चरण 2 से क्रमश: - के साथ युक्त
होने की चेष्टा, अपनी ज्ञानेंद्रियों को नियंत्रित
करके, अपने मस्तिष्क को प्रत्येक
परिस्थिति में सम रखते हुये, सभी जीवों के कल्याण में अपने को
हर्षित रखते हुये, प्रयत्न करते हैं, वे भी युक्त स्थिति को प्राप्त होते हैं
इसमें कोई संशय नहीं है ।
शुक्रवार, 31 मार्च 2017
गुरुवार, 30 मार्च 2017
तुलना : चरण 2
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन की
जिज्ञासा की पूर्ति करते हुये चिदानंद ब्रम्ह के साथ युक्त होना और ब्रम्हस्वरूप
पुरुषोत्तम अवतारी पुरुष के साथ युक्त होना की तुलनात्मक स्थिति को बताते हुये
जिज्ञासु अर्जुन से कहे कि लेकिन जो व्यक्ति, अक्षर, अ-परिभाष्य, अ-रूपधारी, सर्वव्यापी, अ-चिंतनीय, अ-परिवर्तनीय, अ-चल, स्थिर – क्रमश: चरण 3
बुधवार, 29 मार्च 2017
तुलना : चरण 1
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन की
जिज्ञासा की पूर्ति करते हुये चिदानंद ब्रम्ह के साथ युक्त होना और ब्रम्हस्वरूप
पुरुषोत्तम अवतारी पुरुष के साथ युक्त होना की तुलनात्मक स्थिति को बताते हुये
जिज्ञासु अर्जुन से कहे कि जो व्यक्ति समर्पित निष्ठा से ओत्प्रोत् होकर अपने हृदय
में सर्वोच्च विश्वास धारण कर अपने मस्तिष्क को मुझपर केंन्द्रित कर मुझसे युक्त
होने की चेष्टा करता है उसे मैं निपुण योगी मानता हूँ ।
मंगलवार, 28 मार्च 2017
निराकार साकार
ब्रम्ह का स्वरूप बताया गया है “सत
चित आनंद” । जागृत चेतना का मनुष्य “अवतारी पुरुष” । ज्ञान का जिज्ञासु क्या पाने
को प्रयत्न करे ? आनंद को प्राप्त व्यक्ति प्रत्येक
भाँति आनंद स्वरूप है । वह आँख के सामने है । उसके कृत उसके विचार सभी कुछ सुलभ है
। ब्रम्ह संसार से बिलकुल अलग असम्बद्ध अस्तित्व है । जिज्ञासु अर्जुन की जिज्ञासा
प्रत्येक भाँति व्यवहारिक है ।
सोमवार, 27 मार्च 2017
चिदानंद पुरुषोत्तम
ज्ञान का जिज्ञासु अर्जुन गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण से प्रश्न करता है कि निराकार अक्षर ब्रम्ह के साथ युत् होने
को चेष्टारत और ब्रम्ह के साक्षात् रूप अवतार की निष्ठा पूर्वक सेवा मे युक्त भक्त
इन दोनों में से किसे युति में अधिक सफलता मिलती है ?
