सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

विलीन

इस रूप संसार की उत्पत्ति और विलय बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि दिन का उदय होने पर सभी जीव रूप प्रगट हो जाते हैं और रात्रि का आगमन होने पर सभी रूप इस प्रकृति में विलीन हो जाते हैं । 

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

दिन और रात्रि

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि ब्रम्हा का दिन एक हज़ार युगो के बराबर होता है और ब्रम्हा की रात्रि एक हज़ार युगों के बराबर की होती है । जो व्यक्ति इस तथ्य को जानता है वह दिन और रात्रि का ज्ञाता होता है । 

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

ब्रम्हा पर्यंत

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि ब्रम्हा पर्यंत जीव कोटि की जितनी भी रचनायें हैं उन सभी का पुनर्जन्म होता है, परंतु जो व्यक्ति मुझ तक पहुँच जाता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता है । 

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

शीर्शस्थ उपलब्धि

ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति द्वारा निर्मित शरीर जो कि ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति के अवलम्ब से स्थिर है, कंचिद यदि मूल ब्रम्ह का साक्षात् अनुभव कर सके तो निष्चय ही यह शिखर उपलब्धि होगी । गुरू इस उपलब्धि का फल बताते हुये कहे कि ऐसी आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता है । अन्यथा की दशा में पुनर्जन्म सामान्य प्रक्रिया होती है । 

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

निर्वाण

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कंचिद व्यक्ति मुझे जान जाता है उसका फिर पुनर्जन्म नहीं होता है, क्योंकि पुनर्जन्म अस्थिरता और दु:ख भोग के लिये होता है जबकि मुझे जानना इन भोगों से मुक्ति होती है । 

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

सतत् का विज्ञान

मनुष्य की सामान्य प्रवृत्ति प्रकृतीय मोंह में आसक्ति की होती है । यह उसके पुनर्जन्म का अधार होता है । इसके विपरीत यदि व्यक्ति विषेस प्रयत्नों के द्वारा अपने को ब्रम्ह के साथ युक्त रखने का अभ्यास अपनी आम क्रिया पद्धति बना लेता है तो फलत: उसकी प्रकृतीय मोंह की दशा क्षीण हो जाती है और वह ब्रम्ह के प्रतिनिधि के स्वरूप में पर्णित हो जावेगा । इस दशा की चरम स्थिति होगी श्रीपद में विलय । ऐसे व्यक्ति की आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होगा । 

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

सतत् एकाग्रता

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जो व्यक्ति सतत् मेरा चिंतन करता है, अपने ध्यान को किसी अन्य में विचलित नहीं होने देता है, ऐसे योगी का आचरण सतत् मर्यादित होता है, ऐसा योगी आसानी से मुझे पाता है । 

सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

शिखर उपलब्धि

इस नश्वर शरीर द्वारा अचिंतनीय ब्रम्ह का ध्यान, अग्राह्य ब्रम्ह की धारण क़ायम करना एक दुष्कर लक्ष्य होता है । इस उपलब्धि के लिये इस नश्वर संसार के साथ मोंह का त्याग करना तथा उस परम् सत्य के अविनाशी अस्तित्व के ध्यान में एकाग्र होने का उपदेश गुरू ने दिया है । 

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

ॐ उच्चारण

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति एक अक्षर ॐ का उच्चारण करते हुये एकाग्र चित्त में ब्रम्ह का ध्यान संजोये हुये इस शरीर का त्याग करता है वह व्यक्ति उच्चतम लक्ष्य ब्रम्ह को प्राप्त करता है । 

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

सम्भावित विघ्न

गुरू साधना अवधि में सम्भावित समस्त विघ्नों को नियंत्रित करने का उपदेश किये हैं । भौतिक बाधाओं से रक्षा के लिये शरीर के नौ द्वारों का नियंत्रण । स्मृति से विघ्न की सम्भावना के निवारण के लिये मस्तिष्क का धारणा में केंद्रित रखने का परामर्ष । जीवन शक्ति प्रकृतीय मोंह को ना उन्मुख होवे इसकी रक्षा के लिये उसे मस्तक में स्थिर रखने का परामर्ष किये हैं । 

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

निर्विघ्न एकाग्रता

विष्णु परम् पद पाने का उपाय बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि व्यक्ति को अपने शरीरके नौ द्वारों को नियंत्रित रखते हुये, मस्तिष्क को धारणा में स्थिर करके, प्राण को मस्तक में एकत्रित करके ब्रम्ह के ध्यान में संलग्न होवें । 

