प्रकृतीय
मोंह से मुक्ति इसी रूप संसार में जीवन जीते ही मिल सकती है । इसके लिये सही धारणा
बनाने की आवश्यकता होती है । प्रत्येक रूप में ब्रम्ह की अनुभूति होने की दशा उस
रूप के प्रति आसक्ति-मोंह का निवारण करने वाली होगी । प्रत्येक रूप के प्रति
आदर भाव ब्रम्ह चेतना का प्रतीक होगी । गुरू द्वारा उपदेशित पथ प्रत्येक रूप में ब्रम्ह के दर्शन का बोध निष्चय ही प्रकृतीय मोंह को क्षीण करने वाली होगी ।
शुक्रवार, 31 जुलाई 2015
गुरुवार, 30 जुलाई 2015
मुक्ति
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति समस्त रूपों में ब्रम्ह को
विद्यमान देखने का अभ्यासी बनता है उसे इस भूलोक में जीवन जीते हुये इस रूप संसार
के रूपों के मोंह से मुक्ति मिल जाती है । ब्रम्ह जो कि दोष रहित है वह सभी में
विद्यमान है । मस्तिष्क में यह भाव स्थिर से स्पापित हो जाने पर मनुष्य ब्रम्ह में
स्थापित हो जाता है ।
बुधवार, 29 जुलाई 2015
समभाव की व्याख्या
इस
रूप संसार के प्रत्येक रूप की रचना में एक उभयनिष्ठ एकता, परम् सत्य के अंश की होती है,
जो कि प्रकृति निर्मित प्रत्येक रूपों में विद्यमान होती है । इस परम् सत्य के अंश
का मूल मौलिक परिचय, उसकी सत्य और असत्य के मध्य भेद के
प्रति जागरूकता तथा शांत भाव होता है । भेद आत्मा और प्रकृति में होता है ना कि
आत्मा और शरीर में । प्रकृति वस्तु विस्तार, मिश्रण एवं परवशता पर आधारित होती है
जबकि आत्मा स्वतंत्र अस्तित्व होता है । इस प्रकार यदि प्रत्येक रूप की आत्मा को
उस शरीर का परिचय माना जाय तो गुरू द्वारा बताया गया समभाव स्पष्ट विदित हो जायेगा
।
मंगलवार, 28 जुलाई 2015
विद्या विनय सम्पन्ने
व्याख्याकार
कहता है कि ज्ञान का जिज्ञासु जितना ही सीखता है उतना ही विनम्र हो जाता है । जब
हम अंधकार मे मोमबत्ती जलाते हैं तभी हमें अनुभव आता है कि अंधकार कितना गहन है । सच्चाई
यह है कि हम जितना जानते हैं वह हमारे ना जानने की अपेक्षा अति अल्प होता है ।
इसलिये थोडा ज्ञान होने पर व्यक्ति रूढवादी हो जाता है, उससे थोडा अधिक ज्ञान होने पर उसके सामने
अनेकानेक प्रश्न उपस्थित होते हैं, और थोडा अधिक ज्ञान होने पर वह
प्रार्थना करने लगता है । यहाँ तककि ज्ञान का स्तर एक सीमा तक उठने पर यह अनुभव करता है कि हमारा अस्तित्व प्रभु की कृपा से ही है । प्रत्येक धर्म में,
प्रत्येक काल में सभी प्रत्येक विद्वान संत प्रभु के प्रति श्रद्धालु
ही हुये हैं ।
सोमवार, 27 जुलाई 2015
उपलब्धियाँ
उचित
का सही निर्णय करने की विवेक में क्षमता जाग्रित होने के फल से प्राप्त होने वाली
स्थिति को बताते हुये
गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि ज्ञानी संत सभी को समभाव से देखते हैं,
चाहे वह विद्वान विनम्र ब्राम्हण होवे, चाहे वह एक गाय होवे,
चाहे एक हांथी होवे, चाहे एक कुत्ता होवे,
चाहे वह एक नीच वर्ण का मनुष्य होवे ।
रविवार, 26 जुलाई 2015
साधना विधि
सर्वोच्च उपलब्धि तक पहुँचने का उपाय
बताते हुये गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि जो व्यक्ति परम् ब्रम्ह
का चिंतन करते हुये, परम् ब्रम्ह का ध्यान अपने विवेक में
धारण करने के लिये अपनी समस्त उर्जा को व्यय करता है, परम् ब्रम्ह को जानना और पाना अपना
सम्पूर्ण लक्ष्य बना लेता है, अपनी समस्त श्रद्धा को परम् ब्रम्ह में
निवेश करता है वह व्यक्ति एक ऐसी दशा को प्राप्त होता है जहाँ से फिर अज्ञान के
लोक में लौटने का भय नहीं रह जाता है । उसके समस्त कर्म दोष उचित के विवेक के
