गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि व्यक्ति जब रज़ोगुण प्रधान हो,
उस समय यदि विलय को प्राप्त होता है तो उसकी आत्मा कर्मों में आसक्त लोगो के मध्य
जन्म लेती है, और यदि उसका विलय तब हो, जबकि तमोंगुण प्रधान हों, तब वह मूढ योनियों में जन्म लेती है ।
शुक्रवार, 30 जून 2017
गुरुवार, 29 जून 2017
विशुद्ध
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जब देहधारी आत्मा उस दशा में विलय को प्राप्त होती है, जबकि सत्वगुण प्रधान हों, तब वह सर्वोच्च (भगवान) को जानने वालों के
विशुद्ध लोक में पहुँचती है ।
बुधवार, 28 जून 2017
तमस् प्रधान
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
बोले कि हे कुरूनंदन (अएजुन) जब तमोगुण बढ जाता है, तब प्रकाश का अभाव,
निष्क्रियता, लापरवाही और केवल मूढता....ये सब
उत्पन्न होते हैं ।
मंगलवार, 27 जून 2017
रज़स् प्रधान
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
बोले कि हे भरतो में श्रेष्ठ जब रज़ोगुण की वृद्धि हो जाती है, तब लोभ, गतिविधि, कार्यों का प्रारम्भ, अशांति और वस्तुओं की लालसा....ये सब
उत्पन्न हो जाते हैं ।
सोमवार, 26 जून 2017
सर्वद्वारेषु देहेअस्मिन
ज्ञान की अनुभूति को शरीर की
प्रकृति में पिरोहित हो जाने की दशा होने पर प्रत्येक ज्ञानेंद्रिय से उसकी
अभिव्यक्ति होने लगेगी । ज्ञान के जिज्ञासु के लिये गुरू की यही अनुशंसा है कि
ज्ञान व्यक्ति का जीवनस्व-रूप बन जाना चाहिये । शरीर की
प्रकृति ही आत्मबोध से ओत्प्रोत हो जाय । ऐसी दशा होने पर ज्ञान उसके शरीर के
प्रत्येक आचरण में प्रस्फुटित होने लगेगा ।
रविवार, 25 जून 2017
ज्ञान ज्योति
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि कंचिद चेतना (ज्ञान) का प्रकाश मनुष्य शरीर के प्रत्येक द्वारों से
विकीर्त होने लगे तो जाना जायेगा कि सत्व स्थापित हो गया है ।
शनिवार, 24 जून 2017
वर्चस्व
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
बोले हे भारत सत्व रज़स् और तमस् को दबाकर उनपर विजयी होता है । रज़स् सत्व और तमस्
को दबाकर उनपर विजयी होता है इसी प्रकार तमस् सत्व और रज़स् को दबाकर उनपर विजयी
होता है ।
शुक्रवार, 23 जून 2017
आनंद कर्म प्रमाद
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
बोले हे भारत (अर्जुन) व्यक्ति को सत्व आनंद से, रज़स् कर्म से और तमस् ज्ञान को ढककर प्रमाद से बाँधता है
।
गुरुवार, 22 जून 2017
तमस् के फल
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि तमस् की उत्पत्ति अज्ञान से होती है और यह सभी जीवधारियों को छलती है ।
हे भरत (अर्जुन) यह व्यक्ति को लापरवाही,
आलस्य और निद्रा के आगोश में बाँधती है ।
बुधवार, 21 जून 2017
शक्तिशाली रज़स्
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि रज़स् की वृत्ति व्यक्ति में वासना के प्रति प्रबल इच्छा और मोहाशक्ति के
पथ से आकर्षण सृजित करता है । इसके फलसे,
हे कुंतीपुत्र (अर्जुन), व्यक्ति जागृत हुई इच्छा की पूर्ति
के लिये कर्म करने को उद्यत होता है ।
मंगलवार, 20 जून 2017
अहंकार-शून्यता
सत्वगुण शुद्ध होने के कारण
अपेक्षाकृत उत्तम इच्छाओं को जन्म देता है । बंधन इच्छाजनित कार्यों के करने से
उत्पन्न होता है । इसलिये सत्व किसी भी भाँति मुक्तिदायक नहीं होता है । इसके फल
से उत्तम परिस्थितियों का जीवन मिलेगा परंतु मुक्ति नहीं । मुक्ति के लिये
अहंकारशून्य की दशा ही एक मात्र पथ है ।
सोमवार, 19 जून 2017
सत्व भी बंधन
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले कि हे
दोषरहित अर्जुन सत्वगुण शुद्ध होने के कारण ज्योति और स्वास्थ्य की वृद्धि करता है
