गुरुवार, 31 मार्च 2016

अहंकार और निरंकार

गुरू द्वारा बताये गये ब्रम्ह के रहस्य को एक व्याख्याकार कहता है कि आत्मा जो कि रूप जीव को आश्रय देती है वह अहंकार बोध के द्वारा उस रूप की प्रकृति से बँधी रहती है जबकि ब्रम्ह जो कि समस्त रूपों का सृजनकर्ता है और समस्त रूप उसके सहारे से ही अपने रूप में स्थिर हैं वह अहंकार भाव से पूर्णतया मुक्त होने के कारण प्रत्येक रूप से अछूता है । 

बुधवार, 30 मार्च 2016

विलक्षण रहस्य

ब्रम्ह के रहस्य को बताते हुये योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि इसपर भी रूप धारी जीव मुझमें एक आश्रय के रूप में रहते नहीं हैं । हे पार्थ इस रहस्य को जानो । यहाँ तक कि मेरी उच्चतर प्रकृति आत्मा जो कि इस रूप संसार के जीवों को आश्रय देती है वह भी मुझमें नहीं रहती है । 

मंगलवार, 29 मार्च 2016

जीव में ब्रम्ह नहीं

यह ब्रम्ह का विज्ञान है लीला है कि यह समस्त रूप संसार तथा इस रूप संसार की प्रत्येक गति ब्रम्ह द्वारा है फिरभी ब्रम्ह ना ही इस रूप संसार के किसी रूप में है और ना ही इसकी किसी गति में ही है । यही रहस्य इस संसार का जानने योग्य सर्वोच्च रहस्य है, सर्वोच्च ज्ञान है । 

सोमवार, 28 मार्च 2016

रूप-संसार ब्रम्ह से

गुरू द्वारा बताये गये ब्रम्ह के रहस्य के अनुसार यह समस्त रूप संसार ब्रम्ह से है, ब्रम्ह के सहारे पर स्थिर है, इसमें होने वाली प्रत्येक गति प्रत्येक परिवर्तन ब्रम्ह द्वारा है फिरभी यह रूप संसार ब्रम्ह को निरूपित नहीं करता है । ब्रम्ह पूर्णतया भिन्न है और इस रूप संसार से पूर्णतया अछूता है |

रविवार, 27 मार्च 2016

ब्रम्ह अ-सम्बद्ध

गुरू द्वारा बताये गये ब्रम्ह के रहस्य के अनुसार यह समस्त रूप संसार ब्रम्ह का ही निरूपण है फिरभी ब्रम्ह इनमें से किसी भी रूप में नहीं है । यह समस्त रूप ब्रम्ह की प्रकृति को निरूपित करते हैं परंतु इनमें ब्रम्ह नहीं है । ब्रम्ह पूर्णतया भिन्न स्वत: अस्तित्व है जिसका इस रूप संसार से कोई सीधा सम्बंध नहीं है । 

शनिवार, 26 मार्च 2016

समाहित दशा

ब्रम्ह के रहस्य को बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि यह पूरा रूप संसार मेरी अपरिवर्तनीय अरूपधारी प्रकृति से युक्त होकर हमारे अंदर समाहित दशा में है जबकि मैं उसमें नहीं हूँ । 

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

अनिवार्य वाँक्षना

ब्रम्ह का साक्षात् अनुभव पाने को सचेष्ट व्यक्ति के लिये सर्वोच्च महत्वपूर्ण होगा कि वह अपनी आठ वर्गीय निम्नतर प्रकृति को अपनी उच्चतर प्रकृति आत्मा के प्रति पूर्ण समर्पित कर देवें । यही दशा सतत् का अभ्यास बन जाने पर व्यक्ति ब्रम्ह का साक्षात् अनुभव करेगा । 

गुरुवार, 24 मार्च 2016

आत्मब्रम्ह

ब्रम्ह का साक्षात् अनुभव पाने के लिये सर्वप्रथम व्यक्ति को अपने अंदर विद्यमान ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति आत्मा के प्रति निष्ठावान होना होगा तथा द्वितीय चरण में उसे यह दृढ विश्वास स्थिर करना होगा कि आत्मा चेतना के जीवन के आदर्ष प्रतीक अवतारी पुरुष के जीवन स्तर तक हम अवश्य पहुँच सकेंगे । 

