स्वयँ
अपने विषय में गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि तीनो लोको में कोई ऐसा
कार्य नहीं है जिसे किया जाना मुझसे अपेक्षित है अथवा किसी अ-प्राप्त को प्राप्त
करने के लिये मुझे करना है परंतु फिरभी मैं कार्य करता हूँ । यदि मैं कार्य करना
बंद करदूँ तो पूरा संसार समाप्त होकर बिना अस्तित्व में पर्णित हो जावेगा ।
गुरुवार, 30 अप्रैल 2015
बुधवार, 29 अप्रैल 2015
फल की कामना मात्र भ्रम
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि फल की इच्छा से कार्य करना मात्र एक भ्रम
होता है । एक मुक्त आत्मा का व्यक्ति बिना फल की कामना के कार्य करता है वही कार्य करने का सच्चा मार्ग
है । मुक्त पुरुष कहता है कि मैं कार्य करूँ या ना करूँ मुझे कोई अंतर नहीं पडता
है । मैं कार्य इसलिये करता हूँ कि शरीर कार्य करने में सक्षम है तो मैं कार्य
क्यों ना करूँ ।
मंगलवार, 28 अप्रैल 2015
कर्म के उदाहरण
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि जिसे आत्मज्ञान प्राप्त हो गया है वह बिना
किसी स्वार्थ की पूर्ति की अभिलाषा के समुदाय के लिये कार्य करता है । इस कथन के
समर्थन में वह राजा जनक का उदाहरण भी बताते है कि राजा जनक पूर्णरूप से मुक्त थे
परंतु बिना किसी लिप्सा के समुदाय के हित के लिये कार्य करते थे । जिन व्यक्तियों
को ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ है परंतु वह ज्ञानप्राप्ति के लिये प्रयत्नशील हैं ऐसे
व्यक्ति इन आदर्श मुक्त व्यक्तियों के कर्मों से उदाहरण ग्रहण करते हैं ।
सोमवार, 27 अप्रैल 2015
आत्मबोध : फल 3
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि मुक्त आत्मा के व्यक्ति बिना
किसी स्वार्थ पूर्ति की कामना से कर्म करके जीवन में उत्कर्षतम स्थिति को पाता है
क्योंकि बिना आसक्ति के किया हुआ कर्म ही सर्वोपरि गुणवत्ता का होता है ।
व्याख्याकार इस कथन की व्याख्या करते हुये बताता है कि यज्ञ को समर्पित कर्म की
अपेक्षा मुक्त आत्मा द्वारा किया हुआ कर्म उत्कृष्ठ होता है । पुन: इच्छापूर्ति
में किये गये कर्म की अपेक्षा यज्ञ में आहुति के रूप में किया हुआ कर्म उत्तम होता
है । इसलिये मुक्त आत्मा के कर्मको सर्वोपरि गुणवत्ता का कहा गया है । दूसरे रूप
में उत्तम कर्मविधि से किया हुआ कर्म मुक्ति प्रशस्थ करता है । इस प्रकार कर्म ही मुक्ति प्रदान भी
करता है ।
रविवार, 26 अप्रैल 2015
आत्मबोध : फल 2
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि आत्मबोध में लीन व्यक्ति को ना ही कुछ
किये हुये कर्म से पाने की अभिलाषा होती है और ना ही कुछ ना किये हुये कर्म से पाने की अभिलाषा
शेस रह जाती है । इसलिये वह अपने किसी स्वार्थ की पूर्ति के लिये किसी के ऊपर
निर्भर नही होता है ।
शनिवार, 25 अप्रैल 2015
आत्मबोध : फल 1
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जो व्यक्ति अपनी आत्मा के बोध में
हर्षित रहता है, अपनी अत्मा के बोध में ही संतुष्ट रहता है,
अपनी आत्मा के बोध में ही लीन रहता है उसे किसी कर्म की वाँक्षना ही नहीं रह जाती