प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं ।
शनिवार, 25 जुलाई 2015
ज्ञानज्योति
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जिन व्यक्तियों के विवेक में उचित का
सही निर्णय करने की क्षमता ने अज्ञान के ऊपर विजय कर लिया है उनके विवेक में परम्
ब्रम्ह का सूर्य समान चमकता स्वरूप सतत् दीखता रहता है ।
शुक्रवार, 24 जुलाई 2015
ज्ञानेन
ज्ञान
जो कि आत्मा और प्रकृति के द्वैत के भेद का बोध कराता है । नित्य आत्मा और
विनाशशील प्रकृति का भेद बोध । स्वतंत्र अस्तित्व आत्मा और पराधीन प्रकृति के मध्य
भेद । इस भेद को अनुभव करने वाला ज्ञानी होता है ।
गुरुवार, 23 जुलाई 2015
अज्ञानेन
अज्ञान
के अधीन । यह अज्ञान होता है जो मनुष्य को इस विनाशशील संसार के रूपों में सत्य
अस्तित्व का भास सृजित करता है । इसी अज्ञान के वशीभूत मनुष्य सत्य ब्रम्ह को विस्मृत
कर असत्य प्रकृति के मोंह में आसक्त होता है ।
बुधवार, 22 जुलाई 2015
विभु:
आत्मा
जो कि प्रकृति का वेध करने में सक्षम होती है, वह ज्ञानी के आत्मा के रूप में प्रकृति
के गुणों से प्रभावित नहीं होती है । परम् ब्रम्ह के आचरण के अनुरूप क्रिया
सम्पादन प्रेरित करने वाली आत्मा – विभु: । अद्वैत् वेदांत में ज्ञानी की आत्मा और
परम् ब्रम्ह को एकरूप मान्यता है ।
मंगलवार, 21 जुलाई 2015
यथार्थ
मुक्त
आत्मा के विषय में और आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये
कि वह प्रकृति के गुणों के अधीन कोई कार्य नहीं करती है । चूँकि ज्ञान सदैव अज्ञान
के आवरण से आच्छादित रहता है इसलिये लोग भ्रमित होकर प्रकृति के गुणों के अधीन
कार्य करते हैं ।
सोमवार, 20 जुलाई 2015
अकर्ता
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को मुक्त आत्मा के विषय में आगे बताते हैं कि वह ना ही
स्वयँ किसी कार्य की कर्ता होती है और ना ही किसी के प्रतिनिधि के रूप में कार्य
करती है और ना ही वह किसी किये हुये कर्म के फल से कोई सम्बंध रखती है क्योंकि उसे
यह विदित है कि उपरोक्त समस्त प्रकृति के कर्तव्य क्षेत्र के विषय होते हैं ।
रविवार, 19 जुलाई 2015
आत्मप्रकृति
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञान से प्रकाशित आत्मा के लिये बताते हैं कि आत्मा
जब अपनी प्रकृति को नियंत्रित कर लिया हो और कर्म प्रेरण में कर्ता के भाव से
मुक्त हो गयी हो तो वह इस नौ द्वारो की शरीर में मुक्त दशा में रहती है ।
शनिवार, 18 जुलाई 2015
शांति
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि योग की अवस्था में कर्मों को करने के फल से
व्यक्ति ब्रम्ह की दिव्य शांति की दशा को प्राप्त होता है और ब्रम्ह के साथ एकीकृत
अनुभव करते हुये उसे कोई इच्छा जाग्रित ही नहीं होती है । इसके विपरीत जो व्यक्ति
ब्रम्हके साथ एकीकृत अनुभव करने में रुचि नहीं रखता उसे इच्छायें जाग्रित होती हैं
और वह कार्यों के बंधन में रहता है ।
शुक्रवार, 17 जुलाई 2015
आत्मशुद्धि
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि योगी पुरुष अपनी आत्मा की शुद्धि के उद्देष्य
से अपनी इंद्रियों, मस्तिष्क व विवेक से मात्र कार्य करते
हैं परंतु उन कर्मों में आत्मा को कोई आसक्ति नहीं होती है ।
गुरुवार, 16 जुलाई 2015
नि:स्पर्ष की व्याख्या
गुरू द्वारा बताये गये नि:स्पर्ष को स्पष्ट करते हुये व्याख्याकार
कहता है कि जब व्यक्ति इस परिवर्तनशील संसार के कर्मों को अपनी व्यक्तिगत आसक्ति
