गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि विनय (अभिमान का ना होना) ईमानदारी (छल कपट से रहित) सहनशीलता, सरलता, गुरू की सेवा, शुद्धता, स्थिरता और आत्मसंयम ।
रविवार, 30 अप्रैल 2017
शनिवार, 29 अप्रैल 2017
विस्तार की व्याख्या
क्षेत्र और क्षेत्र का जानने वाला ।
विषय और वस्तु । जानने वाला विषय है और क्षेत्र वस्तु स्वरूप है । इस दृष्टि से
देखने पर मस्तिष्क में जनित होने वाले आवेग भी वस्तु रूप ही है । अहंकार भ्रम है ।
भले ही इस भ्रम का विस्तार इतना प्रचुर है कि यह आम सत्य है । फिरभी अध्ययन की
परिधि में भ्रम को किसी भी भाँति विषय तो नहीं माना जा सकता है ।
शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017
क्षेत्र का विस्तार
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि इच्छा और द्वेष, सुख और दु:ख, स्थूल देह पिण्ड (शरीर), बुद्धि और दृढता को भी, सक्षेप में विक्षेपों सहित क्षेत्र बताया
जाता है ।
गुरुवार, 27 अप्रैल 2017
अवयवों की व्याख्या
गुरू ने क्षेत्र के चौबीस घटक बताये
– पाँच महान तत्व (क्षिति,
जल, गगन, पावक,
समीर) वासनायें – यह अपूर्ण
इच्छाओं का सन्ग्रह है, विवेक – बुद्धि, यह विश्लेष्णात्मक क्षमता है, अव्यक्त – प्रकृति का अस्तित्व अव्यक्त
होता है, दस इंद्रियाँ – पाँच
ज्ञानेंद्रियाँ तथा पाँच कर्मेंन्द्रियाँ, मस्तिष्क – विचारों के प्रवाह का स्थल, पाँच ज्ञानेंद्रियों के पाँच विषय – गंध, स्वाद, दृष्य, स्वर, ताप । समस्त अनुभव ग्रहण के आधार हैं । साँख्य दर्शन द्वारा
प्रशस्थ प्रकृति के चौबीस विभाजन हैं ।
बुधवार, 26 अप्रैल 2017
क्षेत्र के घटक
गुरू योगेश्वर श्री कृष्ण अर्जुन को
बताये कि पाँच स्थूल महान तत्व, अहंकार, विवेक साथ ही अव्यक्त (वासना), दस इंद्रियाँ और मस्तिष्क तथा पाँच
ज्ञानेंद्रियों के विषय ।
मंगलवार, 25 अप्रैल 2017
ब्रम्हसूत्र
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको
बताये कि इस ज्ञान को ऋषियों द्वारा अनेको विधि से ब्रम्ह को प्रसन्न करने वाले
प्रशंसा गायनों में विशिष्ट सुरनादों में गाया गया है तथा ब्रम्हसूत्र में कारणों
का उल्लेख करते हुये विशिष्ट निर्णयात्मक अभिव्यक्ति द्वारा उल्लेख किया गया है ।
सोमवार, 24 अप्रैल 2017
क्षेत्र व ज्ञाता
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
बोले अब तुम्हे मैं संक्षेप में बताता हूँ कि क्षेत्र क्या है इसकी प्रकृति क्या
है इसके विविध रूप क्या हैं कब यह प्रगट होती है और इसको जानने वाला क्या है तथा
उसका सामर्थ्य क्या है ?
