गुरू ने आश्रित
बनने के लिये जो उपदेश दिया उसका अभिप्राय है कि अज्ञान के कारण व्यक्ति दोष-पूर्ण
कर्मों का कर्ता हैं जिसके फल से वह जीवन-मरण के चक्र में घूम रहा हैं, जो कि बन्धन है, इसलिये यदि व्यक्ति
मुक्ति चाहता हो तो उसे अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को अर्पित करके करने का पथ गुरू
ने उपदेश किया है । व्यक्ति ईश्वर को समर्पित हो जाये तो वह व्यक्ति को उसके
दोषपूर्ण कर्मों से रक्षा करेगा, अर्थात् उसका कर्म का कर्तापन का भाव क्षीण होगा, यह गुरू के उपदेश का
सार है ।
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