बुधवार, 23 मार्च 2016

अवतार का अनुसरण

हम ब्रम्ह की कल्पना अवतार पुरुष के जीवन के रूप में करते हैं । इस प्रकार अवतार पुरुष की आराधना ही ब्रम्ह की आराधना का पर्याय होता है तथा इस आराधना का लक्ष्य होता है उस अवतारी पुरुष के जीवन स्तर को पाना । यह विश्वास कि हम उस अवतारी पुरुष के जीवन स्तर को प्रयत्नों द्वारा हासिल कर सकेंगे, इस आराधना की मुख्य वाँक्षना होती है ।  

मंगलवार, 22 मार्च 2016

पुनर्जन्म के चक्र में

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस व्यक्ति की आस्था इस सत्य के ज्ञान के प्रति नहीं होती है जो व्यक्ति इस सत्य के ज्ञान और उसके अनुभव के लिये नहीं सचेष्ट होता, वह पुनर्जन्म के इसी चक्र में भ्रमण करता रहता है । 

सोमवार, 21 मार्च 2016

फल

गुरू की शिक्षा को ग्रहण करके उनके द्वारा सुझाये गये पथ से अग्रसर होने का फल होगा जिज्ञासु की विकसित मानसिक क्षमता, स्वयं अपनी अनुभूतियों को संकलित एवं क्रमबद्ध करने की विकसित क्षमता का प्राप्त होना जिसके फल से व्यक्ति स्वयं उस सत्य की साक्षात अनुभूति कर सकेगा । 

रविवार, 20 मार्च 2016

प्रत्यक्ष अनुभव

गुरू के उपदेशित पथ के अनुसरण से सत्य को स्वयँ अपने अनुभूति द्वारा जाने । यह पुस्तक का ज्ञान नहीं है, यह प्रवचन द्वारा संचरित ज्ञान नहीं है, वंश परम्परा द्वारा अंतरित ज्ञान नहीं है । सत्य स्वयँ प्रकाशित विषय है जिसे कि मानसिक विकास द्वारा, विकसित संवेदनशीलता द्वारा, विकसित नैसर्गिक अनुभूतियों की ग्रहणक्षमता द्वारा स्वयं की अनुभूति द्वारा बिना किसी बाह्य शिक्षा के माध्यम से जाने । 

शनिवार, 19 मार्च 2016

राज़ विद्या

गुरू द्वारा सत्य के सम्बंध में दिये गये उपदेश को व्याख्याकार राज़ विद्या की उपाधि देता है । कहता है कि यह समस्त विद्याओं की राजा है । सत्य ही इस ज्ञात संसार का ज्ञेय सर्वोच्च रहस्य है । इसलिये इस सत्य को जानना इस संसार के सर्वोच्च रहस्य को जानना है । समस्त रूप संसार प्रकृति द्वारा निर्मित है जबकि सत्य मौलिक स्वत: अस्तित्व है । सर्वोच्च पवित्र है । समस्त रूप संसार विनाशशील है जबकि सत्य अक्षर है । 

शुक्रवार, 18 मार्च 2016

शिरोमणि ज्ञान

सत्य का ज्ञान के सम्बंध में गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से बताया कि यह शिरोमणि ज्ञान है, शिरोमणि रहस्य है, सर्वोच्च पवित्रता है, नियमों के अनुरूप है, इसका अभ्यास सुगम है और यह अक्षर है । 

गुरुवार, 17 मार्च 2016

प्रत्यक्ष अनुभूति

सत्य की अपरिवर्तनीय प्रकृति आत्मा ही व्यक्ति के जीवन का आधार होती है । दार्शनिक कहता है कि ईश्वर है परंतु हम उसे सीधे रूप से नहीं जान सकते है बल्कि अ-परोक्ष अनुभव से ही जान सकते हैं । परंतु एक संत एक फक़ीर उसे अपनी आत्मा के अंत:करण में अनुभूति के अनुभव द्वारा सीधे रूप से जानता है । गुरू अपने शिष्य को सत्य की अनुभूति स्वयं उसके अपने अनुभूति द्वारा करा देना लक्ष्य करते हैं । 