और रुचि को त्यागकर, उस कर्म को ब्रम्ह को अर्पित करके करता
है,
मस्तिष्क की ऐसी दशा
मे किया गया उसका कर्म मुक्त कर्म होता है । इसलिये पाप से नि:स्पर्ष रहता है । इस
प्रकार कार्य के प्रति मानसिक रुझान, पाप से नि:स्पर्ष रहने के लिये निर्णायक
होती है ।
बुधवार, 15 जुलाई 2015
नि:स्पर्ष
गुरूयोगेश्वर
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस व्यक्ति ने मोंह का पूर्ण त्याग कर लिया है वह
व्यक्ति अपने कार्यों को ब्रम्ह को समर्पित कर करता है, उसके कार्य में पाप का स्पर्ष भी नहीं
होता है जिस प्रकार कमल का पत्ता पानी में रहते हुये भी पानी को स्पर्ष नहीं करता
है ।
मंगलवार, 14 जुलाई 2015
अकर्म की व्याख्या
व्याख्याकार
गुरू के द्वारा बताये गये अकर्म की व्याख्या करते हुये बताता है कि हमें अपने अंदर
विद्यमान शाश्वत् शुद्ध आत्मा जो कि प्रकृतीय सँरचनाओं से पूर्णरूप से भिन्न है को
अनुभव करने की आवश्यकता है । प्रकृति प्रतिपल परिवर्तित होती रहती है जबकि इन
परिवर्तनों के गर्भ में कोई अपरिवर्तनीय सत्य नहीं निहित होता है । आत्मा नैसर्गिक रूप
में अकर्ता होती है । अ-परिवर्तनशील आत्मा को किसी कार्य से कोई प्रयोजन नहीं होता है । इस
अपरिवर्तनशील आत्मा को व्यक्ति अपना परिचय बनावे यही अनुशंसा भगवद्गीता में की गई है ।
सोमवार, 13 जुलाई 2015
अकर्म का स्वरूप
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जो व्यक्ति स्वयं को किसी अलग अस्तित्व के
रूप में अनुभव नहीं करता है बल्कि वह अपने को परम् ब्रम्ह के साथ एकीकृत महसूस
करता है,
उसका देखना, सुनना, स्पर्ष, सूँघना, स्वादलेना, चलना, सोना, साँस लेना, बोलना, विसर्जन करना, धारण करना, आँखों का खुलना बंद होना,
सभी क्रियाँये इस प्रकार सम्पादित होती हैं कि मानो इंद्रियाँ अपने विषयों के साथ
परस्पर कर रही होती हैं ।
रविवार, 12 जुलाई 2015
कर्मयोग
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति योग की दशा में कार्य का
अभ्यासी होता है, जिसकी आत्मा मोंह से मुक्त होती है, जिसे अपनी आत्मा पर पूर्ण नियंत्रण
होता है,
जिसने अपनी को पूर्ण वश में किया है, जिसे प्रत्येक रूप में निहित आत्मा में
एकरूपता का अनुभव मिलता है, उनका कार्य किसी भी दशा में त्रुटिपूर्ण
नहीं होता है ।
शनिवार, 11 जुलाई 2015
मार्ग
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि हे महाबाहो बिना योग की स्थिति को अपनाये
इच्छाओं का त्याग कठिन होता है । जो संत पुरुष योग की स्थिति में कार्य का अभ्यास
करता है उसे शीघ्र ही आत्मज्ञान मिलता है ।
शुक्रवार, 10 जुलाई 2015
इच्छा का परित्याग
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि इच्छा का परित्याग
करने से जो स्थिति प्राप्त होती है वही स्थिति कर्म करते हुये भी प्राप्त होती है
। इस प्रकार जो व्यक्ति इच्छा के परित्याग और कर्म करना दोनो को एक रूप में देखता है वह
सत्य का दृष्टा होता है ।
गुरुवार, 9 जुलाई 2015
अज्ञानी के लिये भेद
अर्जुन
के प्रश्न को और अधिक विस्तार से समझाते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि हे अर्जुन साँख्य और योग में भेद अज्ञानी के लिये है । जो भी व्यक्ति
साँख्य और योग में से किसी एक को सही रूप से अपनायेगा तो उसे दोनों का ही फल
प्राप्त होगा ।
बुधवार, 8 जुलाई 2015
नित्य सन्यासी
ऐसा
व्यक्ति जो प्रतिपल कर्मफल से विरक्ति की भावना से युक्त रहता है । वह कार्य करता
है परंतु कर्मफल से कोई सम्बंध ना रखते हुये । ऐसा कर्मयोगी ही सच्चे अर्थों में
