गुरू द्वारा तुलना करते हुये चरण 1
में पुरुषोत्तम स्वरूप को समर्पित भाव से युक्त होने के प्रयत्न को योग्य बताया
गया है । पुन: चरण 2 व 3 में ब्रम्ह के चिदानंदस्वरूप से युक्त होने के प्रयत्न को
भी सफल प्रयत्न बताया गया है । इससे यही निष्कर्श निकलता है, कि उद्यमी द्वारा सफलता पाने की सम्भावना को
आधार मानकर अनुशन्सा की गई है । पुरुषोत्तम स्वरूप के साथ युक्त होना तुलनात्मक
रूप से चिदानंद स्वरूप के साथ युक्त होने के प्रयत्न की अपेक्षा आसान है ।
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