है । व्याख्याकार इस कथन के भाव को स्पष्ट करते हुये कहता है कि आत्मबोध का अनुभव उस
व्यक्ति को प्रकृतीय मोंह से विरक्त कर देती है । चूँकी कर्म की आवश्यकता प्रकृतीय
मोंह के परिणाम से जागृत इच्छा की पूर्ति के लिये होती है इसलिये आत्मबोध तत्फलम्
मोंह से मुक्ति की दशा कर्म की आवश्यकता नहीं रह जाने में पर्णित हो जाती है ।
शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015
यज्ञ का स्वरूप
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को यज्ञ का स्वरूप बताने के लिये कहते हैं कि मनुष्य और
यज्ञ रूपी प्रकृति दोनो परस्पर एक दूसरे को देते हैं । यह परस्पर आदान प्रदान यज्ञ
है । एक व्यक्ति के रूप में मनुष्य और यज्ञ के रूप में संसार दोनो एक दूसरे के
सहयोग के ऊपर निर्भर हैं । मनुष्य कर्म की आहुति यज्ञ को अर्पित करता है । यज्ञ
रूपी प्रकृति इस आहुति से प्रसन्न होती है । यही जीवन का नियम है । कर्म भी ब्रम्ह
है,
आहुति भी ब्रम्ह है, आहुति देने वाला भी ब्रम्ह है,
आहुति पाने वाला भी ब्रम्ह है, लक्ष्य भी ब्रम्ह है,
वस्तु भी ब्रम्ह है । यज्ञ में सभी कुछ ब्रम्ह है ।
गुरुवार, 23 अप्रैल 2015
कर्म की उत्पत्ति ब्रम्ह से
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म की उत्पत्ति बताते हुये कहे कि कर्म जो कि यज्ञ
की प्रकृति है की उत्पत्ति अक्षर ब्रम्ह से है । इस प्रकार ब्रम्ह जो समस्त रूपों
में व्याप्त है यज्ञ के केंद्र में विद्यमान रहता है । व्याख्याकार गुरू के
उपरोक्त कथन की पुष्टि में ऋग वेद का अंश उद्घृत करके बताता है कि एक पुरुष को
यज्ञ को आहुत किया जिसका विस्तार समस्त आकाश में विस्तरित था । इस महान यज्ञ की
आहुति से सृष्टि का रूप स्थिर है । यज्ञ रूपी प्रकृति की उत्पत्ति भी ब्रम्ह से है,
यज्ञ भी ब्रम्ह है, आहुति भी ब्रम्ह ही है ।
बुधवार, 22 अप्रैल 2015
यज्ञ को समर्पित
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म करने की विधि बताते हुये कहते हैं कि यज्ञ में
आहुति के समान अपने कर्म को इस सृष्टि को समर्पित करो । ऐसा करने से तुम्हारे कर्म
बंधनकारी नहीं होंगे । किये हुये कर्म से किसी फल की अभिलाषा मत करो । दूसरे
शब्दों में किसी फल की अभिलाषा से कोई कर्म मत करो । कर्म को इस सृष्टि के
सृजनकर्ता परम् ब्रम्ह की सेवा में आहुति करो ।
मंगलवार, 21 अप्रैल 2015
सृष्टि का चक्र
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सृष्टि की उत्पत्ति की श्रँखला बताते हुये कहा कि
कर्म से यज्ञ की उत्पत्ति होती है, यज्ञ से वर्षा की उत्पत्ति होती है,
वर्षा से अन्न की उत्पत्ति
होती है, अन्न
से जीव की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार इस सृष्टि की पूर्ण श्रँखला का मूल कर्म
में निहित है । इसलिये कर्म में सम्मलित ना होना जीव के लिये जघन्य अपराध है ।
अपनी उत्पत्ति के मूल को ही झुठलाना है । इसलिये हे अर्जुन नीयत कर्म करो ।
सोमवार, 20 अप्रैल 2015
निष्कर्म का विज्ञान
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि यदि मनुष्य अपनी बाह्य क्रियाओं को
