अर्जुन ने ज्ञान
के उपदेश के फल से, नीयत कर्म अर्थात् प्रकृति द्वारा आदेशित कर्म को करने का
निश्चय किया । उपदेश के पूर्व इसी कर्म को करने से अर्जुन विमुख होने का निश्चय कर
रहा था । एक निश्चय और अनिश्चय की परिधि में था । गुरू के उपदेश से अर्जित हुई
मानसिक शक्ति द्वारा, जागृत हुये विवेक से वह एक निश्चयात्मक निर्णय को करने में
समर्थ हुआ ।
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