सत्य में लीन रहता है । 

शनिवार, 28 मार्च 2015

ज्ञानी संत : लक्षण 1

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन द्वारा व्यक्त जिज्ञासा के उत्तर में ज्ञानी संत का पहला लक्षण बताते हैं कि जिसने अपनी मस्तिष्क से समस्त इच्छाओं का त्याग कर दिया है और जिसकी आत्मा सदैव आत्मबोध के चिंतनमें लीन रहती है उसे स्थिर विवेक का संत कहा जाता है । 

शुक्रवार, 27 मार्च 2015

ज्ञानी संत

गुरू द्वारा साँख्य, योग व केंद्रित विवेक को बताये जाने पर अर्जुन को यह जानने की सामान्य जिज्ञासा हुई कि कंचिद कोई व्यक्ति जिसे साँख्य की स्थिति प्राप्त है वह योग की अवस्था में कार्य करता है और केंद्रित विवेक की स्थिति में प्रतिपल जीवन जीता है तो उस व्यक्ति का प्रगट में क्या स्वरूप दीखेगा । अर्जुन ने अपनी यह जिज्ञासा गुरू के समक्ष व्यक्त किया ।  

गुरुवार, 26 मार्च 2015

समाधि

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि समाधि विवेक का क्षय नहीं है अपितु यह केंद्रीकरण की चर्मोत्कर्ष स्थिति है । आत्मा का आत्मज्ञान में केंद्रीकरण । इसका लक्ष्य होता है कि विवेक प्रतिपल आत्मज्ञान के सम्पर्क और संसर्ग में रहे । क्या कार्य हमें करना है यह महत्वपूर्ण नहीं होता है । उस कार्य को हम कैसे करते हैं किस मानसिकता में करते हैं यह महत्वपूर्ण होता है । 

बुधवार, 25 मार्च 2015

मोंह से मुक्त

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जिस क्षण तुम भ्रमकारक मोंह से मुक्त हो जावोगे तुम एक पूर्ण रूप से बदले हुये स्वरूप में हो जावोगे । आत्मज्ञान की उपलब्धि के उपरांत मनुष्य को किसी भाँति किसी बाह्य ज्ञान की आवश्यकता नहीं रह जाती है । 

मंगलवार, 24 मार्च 2015

मोक्ष

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जिस मनुष्य का विवेक परम् सत्य को समर्पित हो जाता है वह कर्म के फल से विरक्त हो जाता है परिणामत: उसके कर्म बंधनकारी नहीं रह जाते है । यहाँ तक कि वह जीवित रहते हुये भी मोक्ष की स्थिति का भोग करता है । 

सोमवार, 23 मार्च 2015

कर्म की कुशलता

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि कार्य करने की कुशलता योग है । कुशलता शब्द की व्याख्या करते हुये बताया कि जिसके विवेक में सदैव परम् सत्य को समर्पण भाव व्याप्त है वह कार्य में कुशल है । ऐसी दशा में किये गये कार्य कर्मबंधन से मुक्त होते हैं । 

रविवार, 22 मार्च 2015

योगावस्था

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि मस्तिष्क को प्रकृतीय गुणों के मोंह से मुक्त कर समभाव में स्थापित कर कार्य करो । समभाव की मस्तिष्क की दशा में किये गये कार्य से जनित होने वाले कर्मफल से मस्तिष्क प्रभावित नहीं होगा । कर्मफल से मस्तिष्क का प्रभावित ना होना योग है । 

शनिवार, 21 मार्च 2015

कर्म पर अधिकार

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि कर्ता व्यक्ति का केवल कर्म पर अधिकार है । कर्म का फल सदैव विधि के नियंत्रण के अधीन होता है । कर्मफल की अभिलाषा से किया जाने वाला कर्म किसी भी दशा में अ-कर्तापन की स्थिति का नहीं हो सकता है । जबकि कर्म करने की आदर्श विधि अ-कर्तापन होती है । 