नियंत्रित करता है परंतु अपनी इच्छाओं को नहीं नियंत्रित करता है जोकि बाह्य
क्रियाओं की प्रेरक होती हैं तो ऐसी दशा में उसका इंद्रियों को नियंत्रित करने का
प्रयत्न सार्थक नहीं होगा । हे अर्जुन इस दृष्य संसार का समस्त रूप भोग और
स्वामित्व के लिये नहीं होता है । इसलिये हे अर्जुन यदि खोई हुयी मानसिक शांति को
फिर से पाना है, यदि हेरा-फेरी के दुष्कर्म से मुक्त होना है,
यदि छाये हुये अज्ञान का नाश करना है तो संसार के समस्त रूपों को परम् ब्रम्ह के
प्रगट रूप की मर्यादा से ग्रहण करना होगा, प्रत्येक कर्म को परम् ब्रम्ह की सेवा
के रूप में करना होगा । यही सच्चा निष्कर्म होगा ।
रविवार, 19 अप्रैल 2015
निष्कर्म की व्याख्या
व्याख्याकार
कहता है कि प्रकृतीय मोंह से मुक्त आत्मा कर्म में संलग्न होती है परंतु अपने किसी
स्वार्थ जनित
इच्छा की पूर्ति के लिये नहीं, प्रकृति के किसी गुण के प्रभाव से नहीं
अथवा अविद्या के प्रभाव से नहीं अपितु जैसे ईश्वर कार्य करता है बिना कर्म में
लिप्त हुये कार्य करता है । जिसको आत्मा का बोध हो गया है, जिसका अहंकार क्षीण हो गया है वह अपने
अंत:करण में विद्यमान परम् सत्य की प्रेरणा से कार्य करता है । स्वार्थ पूर्ति की
इच्छा से मुक्ति, व्यक्तिगत स्वार्थ के भ्रम से मुक्ति ही सच्चा निष्कर्म होता
है ।
शनिवार, 18 अप्रैल 2015
प्रकृति द्वारा प्रेरित
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि प्रकृति के विज्ञान द्वारा प्रत्येक मनुष्य
की कर्मेंद्रियों में ऐसी क्रियात्मक प्रेरणा सृजित होती है कि मनुष्य बिना कार्य
किये रह ही नहीं सकता है । जब तक जीवन है प्रत्येक मनुष्य कार्य तो करेगा ही करेगा
। व्यख्याकार गुरू के उपरोक्त कथन को स्पष्ट करते हुये बताता है कि जिसे आत्मा का
ज्ञान प्राप्त है वह मनुष्य प्रकृति के गुणों से प्रभावित हुये बगैर कार्य करता है
और जिसे अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं है वे व्यक्ति प्रकृति के गुणों की
आसक्ति में कार्य करते हैं ।
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015
निष्कर्म
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि निष्कर्म कर्म करने की वह स्थिति है
जिसमें मनुष्य कर्म द्वारा प्रभावित नहीं होता है । प्रकृति का नियम है कि मनुष्य
कर्म के फल से बँधता है । प्रत्येक कर्म की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है फलत:
सृजित होता है बंधन, आत्मा को पुनर्जन्म के लिये आधार तथा
परम् सत्य का ज्ञान पाने में बाधा बढती है । इन दोषों से बचने के लिये कर्म का
त्याग नहीं अपितु कर्म फल के त्याग की आवश्यकता होती है । निष्कर्म कर्म करना वाँक्षित
होता है ।
गुरुवार, 16 अप्रैल 2015
अंतर्मुखी और बाह्यमुखी
अर्जुन
द्वारा व्यक्त किये गये मानसिक भ्रम का निवारण करने के लिये गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण उसे बताये कि ज्ञान प्राप्ति के जिज्ञासु प्राय: दो प्रकार के होते हैं (1)
वे व्यक्ति जो ज्ञान के उपदेश को अपने मस्तिष्क में ध्यानके बल से ग्रहण करते हैं (2)