रविवार, 26 मार्च 2017
विश्वरूपदर्शन
गुरू द्वारा अनुग्रहपूर्वक जिज्ञासु
अर्जुन को अपने दिव्यरूप का दर्शन कराया गया । विश्वरूपदर्शन यह प्रगट करता है कि
ब्रम्ह वह धरातल है जिसपर सकल परिवर्तनशील रूप संसार उदय हो रहा है अस्त हो रहा है
। ब्रम्ह उस समुद्र के समान है जिसमें परिवर्तनशील रूपसंसार उठती हुई लहरों के
समान उभरता है लहरों के समान उसी समुंद्र में विलीन हो जाता है ।
इस प्रकार श्रीमद्भागवद्गीता का
विश्वरूपदर्शनयोग नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।
शनिवार, 25 मार्च 2017
पूर्ण समाहित
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण जिज्ञासु
अर्जुन से कहे कि हे पाण्डव (अर्जुन),
जो व्यक्ति प्रकृतीय मोंह से मुक्त दशा में, किसी अन्य जीव से शत्रुता ना रखते हुये, मुझे पाना ही अपना सर्वोच्च अंतिम लक्ष्य
धारण करके पूजता हैं, और समस्त कर्म मेरे लिये ही करता
है, ऐसा व्यक्ति ही मुझे पाने में सफल
होता है ।
शुक्रवार, 24 मार्च 2017
आदर्श भक्ति
एक आदर्श भक्त की परिभाषा करते हुये
आचार्य शंकर बताये कि “एक आदर्श भक्त वह है जो कि अपने प्रत्येक ज्ञानेंद्रिय, मस्तिष्क, विवेक और आत्मा द्वारा ब्रम्ह की अनुभूति करे” । वास्तविकता
में ब्रम्ह की सत्य अनुभूति ही उसका साक्षात्कार है । यही गुरू का उपदेश भी
निर्दिष्ट करता है और आचार्य की परिभाषा भी बताती है ।
गुरुवार, 23 मार्च 2017
अखण्ड भक्ति
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनसे
बताये कि हे शत्रुओं के हंन्ता (अर्जुन) अखण्ड अनन्य भक्ति द्वारा मेरे इस दिव्यरूप
को जाना जा सकता है, सत्य दर्शन किया जा सकता है और
मेरे इस स्वरूप में समाहित हुआ जा सकता है ।
बुधवार, 22 मार्च 2017
देवदुर्लभ
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
कहे कि इस संसार का कोई भी व्यक्ति वेदों के ज्ञानके पथ से अथवा बलिदान के पथ से
अथवा कर्मकाण्डों के धर्मविधान के पथसे प्रयत्न करते हुये आज़ तक इस कालातीत रूप का
दर्शन नहीं कर सका था जिसका कि दर्शन मैंने अनुग्रह पूर्वक तुम्हे कराया है ।
मंगलवार, 21 मार्च 2017
कालातीत
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
कहे कि हे अर्जुन मेरे कालातीत स्वरूप का दर्शन वास्तव में बहुत ही कठिन कार्य है
यहाँ तक कि देवता भी इस रूप के दर्शन के लिये लालायित रहते हैं, का साक्षात् दर्शन मैंने तुम्हे कराया है ।
सोमवार, 20 मार्च 2017
संकलित
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा
अर्जुन के आग्रह को अनुग्रह पूर्वक स्वीकार कर अपने सहज प्रतिभासित मनुष्य स्वरूप
में वापस स्थापित किये जाने पर अर्जुन अपने अंत:करण के उद्गार को व्यक्त करते हुये
कहा कि हे जनार्दन (श्रीकृष्ण) आपके प्रतिभावान मनुष्य स्वरूप को देखकर अब मेरा
मस्तिष्क संकलित हो सका है और मैं अपने सहज स्वभाव को प्राप्त कर सका हूँ ।
रविवार, 19 मार्च 2017
विमोचन
धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र का
वृतांत बताते हुये संजय कहता है कि हे राजन इस प्रकार अर्जुन को श्रीकृष्ण ने अपने
विशाल दिव्यरूप का दर्शन कराने के उपरांत अर्जुन के आग्रह पर अपने को अपने सामान्य
स्वरूप में स्थापित करके अर्जुन को उत्पन्न हुये भय से मुक्त किया है ।
शनिवार, 18 मार्च 2017
सामान्य स्वरूप
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अपने मौलिक
स्वरूप को ग्रहण करते हुये अर्जुन से कहते हैं कि मेरे दिव्य विराट रूपके दर्शनसे
ना ही भयभीत होइये और नाही भ्रमित होइये अपने हृदय में नाही भय करिये और नाही हर्ष
करिये और मेरे मौलिक स्वरूप का दर्शन कीजिये ।
