कर्म को ब्रम्ह की सेवामें अर्पित करके करने की विधि बताने के
उपरांत गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से इस अर्पण का विज्ञान बताते हुये कहे कि
इस प्रकार तुम कर्म के फल के विकार से बच जावोगे और तुम सन्यास के भाव में कर्म को
करते हुये मुझे प्राप्त कर सकोगे ।
गुरुवार, 30 जून 2016
बुधवार, 29 जून 2016
अर्पण कर्मयोग का पोषक
कर्म को ब्रम्ह को अर्पित करके करना ज्ञोतक होगा कर्म को ब्रम्ह
की सेवा के लिये करना । स्मरणीय है कि कर्म को अपनी इच्छा की पूर्ति के लिये करना
वर्जित कहा गया है । प्रत्येक कर्म को ब्रम्ह को अर्पित करके करना उस कर्म को
ब्रम्ह की सेवा के पवित्र स्वरूप में पर्णित करना है । यह कर्मयोग का पोषक भाव है
। ऐसा करने से व्यक्ति के जीवन का प्रत्येक पल ब्रम्ह की सेवा में पर्णित हो
जायेगा ।
मंगलवार, 28 जून 2016
कर्मस्वरूप सेवा भाव
कर्म कोई भी किया जाय उसे कंचिद ब्रम्ह की सेवा के भाव में
पर्णित करके किया जाय तो वह कर्म सम्पादन ही ब्रम्ह की पूजा में पर्णित हो जायेगा
। फिर व्यक्ति को ब्रम्ह की पूजा के लिये अलग से कोई धार्मिक कर्म करने की
आवश्यकता नहीं रह जायेगी । समस्त कर्मों का कर्ता ब्रम्ह स्वयं है । हम सेवक
ब्रम्ह के कर्म को करके ब्रम्ह की सेवा ही करते है ।
सोमवार, 27 जून 2016
शाश्वत अर्पण
गुरू का उपदेश है कि व्यक्ति को अपना प्रत्येक कार्य ब्रम्ह को
अर्पित करके करने से उसका प्रत्येक कर्म शाश्वत सेवा में पर्णित हो जाता है । यह
अहंकार के नाश में सहायक होता है । आत्मा प्रधान व्यक्तित्व के जिज्ञासु को यह किये
जा रहे प्रयत्नों के लिये अत्यंत योगकारक दशा होती है ।
रविवार, 26 जून 2016
अर्पण विधि
ब्रम्ह को अर्पित करने की प्रक्रिया में अर्पण का भाव बताने के
उपरांत गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्पण की विधि बताते हुये कहे कि हे कुंती पुत्र
जो कुछ भी कर्म करो, जो कुछ भी ग्रहण करो, उसे सेवा भाव से मुझे अर्पित करने के
उपरांत करो ।
शनिवार, 25 जून 2016
सरलतम उपाय
ब्रम्ह यदि आत्माधारी को ग्रहण करता है तो यह आत्माधारी की
उच्चतम उपलब्धि होगी । इस उपलब्धि का सरलतम उपाय है कि आत्माधारी अपने अहंकार को
शून्य करके उस ब्रम्ह को अर्पित हो जाय । तुलसी पत्र अथवा पुष्प यह तो लक्षणात्मक
अभिव्यक्ति हैं ।
शुक्रवार, 24 जून 2016
समर्पण का प्रतीक
व्यक्ति में जबतक अहंकार शेस है वह अपने को ब्रम्ह से भिन्न एक
अलग अस्तित्व के रूप में अनुभव करता है वह ब्रम्ह को समर्पित नहीं हो सकता है ।
अहंकार शून्य स्थिति समर्पण है । गुरू ने अर्पण का जो उपदेश किया है वह वास्तविकता
में इसी समर्पण को ही प्रशस्थ करता है । जो व्यक्ति अपने स्व को ब्रम्ह को अर्पित
कर देता है ब्रम्ह उसे ग्रहण कर लेता है ।
गुरुवार, 23 जून 2016
अर्पण में भाव की प्रधानता
गुरू द्वारा बताये गये भक्त के अर्पण के सम्बंध में अर्पण का
भाव प्रधान महत्व का होता है । अर्पित की जाने वाली वस्तु का मूल्य महत्वपूर्ण