वे कर्मशील जिज्ञासु जो उपदेश को बाह्य जगत में कर्म के माध्यम से उसे ग्रहण करते
हैं । जिन्हे अपने मस्तिष्क में ध्यान के द्वारा ग्रहण करने की रूचि है उनके लिये
बुद्धियोग उपयोगी होता है और जिन्हे कर्म द्वारा ज्ञान ग्रहण करने में रूचि है
उनके लिये कर्मयोग उपयोगी होता है । दोनो ही पथ बराबर प्रभावी होते है ।
बुधवार, 15 अप्रैल 2015
अर्जुन मतिभ्रमित
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अब तक जितना कुछ साँख्य एवँ योग के विषय में
बताया उससे मानो अर्जुन एक का ज्ञान दूसरे में मिला बिलकुल मतिभ्रमित सा हो गया वह
अ-क्रमबद्ध
रूप से कहने लगा कि यदि बुद्धियोग ज्यादा उत्तम है तो आप मुझे कर्म का परामर्ष
क्यों दे रहे हैं । यदि साँख्य ज्ञान प्राप्ति का ज्यादा अच्छा पथ है तो योग का
क्या औचित्य हैं ।
मंगलवार, 14 अप्रैल 2015
सही के चुनाव द्वारा मुक्ति
सही
के चुनाव द्वारा, ईश्वर के प्रति समर्पण से युक्त, अहंकार का त्याग कर के,
इच्छा का पूर्ण मर्दन करके मनुष्य प्रकृतीय मोंह से पूर्ण मुक्ति पा सकता है ।
मुक्ति की दशा इस जीवन के रह्ते हुये ब्रम्ह का अनुभव, ब्रम्ह की शांति देने वाली होती है ।
जीवन के कलह, त्रास, अशांति सभी लुप्त हो जावेंगे ऐसा संत
कार्य तो सभी करेगा परंतु फल के लिये नहीं अपितु ब्रम्ह की सेवा
के लिये ।
इस
प्रकार भागवद्गीता का बुद्धियोग नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ।
सोमवार, 13 अप्रैल 2015
सर्वभौम मान्यता
मनुष्य
की आंतरिक शक्ति के प्रति सजग विवेक, प्रकृति द्वारा आदेशित कर्मों के सम्पादन
के लिये प्रचुर आंतरिक शक्ति, मुक्ति की स्वतंत्रता,
परम् सत्य को सतत्
समर्पण यह
स्थितियाँ जो प्रत्येक धर्म के संतों में उभयनिष्ठ रूप से पायी जाती हैं । इसलिये यह निष्कर्श
निकलता है कि प्रत्येक धर्म परम् सत्य को कुछ उभयनिष्ठ मान्यताओं के अधीन मानता है
। ऐसे संत मानव समाज के लिये उदाहरण होते हैं । कंचिद स्वार्थ के दायरे में बँधा
मानव यदि जागृत होकर प्रगति का पथ अपनावे तो सम्पूर्ण मानवता स्वार्थ के संकीर्ण
दायरे से प्रगति कर एक उच्च स्तरीय जीवन को प्राप्त कर सकती है ।
रविवार, 12 अप्रैल 2015
उपलब्धियों का क्रम
बौद्ध
सम्प्रदाय में मान्यता है कि स्वास्थ्य सर्वोच्च लाभ होता है,
संतोष सर्वोच्च
सम्पत्ति होती है, विश्वास सर्वोत्तम मित्र होता है और निर्वाण सर्वोच्च आनंद
होता है ।
शनिवार, 11 अप्रैल 2015
दिव्य शांति
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जो व्यक्ति अपने मस्तिष्क की समस्त
इच्छाओं का दमन कर, अहंकार की अनुभूति से मुक्त,
प्रकृति द्वारा आदेशित कर्मों को करता है उसे समस्त सांसारिक त्रासो से मुक्ति मिल
जाती है और वह परम् शांति को प्राप्त होता है । कंचिद यह स्थिति उसके मृत्यु
पर्यंत स्थिर रह जाने की दशा में वह ब्रम्ह की दिव्य शांति को प्राप्त होता है ।
शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015
शांति की उपलब्धि
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो मनुष्य अपनी इच्छाओं को पूर्ण नियंत्रित
कर लेता है और बिना आसक्ति के अहंकार भाव से मुक्त होकर कार्य करता है वह दिव्य