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

आत्मज्ञान मुक्तिकारक

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि वेदों का ज्ञान शक्ति और वैभव पाने में समर्थ होता है परंतु उस ज्ञान से मुक्ति नहीं मिल सकती है । मुक्ति पाने के लिये आत्मज्ञान तथा उस आत्मज्ञान के प्रति निष्ठावान होना अनिवार्य होता है । इसलिये हे अर्जुन अपने को गुणों के प्रभाव से ऊपर उठावो और आत्मज्ञान के लिये एकाग्र करो । आत्मा जोकि अज़र है अमर है उसे हम जानते नहीं हैं जबकि उसे जानना ही जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि होती है । गुरू ने तुलनात्मक अभिव्यक्ति में वेदों के ज्ञान को तालब के जल के समान सीमित क्षमता का बताया । 

गुरुवार, 19 मार्च 2015

आत्मज्ञान में बाधक

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि प्रकृति के गुणों के प्रभाव से जो मनुष्य सम्पत्ति और शक्ति को अर्जित करने में पुन: उसकी रक्षा करने में रुचि रखता है और अपने को समर्पित करता है वह आत्मज्ञान और उचित विवेक को अर्जित करने में समर्थ नहीं हो पाता है । 

बुधवार, 18 मार्च 2015

वैभव तथा मुक्ति

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को वेदों में वर्णित कर्मकाण्ड की क्रियायें जो कि सांसारिक वैभव की प्राप्ति तथा स्वार्थपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति के लिये की जाती हैं की तुलना गीता में वर्णित बुद्धियोग जिसके अनुसरण द्वारा मनुष्य प्रकृतीय मोंह से मुक्ति पाता है करते हुये मुक्ति को अधिक श्रेयस्कर बताया है । 

मंगलवार, 17 मार्च 2015

केंद्रित एवं विकेंद्रित

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को साँख्य व योग बताने के उपरांत कहा कि मनुष्य द्वारा अपनी आत्मा को परम् सत्य के प्रति समर्पित करने में जीवन के पूर्णता की स्थिति को प्राप्त होता है । प्रकृति की असँख्य सम्भावनाओं की ओर प्रवृत्त होना मनुष्य के लिये स्वाभाविक क्रम होता है । परंतु इन असँख्य सम्भावनाओं की ओर उन्मुख होने पर मनुष्य कभी इनसे मुक्ति नहीं पा सकता है । इसलिये एकाग्र होकर अपने कर्तव्य दायित्व के प्रति अपने को केंद्रित करो । ऐसा करने के लिये अपनी आत्मा का अनुभव करो । अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की अनुभूति करते हुये एकाग्र बुद्धि द्वारा किये गये कर्म सर्वोत्तम होते हैं । 

सोमवार, 16 मार्च 2015

साँख्य और योग

भागवद्गीता में जैसा कि वर्णित है साँख्य तथा योग दोनो का ही लक्ष्य एक ही है । नियंत्रित मस्तिष्क । एक ही लक्ष्य को पाने के लिये मात्र दोनो के पथ भिन्न हैं । 

रविवार, 15 मार्च 2015

विवेक सारथी

यदि जीवन को एक रथ कहा जाय तो विवेक इसका सारथी होता है । इंद्रियाँ रथ के पाँच घोडे हैं, और मस्तिष्क उन घोडों की लगाम की रस्सी है । विवेक मस्तिष्क के माध्यम से सभी इंद्रियों के कार्य को नियंत्रित करता है और साथ ही मस्तिष्क को आत्मज्ञान आत्मसात् करने का पथ प्रशस्थ करता है । विवेक को परम् सत्य की अनुभूति प्रतिपल विदित रहने की दशा में जीवन परम् सत्य की ज्योति से प्रकाशित रहता है । यह स्थिति इस रूप संसार के सृजन के मनतव्य के अनुरूप होती है । विवेक आत्मज्ञान से प्रतिपल प्रकाशित रहे इसके लिये आवश्यक होता है कि विवेक को आच्छादित करने वाली बाधाओं से रक्षित किया जाय । ऐसी दशा सृजित करने पर अहंकार का परम् सत्य में स्वयं विलय हो जावेगा । 

