सोमवार, 30 नवंबर 2015

सत्य की प्रकृति

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मेरी प्रकृति का पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मस्तिष्क, विवेक और अहंकार यह आठ प्रकार का विभाजन होता है ।

रविवार, 29 नवंबर 2015

यथास्थिति की व्याख्या

इस रूप संसार में सामान्य स्थिति में प्रत्येक मनुष्य प्रकृतीय मोंह में जीवन यापन कर रहा है । गुरू कहते हैं कि हज़ारों में कोई एक व्यक्ति होता है जो सत्य को जानने के लिये उद्यत होता है । इन उद्यमियों में से भी ज्यादातर लोग योग की स्थिति प्राप्त नहीं कर पाते हैं । जो लोग योग की स्थिति प्राप्त भी कर लेते हैं वह भी मेरे सत्य स्वरूप को नहीं जान पाते हैं । 

शनिवार, 28 नवंबर 2015

यथास्थिति

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि हज़ारो में से कोई एक व्यक्ति सत्य को जानने के लिये अपनी पूर्णता के लिये प्रयत्नशील होता है | इन प्रयत्नशील जिज्ञासुओं में से जो कोई अपने को पूर्ण योगी बनाने में सफल भी हो जाता है, वह भी मेरे सत्य रूप को नहीं जान पाता है । 

शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

सत्य के ज्ञान की व्याख्या

गुरू जिज्ञासु अर्जुन को आत्मा का सत्य स्वरूप तथा इस सत्य स्वरूप का संसार की रचना के साथ कारणयुक्त सम्बंध बताने का लक्ष्य करते हैं । किसी भी ज्ञान के जिज्ञासु के हृदय में मस्तिष्क में मात्र सत्य के निर्विकार, निरंकार, निरंजन स्वरूप से पूर्ण संतोष नहीं मिलता है इसीलिये गुरू उस सत्य का संसार के रूपों के साथ कारण्युक्त सम्बंध भी बताने को कहे । 

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

सत्य का ज्ञान

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि मैं तुम्हे सत्य का ज्ञान व उस सत्य का विस्तार पूर्ण रूप से बताउँगा जिसे जानने के बाद तुम्हे इस संसार का कोई अन्य ज्ञान जानना शेस नहीं रह जावेगा । 

बुधवार, 25 नवंबर 2015

व्यापक स्वरूप की व्याख्या

गुरू ज्ञान के जिज्ञासु अर्जुन को आत्मज्ञान तथा आत्मस्वरूप का ब्रम्ह के साथ युत होने का उपदेश करने के उपरांत उसे और आगे ब्रम्ह का विस्तार संसार के समस्त रूपों में बताने और अनुभव कराने के उद्देष्य से आगे उपदेश करते हैं । 

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

व्यापक रूप

ध्यान योग का समस्त विस्तार बताने के बाद गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे हे अर्जुन अब तुम सुनो कि जो व्यक्ति योग की अवस्था में अपने को स्थापित कर अपने मस्तिष्क को पूर्ण रूप से मेरे ध्यान में संलग्न कर मुझे जानना ही अपना सम्पूर्ण लक्ष्य निर्धारित कर प्रयत्न करता है वह निष्चय ही मुझे जानने में सफल होता है । 

सोमवार, 23 नवंबर 2015

व्यवहारिक स्वरूप

ब्रम्ह व्यापक दिव्य स्वत:अस्तित्व है । उसने अपने को अपनी माया शक्ति द्वारा संसार के समस्त रूपों में विस्तृत किया है । प्रत्येक रूप में विद्यमान उसकी ही उच्चतर प्रकृति आत्मा का यह दायित्व है कि वह अपने उद्गम के मूल ब्रम्ह को जाने, उसकी मर्यादा के अनुकूल आचरण करे, अपने को उस ब्रम्ह के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करे । योग यही लक्ष्य प्राप्त करने का पथ है । इसी योग को व्यवारिक जीवन में चरितार्थ करने के लिये समस्त विस्तार भगवद्गीता के ग्रंथकार ने इस ध्यानयोग नामक छठे अध्याय में गुरू योगेशवर श्रीकृष्ण के उपदेश के माध्यम से  प्रस्तुत किया है । यह अध्याय पूर्ण हुआ । 

