व्यक्ति प्रकृति
के निर्देशों को यथास्वरूप ग्राह्य नहीं कर पाता है । उसकी अपनी मनोवृत्तियाँ बाधक
होती हैं । गुरू का उपदेश प्रशस्थ करता है कि व्यक्ति को अपने मनोवेगों को अन्कुश
करके उसे प्रकृति द्वारा सृजित आदेशों को यथास्वरूप ग्रहण करने की दृढता होनी
चाहिये ।
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