परंतु यह भी बंधन ही होता है जिसके फलसे व्यक्ति खुशी और धर्मज्ञान के लिये उद्यत
होता है ।
रविवार, 18 जून 2017
त्रिगुणातीत
आत्मा कंचिद अपने को प्रकृति के
गुणों के साथ सम्बद्ध चिन्हित करती है तो वह शरीर, मस्तिष्क और चेतना को अहंकार से जनित इच्छापूर्ति के लिये
प्रयोग करने लगती है । यह उसका बंधन है । इस बंधन के फल से वह जीवन और मृत्यु के
चक्र में अनवरत भ्रमण करती है । इस बंधन से मुक्ति के लिये उसे अपने को इन गुणों
से ऊपर उठाना होगा अलग करना होगा । ऐसी दशा प्राप्त होने पर सत्व चैतन्य की ज्योति
में पर्णित हो जायेगी, रज़स् वैदिक कर्मकाण्ड में पर्णित
हो जायेगी और तमस् मानसिक शांति में पर्णित हो जायेगी ।
शनिवार, 17 जून 2017
त्रिदेव
ब्रम्हाणीय त्रिदेव प्रकृति की
तीनों प्रवृत्तियों के वर्चस्व के प्रतीक हैं । सत्व के विष्णु जिनका रक्षक-पालक स्वभाव है, रज़स् के ब्रम्हा जिनका सृजन-उत्पत्ति स्वभाव है और तमस् के शंकर जिनका संहार स्वभाव है । विश्वरूप
में स्थिरता सत्व से मिलती है, सृजनात्मक क्रियावृत्ति रज़स् से
मिलती है और पतन तथा विलय की वृत्ति तमस् से मिलती है । इसप्रकार ये प्रवृत्तियाँ
विश्व के पालन, सृजन और सन्हार के लिये जिम्मेदार
होती हैं ।
शुक्रवार, 16 जून 2017
सत्व रज़स तमस
गुण प्रकृति की प्रवृत्तियाँ हैं ।
सत्व – चैतन्य का प्रकाश है, रज़स – बाह्य उन्मुख गति की
प्रवृत्ति है, तमस – जडता, प्रमाद है । प्रकृति के सृजन का आधार है ।
इनके ही प्रभाव के फल से,
प्रकृति बन्धनकारी है, आत्मा जीवन और मृत्यु के चक्र में बधाँ
अनवरत यात्रा करता है । इनकी उत्पत्ति क्षेत्रों के ज्ञाता के स्वभाव से है ।
गुरुवार, 15 जून 2017
प्रकृति के आधार
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये
कि हे माहाबाहो सत्व, रज़स, तमस यह प्रकृति के रचनागत गुण है जो कि अनश्वर आत्मा को शरीर
से बाँधकर रखते हैं ।
बुधवार, 14 जून 2017
बीर्यरूप कारण
सभी जीवित रूपों की माता प्रकृति है
और पिता परमात्मा है । क्योंकि प्रकृति भी परमात्मा की ही एक प्रकृति (स्वभाव) है, इसलिये परमात्मा विश्व का पिता और माता
दोनो ही है । ब्रम्ह इस संसार का वीर्यरूप कारण है । उसके इन उत्पत्तियों द्वारा
ही संसार में समस्त काम चलता रहता है । जहाँ परमात्मा एक अर्थ में इस मानवीय
प्रकृति के लिये अनुभवातीत है वहाँ आत्मा के रूप में ब्रम्ह की प्रत्यक्ष
अभिव्यक्ति भी है ।
मंगलवार, 13 जून 2017
माता पिता
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
बोले कि हे कुंतीपुत्र, जहाँ कहीं भी जिन किन्ही भी
योनियों में जो भी रूप उत्पन्न होते हैं,
उन सभीकी योनि महांन् ब्रम्ह है और मैं पिता हूँ, जो कि बीज़ डालता है ।
सोमवार, 12 जून 2017
हिरण्यगर्भ
समस्त अस्तित्व ब्रम्ह की ही
अभिव्यक्ति है । ब्रम्ह विश्व का बीज़ है । इस संसार के प्रसंग में वह “हिरण्यगर्भ”
विश्वात्मा बन जाता है । गुरू के कथन का अर्थ करते हुये आदिशंकर का कहना है “मैं
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को सन्युक्त करता हूँ जिससे हिरण्यगर्भ का जन्म होता है और
उससे सब प्राणी उत्पन्न होते है” । यह संसार सीमित प्रकृति पर असीमित ब्रम्ह की
लीला है ।
रविवार, 11 जून 2017
प्रकृति गर्भ
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि महान प्रकृति मेरा गर्भ है,
उसमें मैं बीज़ डालता हूँ और हे भारत (अर्जुन) उसमें से यह सभी वस्तुयें और जीव
उत्पन्न होते हैं ।
शनिवार, 10 जून 2017
समानधर्मिता
इस समस्त रूप संसार में, ब्रम्ह ने अपने को, समस्त जीवों में तथा समस्त रूपों में विस्तरित कर दिया है ।
समस्त रूप और नाम सत्य ब्रम्ह के ऊपर अध्यास हैं । समस्त जीव निर्जीव प्रकृति से
