मनुष्य के जीवन के संघर्ष में एक
पक्ष होता है बुराइयों का शमन करना तो दूसरा पक्ष होता है उत्कर्ष की प्राप्ति के
लिये प्रयत्न करना । दोनो पक्ष एक दूसरे के सम्मुख होते हैं । इस संसार में
अपूर्णता, बुराई, और अकारण विघ्न विद्यमान हैं । उचित कर्म द्वारा
मनुष्य बुराई को उत्कर्ष मे पर्णित कर सकता है अपूर्णता को पूर्णता में पर्णित कर सकता है और अकारण विघ्न
को सकारण हल में पर्णित कर सकता है । युद्ध त्रास भी होता है और मर्यादा (discipline) की स्थापना भी होता है ।
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