शनिवार, 14 मार्च 2015

बंधन तथा मुक्ति

साँख्य दर्शन के अनुसार आत्मा अ-क्रियाकारी होती है । इसलिये बंधन अथवा मुक्ति के लिये आत्मा जिम्मेदार नहीं होती है । शरीर की रचना में प्रयुक्त 24 अवयव प्रकृति के 5 मूल तत्व, उन प्रत्येक मूल अवयवों के 5 गुण, 10 इंद्रियाँ, मस्तिष्क, बुद्धि, अहंकार तथा आत्मा । आत्मा के बंधन अथवा मुक्ति के लिये इनमें से बुद्धि अर्थात् विवेक जिम्मेदार होता है । यदि विवेक आत्मा और प्रकृति के भेद को स्पष्ट विदित रखता है मुक्ति प्रशस्थ होती है । अन्यथा बंधन प्रशस्थ होता है । 

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

योग

भागवद्गीता में गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण मस्तिष्क के नियंत्रण को योग बताते हैं । एक व्यक्ति जिसे साँख्य की स्थिति प्राप्त है, जिसके विवेक में आत्मा और प्रकृति निर्मित शरीर के बीच स्पष्ट भेद विद्यमान है, जिसकी आत्मा संसार के परिवर्तनों से अविचलित रहती है, उस व्यक्ति का मस्तिष्क विवेक के पूर्ण नियंत्रण में जो भी कार्य करेगा वह योग है । मस्तिष्क का साँख्य की स्थिति के विवेक के पूर्ण नियंत्रण द्वारा कार्य बुद्धियोग है । विवेक मात्र धारणा स्थिर करने हेतु नहीं अपितु विवेक जो प्रतिपल परम् सत्य व प्रकृति के मध्य भेद अपने में स्थिर रख सके, यह उस विवेक का सतत् अभ्यास हो, और मस्तिष्क जो इंद्रीय वासनाओं में लिप्त ना रहे अपितु विवेक के प्रति निष्ठावन रहे । ऐसा विवेक और ऐसा मस्तिष्क सृजित करेगा बुद्धियोग । 

गुरुवार, 12 मार्च 2015

साँख्य

धर्मदर्शन के छ: मान्यता प्राप्त मार्गो में से साँख्य एक है । परंतु भागवद्गीता में गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को साँख्य बताते हुये कहे कि पुरुष (आत्मा) तथा प्रकृति (मैं-नही) (सत्य-नहीं) के बीच स्पष्ट द्वैत का भेद साँख्य है । परम् सत्य आत्मा और प्रकृति दोनो का स्वामी है । विवेक द्वारा परम् सत्य का अनुभव साँख्य है । यह परम् सत्य और विवेक का एकीकरण है । परम् सत्य का बोध परस्पर चर्चा अथवा अध्ययन की प्रक्रिया में परिचर्चा द्वारा नहीं अपितु स्वयँ अपने अनुभव द्वारा । गीता की मान्यता है कि यह बोध इच्छाओं के शमन द्वारा सम्भव होता है । 

बुधवार, 11 मार्च 2015

उपदेश चरण 18

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को कार्य में संलग्न होने के लिये उपयुक्त मानसिकता बताते हैं । मस्तिष्क को समभाव में रखते हुये युद्ध को लडो । मस्तिष्क में किसी परिवर्तन की अभिलाषा ना हो, भावुकता के प्रभाव से उचित अनुचित का द्वंद ना हो, प्रकृति ने जो दायित्व जिस रूप में दिया है उसे उसी स्वरूप में ग्रहण करो । उपरोक्त वर्णित मस्तिष्क की स्थिति पाने का रहस्य बताते हुये गुरू ने बताया कि जब व्यक्ति अपने आत्मा के शाश्वत् सत्य का अनुभव कर लेता है और वह उस सत्य के प्रति निष्ठावान बन जाता है तो फिर सांसारिक परिस्थितियाँ उसके मस्तिष्क को प्रभावित नहीं कर पाती हैं ।  

