भगवद्गीता
गुरुवार, 18 जनवरी 2018
विस्मय
सन्जय धृतराष्ट्र से आगे कहता है कि जब जब मैं हरि (कृष्ण) के उस अत्यन्त आश्चर्यजनक विराट रूप को याद करता हूँ
,
तो मुझे बहुत विस्मय होता है
,
मैं बार-बार पुलकित हो उठता हूँ ।
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