रविवार, 22 नवंबर 2015

योगाभ्यास का साराँश

गुरू द्वारा योग के सम्बंध में उसके समस्त पहलुओं के उपदेश का सार यह है कि प्रत्येक रूप में विद्यमान आत्मा और उस रूप की प्रकृति के मध्य नियंत्रित परस्पर को स्थापित करना तथा यह सुनिश्चित करना कि इस परस्पर में आत्मा अपने मौलिक स्वरूप में सतत् आचरण करे । यही जो कर सके वह योगी है । ब्रम्ह की ही उच्चतर प्रकृति आत्मा है । ब्रम्ह की ही निम्नतर प्रकृति रूप की प्रकृति है । माया भी ब्रम्ह के ही विज्ञान की शक्ति है । यह समस्त व्यूह ब्रम्ह की लीला है । उनकी कृपा द्वारा ही कुछ भी सम्भव हो सकेगा । 

शनिवार, 21 नवंबर 2015

भक्तयोगी की व्याख्या

वह योगी जो भक्तिपूर्वक ब्रम्ह को समर्पित रहता है उसे गुरू द्वारा सबसे प्रिय बताने का अभिप्राय यह बनता है कि योग की सकल साधना ब्रम्ह की कृपा के अधीन ही होती है । माया इतनी प्रबल शक्तिशाली होती है कि इसे कोई काट नहीं पाता है । इसलिये मुक्त आत्मा की स्थिति शीघ्र बनती नहीं है । इस सब उपलब्धि के लिये ब्रम्ह की कृपा का अवलम्ब अनिवार्य होता है ।    

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

भक्तयोगी

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि समस्त योगियों में वह योगी जो श्रद्धापूर्वक मेरी पूजा करता है मेरी भक्ति करता है और उसकी आत्मा सदैव मुझमें ही बसती है मैं उसे सबसे अधिक प्रिय मानता हूँ । 

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

सर्वश्रेष्ठ की व्याख्या

ब्रम्ह को पाने के लिये जितने भी मार्ग बताये गये हैं गुरू उन सभी की तुलना करते हैं । योगी जो अपने को ब्रम्ह के साथ युत करता है जोडता है । ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति आत्मा हम सभी के अंदर विद्यमान है । आत्मा को ब्रम्ह के साथ जोडना – आत्मा में ब्रम्ह की अनुभूति करना – आत्मा का अनुभव पाना यह योग का क्षेत्र है । तपस्वी भी उसी ब्रम्ह का अनुभव पाने के लिये अपने को समस्त सुख से वंचित कर तपस्या द्वारा साधना करता है । ध्यान के पथ से साधना कर ज्ञानमार्गी भी उसी ब्रम्ह का अनुभव पाना चाहता है । वेदों में वर्णित यज्ञ क्रियाँओं द्वारा कर्मकाण्डी भी उसी ब्रम्ह का ज्ञान पाने को चेष्टारत होता है । परंतु गुरू इन सभी में योगी को सर्व श्रेष्ठ बताते हैं । 

बुधवार, 18 नवंबर 2015

योगी सर्वश्रेष्ठ

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि योगी उनसे श्रेष्ठ होता है जो अपने को आराम और व्यसन से वंचित कर तपस्वी है, योगी उनसे भी श्रेष्ठ होता है जो सत्य के ज्ञाता हैं, योगी उनसे भी श्रेष्ठ होता है जो कर्मकाण्डी हैं इसलिये हे अर्जुन तुम प्रयत्नपूर्वक योगी बनो । 

मंगलवार, 17 नवंबर 2015

दृढ उद्यम की व्याख्या

गुरू द्वारा बताये गये उपदेश से प्रत्येक जिज्ञासु साधक के लिये एक अवलम्ब मिलता है कि यदि कंचिद कमजोरियों के कारण पूर्ण सफलता इस जन्म में ना भी मिली तो प्रयत्न नष्ट नहीं जायेगे बल्कि आगे के जन्मों में इस जन्म के प्रयत्न सहायक होंगे और साधना सिद्धि की ओर आगे बढेगी । भगवद्गीता का संदेश यह आस्था जागृत करने वाला है कि प्रत्येक व्यक्ति को ब्रम्ह स्वरूप तक उत्थान कराना प्रकृति का लक्ष्य है । 

