ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुनसे
कहे कि ऋषियों में मुझे भृगु जानो,
उच्चारण में मुझे अक्षर ॐ जानो, यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ और अचल
अधिष्ठानो में मैं हिमालय पर्वत हूँ ।
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप
के प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप
चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन
स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना
आपकी पूर्णता है ।
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