मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

अपेक्षित स्वरूप

इस रूप संसार के रचयिता, संचालक, रक्षक व स्वामी ब्रम्ह ने प्रत्येक रूप को किसी प्रयोजन के उद्देष्य से सृजित किया है । इसलिये प्रत्येक रूप का यह दायित्व है कि मालिक के हाथों के यंत्र के रूप में वह अपने को मालिक की सेवा में प्रस्तुत करे ता कि वह मालिक उस रूप से अपना वह कार्य सम्पादित करा सके जिसके निमित्त मालिक ने उस रूप को सृजित किया है । दूसरे शब्दों मे “अहंकारशून्य” दशा में व्यक्ति अपने को मालिक के सामने उसकी सेवा के लिये तत्पर हो । गुरू के उपदेश के अनुसार यही अपेक्षित स्वरूप है ।      

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

अपेक्षित स्वरूप

इस रूप संसार के रचयिता, संचालक, रक्षक व स्वामी ब्रम्ह ने प्रत्येक रूप को किसी प्रयोजन के उद्देष्य से सृजित किया है । इसलिये प्रत्येक रूप का यह दायित्व है कि मालिक के हाथों के यंत्र के रूप में वह अपने को मालिक की सेवा में प्रस्तुत करे ता कि वह मालिक उस रूप से अपना वह कार्य सम्पादित करा सके जिसके निमित्त मालिक ने उस रूप को सृजित किया है । दूसरे शब्दों मे “अहंकारशून्य” दशा में व्यक्ति अपने को मालिक के सामने उसकी सेवा के लिये तत्पर हो । गुरू के उपदेश के अनुसार यही अपेक्षित स्वरूप है ।      

रविवार, 26 फ़रवरी 2017

सापेक्ष अनुभूति

इस लेख श्रंखला के विगत तीन अंक जिनके शीर्षक “निमित्तमात्र”, “कर्म विवेक” और “निमित्तमात्रम्” हैं के अंतर्गत लिखे गये विवरण का अभिप्राय यह नहीं है कि यह संसार रूपी ब्रम्ह की रचना मात्र एक पूर्व निर्धारित किसी प्रारूप का प्रगटन है । समय जो कि संसार और इस संसार की प्रत्येक गति का नियंत्रक होता है, उसकी स्वयं की उत्पत्ति ब्रम्ह से है । इस प्रकार इस संसार का प्राणी जब समय का अवलोकन करता है तो उसे दीखता है “विगत”, “वर्तमान”, और “भविष्य” जबकि ब्रम्ह जब समय को देखता है तो उसे जो दीखता है केवल एक “वर्तमान”। ब्रम्ह के “वर्तमान” में सभी कर्म किसी प्रयोजन से हैं जिसे वह प्रकृति के माध्यम से व्यक्त करता है । ऐसी स्थिति में जब व्यक्ति प्रकृति द्वारा प्रस्तुत किये गये कर्म को न स्वीकार कर उलटे अपनी इच्छा और मनोवेगों द्वारा कर्म करना चाहता है, तो वह निषिद्ध है, अधर्म है, और अर्जुन हठात् यही करने को उद्यत था ।

शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

निमित्तमात्रम्

कर्म – कर्मफल – कर्तव्य की स्थिति को व्यक्त करने के लिये श्रीमद्भागवद्गीता के ग्रंथकार ने “निमित्तमात्रम्” शब्द का प्रयोग किया है जिसका शाब्दिक अर्थ बनेगा “अवसर मात्र” । तर्क प्रश्न उपस्थित करता है कि यदि संसार मात्र पूर्वनिर्धारित का ही निरूपण करता है तो मनुष्य का कर्तव्य क्या है ? धर्म ग्रंथ कहते हैं कि ईश्वर अपने बनाये जीवों के प्रति कृपालु है और उन्हे प्यार करता है । तो क्या ईश्वर अपनी मनमानी इच्छाओं से संसार का संचालन करता है ? कंचिद नहीं । यह कर्म और कर्मफल होते हैं जो संसार में घटित हो रही प्रत्येक घटना का निर्धारण करते हैं । प्रश्नगत होता है कि जीव उपस्थित कर्म को किन भावों से ग्रहण करता है । ग्रंथकार इंगित करना चाहता है “अहंकार शून्य” दशा । व्यक्ति द्वारा उपस्थित कर्म को यथा स्वरूप ग्रहण करना अपेक्षित भाव होता है ।     