सोमवार, 16 नवंबर 2015

दृढ उद्यम

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति अपने समस्त मानसिक विकारों को नियंत्रित करके योग की साधना में प्रयत्न करता है और पूर्ण सफलता पाने के लिये सतत् कई जन्मों तक प्रयत्नों को ज़ारी रखता है उसे योगावस्था की उच्चतम उपलब्धि प्राप्त होती है । 

रविवार, 15 नवंबर 2015

तुलनात्मक स्थिति की व्याख्या

गुरू द्वारा व्यक्त वेदों द्वारा ब्रम्ह का ज्ञान तथा योग द्वारा ब्रम्ह का अनुभव की तुलनात्मक अभिव्यक्ति का अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार किसी व्यक्ति को यदि कोई नदी पार करना है तो उसे नौका चाहिये परंतु जिस व्यक्ति ने नदी पार कर लिया है तो उसे नौका से क्या प्रयोजन रहेगा उसी प्रकार वेद का ज्ञान ब्रम्ह तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्थ करता है जबकि योग व्यक्ति को ब्रम्ह का साक्षात् अनुभव करा देता है इसलिये योगी को वेद के ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है । 

शनिवार, 14 नवंबर 2015

योग का सामर्थ्य

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि व्यक्ति के पूर्व के जन्म के योग के अभ्यास के बल से नये जन्म में प्रयत्न प्रारम्भ करने पर प्रयत्नकाल में ही उसे ब्रम्ह का अनुभव वेद द्वारा व्यक्त ब्रम्ह के ज्ञान से अधिक ही हो जाता है जो कि अभ्यास की पूर्णता पर इतना शक्तिशाली हो जाता है कि उस व्यक्ति को पुन: मोंह व्याप्त होता ही नहीं है । 

शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

सतत् प्रयत्न की व्याख्या

गुरू ने बताया कि सिद्ध योगी की स्थिति पानेके लिये सतत् प्रयत्न करना होगा । किसी एक जन्म में व्यक्ति ब्रम्ह के साथ जो रिश्ता स्थापित करता है और इस रिश्ते से जो बल अर्जित करता है वह मृत्यु होने पर समाप्त नहीं होता है । व्यक्ति के अगले जन्म के प्रयत्नों का प्रारम्भ वहीं से होता है जहाँ तक पहुँच कर पूर्व जन्म के प्रयत्न मृत्यु के कारण स्थगित हो गये थे । इन प्रयत्नो के लिये मृत्यु कोई सीमा रेखा नहीं होती है । 

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

पुन: अवसर का फल

योगी के कुल में जन्म का फल बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि सिद्ध योगी के कुल के वातावरण के प्रभाव से उस व्यक्ति द्वारा पूर्व के जन्म में किये गये योगाभ्यास के प्रयत्नों की स्मृति पुन: जागृत हो जावेगी और वह व्यक्ति पूर्व के जन्म में जहाँ तक योगाभ्यास में सफलता हासिल कर चुका था वहाँ से आरम्भ करके सिद्ध की स्थिति की ओर अग्रसर होगा । 

बुधवार, 11 नवंबर 2015

पुन: अवसर का विस्तार

अर्जुन के भय के निवारण के लिये गुरू योगेश्वर श्री कृष्ण आगे बताते हुये कहे कि उसे ऐसे योगी के कुल में जन्म दिया जायेगा जिन्हे सत्य का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो गया है । हे अर्जुन ऐसे योगी के घर में जन्म पाना इस संसार में किसी अन्य प्रयत्न से सम्भव नहीं होगा । 

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

पुन: अवसर

अर्जुन के भय निवारण के लिये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण आगे बताये कि यदि कोई व्यक्ति योग की स्थिति में कई वर्षों तक रहने के बाद भी विचलित हो जाता है तो भी उसे पुन: योग अभ्यास के लिये अवसर प्रदान करने के निमित्त से उसे शुद्ध और प्रगतिशील व्यक्ति के कुल में जन्म दिया जाता है । 

सोमवार, 9 नवंबर 2015

भयमुक्त की व्याख्या

गुरू का कथन व्यक्त करता है कि जो कार्य व्यक्ति ब्रम्ह से युक्त होकर करेगा उस कार्य को ब्रम्ह स्वयं देख रहा है कि किस निष्ठा से वह व्यक्ति उस कार्य को कर रहा है इसलिये असफलता की कल्पना कर के भयभीत मत होवो ब्रम्ह सदैव न्यायपूर्ण ही करेगा । आप अपनी निष्ठा के प्रति सज़ग रहो । आप अपनी निष्ठा को सत्य रखो । 