शुक्रवार, 17 मार्च 2017
अनुग्रह
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण दिव्यरूप
के दर्शन की विशिष्टता को बताते हुये अर्जुन से कहे कि इस संसार का कोई भी व्यक्ति
चाहे वेदों के ज्ञानके पथ से, चाहे बलिदान के पथ से. चाहे कर्मकाण्डों के धर्म विधान के पथ से
प्रयत्न करते हुये आज़ तक इस दिव्य रूप का दर्शन नहीं कर सका था जिसे कि मैंने
अनुग्रह पूर्वक तुम्हे कराया है ।
गुरुवार, 16 मार्च 2017
नित्य अनुभव
ज्ञान के जिज्ञासु साधक का लक्ष्य
कंचिद दिव्यरूप का दर्शन मात्र नहीं कहा जा सकता है । यह दर्शन यदि जिज्ञासु का
नित्य अनुभव बन जाय तब अभीष्ट की प्राप्ति मानी जावेगी । दिव्य रूप का दर्शन साधक
के चक्षुओं को खोल सकता है परंतु उन्हे व्यापक नहीं बना सकता है । माया के विस्तार
जिज्ञासु के मस्तिष्क में प्रकृतीय मोंह के जो चकाचौध सृजित करते हैं उनके शमन के
बिना जिज्ञासु को जो दर्शन का लाभ मिला वह क्षीण हो सकता है ।
बुधवार, 15 मार्च 2017
अनुकम्पा
अर्जुन की विनय को स्वीकार करते
हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने, अपना पूर्व का स्वरूप धारण करते
हुये अर्जुन से कहा कि, हे अर्जुन मेरी कृपा से और मेरी
दैवीय शक्ति के माध्यम से ब्रम्ह के जिस दिव्य रूप जो कि, प्रकाशपुंज रूप है सर्वव्यापी है अनंत है और प्राचीनतम है का
साक्षात् दर्शन तुम्हे कराया गया, उस रूप का दर्शन आज़ तक अन्य किसी
को भी नहीं हुआ था ।
मंगलवार, 14 मार्च 2017
महिमा गायन : चरण 11
अर्जुन गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण की
महिमा गायन करते हुये आगे कहता है कि हे विराटरूपधारी प्रभु कृपा पूर्वक अपने शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये चतुर्भुज स्वरूप का दर्शन कराइये हे
महाप्रभु ।
सोमवार, 13 मार्च 2017
अज्ञान द्वारा भय
अर्जुन गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण के
विराट रूप के दर्शन से रोमांचित और भयभीत हो गया है और विनय करता है कि हे प्रभु
आप अपने सामान्य स्वरूप में पुन: स्थापित होने की कृपा करें । अर्जुन मोंह से
आच्छादित है । विनाशशील से मोंह और अविनाशी की विस्मृति दोनों एक दूसरे के पर्याय
हैं । जिस व्यक्ति को सत्य विस्मृत हो और उसी विस्मृत दशा में सत्य के विराट रूप
का दर्शन हो जाय तो भय साधारण प्रतिफल होगा । वही मनोदशा अर्जुन व्यक्त करते हुये
विनय करता है कि हे प्रभु आप अपने सामान्य स्वरूप को ग्रहण करें ।
रविवार, 12 मार्च 2017
महिमा गायन : चरण 10
अर्जुन गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण की
महिमा गायन करते हुये आगे कहता है कि हे प्रभु आपके दिव्य रूप का साक्षात् दर्शन
करके मैं बहुत खुश हुआ परंतु प्रभु मैं इस विराट रूप के दर्शन से बहुत भयभीत हो
गया हूँ और हे प्रभु हे सम्पूर्ण संसार के प्रश्रय कृपा पूर्वक अपने पूर्व के रूप
के दर्शन कराइये प्रभुश्री ।
शनिवार, 11 मार्च 2017
महिमा गायन : चरण 9
अर्जुन गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण की
महिमा गायन करते हुये आगे कहता है कि हे आराध्य देव मैं आपके ऐश्वर्य के सम्मुख
साष्टांग प्रणति करते हुये विनय करता हूँ कि प्रभु मुझे अपना पुत्र मानकर, प्रिय मानकर, सखा मानकर हमारी धृष्ठता के लिये क्षमा करने की कृपा करें ।
शुक्रवार, 10 मार्च 2017
महिमा गायन : चरण 8
अर्जुन गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण की
महिमा गायन करते हुये आगे कहता है कि हे प्रभु आप इस संसार के समस्त चल और अचल
रूपों के पिता हैं प्रभु आप समस्त ऋषि मुनियों की तपस्या का अंतिम लक्ष्य ज्ञेय