शांति की अनुभूति करता है ।
गुरुवार, 9 अप्रैल 2015
शुद्ध अशुद्ध मस्तिष्क
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को इच्छाओं के सम्बंध में दिये गये उपदेशों को व्याख्याकार
उपनिषदों के संदर्भ से स्पष्ट करते हुये कहता है कि जिस मनुष्य का मस्तिष्क
इच्छाओं की पूर्ति के लिये चेष्टारत है वह अशुद्ध है । जिस मनुष्य का मस्तिष्क
इच्छाओं की लिप्सा से विरक्त है वह शुद्ध है ।
बुधवार, 8 अप्रैल 2015
इच्छा और शांति
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति इच्छाओं को
पकड कर निचोडता है अर्थात् उनकी पूर्ति कर के इंद्रीय वासनाओं की पूर्ति करना
चाहता है तो उस व्यक्ति को यथार्त में अ-शांति ही मिलती है । उपरोक्त के विपरीत एक
व्यक्ति जो अपने को इच्छाओं के प्रति समुंद्र के समान शांत बनाता है, अर्थात्
इच्छायें शांत समुंद्र में गिरने वाली नदियों के समान उसमें आकर गिरती हैं और उस
समुंद्र में समा जाती हैं और समुंद्र का जल स्तर अपरिवर्तित रहता है, ऐसा
व्यक्ति शांत ही बना रहता है, इच्छाये उसे
अशांत नहीं कर पाती हैं ।
मंगलवार, 7 अप्रैल 2015
अज्ञानी की रात्रि ज्ञानी का दिन
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि अज्ञानी पुरुष की रात्रि ज्ञानी पुरुष
के प्रात:काल के समान होती है और अज्ञानी पुरुष का दिन ज्ञानी पुरुष की रात्रि के
समान होता है । व्याख्याकार उपरोक्त कथन को स्पष्ट करते हुये बताता है कि अज्ञानी
पुरुष वासनाओं के झिलमिलाते आकर्षण से मोहित उनको पाने की चेष्टा में व्यस्त होता
है उस समय ज्ञानी पुरुष परम् सत्य को अनुभव करने की चेष्टा में रत रहता है। इस
प्रकार ज्ञानी परम् सत्य को जानने की जागृति दशा में है जबकि अज्ञानी परम् सत्य के
ज्ञान के प्रति अचेत सोये हुये दशा में रहता है । अज्ञानी का दिन अर्थात् द्वंदो
का जीवन यह ज्ञानी पुरुष के लिये आत्मा की कालिमा है रात्रि है ।
सोमवार, 6 अप्रैल 2015
अनियंत्रित विवेक के फल
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि अ-नियंत्रित विवेक धारक व्यक्ति का
मस्तिष्क कभी एकाग्र नहीं हो सकता है । एकाग्रता के अभाव से वह सदैव अशांत दशा में
रहेगा । मस्तिष्क जब विभिन्न इंद्रियों के विषयों के पीछे भ्रमण करेगा तो उसका
विवेक कभी भी उसके हित में सहायक नहीं हो सकेगा । जिस प्रकार पानी पर तैरती नाव को
हवा चलाती है उसी प्रकार उसकी इंद्रियाँ उसे कभी स्थिर नहीं होने देंगी । इसलिये
हे अर्जुन जब तक मनुष्य अपने को इंद्रीय वासनाओं से समेटेगा नहीं तब तक उसका विवेक
एकाग्र नही हो सकता ।
रविवार, 5 अप्रैल 2015
नियंत्रित विवेक के फल
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि बुद्धियोग की स्थिति प्राप्त व्यक्ति
इंद्रियों की वासना वस्तुओं के मध्य विचरण करते हैं परंतु फिरभी उनके विवेक की
शाश्वतता प्रभावित नहीं होती है । ऐसे व्यक्ति के सम्मुख जो भी परिस्थिति जिसभी
रूप में आती है वे उसे बिना किसी प्रतिक्रिया के उसके मौलिक स्वरूप में ग्रहण करते
हैं । ऐसे व्यक्ति को किसी दूसरे की अमानत की कोई चाहत नहीं होती है,