बुधवार, 16 मार्च 2016

दोष से रक्षित

ज्ञान के प्रकाश में जीवन जीना हित है । अज्ञान का धुंध हमें धरोहरि में मिली है । गुरू सत्य का ज्ञान कराने के लिये शिष्य को अज्ञान के कु-प्रभाव से रक्षित करने के उद्देष्य से उसे प्रकृतीय मोंह से उबारने के लिये विज्ञान की शिक्षा देते हैं । 

मंगलवार, 15 मार्च 2016

विज्ञान सहितम्

सत्य को जानना ज्ञान है । सत्य की अभिव्यक्ति उसकी प्रकृति को विस्तार से एवं क्रमबद्ध रूप से जानना विज्ञान है । ज्ञान के लिये व्यक्ति को उपलब्ध ज्ञानेंद्रियाँ अक्षम होती हैं । इसलिये ज्ञान की अनुभूति ही सम्भव हो सकता है । इस अनुभूति के लिये सत्य के प्रगट रूप उसकी प्रकृति का विस्तार पूर्वक ज्ञान आवश्यक वाँक्षना है इसलिये गुरू ने अर्जुन से कहा कि मैं तुम्हे सत्य की अनुभूति पाने का रहस्य विज्ञान सहित बताऊँगा । 

सोमवार, 14 मार्च 2016

सत्य का अंवेषण

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि अब मैं तुम्हे समस्त प्रकृतीय ज्ञान सहित सत्य को जानने का रहस्य बताऊँगा जिसे जानने के बाद तुम दोष से पूर्णतया मुक्त हो जावोगे ।  

रविवार, 13 मार्च 2016

ब्रम्ह समाहित

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जो योगी इन समस्त तथ्यों को जानते हुये अक्षर ब्रम्ह से युक्त रहते हुये जीवन के समस्त कर्मों को करता है वह अक्षर ब्रम्ह की स्थिति को प्राप्त होता है ।

इस प्रकार अक्षर ब्रम्ह से योग नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ । 

शनिवार, 12 मार्च 2016

मोंह से मुक्त योगावस्था

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा हे अर्जुन जो व्यक्ति इन ज्ञान और अज्ञान के पथ को जानता हैं वह मोंह के भ्रम से ग्रसित नहीं होता है तथा ब्रम्ह के साथ युत् रहते हुये ब्रम्ह की शांति का भोग करता है । 

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

ज्ञान - प्रकाश, अज्ञान - अंधकार

सत्य को जानना । सत्य की मर्यादा के अनुरूप जीवन यापन करना । यह प्रकाश के दिन में जीवन जीना है । अज्ञान के भ्रम में जीवन जीना । मोंह की रात्रि में जीवन जीना है । ज्ञान के प्रकाश में जीवन जीने का फल होगा मोंह से मुक्ति फलत: मोक्ष । इसके विपरीत अज्ञान की परिधि में मोंह के भ्रम में जीवन जीना । पुनर्जन्म के पथ पर चलते जाना है । द्वैतो का त्रास भोगने का जीवन जीना है । 

गुरुवार, 10 मार्च 2016

मोक्ष और पुनर्जन्म

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि दो पथ जिन्हे प्रकाश और अंधकार द्वारा व्यक्त किया जाता है के द्वारा ज्ञान तथा अज्ञान का रूप बताया गया है, यह दो इस संसार में प्रचलित दो पथ हैं, जिनके माध्यम से व्यक्ति मोक्ष और पुनर्जन्म की यात्रा करता है । 

बुधवार, 9 मार्च 2016

जन्म की ओर

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि धुँआ, रात्रि, माह का वह आधा भाग जब चंद्रमा आकाश में नहीं उदय होता है, वर्ष का वह छ: माह जिसमें सूर्य प्रथ्वी के दक्षिणी भाग मे होता है की अवधियों में जो व्यक्ति मोंह से मुक्त होता है वह पुन: मोंह में वापस लौटता है । 