निमित्तमात्रम्

कर्म – कर्मफल – कर्तव्य की स्थिति को व्यक्त करने के लिये श्रीमद्भागवद्गीता के ग्रंथकार ने “निमित्तमात्रम्” शब्द का प्रयोग किया है जिसका शाब्दिक अर्थ बनेगा “अवसर मात्र” । तर्क प्रश्न उपस्थित करता है कि यदि संसार मात्र पूर्वनिर्धारित का ही निरूपण करता है तो मनुष्य का कर्तव्य क्या है ? धर्म ग्रंथ कहते हैं कि ईश्वर अपने बनाये जीवों के प्रति कृपालु है और उन्हे प्यार करता है । तो क्या ईश्वर अपनी मनमानी इच्छाओं से संसार का संचालन करता है ? कंचिद नहीं । यह कर्म और कर्मफल होते हैं जो संसार में घटित हो रही प्रत्येक घटना का निर्धारण करते हैं । प्रश्नगत होता है कि जीव उपस्थित कर्म को किन भावों से ग्रहण करता है । ग्रंथकार इंगित करना चाहता है “अहंकार शून्य” दशा । व्यक्ति द्वारा उपस्थित कर्म को यथा स्वरूप ग्रहण करना अपेक्षित भाव होता है ।     

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

कर्म का विवेक

कर्म और कर्मफल यह ब्रम्ह के मस्तिष्क से उत्पन्न नियम है । इसका संचालन सीधा ब्रम्ह ही करता है । इसके संचालन अवधि में, पूर्व में किये गये कर्म के कर्मफल के फलभोग हेतु वर्तमान में उपस्थित कर्म होते हैं । कर्ता व्यक्ति यदि ब्रम्ह के संविधान के प्रति निष्ठावान है तो वह उपस्थित कर्म को अपना कर्तव्य दायित्व मान कर यथा स्वरूप उसे करता है । इसके विपरीत अज्ञान से आच्छादित व्यक्ति उसे करें अथवा ना करें को अपने मस्तिष्क द्वारा निर्धारित करने की चेष्टा करता है । ऐसा करने से उसके अज्ञान की और वृद्धि होती है । 

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

निमित्त मात्र

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण काल के नियंत्रक स्वरूप को बताने के उपरांत शिष्य अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन उठो और सामने खडे शत्रुओं को मार कर विजय का गौरव प्राप्त करो साथही उन्नत राज्य का स्वामित्व भोग करो क्योंकि सामने खडे शत्रुओं को मैं पहले ही मार चुका हूँ तुम्हे तो मात्र एक निमित्त बनना है । 

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

काल की व्याख्या

इस रूप संसार के समस्त नियंत्रण काल के अधीन हैं । कर्म एवं कर्मफल का नियम ब्रम्ह का अ-परिवर्तनीय अंकुश है । आज़ जो कुछ भी घटित हो रहा है वह विगत समय के कर्म के फल के रूप में है । इसलिये आज़ के हो रहे घटित को आज़ का कर्म प्रभावित नहीं कर सकता है । कुछ लोग इस आज़ के घटित हो रहे को “ईश्वर के संकल्प” की संज्ञा देते हैं तो दूसरे कुछ लोग इसे प्रकृति का पूर्व निर्धारित क्रम बताते हैं परंतु गुरू के उपदेश जैसा कि श्रीमद्भागवद्गीता में वर्णित है के अनुसार काल” सृजन और विनाश दोनो का नियंत्रक है और समस्त आज़ के घटित पूर्व समय में किये गये कर्म के फल हैं । 

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

काल नियंत्रक

अर्जुन द्वारा व्यक्त ब्रम्ह के दिव्य रूप का वृतांत सुनकर गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस विकसित दमनीय रूप संसार का विनाश विलय करने वाला नियंत्रक काल मैं हूँ । यहाँ तक कि यदि कोई अलग के कर्म न किया जाय तो भी सामने युद्ध की कामना से युक्त खडे समस्र्त योद्धा अपने विनाश को प्राप्त होंगे । 

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

अभिव्यक्ति का चर्मोत्कर्ष

दिव्य स्वरूप के वृतांत को व्यक्त करते करते अर्जुन जैसे थक सा गया और परम्ब्रम्हस्वरूप योगेश्वर श्रीकृष्ण से याचना भाव से कहने लगा कि हे करुणाधाम महाप्रभु दया करिये मैं पूर्णतया हत्प्रद दशा में हो गया हूँ और कृपा पूर्वक मुझे अपने इस दिव्य रूप के मूल तत्व का ज्ञान बोध कराने की महती कृपा करें । 

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

अर्जुन की अभिव्यक्ति : चरण 16

दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि हे विष्णुरूप स्वामी समस्त संसार के जीव आपके मुख में धधकती अग्नि मे प्रवेष करते भस्म होते समाप्त हो रहे हैं और मुख की अग्नि से विकरित होते ताप से बाहर के भी सभी जीव झुलस रहे हैं । 