मंगलवार, 10 मार्च 2015

उपदेश चरण 17

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कर्तव्य के रूप में युद्ध लडने के परामर्ष के समर्थन में अर्जुन को युद्ध ना लडने की दशा में सम्मुख होने वाली अपकीर्ति का वर्णन करते हैं । एक कीर्तिमान योद्धा को युद्ध से विमुख होने पर मिलने वाला अपयश मृत्यु से भी अधिक क्लेशकारी होगा । शत्रु तुम्हे कायर कहेंगे और कहेंगे कि मेरी शक्ति से भयभीत होकर युद्ध नहीं किया । इसलिये हे अर्जुन युद्ध करते वीरगति को प्राप्त होकर स्वर्ग के भागीदार बनो अथवा विजयी होकर पृथ्वी पर ऐश्वर्य भोग करो । 

सोमवार, 9 मार्च 2015

उपदेश चरण 16

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को वर्तमान परिस्थिति में युद्ध में सम्मलित होना उसके लिये धर्मवत् आचरण के रूप में बताया । व्याख्याकार इसे स्पष्ट करते हुये महाभारत के उद्योगपर्व में वर्णित गुरू के कथन का संदर्भ देकर बताया कि सिद्धयोगी सन्यास द्वारा और कुलीन क्षत्रीय युद्ध में संघर्ष द्वारा ब्रम्हलोक में स्थान पाने के लिये योग्यपात्र बनते हैं । इसका विलोम की स्थिति कि जब सत्य और असत्य का युद्ध हो रहा हो तो इस युद्ध से विमुख होने वाला पाप का भागीदार बनेगा । 

रविवार, 8 मार्च 2015

उपदेश चरण 15

गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को शरीर की रचना में प्रयुक्त दो अवयव आत्मा जो कि अविनाशी है और प्रकृति जो कि विनाशशील है को बताकर यह परामर्श दिये कि विनाशशील के लिये मोंह मत करो और अपना कर्तव्य समझ कर युद्ध करो । पुन: गुरू को लगा कि शायद अर्जुन संतुष्ट नहीं हुआ है तब उन्होने उसे उसके कर्मदायित्व का संदर्भ देकर उसे सत्य की प्राप्ति के लिये नीयत किये गये युद्ध को अपना कर्म दायित्व मानकर युद्ध में संलग्न होने का उपदेश किये । 

शनिवार, 7 मार्च 2015

उपदेश चरण 14

गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि कोई अपने को एक अद्भुद व्यक्ति के रूप में देखता है, कोई अपने को एक अद्भुद व्यक्ति के रूप में व्यक्त करता है, और कोई अपने को एक अद्भुद व्यक्ति के रूप में सुनता है परंतु फिरभी कोई अपने अद्भुद रूप को जानता नहीं है । व्याख्याकार इस कथन की व्याख्या करते हुये बताता है कि हमारे अंदर आत्मा अद्भुद है जिसे कि जानने की बहुसँख्यक लोग आवश्यकता ही नहीं समझते हैं, जो जानना चाहते भी हैं उनमें से अधिक लोग कोई समस्या आने पर जानने का प्रयत्न छोड देते हैं बहुत विरले ही लोग उसे जानने की मंजिल तक पहुँचते हैं । 

शुक्रवार, 6 मार्च 2015

उपदेश चरण 13

गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जीव की उत्पत्ति शून्य से हुई है । मध्य में रूपधारी होता है । पुन: मृत्यु होने पर पुन: शून्य में विलीन हो जाता है । इसमें शोक करने की क्या बात है । 