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

परम् पद की व्याख्या

गुरू द्वारा बतायी गई वेदों में वर्णित विष्णु परम् पद, अक्षर स्थिति वह स्थिति होती है जिसमें पहुँचने के बाद व्यक्ति दोबारा माया की मोंह की ओर वापस नहीं लौटता है । विदित है कि यह स्थिति प्रकृतीय मोंह के त्याग के बाद ही होती है । मोंह छूटने के बाद भी पुन: वापस ग्रसने वाला होता है । विष्णु परम् पद मोंह से मुक्ति का वह स्तर है जहाँ से पुन: मोंह में वापस लौटने का भय नहीं रह जाता है ।  

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

विष्णु परम् पद

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस अक्षर स्थिति को वेदों में विष्णु परम् पद बताया गया है, जिस स्थिति को तपस्वी मोंह का त्याग करने पर पाता है, जिस स्थिति को पाने के लिये तपस्वी आत्मसंयम का जीवन जीते हुये साधना करता है, मैं तुम्हे संक्षेप में वह बताऊँगा ।  

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

योग अग्नि

गुरू द्वारा ब्रम्ह की स्थिति पाने के उपाय में वर्णित योगाभ्यास की शक्ति द्वारा अर्थात् आत्मा को ब्रम्ह के भाव में युक्त रखते हुये, माया के प्रति मोंह को ब्रम्ह चेतना की अग्नि में भस्म करने से उसका अस्तित्व निरापद ब्रम्ह में विलीन हो जावेगा । 

सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

प्राण विसर्जन

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति शांत मस्तिष्क की स्थिति में, अपनी मुझमें समर्पित भक्ति के द्वारा योगाभ्यास की शक्ति से अपने एकाग्र ध्यान की स्थिति में अपने मोंह का त्याग करता है वह व्यक्ति परम् ब्रम्ह को प्राप्त होता है । 

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

जीवन ज्योति

ब्रम्ह जो कि इंद्रियों, मस्तिष्क, विवेक के लिये अग्राह्य है का ध्यान कैसे किया जाय के सम्बंध में गुरू की अनुशंसा है कि व्यक्ति को अपनी आत्मा के ध्यान का अभ्यास करना होगा जो कि ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति है, अभेद्य है, सूक्ष्मतम् है, अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करने में चमकते हुये सूर्य की ज्योति के समान सक्षम है । गुरू का अभिप्राय है कि सतत् आत्मचेतना ही सतत् ब्रम्ह के ध्यान का व्यवहारिक स्वरूप है ।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

अंधकारनाशक

ब्रम्ह का ध्यान करने के लिये लक्ष्य निर्धारित करते हुये गरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि व्यक्ति को ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति आत्मा जो कि इस रूप संसार की शासक है, सूक्ष्मतम् है, सभी रूपों का आधार है, जिसका रूप अग्राह्य है, जो कि अंधकार का नाश करने में सूर्य की ज्योति के समान है का ध्यान करना है । 

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

समस्वर की व्याख्या

गुरू का उपदेश है कि सतत् अवतार पुरूष के ध्यान के अभ्यास द्वारा व्यक्ति ब्रम्ह के साथ सीधे सम्पर्क में हो जाता है । यह अभ्यास इतना विकसित करने की गुरू की अनुशंसा है कि अवतार पुरुष का ध्यान व्यक्ति का आम स्वभाव ही बन जाय । ऐसा अभ्यास होने की दशा में ही व्यक्ति मृत्यु का समय आने पर इस शरीर को त्यागने के समय ब्रम्ह का ध्यान कर सकेगा । 

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

समस्वर

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको बताये कि जो व्यक्ति सतत् मेरा ध्यान करता है, मेरा ध्यान करना उसका सतत् अभ्यास बन जाता है, उसका ध्यान विचलित होकर किसी अन्य में जाता ही नहीं है हे अर्जुन ऐसा व्यक्ति ही ब्रम्ह तक पहुँच पाता है । 

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

महत्वपूर्ण

विगत तीन अंको में गुरू द्वारा बताये गये मृत्यु के समय विचार के सम्बंध में उपदेश का सार यह है कि व्यक्ति अपने विचारो के द्वारा ही अपना भविष्य सृजित करता है । किसी भी कर्म का उद्भव विचारों के धरातल से ही होता है । इसीलिये गुरू अनुशंसा करते हैं कि मेरे विचारों में संलग्न रहते हुये युद्ध करो । ब्रम्ह का सतत् स्मरण करते हुये कर्मों को करो । सतत् ब्रम्ह के ध्यान में संलग्न रहना ही योग है । वह ब्रम्ह मुझमें है । वासुदेव सर्वस्य । हमें अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित करना है जो कि हमारा रक्षक है हमारे अंदर व्याप्त है । यही सर्वाधिक महत्वपूर्ण अभ्यास है