किसी के वैभव से कोई ईर्ष्या नहीं होती, उनकी अपनी कोई इच्छा नहीं होति और ना
ही कोई माँग होती है । ऐसी शुद्धआत्मा के व्यक्ति को दु:ख की छाया भी नहीं छूती है
। ऐसे व्यक्ति परमात्मा के साथ सीधे सम्पर्क में रहते हैं ।
शनिवार, 4 अप्रैल 2015
स्थापना का रहस्य
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बुद्धियोग में स्थापित संत के लक्षण बताये,
पुन: बताया कि इंद्रियाँ किस प्रकार जिज्ञासु अथवा सिद्ध संत को पूर्ण पतन की
स्थिति पर्यंत पहुँचाने में समर्थ प्रमाणित होती हैं । इन
इंद्रियों को वश में करने के लिये गुरू वास्तविक रहस्य बताते है । गुरू बताते हैं कि
इंद्रियों को हठात् उनकी वासना वस्तु से हटाना या दूर करना,
अथवा उन विषय वस्तुओं से घृणा करना सहायक नहीं होगा । घृणा भी उतनी ही घातक होती
है जितना कि प्यार । इस सम्भावित बाधा के निवारण के लिये मनुष्य को अपने अंत:करण से उन
वासना वस्तुओं से विमुख होना वास्तविक निदान होता है । जीवन रूपी रथ से इंद्री
रूपी घोडों को हटाया नहीं जा सकता है । मस्तिष्क की लगाम द्वारा इन घोडों को
नियंत्रित करना लक्ष्य करना निदान प्रमाणित होता है । मस्तिष्क का सफलता पूर्वक
प्रयोग बुद्धियोग की स्थापना का मूल रहस्य है ।
शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015
बुद्धियोग की बाधा : चरण 2
बुद्धियोग
की दूसरी
बाधा का विस्तार बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते
हैं कि जब इंद्रियाँ मस्तिष्क को अपनी वासनाओं में आकर्षित करने में सफल हो जाती
हैं तो मस्तिष्क वासना के व्यभिचार में लिप्त हो उनकी इच्छा जनित कर लेता है । पुन:
इच्छा से क्रोध जनित होता है । पुन: क्रोध स्मृति क्षय में पर्णित होता है । स्मरण
का क्षय विवेक के नाश में पर्णित होता है । विवेक का नाश होना पूर्ण पतन की स्थित होती
है ।
गुरुवार, 2 अप्रैल 2015
बुद्धियोग की बाधाँये : चरण 1
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञानी संत के लक्षण बताने के बाद बुद्धियोग की
स्थिति पाने में आने वाली बाधाओं को भी चरणों में बताते हैं । गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को बताये कि एक मनुष्य जो कि बुद्धियोग की स्थिति पाने को जिज्ञासु है । वह
मानसिक रूप से उत्कण्ठित है । परंतु उसकी इंद्रियाँ हठात् उसके मस्तिष्क को अपनी
वासनाओं में आकर्षित कर लेती हैं । यह बाधा का पहला चरण होता है ।
बुधवार, 1 अप्रैल 2015
ज्ञानी संत : लक्षण 5
ज्ञानी
संत का पाँचवा लक्षण बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह
सम्भावित बाह्य बाधाओं को, अपने संयमित विवेक द्वारा अपनी आत्मा
को उन्हे पोषित करने से रोक कर, अपने केंद्रित आत्मज्ञान की रक्षा करते
हैं । इसके बावज़ूद भी सम्भव है कि इच्छा शेष रह जाय इस भय के निवारणके लिये सतत्
अपने अंत:करण की समीक्षा करते रहते हैं । कहने का अभिप्राय यह है कि ऐसे संत बाह्य
बाधाओं के निवारण के अतिरिक्त अपनी मानसिक जिज्ञासा का भी निवारण करते है
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