पूर्ण सन्यासी भी होता है । ऐसे योगी को ही नित्य सन्यासी कहा जाता है ।
मंगलवार, 7 जुलाई 2015
तुलना
व्याख्याकार
गुरू द्वारा व्यक्त साँख्य और योग के तुलनात्मक अभिव्यक्ति की व्याख्या करते हुये
कहता है कि जहाँ साँख्य में आत्म-चिंतन द्वारा विवेक को जागृत रखते हुये बंधनकारी
कर्मों के त्याग की अपेक्षा बतायी गई है वहीं योग में सही के चुनाव द्वारा कर्मफल
के परित्याग की अपेक्षा बतायी गई है । दोनों का ही प्रभाव एक ही होता है परंतु
क्रियांवन काल में योग का पथ अपेक्षाकृत सुगम साध्य प्रमाणित होता है ।
सोमवार, 6 जुलाई 2015
तुलनात्मक अभिव्यक्ति
गुरू
के तुलनात्मक अभिव्यक्ति की व्याख्या विस्तार यह है कि जहाँ साँख्य मार्गदर्शन
देता है कि विवेक द्वारा आत्मा और प्रकृति के मध्य भेद को स्पष्ट विदित रखते हुये बंधनकारी
कर्मों का त्याग किया जाय, वहीं योग का निर्देश है कि कर्मफल की
कामना से रहित कर्म किया जाय । यद्यपि की मूल में दोनों ही उपरोक्त अनुशंसाओं का
लक्ष्य एक ही उद्देष्य की प्राप्ति है परंतु फिरभी क्रियांवन में योग का पथ अधिक
सार्थक एवं प्रयोज्य प्रमाणित होता है ।
रविवार, 5 जुलाई 2015
इच्छा से मुक्त कर्म
अर्जुन
के प्रश्न का उत्तर देते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि
बंधनकारी कर्मों का त्याग और बिना कर्मफल की कामना किये कर्म करना दोनों ही आत्मा
को पाप कृत से उबारने वाले पथ हैं । तुलनात्मक दृष्टि से विचार
करने में फल की कामना से मुक्त कर्म अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली प्रमाणित होने वाला
पथ है ।
शनिवार, 4 जुलाई 2015
प्रश्न की व्याख्या
व्याख्याकार
अर्जुन के प्रश्न का विस्तार बताते हुये कहता है कि अर्जुन का प्रश्न
मात्र अर्जुन के परिवेश के व्यक्ति के लिये ही प्रभावी है । जिसे आत्मज्ञान हो गया
है उसे किसी कर्म की वाँक्षना नहीं रह जाती है । इसलिये अर्जुन का प्रश्न मात्र उस
व्यक्ति के लिये उपयोगी है जिसे आत्म-ज्ञान नहीं हुआ है । ऐसे व्यक्ति के लिये
कर्म करना ज्यादा अच्छा पथ है । बिना इच्छा के किया हुआ कर्म बंधनकारी नहीं होता
है और ऐसे ही कर्म के लिये भागवद्गीता में अनुशंसा की गई है ।
शुक्रवार, 3 जुलाई 2015
अर्जुन का प्रश्न
कर्मयोग
तथा ज्ञानयोग का उपदेश गुरू से सुनकर अर्जुन ने गुरू से प्रश्न किया कि हे कृष्ण आपने कर्म का त्याग
बताया तथा इच्छा का त्याग करके कर्म करने
का भी पथ बताया । कृपया निश्चय पूर्वक यह
बतावें कि इन दोनो में से कौन सा पथ ज्यादा उत्तम है ।
गुरुवार, 2 जुलाई 2015
निष्कर्श
अर्जुन को ज्ञान का उपदेश देकर गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण उससे कहते हैं
कि हे पार्थ ज्ञान की तलवार से उस मोंह को काटो जो अज्ञान के कारण तुम्हे आच्छादित
किये हुये है । अपने को योग की अवस्था में स्थापित कर अपना कर्तव्य करो ।
गुरू
के इस कथन के साथ ही ज्ञान-योग नामक चतुर्थ अध्याय पूर्ण हुआ ।
बुधवार, 1 जुलाई 2015
मुक्त कर्म - ज्ञान - आत्मसंयम
गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को उपलब्धियों का क्रम बताते है कि जिस मनुष्य ने योग
धारण कर अपने को मोंह से मुक्त कर कार्य का अभ्यास कर लिया है,
जिसके मस्तिष्क में ज्ञान के प्रति आस्था के बल से उसके संशय निवारण हो गये हैं,
जो सदैव आत्मबोध में लीन रहता है उसके कर्म बंधनकारी नहीं रह जाते हैं ।
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