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

लक्ष्य

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को कहे कि इसलिये तुम मेरा स्मरण करते हुये युद्ध करो । जब तुम्हारा विचार मेरे में ही संलग्न रहेगा और सिर्फ मेरे ही ध्यान में एकाग्र रहेगा तब तुम बिना किसी संशय मेरे में ही समाहित हो जावोगे । 

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

यथास्थिति

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति जिसभी स्थिति का ध्यान करते हुये मृत्यु को प्राप्त होता है उस व्यक्ति को वही स्थिति प्राप्त होती है । हे कुंती पुत्र जिसका ध्यान जहाँ केंद्रित रहता है उसे वही स्थिति मिलती है । 

रविवार, 7 फ़रवरी 2016

गंतव्य

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति मृत्यु के समय मेरा स्मरण करते हुये शरीर का त्याग करता है वह मेरे लोक में आता है इसमें संशय नहीं है । 

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

ब्रम्ह की क्षवि

विचाराधीन चाहे परिवर्तनशील प्रकृति होवे अथवा अपरिवर्तनीय प्रकृति होवे अथवा दोनों के परस्पर से उत्पन्न होने वाला कर्म होवे, तीनो ही एकल ब्रम्ह की ही क्षवि को निरूपित करने वाले होते हैं । ब्रम्ह ही आहुति भी है, आहुति होने वाली वस्तु भी ब्रम्ह ही है, आहुति ग्रहण करने वाली अग्नि भी ब्रम्ह है, ब्रम्ह को पाने के लक्ष्य से ही आहुति दी भी जाती है । 

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

आहुति

कर्म की उत्पत्ति परिवर्तनशील प्रकृत और अ-परिवर्तनीय आत्मा के मध्य परस्पर क्रिया द्वारा होती है । गुरू ने कर्मों की कर्ता परिवर्तनशील प्रकृति को बताया है । अ-परिवर्तनीय प्रकृति यद्यपि कि कर्मों की अकर्ता होती है फिरभी कर्म की उत्पत्ति उसके सम्मलित होने पर ही होती है । अ-परिवर्तनीय प्रकृति से आहुति अपेक्षित होती है । आहुति होने वाला ब्रम्ह है । 

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

अ-परिवर्तनीय

ब्रम्ह की अ-परिवर्तनीय प्रकृत ही इस रूप संसार की वैयक्तिक ईश्वर है । इसे ही हिरण्यगर्भ कहा गया है । इसे ही संसार के लोग पूजते हैं । यह ही समस्त पूजने वालों की आराध्य है । मनुष्य के शरीर में यही आत्मा है । यही समस्त रूपों का आधार है । यह प्रत्येक परिवर्तनीय को बेधने में सक्षम है जबकि इसे कोई बेध नहीं सकता है । 

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

परिवर्तनशील

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि हे अर्जुन इस संसार के समस्त रूपों का सृजन मेरी परिवर्तनशील प्रकृति द्वारा हुआ है, इस संसार की समस्त दैविक वृत्तियों का आधार मेरी अ-परिवर्तनशील प्रकृति है, समस्त बलिदानों का आधार मैं स्वयं हूँ । 

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

कर्म

मौलिक स्वरूप में कर्म का सूत्रपात ब्रम्ह से हुआ है । ब्रम्ह के कर्म द्वारा ही यह रूप संसार प्रगट हुआ है । इस परिवर्तनशील संसार में कर्म प्रेरण का दायित्व उसकी अपरिवर्तनीय प्रकृति आत्मा में निहित होता है । इस संसार के समस्त कर्मों की कर्ता उसकी परिवर्तनशील प्रकृति होती है । इन्ही दोनो की परस्पर क्रिया ही इस संसार के समस्त कर्म है, फलत: गति हैं, फलत: परिवर्तन है ।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

स्वभाव

इस रूप संसार में विषय आत्मा वस्तु प्रकृति के मध्य परस्पर क्रिया और प्रतिक्रिया ही इस रूप संसार की गतिविधि होती है । परिवर्तनशील प्रकृति अपने गुणों के द्वारा अपरिवर्तनशील विषय आत्मा को मोहित करती है । विषय आत्मा का वस्तु प्रकृति को अवलम्ब देना नैसर्गिक धर्म होता है । इन्ही के परस्पर द्वारा इस रूप संसार की गति सृजित होती है ।