रविवार, 23 अप्रैल 2017
अखण्ड ज्योति पुँज
ब्रम्ह अखण्ड सत्ता हैं जिसने अपने
को समस्त रूपों में, सभी को अपना दर्शन सुलभ कराने के
हेतु प्रगट किया है । उसकी इस कृपा को अज्ञानी उसे संसारी भी कह सकते हैं । उसकी
महिमा की ज्योति स्वरूप “आत्मा” अज्ञानवश अपने को अनात्मन के साथ सम्बद्ध प्रगट
करती है । जीव प्रकृति के बंधन में है ।
शनिवार, 22 अप्रैल 2017
सर्वोच्च ज्ञान
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
कहे हे भारत (अर्जुन) मैं क्षेत्र और क्षेत्र को जानने वाले को जानने को सर्वोच्च
ज्ञान मानता हूँ और मुझे तुम हर प्रत्येक क्षेत्र को जानने वाला जानो ।
शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017
क्षेत्रज्ञ
प्रकृति निर्मित शरीर कर्ता परंतु
कर्म प्रेरण क्षमता से रहित होती है । आत्मा का मौलिक स्वरूप / धर्म अकर्ता, असम्बद्ध, स्वत: प्रकाशित,
दृष्टा, अद्वैत होता है । अज्ञान के वशीभूत
जब आत्मा अनात्मन के साथ सम्बद्ध और कर्ता स्वरूप में प्रगट होने लगती है तो वह
क्षेत्रज्ञ कही जाती है ।
गुरुवार, 20 अप्रैल 2017
क्षेत्र
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
कहे हे कुंती पुत्र (अर्जुन) इस शरीर को क्षेत्र कहा जाता है और इसे जानने वाले को, सत्य के ज्ञाता लोग क्षेत्रज्ञ कहते हैं ।
बुधवार, 19 अप्रैल 2017
भक्त के लक्षण : 8
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
भक्त के लक्षणों को बताते हुये कहे कि जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक “ये तु
धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं”, भक्त के आचरण के सम्बंध में यथोक्तंं
अर्थात् जैसा कि “भक्त के लक्षण 1 से 7 पर्यंत”, का पालन करते हुये मेरी आराधना करता है मैं ऐसे भक्त को अतिशय
प्रिय मानता हूँ ।
इस प्रकार भक्ति-योग नामक बारहवाँ
अध्याय पूर्ण हुआ ।
मंगलवार, 18 अप्रैल 2017
भक्त के लक्षण : 7
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
भक्त के लक्षणों को बताते हुये कहे कि जो व्यक्ति निंदा और अस्तुति दोनो ही
स्थितियों में मौन रहकर समभाव से आचरण करता है, जो किसी स्थिर निकेत के लिये उद्यत नहीं होता है, जिसे जो कुछ भी प्रकृति प्रदत्त उसे
प्राप्त होता है, उसमें संतुष्ट रहता है, जो अपने मस्तिष्क में दृढ है, ऐसे भक्त को मैं प्रिय मानता हूँ ।
सोमवार, 17 अप्रैल 2017
भक्त के लक्षण : 6
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
भक्त के लक्षणों को बताते हुये कहे कि जो व्यक्ति शत्रु और मित्र दोनो के ही साथ
समान व्यवहार करता है मान और अपमान दोनो ही स्थितियों में समभाव में रहता है शीत
और ताप सुख और दु:ख प्रत्येक में सम सहनशील रहता है जो मोंह से मुक्त है |
रविवार, 16 अप्रैल 2017
भक्त के लक्षण : 5
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
भक्त के लक्षणों को बताते हुये कहे कि जो व्यक्ति ना ही किसी को रिझाता है ना ही
किसी से घृणा करता है ना ही किसी को दु:ख देता है ना ही कोई इच्छा करता है जिसने
अच्छे और बुरे से सम्बंध तोड दिया है ऐसा भक्त मुझे प्रिय है ।
शनिवार, 15 अप्रैल 2017
भक्त के लक्षण : 4
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
भक्त के लक्षणों को बताते हुये कहे कि जिस व्यक्ति को कोई कामना नहीं है, जो अपने सात्विक स्वरूप में स्थिर है, जो अपने कार्यों को कुशलता पूर्वक करता है, जो निरंकार रहता है, जिसने किसी भी इच्छाजनित प्रेरण से अपने को
वंचित कर लिया है, मेरा भक्त है वह मुझे प्रिय है ।
शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017
भक्त के लक्षण : 3
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
भक्त के लक्षणों को बताते हुये बताये कि जो व्यक्ति ना ही लोक के त्रास का कारण
बने और ना ही लोक से त्रासित होवे जो कि हर्ष और क्रोध से, भय और उत्तेजना से मुक्त हो वह ही मुझे प्रिय है ।
गुरुवार, 13 अप्रैल 2017
भक्त के लक्षण : 2
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
भक्त के लक्षणों की गणना कराते हुये बताये कि ऐसा योगी जो सदैव संतुष्ट रहे, आत्मनियंत्रित हो, अडिग दृढनिष्चयी हो,
जिसने अपने मस्तिष्क और विवेक को मुझे अर्पित कर दिया हो ऐसे मेरे भक्त को मैं
प्रिय मानता हूँ ।
बुधवार, 12 अप्रैल 2017
भक्त के लक्षण : 1
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
भक्त के लक्षणों की गणना कराते हुये बताये कि व्यक्ति जिसे किसी अन्य जीव से द्वेष
