शनिवार, 5 नवंबर 2016

रूप विस्तार चरण 5

ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनसे कहे कि ऋषियों में मुझे भृगु जानो, उच्चारण में मुझे अक्षर ॐ जानो, यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ और अचल अधिष्ठानो में मैं हिमालय पर्वत हूँ । 
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।  

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