गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि “सत्” शब्द का प्रयोग
वास्तविकता और अच्छाई के अर्थ में किया जाता है, और हे पार्थ (अर्जुन), “सत्” शब्द का प्रयोग प्रशासनिक कार्य के लिये भी किया जाता है
।
शनिवार, 30 सितंबर 2017
शुक्रवार, 29 सितंबर 2017
तत्
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने
अर्जुनको बताया कि “तत्” शब्द का उच्चारण करके यज्ञ और तप और दान की विविध
क्रियाँए प्रतिफल की इच्छा रखे बिना मोक्ष की इच्छा रखने वाले लोगों द्वारा की
जाती हैं ।
गुरुवार, 28 सितंबर 2017
शास्त्रोक्त
“ॐ तत् सत्” के विषय में आगे बताते
हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्णने अर्जुन को बताये कि इसलिये ब्रम्हचारी लोगो द्वारा
शास्त्रों द्वारा बतायी गई यज्ञ, दान और तप की क्रियाँये ॐ शब्द का
उच्चारण करके की जाती हैं ।
बुधवार, 27 सितंबर 2017
ॐ तत् सत्
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि “ॐ तत् सत्” यह ब्रम्ह का तीन प्रकार का प्रतीक समझा जाता है । प्राचीन
काल में इसके द्वारा ब्राम्हण, वेद और यज्ञों का विधान किया गया
था ।
मंगलवार, 26 सितंबर 2017
तामसिक दान
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो दान गलत स्थान पर या गलत समय पर या अयोग्य व्यक्ति को बिना किसी धर्म क्रिया
के द्वारा अपमान-पूर्वक किया जाता है, उसे तामसिक दान माना जाता है ।
सोमवार, 25 सितंबर 2017
राजसिक दान
गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको
बताये कि परंतु जो दान किसी प्रतिफल की आशा से या भविष्य में किसी लाभ की आशा से
किया जाता है, और जिस दान को देने में क्लेश होता
है, उसे राजसिक दान माना जाता है ।
रविवार, 24 सितंबर 2017
सात्विक दान
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो दान ऐसे व्यक्ति को, जिससे किसी प्रतिफल की आशा नहीं है, इस भावना से दिया जाता है कि दान देना
हमारा कर्तव्य है, और जो उचित स्थान में,उचित समय पर और योग्य व्यक्ति को दिया जाता
है, वह दान सात्विक दान माना जाता है ।
शनिवार, 23 सितंबर 2017
तामसिक तप
गुरू तोगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो तप मूर्खतापूर्ण दुराग्रह के साथ अपने आपको कष्ट देकर या दूसरों को
हाँनि पहुँचाने के लिये किया जाता है,
वह तामसिक तप कहलाता है ।
शुक्रवार, 22 सितंबर 2017
राजसिक तप
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो तप सत्कार, सम्मान या प्रतिष्ठा पाने के लिये
किया जाता है या प्रदर्शन के लिये किया जाता है, वह राजसिक तप कहलाता है । यह अस्थिर और अस्थायी होता है ।
गुरुवार, 21 सितंबर 2017
सात्विक तप
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि यदि तीन प्रकार के तप (शरीर का तप, वाणी का तप, मानसिक तप) को संतुलित मन वाले
व्यक्तियों द्वारा फल की इच्छा रखे बिना,
पूर्ण श्रद्धा के साथ किया जाय, तो वह सात्विक तप कहलाता है ।
बुधवार, 20 सितंबर 2017
मानसिक तप
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि मन की प्रशांतता, सौम्यता, मौन, आत्मसंयम और मन की पवित्रता -----
यह मानसिक तप कहलाता है ।
मंगलवार, 19 सितंबर 2017
वाणी का तप
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको
बताये कि ऐसे शब्दों को बोलना, जो दूसरों को बुरे ना लगे, जो सत्य हों, जो प्रिय हों, जो हितकारी हों और नियमित रूप से
वेदों का पाठ ----- यह वाणी का तप कहलाता है ।
सोमवार, 18 सितंबर 2017
शरीर का तप
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
बताये कि देवताओं की, ब्राम्हणों की, गुरूओं की और विद्वानों की पूजा, पवित्रता, ईमानदारी, ब्रम्हचर्य और अहिंसा, यह शरीर का तप कहलाता है ।
रविवार, 17 सितंबर 2017
तामसिक यज्ञ
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
बताये कि जो यज्ञ नियम के अनुसार नहीं है, जिसमें कोई अन्न नहीं बाँटा गया, जिसमें मंत्र नहीं पढे गये और जिसमें दक्षिणा नहीं दी गयी, जो श्रद्धा से रहित है, उसे लोग तामसिक यज्ञ कहते हैं ।
शनिवार, 16 सितंबर 2017
राजसिक यज्ञ
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले
कि परंतु हे भरतो में श्रेष्ठ (अर्जुन),
जो यज्ञ फल की कामना से या प्रदर्शन के लिये किया जाता है, तू समझ ले कि वह राजसिक है ।
शुक्रवार, 15 सितंबर 2017
सात्विक यज्ञ
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो यज्ञ फल की इच्छा न रखने वाले लोंगो द्वारा, जिनका यह विश्वास होता है कि यज्ञ करना उनका कर्तव्य है, शास्त्रीय नियमों के अनुसार किया जाता है, वह सात्विक कहलाता है ।
गुरुवार, 14 सितंबर 2017
तामसिक अहार
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो भोजन बिगड गया हो, बेस्वाद हो, सड गया हो, जूठा हो और गंदा हो,