ना हो, जो कि प्रत्येक जीव के साथ करुण
एवं मित्रवत् व्यवहार करे, जो मोंह से मुक्त तथा अहंकार से
मुक्त हो और जो सुख दु:ख में समभाव से धैर्यवान रहे ।
मंगलवार, 11 अप्रैल 2017
उपलब्धि पर्यंत
समस्त साधना का लक्ष्य होता है
मोक्ष । जीवन मरण का चक्र कर्म और कर्मफल से सतत् चलता रहता है । इच्छा-जनित कर्मों के परित्याग के द्वारा कर्मफल
की कामना से मुक्त कर्म सम्भव है । कर्म और कर्मफल का नियम इच्छा-जनित कर्मों पर प्रभावी होता है । इसलिये
लक्ष्य की उपलब्धि के लिये सबसे प्रभावी परिणाम कर्मफल की कामना से मुक्त कर्म
द्वारा ही सम्भावित होती है ।
सोमवार, 10 अप्रैल 2017
गंतव्य पर्यंत
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
बताये कि मस्तिष्क केंद्रित करने की अपेक्षा ज्ञान उत्तम है ध्यानसाधना ज्ञान से
भी उत्तम है और ध्यानसाधना से भी अच्छा है
फलकी कामना से मुक्त होकर कर्म करना क्योंकि फलकी कामना से मुक्त होकर कर्म करने
से तत्काल शांति मिलती है ।
रविवार, 9 अप्रैल 2017
इच्छारहित कर्म
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो व्यक्ति अपने समस्त कर्मों को मुझे समर्पित करके करने में भी सफल ना
हो सके वह प्रकृति द्वारा प्रेरित कर्मों को बिना किसी फल प्राप्ति की कामना से
करने का अभ्यास करे ।
शनिवार, 8 अप्रैल 2017
समर्पित कर्म
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो व्यक्ति ध्यान-साधना द्वारा भी अपने मस्तिष्क को
मुझपर केंद्रित ना कर सके उसे हमारी सेवा को अपना सर्वोच्च लक्ष्य बनाना चाहिये
यहाँ तककि अपने समस्त कर्मों को मुझे समर्पित करके करने से भी वह पूर्णता की स्थिति
को प्राप्त कर सकता है ।
शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017
ध्यान-साधना
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि यदि कंचिद व्यक्ति अपने मस्तिष्क को मुझपर पूर्ण केंद्रित नरने में समर्थ
ना हो सके तो उसे ध्यान-साधना, सांद्रता के पथ से एकाग्रता का अभ्यास करना चाहिये ।
गुरुवार, 6 अप्रैल 2017
मुक्ति पथ
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि जो व्यक्ति अपने मस्तिष्क को मुझपर केंद्रित करके, अपने हृदय में मुझे धारणकर, मुझमें ही जीवन जीता है, वह मुझे प्राप्त करता है इसमें किसी भी
भाँति संशय नहीं है ।
बुधवार, 5 अप्रैल 2017
त्वरित फल
जो व्यक्ति अभ्यास विधि की
अनुशंसानुरूप साधना करते हैं उस साधना का फल बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन से बताये कि ऐसे साधक को मैं तुरंत जीवन मरण के चक्र से मुक्त कर देता हूँ
।
मंगलवार, 4 अप्रैल 2017
अभ्यास विधि
पुरुषोत्तम स्वरूप को लक्ष्य बनाकर
साधक को साधना का अभ्यास कैसे करना चाहिये को बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति अपने समस्त प्रयत्न मुझे अर्पित करते हैं, अपनी समस्त मानसिक क्षमता मुझे अर्पित करते
हुये मुझे पूजते हैं, मेरा ही ध्यान करते हैं, अपने को पूर्ण समर्पित करते हैं ।
सोमवार, 3 अप्रैल 2017
प्रयत्न की समीक्षा
चिदानंद ब्रम्ह स्वरूप के साथ युक्त
होने के लिये साधक को अपने स्व को लाँघकर अपने आत्मा के स्वरूप में समाहित होना
होगा । पुरुषोत्तम स्वरूप के साथ युक्त होने के लिये साधक को अपने स्व को शून्य
करना होगा । कठिन दोनो ही है । आत्मा की अनुभूति करने वाला साधक स्वयं ब्रम्ह
स्वरूप हो जायेगा । स्व को शून्य करने पर साधक पुरुषोत्तम स्वरूप में विलीन हो
जायेगा ।
रविवार, 2 अप्रैल 2017
साधनाकाल
गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण योग साधना
अवधि में जिज्ञासु के प्रयत्नों की समीक्षा करते हुये अर्जुन से बताये कि जो
व्यक्ति अव्यक्त ब्रम्ह से युक्त होने के लिये प्रयत्नशील होते हैं, उनका कार्य अति दुष्कर इसलिये हो जाता है, क्योंकि अव्यक्त पर ध्यान केंद्रित करना
जीवधारी के लिये अति कठिन प्रयत्न है ।
शनिवार, 1 अप्रैल 2017
तुलना का आधार
गुरू द्वारा तुलना करते हुये चरण 1
में पुरुषोत्तम स्वरूप को समर्पित भाव से युक्त होने के प्रयत्न को योग्य बताया
गया है । पुन: चरण 2 व 3 में ब्रम्ह के चिदानंदस्वरूप से युक्त होने के प्रयत्न को
भी सफल प्रयत्न बताया गया है । इससे यही निष्कर्श निकलता है, कि उद्यमी द्वारा सफलता पाने की सम्भावना को
आधार मानकर अनुशन्सा की गई है । पुरुषोत्तम स्वरूप के साथ युक्त होना तुलनात्मक
रूप से चिदानंद स्वरूप के साथ युक्त होने के प्रयत्न की अपेक्षा आसान है ।
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