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

अज्ञान का स्वरूप

मनुष्य की तर्क पर आधारित सोच में, उसका अपना एक अलग अस्तित्व एवं उसके मन द्वारा सृजित उसकी अपनी इच्छाये, फिर उन्ही इच्छाओं की पूर्ति में किये गये कर्म. यह सभी मिलकर कर्मफल भोग की बाध्य परिस्थिति मनुष्य के जीवन का स्वरूप बना हुआ है । इन्ही समस्त बातों को यदि एक शब्द द्वारा व्यक्त करना हो तो कहा जायेगा “अज्ञान” । अज्ञान दो भ्रामक बातो  का योग है (1) स्वयं का अलग अस्तित्व बोध जिसे अहंकार कहा जाता है (2) स्वयं की इच्छायें ।

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

कर्म एवं कर्मफल

मनुष्य जिन कर्मों को अपनी इच्छा की पूर्ति के लिये करता है, उनके फलों को भोगना उसकी बाध्यता होती है । यह नियम स्वयं ब्रम्ह के मस्तिष्क से उत्पन्न हुआ है और इसका संचालन ब्रम्ह स्वयं ही करता है । इसलिये इसमें किसी प्रकार अथवा किसी भी परिस्थिति में अन्यथा की कोई सम्भावना नहीं हो सकती है । इसके विपरीत जो कर्म प्रकृति द्वारा प्रेरित होते हैं और उन कर्मों का सम्पादन मनुष्य ब्रम्ह की सेवा के भाव से एवं उसके प्रतिनिधि के रूप में सम्पादित करता है ऐसे कर्मों के कर्मफल से मनुष्य का कोई सम्बंध नहीं होता है । वह स्वतंत्र रहता हैं । 

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

अज्ञान का फल

अर्जुन की अभिव्यक्ति जैसा कि पूर्व में वर्णित चरण 12 से 15 पर्यंत जिस दशा का वृतांत व्यक्त करती है वह मनुष्य अपने अज्ञान के वशीभूत भोगता है । जीव अज्ञान के वशीभूत जिन कर्मों को करता है उन्ही कर्मों के स्वाभाविक फल के रूप में उसको अपने विनाश का सामना करना पडता है । मनुष्य के स्वयं की इच्छा की पूर्ति में किया गया कर्म निश्चय ही बंधनकारी कर्मों की परिधि में है फलत: उसका फलभोग उसकी बाध्यता है । 

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

अर्जुन की अभिव्यक्ति : चरण 15

दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि जिस प्रकार एक पतंगा अपने को नष्ट करने के लिये अग्नि में तीव्र गति से प्रवेश करता है उसी प्रकार ये जीव तीव्र गति से समाप्त हो जाने के लिये आपके मुख में प्रवेष कर रहे हैं ।  

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

अर्जुन की अभिव्यक्ति : चरण 14

दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि जिस प्रकार नदियों की प्रचण्ड धारायें समुद्र की ओर अपने स्वाभाविक क्रम में चली जाती हैं उसी प्रकार इस संसार के समस्त वीर नायक आपके मुख के प्रचण्ड धधकती ज्वाला में प्रवेश करते जा रहें हैं । 

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

अर्जुन की अभिव्यक्ति : चरण 13

 दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि पूरा समूह आपके भयावह स्वरूप वाले मुख के अंदर तीव्र गति से प्रवेष कर रहा हैं और उनमें से कुछ जो दाँतों के बीच पहुँच गये हैं उनके सिर पिसकर पाउडर के समान चूर हो गये हैं ।

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

अर्जुन की अभिव्यक्ति : चरण 12

दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि धृतराष्ट्र के समस्त पुत्र तथा उनके सहयोग में लडने के लिये आये हुये समस्त राजा तथा भीष्म, द्रोण, और कर्ण के साथ साथ मेरे पक्ष के समस्त प्रधान योद्धा – क्रमश: चरण 13 

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

अर्जुन की अभिव्यक्ति : चरण 11

दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि हे कृपामूर्ति हे देवों के देव हे इस रूप संसार के आधार मैं आपके मुख के हाथीदाँत सदृष्य दाँतो और उसके अंदर धधकती समय की अग्नि ज्वाला को देखकर अति अचम्भित, भयभीत हूँ तथा अपने नियंत्रण को खो चुका हूँ| 

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

अर्जुन की अभिव्यक्ति : चरण 10

दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि हे विष्णु आपके इस भयावह स्वरूप जिसमें आपका विस्तार आकाश को छू रहा है, अनेको रंग चमक रहे हैं, मुख फैला हुआ खुला है, चमकती हुई बडी बडी आँखे हैं को देखकर मेरा अंत:करण तक भय से काँप रहा है और मैं किसी भी प्रकार अपने को स्थिर नहीं कर पा रहा हूँ ।  