नहीं होती है । साधारण से साधारण वस्तु आराध्य को अर्पित किया जाय परंतु अर्पण
श्रद्धायुक्त होना चाहिये ।
बुधवार, 22 जून 2016
श्रद्धापूर्ण अर्पण
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि जो भी व्यक्ति
सात्विक हृदय से श्रद्धापूर्वक एक तुलसी पत्र अथवा एक पुष्प अथवा जल कुछ भी अर्पित
करता है मैं उसके अर्पण को ग्रहण करता हूँ ।
मंगलवार, 21 जून 2016
तुलना का आधार
सांसारिक जीवन में सांसारिक द्वैतो का भोग ही समस्त त्रासदा का
मूल होता है । इसलिये जो व्यक्ति सांसारिक वैभवों को लक्ष्य कर देवताओं की उपासना
करते हैं और लक्षित वैभव पाते भी हैं तो भी उन्हे इन सांसारिक द्वैतो से तो मुक्ति
मिलती नहीं है । इसके विपरीत जो व्यक्ति आत्मा प्रधान जीवन को लक्ष्य कर अपने
समस्त कर्मों को ब्रम्ह को अर्पित करता है वह सांसारिक द्वैतों से मुक्त ब्रम्ह की
दिव्य शांति को पाता है ।
सोमवार, 20 जून 2016
दिव्य शांति सर्वोच्च
किसी भी उपासना का लक्ष्य उपलब्धि होती है । गुरू ने तुलनात्मक
उपलब्धि के उदाहरण से सर्वोच्च का निर्धारण स्पष्ट किया हैं । गुरू बताये कि
जिन्हे सांसारिक वैभव को पाना लक्ष्य होता है वे व्यक्ति देवताओं की उपासना करते
हैं, जिन्हे आत्मा प्रधान व्यक्तित्व का
जीवन पाना लक्ष्य है वे व्यक्ति अपने समस्त प्रयत्नों को ब्रम्ह को अर्पित करते
हैं और फल स्वरूप ब्रम्ह की दिव्य शांति को पाते हैं । गुरू ने बताया कि यह
उपलब्धि ही सर्वोच्च होती है ।
रविवार, 19 जून 2016
उपासना प्रगति का द्योतक
मनुष्य समुदाय में प्रत्येक प्रकार की उपासना का प्रचलन पाया
जाता है यथा देवताओं की उपासना, अपने पूर्वजो की उपासना, मृतक आत्माओं की उपासना आदि । गुरू का
उपदेश बताता है कि फलीभूत सभी उपासनायें होती हैं । उपासक व्यक्ति के मानसिक स्तर
भिन्न होते हैं और सभी उपासनाओं की उपलब्धियाँ भिन्न होती हैं ।
शनिवार, 18 जून 2016
उपलब्धि का स्तर
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको बताये कि जो व्यक्ति देवताओं
को पूजता है वह देवताओं को पाता है,
जो व्यक्ति मृतक आत्माओं को पूजता है वह मृतक आत्माओं को पाता है, जो व्यक्ति मुझे पाने के लिये अपने समस्त
कर्मों को मुझे अर्पित करता है वह व्यक्ति मेरी दिव्य शांति को प्राप्त करता है |
शुक्रवार, 17 जून 2016
सत्य लक्ष्य
ब्रम्ह की उच्चतर,
अ-परिवर्तनीय, अ-रूपधारी प्रकृति आत्मा की
प्रधानता का जीवन प्राप्त करने के जिज्ञासु को प्रयत्नों में अग्रसर होने के लिये
यह नितांत आवश्यक होता है कि वह ब्रम्ह की धारणा अपने मस्तिष्क में स्थिर करे ।
ब्रम्ह लोकातीत है । उसकी धारणा लोक के साधनों के माध्यम से स्थिर करना है । इस
प्रक्रिया मे समस्त अ-लौकिक घटना चक्रों एवँ प्रक्रियाओं में ब्रम्ह के दर्शन का
पथ अपनाने का पथ गुरू निर्दिष्ट किये हैं ।
गुरुवार, 16 जून 2016
भोक्ता स्वरूप
गुरू ने ब्रम्ह को समस्त कार्य आहुतियों का भोक्ता होने का
उपदेश दिया है । कार्य सम्पादन ब्रम्ह की प्रकृति है । प्रकृति का उद्भव श्रोत में