गुरुवार, 5 मार्च 2015

उपदेश चरण 12

गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले हे अर्जुन जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है और जिसकी मृत्यु हुई है उसका जन्म निश्चित है । व्याख्याकार कहता है कि जीवन अवधि थोडी है और मृत्यु निश्चित है । हमें विवेक के प्रयोग द्वारा सही कर्म करने के लिये पीडा भी सहकर करने की भावना होनी चाहिये । मृत्यु निश्चित है के भाव को ग्रहण करने पर अनश्वर आत्मा का अहसास ग्रहण करने का अवसर होता है । यदि समय के साथ हम आत्मा का अहसास इस जीवन के रहते कर सकें तो यह इस संसार की उच्चतम उपलब्धि होगी । 

बुधवार, 4 मार्च 2015

उपदेश चरण 11

गुरो योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा के सम्बंध में बताते हुये कहते हैं इसे युद्धास्त्रों द्वारा आहत् नहीं किया जा सकता, अग्नि द्वारा जलाया नहीं जा सकता, पानी द्वारा इसे गीला नहीं किया जा सकता, वायु इसे सुखा नहीं सकती, यह सभी को वेध सकता है परंतु इसे कोई वेध नहीं सकता है । यह सदैव एक ही है । इसे ज्ञानेंद्रियों द्वारा जाना नहीं जा सकता है । प्रकृति के जिन परिवर्तनों के द्वारा मस्तिष्क, शरीर, और प्राण प्रभावित होते हैं उनसे यह प्रभावित नहीं होता है । इसलिये अविनासी के लिये शोक करना योग्य नही है । 

मंगलवार, 3 मार्च 2015

उपदेश चरण 10

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह आत्मा अजन्मा है, अपरिवर्तनशील है, इसे कोई किसी भाँति क्षति नहीं पहुँचा सकता है । जिस प्रकार कोई पुराने वस्त्र का त्यागकर नये वस्त्र धारण करता है उसी प्रकार यह आत्मा जीर्ण शरीर का त्यागकर नयी शरीर धारण करता है । व्याख्याकार स्पष्ट करते हुये कहता है कि पुनर्जन्म प्रकृति का नियम है । परम् ब्रम्ह गति नहीं करता है । आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में अंतरित होती है । शरीर धारण ,करने पर आत्मा शरीर, मस्तिष्क, प्राण को अपनी ओर आकर्षित करती है जो कि प्रकृति के पदर्थों से बने होते हैं । विज्ञानी आत्मा शरीर (अन्न), मस्तिष्क (विवेक), और प्राण (जीवन) को कार्य सम्पादन क्षमता प्रदान करती है । शरीर धारण करना आत्मा के लिये अनिवार्य वाँक्षना है । 

सोमवार, 2 मार्च 2015

उपदेश चरण 9

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मा जो इन सभी शरीरों में है वह अनश्वर है । इस आत्मा को ज्ञान प्राप्ति के सामान्य श्रोतों से जाना नहीं जा सकता है । इसलिये हे अर्जुन तुम युद्ध करो । जो यह कहते हैं कि मैं इसे हत्या कर रहा हूँ वह सत्य को नहीं जानते हैं । व्याख्याकार उपरोक्त कथन को स्पष्ट करते हुये कहता है कि योगेश्वर आत्मा और प्रकृति के भेद को स्पष्ट करनेके लिये यह उपदेश किये हैं । 

रविवार, 1 मार्च 2015

उपदेश चरण 8

गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं हे अर्जुन इन सभी युद्ध के लिये उपस्थित  दोनो पक्ष के योद्धाओं के अंदर आत्मा विद्यमान है वह अनश्वर है । इस अभेद्य सत्य को कोई क्षति नहीं पहुँचा सकता है । व्याख्याकार कहता है कि ईश्वर भी इस सत्य को क्षतिग्रस्त नहीं कर सकता है । यह स्वयं सिद्ध सत्य है । धर्म ग्रंथ केवल इस सत्य के ऊपर आच्छादित असत्य को बताते हैं और उस असत्य को हटाने की विधि बताते हैं । मूल सत्य की व्याख्या नही सम्भव है । इस रूपों के संसार में यही गुणात्मक सत्य ही एक मात्र उभयनिष्ठ समता है ।