रविवार, 8 नवंबर 2015

भयमुक्त भविष्य

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन के मस्तिष्क में व्याप्त भय को जानने के बाद बोले हे पार्थ जो व्यक्ति योग का पथ अपनाता है उसका ना ही इस जन्म में और ना ही बाद के जन्मों में कोई भी अहित नहीं हो सकता है यहाँ तक कि हे मित्र जो व्यक्ति योग का पथ अपनाता है उसे किसी दु:ख का सामना नहीं करना पडता है । 

शनिवार, 7 नवंबर 2015

भविष्य का भय : चरण 3

अर्जुन अपने मस्तिष्क का भय व्यक्त करते हुये जैसे एकदम त्रस्त दशा का अनुभव कर कहता है हे कृष्ण कृपया मेरे मस्तिष्क में उत्पन्न हुये संदेह का निवारण कीजिये क्योंकि आप के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है जो मेरे भय का निवारण कर सके । 

शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

भविष्य का भय : चरण 2

अर्जुन अपने मस्तिष्क में व्याप्त भय को आगे व्यक्त करते हुये कहता है कि हे महाबाहो क्या ऐसा व्यक्ति जिसे योग की दशा प्राप्त होने में सफलता नहीं मिल पाती है वह दोनो से ही वंचित नहीं रह जाता है और आत्मा प्रधान जीवन पाने की राह में लावारिस भटकता है । क्या उसका विनाश नहीं हो जाता है । 

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

भविष्य का भय : चरण 1

अर्जुन अपने मस्तिष्क में व्याप्त भविष्य के प्रति भय को व्यक्त करते हुये कहता है हे कृष्ण जो व्यक्ति अपने को योग की वाँक्षनाओं के अनुरूप नियंत्रित नहीं कर पाता है यद्यपि कि उसे आस्था है, जिसका मस्तिष्क योग की वाँक्षना के अनुरूप केंद्रित ध्यान की स्थिति नहीं प्राप्त कर पाता है तो ऐसा व्यक्ति किस गति को प्राप्त होता है । 

बुधवार, 4 नवंबर 2015

दुष्कर परंतु साध्य

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको बताये कि जिन व्यक्तियों को अपनी आत्मा पर नियंत्रण नहीं है उन्हे योग की अवस्था पाना दुष्कर अवश्य होता है परंतु जिन्हे अपनी आत्मा पर नियंत्रण है वह यदि उचित पथ से प्रयत्न करते हैं तो उन्हे योगावस्था प्राप्त होती है । 

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

तपस्या

मनुष्य के अंदर विद्यमान सत्य अस्तित्व आत्मा जब विजातीय असत् प्रकृति के साथ मोंह सम्बंध कर लेती है तो फलत: अस्थिरता, उद्विग्नता, अनिश्चय की मानसिक स्थितियाँ जन्म लेती हैं । गुरू द्वारा सुझाये गये निदान, मोंह का त्याग करने में क्लेष उठाना पडता है । इसी को तपस्या कहा जाता है । परंतु सत्य को पाने के लिये तपस्या अनिवार्य होती है । 

सोमवार, 2 नवंबर 2015

निदान की व्याख्या

प्रकृतीय मोंह का जीवन यापन करते हुये मस्तिष्क का आम अभ्यास बन जाता है कि वह अपनी इच्छा की पूर्ति को लक्षित कर उपलब्ध सम्भावनाओं में से हल खोजता है । इस प्रक्रिया द्वारा मस्तिष्क अपनी अशांति और उद्विग्नता स्वयं आमंत्रित करता है । गुरू इसका सरल निदान बताये कि मोंह को त्याग दो समस्त मानसिक चंचलता शांत हो जावेगी । 

रविवार, 1 नवंबर 2015

मुक्ति द्वारा नियंत्रण

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन की समस्या सुन कर कहे कि हे महाबाहो मस्तिष्क की चंचल स्थिति. उद्विग्नता, जिसका जन्म मोंह से हुआ है, का नियंत्रण मोंह को काटने से ही सम्भव होगा ।