भगवद्गीता
बुधवार, 17 जनवरी 2018
पुलकित
सन्जय धृतराष्ट्र से आगे कहता है कि हे महाराज
,
मैं केशव (कृष्ण) और अर्जुन के इस अद्भुद और पवित्र संवाद को बारम्बार स्मरण करके आनन्द से पुलकित हो रहा हूँ ।
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