बने हैं परंतु ब्रम्ह की छाया से प्रकाशित होकर सजीव हो गये हैं । जीव की
चेतनाभूति उसकी भ्रांति होती है । सत्य आत्मा मात्र साक्षी होता है । माया के
प्रभाव से यह भ्रांति और सत्य के मध्य भेद आवरण से ढका होता है । यही अज्ञान होता
है । इसी आवरण के क्षय से, आत्मा साक्षी स्वरूप में जो कि स्वयं
ब्रम्ह हैं, प्राप्त हो जाता है ।
शुक्रवार, 9 जून 2017
मुक्त दशा
शाश्वत जीवन आत्मा को ब्रम्ह में
विलीन होने की स्थिति नहीं है अपितु आत्मा जो की प्रकृतीय मोंह में आसक्त स्थिति
में है उसे स्वतंत्र ब्रम्ह स्वरूप की स्थिति में स्थापित होकर प्रकृतीय मोंह से
मुक्त होने की दशा है । इस दशा को प्राप्त होने पर आत्मा संसार के व्यवहारिक सुख
और त्रास की स्थितियों से ऊपर उठकर अविरल आनंद की स्थिति को भोग करता है । वह
स्वयं आनंद स्वरूप है ।
गुरुवार, 8 जून 2017
जन्म और प्रलय
सर्वोच्च ज्ञान की महिमा को आगे
बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनसे बोले कि इस ज्ञान का सहारा लेकर वे
मेरे स्वरूप वाले बनकर ना ही सृष्टि का समय आने पर जन्म लेते हैं और ना ही प्रलय
काल आने पर दु:खी होते हैं ।
बुधवार, 7 जून 2017
सर्वोच्च पूर्णता
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
बोले कि अब मैं तुम्हे वह सर्वोच्च ज्ञान भी बताऊँगा जिसे जानकर सभी मुनी इस संसार
से ऊपर उठकर पूर्णता की स्थिति तक पहुँच गये हैं ।
मंगलवार, 6 जून 2017
अनात्मन से अनासक्ति
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
बताये कि जो व्यक्ति अपनी ज्ञान चक्षुओं से क्षेत्र और क्षेत्र के ज्ञाता के मध्य
भेद को आत्मसात कर और सभी प्राणियों के प्रकृति से मुक्त हो जाने को जान लेता है, वह सर्वोच्च ब्रम्ह को प्राप्त हो जाता है
।
इस प्रकार “क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ
के भेद का योग” नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ
सोमवार, 5 जून 2017
एकाकी श्रोत
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
बोले जैसे एक सूर्य सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करता है, हे भारत (अर्जुन) क्षेत्र का स्वामी सम्पूर्ण क्षेत्रों को
प्रकाशित करता है ।
रविवार, 4 जून 2017
अक्षर स्वरूप
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि, चूँकी परमात्मा अक्षर है, अनादि है, निर्गुण है इसलिये हे कुंतीपुत्र (अर्जुन) वह शरीर में निवास
करता है फिरभी वह ना ही कोई कर्म करता है और ना ही उसमें लिप्त होता है ।
शनिवार, 3 जून 2017
अधिष्ठान
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो व्यक्ति इस रूप संसार के समस्त फैले हुये रूपों के केंद्र में एक सत्य
स्वरूप ब्रम्ह की अनुभूति करता है और यह अनुभव करता है कि इन समस्त रूपॉं की
उत्पत्ति उसी एक ब्रम्ह से सम्भव हुई है तो वह व्यक्ति ब्रम्ह को प्राप्त हो जाता
है ।
शुक्रवार, 2 जून 2017
अकर्ता साक्षी
अद्वैत वेदांत प्रशस्थ करता है कि
आत्मा मात्र साक्षी होती है । कर्मों की कर्ता प्रकृति होती है । कर्म से मस्तिष्क
और विवेक प्रभावित होते हैं । आत्मा प्रत्येक भाँति कर्मों की दृष्टा है । आदिशंकर
का मत है कि आत्मा में किसी भी गुण का कोई साक्ष्य सम्भव नहीं हो सकता है । आत्मा
निष्कलंक स्वयं प्रकाशित अद्वितीय चिर आनंद स्वरूप होती है ।
गुरुवार, 1 जून 2017
प्रकृति कर्ता
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो व्यक्ति ऐसा देखता है कि,
कर्मों की कर्ता प्रकृति है और आत्मा अकर्ता है वह व्यक्ति सत्य का दृष्टा होता है
।
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