विलय । यह मौलिक स्वाभाविक सत्य है । ब्रम्ह से ही प्रकृति का उद्भव भी है । समस्त
कार्य प्रकृति के सम्पादन है । इसका विलय भी ब्रम्ह में ही है । इस चक्र की
ग्राह्यता ब्रम्ह के सत्य स्वरूप का बोध कराने वाली है ।
बुधवार, 15 जून 2016
श्रद्धा और धारण
गुरू ने ब्रम्ह के व्यापक स्वरूप का जितना भी वृतांत बताया उनसे
ब्रम्ह की धारणा स्थिर करना प्रथम लक्ष्य बनता है । यह धारणा प्रत्येक व्यक्ति
अपनी श्रद्धा और अनुभव के अनुसार धारण करता है । चित्रकार चित्रो के माध्यमसे
व्यक्त करने की चेष्टा करता है, कवि अपने काव्य के माध्यम से
व्यक्त करनेकी चेष्टा करता है । इसी प्रकार भक्त अपनी श्रद्धा के अनुरूप धारण करता
है ।
मंगलवार, 14 जून 2016
भोक्ता एवं अधिपति
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि मैं ही समस्त
आहुतियों का भोक्ता भी हूँ और मैं ही सकल आहुतियों का स्वामी भी हूँ परंतु वे
व्यक्ति जो अन्य देवताओं के प्रति श्रद्धालु होते हैं वह मेरी सत्य प्रकृति जानते
नहीं है इसलिये वह पतन को प्राप्त होते हैं ।
सोमवार, 13 जून 2016
ब्रम्ह एक दूसरा नहीं
गुरू का उपदेश है कि ब्रम्ह एक ही है । उसका कोई दूसरा रूपांतर
नहीं है । मात्र उस ब्रम्ह की धारणा कैसे अपने हृदय में स्थापित कर सकता है व्यक्ति
उसके लिये वही रूप ग्राह्य बन जाता है । गुरू इसी बात की पुष्टि में कहे कि जो
मुझे जिस रूप में पूजता है मैं उसे उसी रूप के माध्यम से फल देकर उसकी पूजा को सफल
करता हूँ ।
रविवार, 12 जून 2016
ब्रम्ह स्वरूप
गुरू ने ब्रम्ह के रहस्य का जो विस्तार बताया है इससे यह बिलकुल
साफ स्पष्ट विदित है कि निराकार ब्रम्ह की किसी रूप विषेस में कल्पना निराधार है ।
फिरभी उपासक को समझने के लिये किसी रूप का सहारा लेना पडता है । इसी कारण अनेकानेक
देवरूपों का प्रचलन सम्भव हुआ है ।
शनिवार, 11 जून 2016
कोई भिन्न देवता नहीं
गुरू का उपदेश विदित करता है कि ब्रम्ह का विस्तार ही समस्त रूप
संसार है । हम जिसे भिन्न देवता समझ कर पूजते वह भी ब्रम्ह ही होता है । यह मात्र
पूजने वाले की सीमित बुद्धि है कि वह अपने आराध्य को एक भिन्न देवता मानता है ।
शुक्रवार, 10 जून 2016
प्रत्येक उपासना ब्रम्ह को
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति अन्य
देवताओं को पूजते हैं वे व्यक्ति भी वास्तविकता में मुझे ही अपनी पूजा अर्पित करते
हैं यद्यपि कि उनकी उपासना विधि के अनुरूप नहीं होती है ।
गुरुवार, 9 जून 2016
ब्रम्ह पर आश्रित
ब्रम्ह की उपासना करने वाले संतों के लिये गुरू की अनुशंसा, पूर्ण समर्पण तथा पूर्ण प्रश्रय के लिये है
। व्यक्ति के पास स्नेह करने की जो भी क्षमता उपलब्ध है उसे वह अपने आराध्य को
अर्पित करें । ऐसा विश्वास रखें कि वह ब्रम्ह की कृपा से पूर्ण सुरक्षित हैं ।
ब्रम्ह की आराधना ब्रम्ह की शक्ति द्वारा ब्रम्ह को समर्पित होकर करने का पथ गुरु
द्वारा निर्दिष्ट किया गया है ।
बुधवार, 8 जून 2016
दायित्व ओढते हैं
गुरू बताये कि जो व्यक्ति ब्रम्ह का ध्यान करते हैं, ब्रम्ह को पूजते हैं ऐसे व्यक्तियों की
