मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

सात्विक कर्म

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि प्रकृति द्वारा आदेशित कर्म, जिसे बिना आसक्ति के, बिना किसी मोंह अथवा घृणा की भावना से युक्त हुये, जिसे बिना किसी फल की अपेक्षा से किया जाता है उसे सात्विक कर्म कहा जाता है । 

सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

तामसिक ज्ञान

गुणों के विज्ञान में ज्ञान के वर्गीकरण को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि परंतु जो ज्ञान किसी एक कार्य को ही सब कुछ मान लेता है और उसके कारण का कोई ध्यान नहीं रखता और तत्वार्थ को नहीं समझ पाता और जो संकीर्ण है, वह तामसिक ढंग का ज्ञान कहलाता है । 

रविवार, 29 अक्टूबर 2017

राजसिक ज्ञान

गुणों के विज्ञान में ज्ञान के वर्गीकरण को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस ज्ञान के द्वारा विभिन्न प्राणियों में उनकी पृथकता के कारण अस्तित्व की विविधता दिखाई पडती है, उस ज्ञान को राजसिक ज्ञान समझना । 

शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

सात्विक ज्ञान

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जिस ज्ञान के द्वारा सब वस्तुओं और प्राणियों में एक ही अनश्वर सत्ता दिखाई पडती है, जो विभक्तों में भी अविभक्त रूप में विद्यमान है, उस ज्ञान को तू सात्विक ज्ञान समझ । 

शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017

गुणों का विज्ञान

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि गुणों के विज्ञान में, ज्ञान, कर्म और कर्ता को गुणों के अन्तर के अनुसार केवल तीन प्रकार के बताये गये हैं । अब तू इनके विषय में ठीक ठीक सुनो । 

गुरुवार, 26 अक्टूबर 2017

योजित क्रियांवन

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कार्य को योजित करने में तीन अवयव है ज्ञान, ज्ञानका उद्देष्य और ज्ञान-योजित-कर्ता । इसी प्रकार कार्य के क्रियांवन में तीन अवयव हैं साधन, कर्म और कार्य का कर्ता । 

बुधवार, 25 अक्टूबर 2017

प्रतिनिधि रूप

आचार्य आदिशंकर बताये कि ज्ञानी भी कार्य करता है परंतु उसका कार्य मात्र एक ब्रम्ह के प्रतिनिधि के रूप में होता है । कार्य में कर्ता व्यक्ति की मानसिक स्थिति का अधिक महत्व है । व्यक्तिगत इच्छा की पूर्ति में किया गया कार्य वर्जित बताया गया है । 

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

अहंकार से मुक्त

कर्म और कर्ता को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर अर्जुन को बताये कि जो अहंकार की भावना से मुक्त है, जिसकी बुद्धि मलीन नहीं है, वह इन मनुष्यों को मारता हुआ भी मारता नहीं है और वह बंधन में नहीं पडता है । 

सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

एकमात्र कर्ता

गुरू के उपदेश में एक मात्र कर्ता शब्द के प्रयोग को आदिशंकर स्पष्ट करते हुये बताये कि “विशुद्ध आत्मा को कर्ता समझता है ।” यदि इसे अभिव्यक्ति का भावार्थ माना जाय तो निश्चय ही वह तथ्य को नहीं समझता है परंतु सामान्यतया जीव को कर्ता समझा जाता है, तो वह मानवीय कर्म के मुख्य निर्धारकों में से, जो सबके सब प्रकृति के उपज है केवल एक है । 

रविवार, 22 अक्टूबर 2017

अ-प्रशिक्षित बुद्धि

कर्म के कारणों को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि ऐसी दशा में जो विकृत मन वाला मनुष्य अपनी अ-प्रशिक्षित बुद्धि के कारण अपने आप को कर्ता समझता है, वह सच्ची स्थिति को नहीं देख रहा होता ।

शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

उचित या अनुचित

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मनुष्य अपने शरीर, वाणी या मन द्वारा जो भी कोई उचित या अनुचित कर्म करता है, उनमें ये पाँच उपकरण अवश्य होते हैं । 

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

दैवम्

कर्म सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक कर्म से कर्मफल सृजित होता है । पूर्व के जन्मों के संचित कर्मफलो को भोगने हेतु वर्तमान शरीर होती है । इसलिये व्यक्ति को ऐसी परिस्थितियों का भी सामना करना पडता है जिसका औचित्य उस व्यक्ति के वर्तमान जन्म के कर्मों से नहीं जुडता है । ऐसे स्थितियों को भाग्य कहकर समाधान किया जाता है । इसी को गुरू ने दैवम् शब्द द्वारा व्यक्त किया है ।

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017

कर्ता

शाब्दिक अर्थ के भाव में कार्य को करने वाला । गुरू के उपदेश के अनुसार कर्ता कर्म के पाँच कारणों मे से एक है । साँख्य सिद्धांत के अनुसार आत्मा केवल साक्षी है । उचिततम अभिव्यक्ति में आत्मा अकर्ता है । प्रकृति आत्मा की उपस्थिति मात्र से गतिमान हो जाती है इसलिये गुरू ने उसे कर्म के कारणों में सम्मलित किया है । 

बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

पाँचवा भाग्य

कार्य के उपकरणों का विस्तार बताते हुए गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कार्य का स्थान और इसी प्रकार कर्ता, विविध प्रकार के साधन, विविध प्रकार की चेष्टायें और पाँचवा भाग्य । 

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

पाँच उपकरण

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा हे महाबाहु (अर्जुन), अब तू मुझसे सब कर्मों को करने के लिये आवश्यक इन पाँच उपकरणों को समझ ले, जैसे कि उन्हे साँख्य सिद्धांत में बताया गया हैं । 

सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

प्रिय अप्रिय मिश्रित

कर्म के फल के त्याग के सम्बंध में गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिन्होने त्याग नहीं किया है, उन्हे मृत्यु के पश्चात् तीन प्रकार के प्रिय, अप्रिय और मिश्रित, फल निलते है परंतु जिन्होने त्याग कर दिया है उन्हे कोई फल नहीं मिलता है । 

रविवार, 15 अक्टूबर 2017

त्यागी

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कर्म का पूर्ण त्याग किसी भी जीवधारी के लिये असम्भव है, परंतु जो व्यक्ति कर्म के फल का त्याग कर देता है वही त्यागी कहलाता है । 

शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

बुद्धिमान व्यक्ति

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको बताये कि उस बुद्धिमान व्यक्ति को, जो त्याग करता है, जिसके संशय समाप्त हो गये हैं और जिसका स्वभाव सात्विक है, अप्रिय कर्म से कोई घृणा नहीं होती और प्रिय कर्म से कोई अनुराग नहीं होता है । 

शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017

सात्विक त्याग

त्याग के सम्बंध में आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर अर्जुन को बताये कि परन्तु जो व्यक्ति नियत कर्तव्य को अपना करने योग्य कार्य मान कर करता है और उसके प्रति सम्पूर्ण आसक्ति तथा फल को त्याग देता है, उसका त्याग सात्विक माना जाता है ।

गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

राजसिक त्याग

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्तिन कर्तव्य का त्याग इसलिये कर देता है कि उसे करने में कष्ट होता है, या उसमें शारीरिक दु:ख का भय है, वह राजसिक प्रकार का त्याग करता है, और उसे त्याग का फल नहीं मिलता है । 

बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

तामसिक त्याग

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि किसी भी नियत किये गये कर्म का त्याग उचित नहीं है । अज्ञान के कारण इस प्रकार के कर्म का त्याग तामसिक ढंग का त्याग कहलाता है । 

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

कर्मयोग का अभ्यास

यज्ञ, दान और तप के कर्मों के सम्बंध में गुरू ने जो उपदेश किया है वह उनके द्वारा पूर्व में बताये गये कर्मयोग की पुन: पुष्टि के समान है । गुरू के उपदेश में सर्वत्र इसी मत की अनुशंसा है कि कर्म का त्याग नही अपितु इच्छा से प्रेरित कर्म का त्याग और त्याग को अधिक स्पष्ट करते हुये बताये कि किये जाने वाले कर्म के परिणाम से जनित होने वाले फल का त्याग होना चाहिये । 

सोमवार, 9 अक्टूबर 2017

सुनिश्चित अंतिम

यज्ञ, दान और तप के कर्मों के विषय में आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये कि परंतु इन कर्मों को भी आसक्ति को और फलों की इच्छा को त्यागकर ही करना चाहिये । हे पार्थ (अर्जुन) यह मेरा सुनिश्चित और अंतिम मत है ।

रविवार, 8 अक्टूबर 2017

पवित्र करने वाले

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये कि यज्ञ, दान और तप के कर्मो का त्याग नहीं करना चाहिये, अपितु उन्हे करते ही रहना चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप बुद्धिमान लोगों को पवित्र करने वाले होते हैं । 

शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

त्याग का सत्य

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले कि हे भरतों में श्रेष्ठ (अर्जुन्) अब तू मुझसे त्याग के सम्बंध में सच्चाई को सुन हे मानवों मे श्रेष्ठ (अर्जुन) त्याग तीन प्रकार का बताया गया है । 

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

यज्ञ दान तप

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कुछ विद्वानो का मत है कि “कर्म को दोष समझकर त्याग देना चाहिये”, जबकि अन्य विद्वानों का मत है कि “यज्ञ दान और तप” के कर्मों का त्याग नही करना चाहिये ।

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

सन्यास और त्याग

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि बुद्धिमान लोग इच्छाजनित कर्मो के त्याग को “सन्यास” कहते है और विद्वान लोग सभी कर्मों के फलो के त्याग को “त्याग” कहते हैं ।  

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

मुक्ति पथ

भगवद्गीता में इच्छा का त्याग करके कर्म करने को सन्यास बताया गया है इस आलोक में कर्म के फल का त्याग, को, त्याग का लक्ष्यार्थ माना जायेगा । मुक्ति त्याग से मिलती है । इच्छाओं के त्याग द्वारा फल का त्याग स्वत: प्राप्त हो जायेगा |

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

सन्यास और त्याग

अर्जुन योगेश्वर के समक्ष जिज्ञासा व्यक्त करता है कि हे महाबाहु (कृष्ण), मैं सन्यास और त्याग का पृथक पृथक सच्चा रूप जानना चाहता हूँ, हे हृषीकेश (कृष्ण), हे केशिनिषूदन (कृष्ण) ! 

सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

असत्

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको बताये कि बिना श्रद्धा के जो यज्ञ किया जाता है, जो दान दिया जाता है, जो तप किया जाता है या कोई कर्म किया जाता है, हे पार्थ (अर्जुन) वह असत् कहलाता है, उसका ना तो इस लोक में और ना तो परलोक नें ही कोई लाभ होता है ।

इस प्रकार “श्रद्धाके तीन प्रकार के भेद का योग” नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ 

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

सत् का विस्तार

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनको बताये कि यज्ञ, तप और दान में दृढता से स्थित रहना भी सत् कहलाता है और इसी प्रकार इन प्रयोजनों के लिये किया गया कोई भी कार्य सत् कहलाता है ।