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

अर्जुन की अभिव्यक्ति : चरण 9

दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि हे देवो के देव आपके इस विशाल दिव्य रूप के दर्शन, जो कि असंख्य मुखो एवँ आँखो से युक्त है असंख्य हाथ जो कि शक्तिशाली अस्त्रों से युक्त हैं असंख्य जँघे और पैरो से युक्त है जिसमें असंख्य पेट हैं, से मैं और यह पूरा संसार भय से थरथरा रहा है । 

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

अर्जुन की अभिव्यक्ति :चरण 8

दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि समस्त रूद्रगण, आदित्य, वसुओं, दोनो अश्विन, मरुत, और गंधर्व यक्ष और असुर, सभी आपके दिव्य रूप में समाहित तथा अचम्भित दशा में विद्यमान हैं ।

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

अर्जुन की अभिव्यक्ति : चरण 7

दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि हे गुणवान प्रभु समस्त देवगण आपके स्वरूप में समाहित दशा में प्रविष्ट है, हे प्रभु सिद्ध महात्मा महर्षियों का समूह अपने दोनो हाँथो को जोडे हुये आपकी वंदना करते हुये भरपूर प्रशंसा भजन गायन कर रहे हैं । 

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

अर्जुन की अभिव्यक्ति : चरण 6

दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य का सम्पूर्ण स्थान तथा आकाश के सम्पूर्ण विस्तार में आप पूर्णतया व्याप्त हैं, हे सर्वव्यापी सनातन सत्य आपके इस आश्चर्यजनक एवं भयावह स्वरूप को देखकर तीनो लोक थरथराया है ।

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

अर्जुन की अभिव्यक्ति : चरण 5

दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि मैं आपको एक प्रारम्भ-रहित, मध्य-रहित और अन्त-विहीन स्वरूप में देख रहा हूँ जो कि अनंत शक्ति-युक्त, अनन्त बाहुधारी हैं जिसकी आखों को क्षवि को चंद्रमा और सूर्य व्यक्त करते हैं और आपके मुखमण्डल अग्नि की लौ समान धधकता हुआ है जिससे विकीर्ण होने वाली उर्जा पूरे सृष्टि को भस्म कर देने वाली है । 

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

अर्जुन की अभिव्यक्ति : चरण 4 की व्याख्या

श्रीमद्भागवद्गीता के ग्रंथकार ने उपरोक्त अभिव्यक्ति में (1‌)अक्षरम्” शब्द का प्रयोग किया है जोकि व्यक्त करता है “अविनाशी” । अर्जुन व्यक्त करता है कि सर्वोच्च - “ब्रम्ह” भी है और वैयक्तिक ईश्वर भी है । वहही एकल अविभाज्य सत्य भी है और नियंत्रक देवता भी है । (2) “शाश्वत्धर्मगोपत” जो कि अभिव्यक्ति है – शाश्वत्धर्म के अविनाशी रक्षक । परम् सत्य जो को एक अलौकिक असम्बद्ध अस्तित्व है । रूप संसार उसी की अभिव्यक्ति है फिरभी वह इससे अछूता है ।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

अर्जुन की अभिव्यक्ति : चरण 4

दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि हे प्रभु आप अक्षर हैं आप ही सर्वोच्च ज्ञेय हो आप ही समस्त रूप संसार के आधार एवं संरक्षक हो हे प्रभु आप ही परम् सत्य हो और सम्पूर्ण रूप संसार के रक्षक हो हे प्रभु आप ही प्रथम पुरुष हो ऐसा मैं देख रहा हूँ और अनुभव कर रहा हूँ । 

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

अर्जुन की अभिव्यक्ति : चरण 3

दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि मैं आपके मुकुट, गदा और चक्र को, जो एक गहान प्रकाश पुंज के रूप में चमकते हुये, प्रत्येक ओर विस्तृत हैं, जिनमें से आग की लपटे विकीर्ण हो रहीं हैं, और जो कि चमकते हुये सूर्य के समान प्रकाशित हैं और जिन्हे पहचानना मुश्किल हो रहा है को देख रहा हूँ ।  

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

अर्जुन की अभियक्ति : चरण 2

दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि मैं अनंत के स्वरूप को विस्तार सहित देख रहा हूँ जिसमें अनंत बाहुये विस्तरित हैं अत्यंत सुंदर मुखाकृत एवँ आखें हैं परंतु हे नाथ हे ब्रम्ह स्वरूप मैं आपके इस दिव्य रूप का ना ही प्रारम्भ कहीं देख रहा हूँ, ना ही मध्य देख रहा हूँ और ना ही कहीं अंत ही देख पा रहा हूँ ।