सुरक्षा, भक्त की समस्त ज्ञानपथ की उपलब्धियों
की सुरक्षा ब्रम्ह स्वयँ करते हैं । ब्रम्ह ऐसे संतों के लिये रक्षक और मित्र
दोनों ही रूपों में रहते है ।
मंगलवार, 7 जून 2016
फँदा
गुरू अर्जुन को उपासना पद्धतियों की तुलनात्मक समीक्षा द्वारा
यह बोध कराना चाहते हैं कि सत्य का ज्ञान अर्जित करने के जिज्ञासुओं को वेदों में
वर्णित उपासना के अनुकरण की चेष्टा नहीं करना चाहिये क्योंकि वह उनके लिये एक फँदे
के समान हो जावेगी जिसमें फँसकर वह सुख भोग को उन्मुख हो जावेगें और अपने मुख्य
लक्ष्य से विचलित हो जावेंगे ।
सोमवार, 6 जून 2016
अप्राप्त की उपलब्धि
वेदों के ज्ञान पर आधारित उपासना के फल बताने के उपरांत गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ब्रम्ह की नि:काम उपासना को बताते हुये जिज्ञासु अर्जुनसे कहे
कि जो व्यक्ति मेरी उपासना करते हैं,
केवल मेरा ही ध्यान करते हैं, वे विघ्न और समस्याओं को झेलते
हुये भी मेरी उपासना और ध्यान में संलग्न रहते है उन्हे फलत: वह उपलब्धियाँ होती
हैं जो उनके लिये अन-उपलब्ध होती हैं और उन्हे उनकी उपलब्धि पर पूर्ण सुरक्षा भी
प्राप्त होती है ।
रविवार, 5 जून 2016
प्रकृति के उत्थान का अवसर
निम्नतर प्रकृति को उत्थान द्वारा उच्चतर प्रकृति के धर्म के
अनुरूप बनाने का प्रयत्न वास्तविकता में मनुष्य योनि के जन्म में ही सम्भव होता है
। मनुष्य शरीर की प्राप्ति का सही उपयोग इसी लक्ष्य की प्राप्ति में ही निहित होता
है । यह उपलब्धि किसी भी अन्य योनि के जन्म में सम्भव नहीं होती है । गुरू का समस्त
उपदेश इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिये है ।
शनिवार, 4 जून 2016
कर्म के नियमों से बँधे
वेदों में वर्णित अहंकार से युक्त उपासना पद्धति व्यक्ति को
देवलोक की उपलब्धि के उपरांत भी वापस पुनर्जन्म की व्यवस्था में लाने का कारण बनती
है । ऐसे व्यक्ति अपनी आत्मा को एक अलग अस्तित्व के रूप में मानते हुये उस आत्मा
के सुखों के लिये उपासना करते हैं । इसलिये उनके प्रयत्न कर्मों के नियम द्वारा
बँधे होते है । फलत: पुनर्जन्म की व्यवस्था में उनकी वापसी होती है ।
शुक्रवार, 3 जून 2016
उपलब्धि उच्चतम नहीं
गुरू द्वारा बताये गये उपदेश के अनुसार व्यक्ति वेदों के ज्ञान
पर आधारित उपासना पद्धतियों को अंगीकार करके पुण्य अर्जित करता है जिसके संचय की
वृद्धि होने पर उसे देवलोक में स्थान मिलता है परंतु अर्जित पुण्यों के क्षीण होने
पर उसे वापस पुनर्जन्म की व्यवस्था में लौटा दिया जाता है । इस वापसी के कारण यह
उपलब्धि उच्चतम नहीं होती है ।
उपलब्धि उच्चतम नहीं
गुरू द्वारा बताये गये उपदेश के अनुसार व्यक्ति वेदों के ज्ञान
पर आधारित उपासना पद्धतियों को अंगीकार करके पुण्य अर्जित करता है जिसके संचय की
वृद्धि होने पर उसे देवलोक में स्थान मिलता है परंतु अर्जित पुण्यों के क्षीण होने
पर उसे वापस पुनर्जन्म की व्यवस्था में लौटा दिया जाता है । इस वापसी के कारण यह
उपलब्धि उच्चतम नहीं होती है ।