मंगलवार, 8 मार्च 2016

मोक्ष की ओर

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि अग्नि, प्रकाश, दिन, माह का आधा भाग जिसमें चंद्रमा आकाश में उदय होता है, वर्ष का वह छ: माह जिसमें सूर्य प्रथ्वी के उत्तरी भाग में होता है की अवधियों में व्यक्ति यदि मोंह से मुक्त होता है तो वह पुन: मोंह में वापस नहीं लौटता है

सोमवार, 7 मार्च 2016

प्रलय काल

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि हे अर्जुन मैं अब तुम्हे वह काल बताऊँगा जिसमें यदि व्यक्ति मोंह से मुक्त होता है तो वह दोबारा मोंह में वापस आसक्त नहीं होता है और तुम्हे वह काल भी बताऊँगा जिसमें यदि व्यक्ति मोंह से मुक्त होता है तो वह वापस मोंह में लौटकर पुन: आसक्त हो जाता है । 

रविवार, 6 मार्च 2016

अनन्य समर्पण

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा हे पार्थ उसी परम् सत्य के अंदर ही यह समस्त परिवरतनशील रूप संसार स्थित है, उस सत्य के अवलम्ब से ही यह समस्त रूप स्थिर है और उस परम् सत्य को अनन्य समर्पण के द्वारा ही पाया जा सकता है । 

शनिवार, 5 मार्च 2016

प्रभव, प्रलय, मोक्ष

रूपों को अवलम्ब देने के लिये उच्च प्रकृति आत्मा की रूप में स्थापना – प्रभव, पुन: रूप की प्रकृति में विलय की दशा – प्रलय, तथा आत्मा की इस प्रभव और प्रलय की बाध्य परिस्थितियों से मुक्ति – मोक्ष यह तीनों ही स्थितियाँ ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति आत्मा के लिये हैं । आत्मा जब प्रकृतीय मोंह से मुक्त होकर योग की अवस्था में अपने कर्मदायित्व का निर्वाह करने में सफल हो जाती है तो उसे फलत: मोक्ष प्राप्त होता है । 

शुक्रवार, 4 मार्च 2016

अक्षर सर्वोच्च

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि समस्त परिवर्तनों से परे इन परिवर्तनों से अ-प्रभावित वह अक्षर सर्वोच्च है । उसी को पाना सर्वोच्च उपलब्धि है । जिन्हे यह स्थिति मिल जाती है वे इन परिवर्तनों में वापस नहीं लौटते हैं । वह स्थिति पाना ही सर्वोच्च लक्ष्य होता है । 

गुरुवार, 3 मार्च 2016

उदय और विलय की व्याख्या

ब्रम्ह की निम्नतर आठ वर्गीय प्रकृति द्वारा निर्मित रूपों को ब्रम्ह की अव्यक्त उच्चवर्गीय प्रकृति आत्मा के अवलम्ब से रूपों की उत्पत्ति अर्थात् उदय और कालांतर से इन समस्त रूपों का प्रकृति में विलय इस सृष्टि की सामान्य चक्रीय व्यवस्था है । परंतु इन समस्त परिवर्तनों के मध्य वह अपरिवर्तनीय सत्य जो कि इन समस्त परिवर्तनों से अछूता रहता है वह शाश्वत् ब्रम्ह है । आत्मा कंचिद अपना दायित्व यथा अपेक्षित निर्वाह करने में सफल हो जाती है तो उसे इस चक्रीय व्यवस्था से मुक्ति मिला जाती है और वह ब्रम्ह में विलय कर जाती है । 

बुधवार, 2 मार्च 2016

शाश्वत अस्तित्व

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि ब्रम्ह शाश्वत् अस्तित्व है जो कि रूपों के उदय और विलय से पूर्णतया अप्रभावित रहता है तथा अपनी अरूपधारी प्रकृति आत्मा से भी पूर्णतया परे है । 

मंगलवार, 1 मार्च 2016

उदय विलय बाध्यता

जीवों की उत्पत्ति और विलय की श्रंखला को बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि यही सीमित रूप दिन का उदय होने पर उत्पत्ति को बाध्य होते हैं और रात्रि का आगमन होने पर विलय के लिये बाध्य होते हैं यह श्रंखला सतत् चलती रहती है ।