वह तामसिक लोगो को प्रिय होता है ।
बुधवार, 13 सितंबर 2017
राजसिक अहार
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो भोजन तीखे, खट्टे, नमकीन, बहुत गरम, चरपरे और रूखे जलन उत्पन्न करने वाले होते हैं, जो दु:ख, शोक और रोग उत्पन्न करते हैं, उन्हें राजसिक लोगों को पसंद आते हैं ।
मंगलवार, 12 सितंबर 2017
सात्विक अहार
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो भोजन जीवन, प्राणशक्ति, बल, स्वास्थ्य, आनंद और उल्लास को बढाते हैं, जो मधुर, चिकनाई से युक्त,
पोषक और रुचिकर होते है, वे सत्विक लोगो को प्रिय होते हैं
।
सोमवार, 11 सितंबर 2017
भोजन यज्ञ तप दान
पूजा पद्धति के विषय में बताने के
उपरांत गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि भोजन भी, जो कि सबको प्रिय है, तीन प्रकार का होता है । इसी प्रकार यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं । तू
इनका भेद सुन ।
रविवार, 10 सितंबर 2017
प्रदर्शंनप्रिय
राजसिक व तामसिक वृत्ति के लोगों की
पूजा पद्धति के विषयमें आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये
कि वे लोग प्रदर्शनप्रिय और अहंकारपूर्ण और काम वासना और राग की शक्ति से प्रेरित
होकर तपों को करते हैं, जो कि शास्त्रों के द्वारा विहित
नहीं है ।
शनिवार, 9 सितंबर 2017
यक्षो और राक्षसों की
गुरू उयोगेस्ग्वर श्रीकृष्ण ने
अर्जुन से बताया कि सात्विक मनुष्य देवताओं की पूजा करते हैं, राजसिक मनुष्य यक्षो और राक्षसों की पूजा
करते है और तामसिक मनुष्य आत्माओं (प्रेतो) और भूतों की पूजा करते हैं ।
शुक्रवार, 8 सितंबर 2017
श्रद्धा का स्वरूप
किसी उच्च आदर्श के प्रति आदरयुक्त
विश्वास आदरयुक्त समर्पण श्रद्धा है । यह प्रत्येक व्यक्ति में होती है । उच्च
आदर्श की क्षवि प्रत्येक व्यक्ति में अलग होती है । यह उसके स्वभाव पर निर्भर करता
है । सात्विक स्वभाव के व्यक्ति का आदर्श होगा “चैतन्य स्वरूप आत्मा”, राजसिक स्वभाव के व्यक्ति का आदर्श होगा
“वैयक्ति ईश्वर” और तामसिक प्रकृति के लोगो का आदर्श होगा “भोग संसार” ।
गुरुवार, 7 सितंबर 2017
श्रद्धा और स्वभाव
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताते हैं कि हे भारत (अर्जुन), प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा उसके
स्वभाव के अनुसार होती है । मनुष्य श्रद्धामय होता है, जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, वह ठीक वही होता है ।
बुधवार, 6 सितंबर 2017
स्वभाव के अनुसार
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन के
प्रश्न का उत्तर देते हुये बोले प्राणियों की श्रद्धा उनके स्वभावके अनुसार
सात्विक, राजसिक और तामसिक होती है । अब
इसके विषय में सुनो ।
मंगलवार, 5 सितंबर 2017
श्रद्धा से युक्त
अर्जुन गुरू के समक्ष जिज्ञासा
व्यक्त करते हुये कहा कि हे कृष्ण,
जो लोग शास्त्रों के विधानो की परवाह न करते हुये श्रद्धा से युक्त होकर यज्ञ करते
हैं, उनकी क्या स्थिति होती है ? उनकी श्रद्धा सात्विक होती है या राजसिक या
तामसिक ?
सोमवार, 4 सितंबर 2017
शास्त्र ही प्रमाण
असुरीय स्वभाव वाले लोगोके विषय में
बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि इसलिये क्या करना चाहिये
और क्या नहीं करना चाहिये, इसके निर्धारण के लिये तू शास्त्र
को ही प्रमाण मान । शास्त्र में बताये गये नियमों को जानकर तुझे इस संसार में अपना
काम करते जाना चाहिये ।
इस प्रकार दैवीय और असुरीय सम्पदाओं
का योग नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।
रविवार, 3 सितंबर 2017
शास्त्र के नियम
असुरीय स्वभाव वाले लोगोके विषय में
बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि परंतु जो व्यक्ति शास्त्र
के नियमों को छोड देता है और अपनी इच्छाओं के अनुसार कार्य करता है, उसे न तो पूर्णता प्राप्त होती है, न सुख प्राप्त होता है और न सर्वोच्च
लक्ष्य ही प्राप्त होता है ।
शनिवार, 2 सितंबर 2017
सर्वोच्च स्थिति
असुरीय स्वभाव वाले लोगोके विषय में
बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि हे कुंती के पुत्र
(अर्जुन), जो अंधकार की ओर ले जाने वाले इन
तीनो द्वारो से छूट जाता है, वह उन कर्मों को करता है, जो उसको आत्मा के लिये कल्याणकारी है और तब
वह सर्वोच्च स्थिति (परम गति) पर्यंत पहुँच जाता है ।
शुक्रवार, 1 सितंबर 2017
काम क्रोध लोभ
असुरीय स्वभाव वाले लोगो के विषय
में बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि आत्मा को विनाश की ओर
ले जाने वाले इस नरक का द्वार तिहरा है,
जो काम, क्रोध और लोभ से बना है । इसलिये
मनुष्य को इन तीनो को त्याग देना चाहिये ।
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