उपलब्धि उच्चतम नहीं
गुरू द्वारा बताये गये उपदेश के अनुसार व्यक्ति वेदों के ज्ञान
पर आधारित उपासना पद्धतियों को अंगीकार करके पुण्य अर्जित करता है जिसके संचय की
वृद्धि होने पर उसे देवलोक में स्थान मिलता है परंतु अर्जित पुण्यों के क्षीण होने
पर उसे वापस पुनर्जन्म की व्यवस्था में लौटा दिया जाता है । इस वापसी के कारण यह
उपलब्धि उच्चतम नहीं होती है ।
उपलब्धि उच्चतम नहीं
गुरू द्वारा बताये गये उपदेश के अनुसार व्यक्ति वेदों के ज्ञान
पर आधारित उपासना पद्धतियों को अंगीकार करके पुण्य अर्जित करता है जिसके संचय की
वृद्धि होने पर उसे देवलोक में स्थान मिलता है परंतु अर्जित पुण्यों के क्षीण होने
पर उसे वापस पुनर्जन्म की व्यवस्था में लौटा दिया जाता है । इस वापसी के कारण यह
उपलब्धि उच्चतम नहीं होती है ।
उपलब्धि उच्चतम नहीं
गुरू द्वारा बताये गये उपदेश के अनुसार व्यक्ति वेदों के ज्ञान
पर आधारित उपासना पद्धतियों को अंगीकार करके पुण्य अर्जित करता है जिसके संचय की
वृद्धि होने पर उसे देवलोक में स्थान मिलता है परंतु अर्जित पुण्यों के क्षीण होने
पर उसे वापस पुनर्जन्म की व्यवस्था में लौटा दिया जाता है । इस वापसी के कारण यह
उपलब्धि उच्चतम नहीं होती है ।
उपलब्धि उच्चतम नहीं
गुरू द्वारा बताये गये उपदेश के अनुसार व्यक्ति वेदों के ज्ञान
पर आधारित उपासना पद्धतियों को अंगीकार करके पुण्य अर्जित करता है जिसके संचय की
वृद्धि होने पर उसे देवलोक में स्थान मिलता है परंतु अर्जित पुण्यों के क्षीण होने
पर उसे वापस पुनर्जन्म की व्यवस्था में लौटा दिया जाता है । इस वापसी के कारण यह
उपलब्धि उच्चतम नहीं होती है ।
उपलब्धि उच्चतम नहीं
गुरू द्वारा बताये गये उपदेश के अनुसार व्यक्ति वेदों के ज्ञान
पर आधारित उपासना पद्धतियों को अंगीकार करके पुण्य अर्जित करता है जिसके संचय की
वृद्धि होने पर उसे देवलोक में स्थान मिलता है परंतु अर्जित पुण्यों के क्षीण होने
पर उसे वापस पुनर्जन्म की व्यवस्था में लौटा दिया जाता है । इस वापसी के कारण यह
उपलब्धि उच्चतम नहीं होती है ।
गुरुवार, 2 जून 2016
गान्तव्य पुनर्जन्म
वेदों के ज्ञान पर आधारित उपासना पद्धति का फल बताते हुये
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि सुखों के भोग की कामना से, वेदो के ज्ञान पर आधारित उपासना द्वारा
व्यक्ति इंद्र के आधिपत्य के देवलोक को प्राप्त करता है जहाँ पर वह सुखों का भोग
करता है परंतु पुण्य के क्षीण होने पर वह पुन: मृत्यु लोक में पुनर्जन्म की
व्यवस्था में वापस लौटा दिया जाता है ।
बुधवार, 1 जून 2016
फलदाता एक
गुरू का उपदेश व्यक्त करता है कि उपासक अनेक है । उपासना
विधियाँ अनेक हैं । उपासना के लक्ष्य अनेक है । परंतु प्रत्येक विधि से उपासना
करने वाले, प्रत्येक लक्ष्य की उपासना करने
वाले, प्रत्येक उपासक की उपासना स्वीकार
करने वाला ब्रम्ह एक ही है । इसीलिये जो व्यक्ति जिसभी लक्ष्य से उपासना करता है
उसे वही लक्ष्य मिलता है ।
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