सत्य हैं हे प्रभु आप समस्त संसार के उपदेशक गुरू हैं हे प्रभु आपके अतुलनीय बल और
ऐश्वर्य की समानता कोई अन्य नहीं कर सकता है ।
गुरुवार, 9 मार्च 2017
महिमा गायन : चरण 7
चरण 6 से क्रमश: - और जो कुछ भी
अ-मर्यादित आचरण मुझसे चाहे खेल खेलते समय, चाहे मित्रवत् बैठे हुये और चाहे खाते हुये इतना ही नहीं चाहे
अकेले में और चाहे लोगो की उपस्थिति में हुआ हो उसके लिये हे अतुलनीय बलशाली देवों
के देव मुझे क्षमा करें प्रभू ।
बुधवार, 8 मार्च 2017
महिमा गायन : चरण 6
अर्जुन गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण की
महिमा गायन करते हुये आगे कहता है कि हे प्रभुजी मैंने असावधानी में और आपके इस
स्वरूप और इस बल को ना जानते हुये अज्ञान में अपना सखा जानकर कभी कृष्ण कभी यादव
कभी सखा जैसे शब्दों से स्नेह्वश कहा – क्रमश: चरण 7 में
मंगलवार, 7 मार्च 2017
महिमा गायन : चरण 5
अर्जुन गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण की
महिमा गायन करते हुये आगे कहता है कि हे महाबली आपका सम्मुख अभिवादन है आपका पीछे
अभिवादन है आपका प्रत्येक दिशा से अभिवादन है आपकी शक्ति और आपके बल को किसी सीमा
से नहीं परिभाषित किया जा सकता है आप सभी में समाहित हैं इसलिये आप सर्वस्य हैं ।
सोमवार, 6 मार्च 2017
महिमा गायन : चरण 4
अर्जुन गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण की
महिमा गायन करते हुये आगे कहता है कि हे प्रभु आपही वायु हैं आपही यम हैं आपही
अग्नि हैं आपही वरुण हैं आपही शशांक हैं आपही प्रजापति हैं आपको हज़ार बार प्रणाम
हैं आपको पुन: प्रणाम है आपको पुन: प्रणाम है ।
रविवार, 5 मार्च 2017
महिमा गायन : चरण 3
अर्जुन गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण की
महिमा गायन करते हुये आगे कहता है कि हे महाप्रभु आप ही प्रथम देवता हैं आप ही
प्रथम पुरुष हैं आप ही सकल संसार के लिये आश्रय हैं । आप समस्त संसार को जानने
वाले है आपको को जानना ही संसार के लिये सर्वोच्च ज्ञान है और आप समस्त रूपों में
व्याप्त हैं आप अनंत हैं प्रभु ।
शनिवार, 4 मार्च 2017
महिमा गायन : चरण 2
अर्जुन गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण की
महिमा गायन करते हुये आगे कहता है कि हे उत्कृष्ठतम उन्नत स्वत: अस्तित्व आप
ब्रम्हा के भी सृजनकर्ता हैं आपही से समस्त उत्पत्ति हुई है आप अनंत है आप देवों
के भी देव हैं सकल संसार के लिये आश्रय है आप अविनाशी हैं आप ज्ञेय और अज्ञेय दोनो
ही हैं ।
शुक्रवार, 3 मार्च 2017
महिमा गायन : चरण 1
अर्जुन साहस पूर्वक गुरु योगेश्वर
श्रीकृष्ण का महिमा गायन करते हुये कहता है कि हे हृषीकेश (श्रीकृष्ण) सभी राक्षस
भय से हर दिशाओं में भाग रहे हैं और सभी देव तथा सिद्ध ऋषि मुनि नतमस्तक होकर आपकी
आराधना कर रहे हैं स्तुति गायन कर रहे हैं ।
गुरुवार, 2 मार्च 2017
चित्रण
संजय धृतराष्ट्र को युद्ध क्षेत्र
की स्थिति का चित्रण व्यक्त करते हुये कह्ता है कि अर्जुन केशव (श्रीकृष्ण) से
शत्रु से युद्ध करने की बात को सुनकर अपने दोनो हाँथो को प्रणाम की मुद्रा में
जोडे हुये भय से अवसन्न दशा में काँपती और लडखडाती हुई आवाज़ में बोलता है ।
बुधवार, 1 मार्च 2017
शत्रु को परास्त
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से
कहते हैं कि हे अर्जुन कोई भय मत करो और शत्रु पँक्ति में खडे द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण,और अन्य योद्धाओं का बध करके शत्रुओं को परास्त करों और
ऐसा जानो कि इन सभी की मृत्यु के आदेश
पारित किये जा चुके हैं ।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)